शनिवार, 16 मई 2026

17. आखिर दर्शन का ज्ञान क्यों आवश्यक है


समय ने पिछली बार चाहा था कि मानव-मन या चेतना की उत्पत्ति और विकास की प्रक्रिया को यहां थोड़ा सार रूप में प्रस्तुत किया जाए।

परंतु अब बात चल निकली है, और जाहिर है कुछ संदर्भों, दृष्टिकोणों और शब्दावली का व्यापक प्रयोग किया जाएगा, तो यह ज़्यादा बेहतर रहेगा कि बात उन्हीं से शुरू की जाए।

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चूंकि इस हेतु समय को आपके साथ दर्शन के क्षेत्र की यात्रा करनी है, अतएव यह समुचित रहेगा की दर्शन की चर्चा ही यहां सबसे पहले की जाए। तो चलिए दर्शनशास्त्र से शुरूआत करते हैं।
समय मानवजाति के अद्यतन ज्ञान को सिर्फ़ यहां समेकित कर रहा है।

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मनुष्य के सामने सदा से ही ये प्रश्न उपस्थित रहे हैं कि विश्व में उसका स्थान क्या है, मानव जीवन का लक्ष्य, उद्देश्य और मूल्य क्या हैं? यह दुनिया आगे कैसी होगी? क्या इस संसार से उत्पीड़न और अन्याय कभी गायब हो पाएंगे? मनुष्य की नियति में क्या बदा है, युद्धों का महाविनाश या शांतिपूर्ण जीवन? मनुष्य के वर्तमान नाभिकीय युग में ये प्रश्न, मुख्यतः मानवजाति की संभावनाओं का प्रश्न और भी तीव्रता से सामने आता है। आख़िर मनुष्य अपने समय की समस्याओं और अंतर्विरोधों से कैसे निबटें? विज्ञान और तकनीकि की उपलब्धियों को मनुष्य की बेहतरी के लिए कैसे इस्तेमाल करें? और यह मनुष्य की बेहतरी ही खु़द अपने आप में क्या है?

कोई भी सचेत सक्रिय व्यक्ति ऐसे प्रश्नों का उत्तर खोजने की कोशिश किए बिना नहीं रह सकता है। किंतु विज्ञान और तकनीक स्वयं इन प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सकते हैं, और मुख्य बात इन प्रश्नों के हर समय के लिए मान्य उत्तर खोजना और उन्हें मात्र कंठस्थ कर लेना नहीं है। इस बात में पारंगत होना कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है कि तेज़ी से बदलती हुई इस दुनिया में ऐसे उत्तर कैसे खोजे जाते हैं, कौनसे दृष्टिकोण और पद्धतियां इसके लिए ज़्यादा उपयुक्त रहती हैं, इन उत्तरों की सचाई को कैसे परखा जाता है और फिर उनके अनुरूप कर्म कैसे किए जाते हैं।

इसके लिए दर्शन का ज्ञान आवश्यक है।

यह ज्ञान एक विशेष शास्त्र से प्राप्त होता है, जिसे दर्शनशास्त्र कहा जाता है।

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दर्शन का उद्‍भव प्राचीन यूनान में हुआ। 
पाईथागौरस ने सर्वप्रथम philosophy पद का उपयोग किया था। ‍
इस तरह पाश्चात्य भाषाओं में दर्शन का पर्याय ‘फ़िलॉसॉफ़ी’, दो यूनानी शब्दों- प्रेम और बुद्धिमता से मिलकर बना है, यानि इसका अर्थ है बुद्धिमता के प्रति प्रेम।

मनुष्य के आसपास की दुनिया असीम है और वह इसकी पहेलियों को हल करने का प्रयत्न धीरे-धीरे और क़दम दर क़दम चलकर ही कर सकता है। दर्शन में इस असीम का, हर विद्यमान वस्तु के स्रोतों तथा कारणों का संज्ञान प्राप्त करने के लिए अनवरत खोज में जुटने और और हर उपलब्धि पर संदेह करने के प्रयास मूर्त होते हैं। प्राचीन यूनान के महान दार्शनिक अफ़लातून ने कहा था कि दर्शन का स्रोत आश्चर्य और अचंभे में है।

प्राचीन काल में दर्शन तथा इसके उद्देश्यों के बारे में कई विविधतापूर्ण विचारों का आविर्भाव हुआ। महान यूनानी चिंतक अरस्तु का मत था कि सारे विज्ञान एक विशिष्ट लक्ष्य का अनुसरण करते हैं, केवल दर्शन ही सब विज्ञानों में स्वतंत्र है क्योंकि यह स्वयं अपने ख़ातिर अस्तित्वमान है, वहीं एक और सुप्रसिद्ध चिंतक सिसेरो ने इसकी सर्वथा उल्टी बात का दावा किया और कहा कि दर्शन जीवन का ऐसा ध्रुवतारा है जिसके बिना न तो मनुष्य का अस्तित्व हो सकता है, न स्वयं मानव जीवन का।

क्या दर्शन और धर्म अलग अलग हैं ?

मत एक - कुछ लोगों का विश्वास था कि दर्शन को धर्म से पृथक नहीं किया जा सकता, कि यह धार्मिक मताग्रहों की बेहतर समझ में सहायक है। 

मत