थोड़ी सी गंभीरता और ध्यान की दरकार है।
मनुष्य के मस्तिष्क में यथार्थ के प्रतिबिंब के तौर पर मन के कई स्तर होते हैं।
चेतना की संरचना और उसकी महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक विशेषताएं क्या हैं?
चेतना की पहली विशेषता तो इसके नाम से ही मालूम हो जाती है, जो परिवेशी विश्व के ज्ञान अथवा बोध का पर्याय है। चेतना की संरचना में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संज्ञानात्मक प्रक्रियाएं शामिल हैं, जिनसे मनुष्य अपने ज्ञान की निरंतर वृद्धि करता रहता है। इन प्रक्रियाओं में संवेदनों, प्रत्यक्षों, स्मृति, कल्पना और चिंतन को सम्मिलित किया जा सकता है। संवेदन और प्रत्यक्ष, जो मस्तिष्क पर उत्तेजित करने वाले कारकों के प्रभाव को सीधे परावर्तित करते हैं, चेतना में वैसा ही इन्द्रियजनित चित्र बनाते हैं, जैसा कि वह मनुष्य को दत्त क्षण में प्रतीत हो रहा होता है।
स्मृति की बदौलत मनुष्य अतीत के बिंबों को चेतना में सुरक्षित रखता है।कल्पना उसे प्रदत्त क्षण में अनुपलब्ध वस्तुओं के बिंबात्मक प्रतिरूप बनाने की संभावना देती है और चिंतन मनुष्य को संचित ज्ञान का तार्किक इस्तेमाल करके समस्याओं को हल करने में समर्थ बनाता है। उपरोक्त मानसिक संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं में किसी एक के भी क्षतिग्रस्त अथवा विकृत होने से चेतना में भी अनिवार्यतः विकृति पैदा हो जाती है।
चेतना की दूसरी विशेषता उसमें कर्ता और वस्तु (विषय) के बीच, अर्थात जो मनुष्य के आत्म का अंग है उसके और जो मनुष्य के अनात्म का अंग है, उसके बीच स्पष्ट भेद किया जाना है। जैव जगत के इतिहास में मनुष्य पहला जीवधारी था, जिसने इस जगत से अलग होकर अपने को परिवेशी वस्तुओं के मुकाबले में रखा। वह अकेला जीवधारी है, जो अपना संज्ञान कर सकता है, अर्थात अपने अहं को अन्वेषण व अध्ययन का विषय बना सकता है। मनुष्य सचेतन ढंग से अपने कार्यों और अपने आप का मूल्यांकन करता है। आत्म का अनात्म से पृथक्करण, जो एक ऐसा अनुभव है जिससे बचपन में हर कोई गुजरता है, मनुष्य की आत्मचेतना के निर्माण में एक महत्त्वपूर्ण चरण है।
चेतना की तीसरी विशेषता मनुष्य के सोद्देश्य क्रियाकलाप का सुनिश्चितीकरण है। चेतना का एक कार्य मनुष्य की सक्रियता के उद्देश्यों का निर्माण है, जिसमें उत्प्रेरकों का बनना तथा उन्हें तौला जाना, संकल्पमूलक निर्णय लेना, विशिष्ट उद्देश्यों की ओर लक्षित कार्यों पर नियंत्रण रखना, आवश्यक सुधार करना, आदि भी सम्मिलित हैं। रोगवश या अन्य किसी कारण से सोद्देश्य क्रियाकलाप में बाधा डालनेवाली सभी मानसिक विचलनों को चेतना का विकार माना जाता है।
चेतना की चौथी विशेषता परिवेश के प्रति एक निश्चित रवैया है। मनुष्य की चेतना का एक अनिवार्य अंग भावों की दुनिया है, जो जटिल वस्तुपरक और मुख्यतः सामाजिक संबंधों को प्रतिबिंबित करती है। मनुष्य जिन अंतर्वैयक्तिक संबंधों में भाग लेता है, उनके भावात्मक मूल्यांकन उसकी चेतना का मूल्यपरक पहलू होते हैं। कई अन्य मामलों की तरह यहां भी विकृतिविज्ञान सामान्य चेतना के सारतत्व को स्पष्ट करने में मदद देता है।
कतिपय मानसिक रोगों में चेतना के विकार का लक्षण भावनाओं और संबंधों के क्षेत्र की गड़बड़ियां होती हैं: रोगी अपनी माँ तक से घृणा करता है, हालांकि पहले वह उसे बेहद प्यार करता था, या फिर वह अपने मित्रों और संबंधियों की बुराई करता है, इत्यादि।
चेतना और भाषा का संबंध
चेतना के उपर्युक्त सभी विशिष्ट लक्षण भाषा के माध्यम से बनते और व्यक्त होते हैं और भाषा मन के विकास से अभिन्नतः जुड़ी हुई है। वास्तव में मनुष्य वाक् के जरिए, भाषा द्वारा होने वाले संप्रेषण के जरिए ही ज्ञान का संचय कर सकता है और मानवजाति द्वारा संचित तथा भाषा में अभिव्यक्त विचारों की संपदा से अपने को समृद्ध बना सकता है। भाषा एक विशेष वस्तुपरक प्रणाली है, जो मनुष्य के सामाजिक-ऐतिहासिक अनुभव अथवा सामाजिक चेतना का प्रतिनिधित्व करती है। व्यक्ति द्वारा आत्मसात् किये जाने पर भाषा एक तरह से उसकी वास्तविक चेतना बन जाती है।
एक सामाजिक उत्पाद होने के कारण चेतना केवल मनुष्य में पाई जाती है। पशुओं में चेतना नहीं होती।
मन का सबसे निचला स्तर अचेतन ( subconsious) है, जिसे यों परिभाषित किया जा सकता है: अचेतन उन मानसिक प्रक्रियाओं, कार्यों और अवस्थाओं की समष्टि है, जो ऐसे प्रभावों पर निर्भर है जिनका कि मनुष्य को बोध नहीं है। चेतन मन के विपरीत अचेतन मन व्यक्ति के कार्यों का सोद्देश्य नियंत्रण अथवा उनके परिणामों का मूल्यांकन करने में असमर्थ होता है।
अचेतन के क्षेत्र में निद्रावस्था के दौरान घटित मानसिक व्यापार ( स्वप्न ) ; असंवेदित, किंतु असल में क्षोभकों द्वारा उत्पन्न अनुक्रियाएं ; जो क्रियाएं पहले चेतनाधारित थी किंतु स्वतः होने या बारंबार आवृति के कारण चेतन मन से विस्थापित हो गयीं ; सक्रियता के कतिपय उत्प्रेरक, जिनमें लक्ष्य की चेतना का अभाव है, और बहुत सी चीज़ें आती हैं। अचेतन परिघटनाओं में बीमार मनुष्य के मन में पैदा होनेवाली प्रलाप, विभ्रम, आदि कतिपय विकृतिमूलक प्रक्रियाओं को भी शामिल किया जाता है। अचेतन मन को चेतन मन का विलोम मानकर, अचेतन को पशु मानस का प्रतिरूप समझ बैठना ठीक न होगा। अचेतन भी मानव मन की चेतना जैसी ही चारित्रिक विशेषता है और वह भी मनुष्य के अस्तित्व की सामाजिक परिस्थितियों द्वारा निर्धारित होता है, हालांकि वास्तव में वह मनुष्य के मन में विश्व का केवल आंशिक तथा अपर्याप्त प्रतिबिंब है।
मन और मस्तिष्क, मन और परिवेश के सहसंबंधों की आगे की जांच के लिए और मानव सक्रियता के मानसिक नियमन तथा नियंत्रण के आगे विश्लेषण के लिए मन की, चेतना की उत्पत्ति के प्रश्न की अधिक विस्तार से विवेचना की आवश्यकता है। वास्तव में मन की मुख्य नियमसंगतियों और मानव चेतना के निर्माण के प्रश्नों का उदविकासीय दृष्टिकोण से विश्लेषण करके ही प्रकाश में लाया और ह्र्दयंगम किया जा सकता है।
समय
प्रस्तुति :शरद कोकास
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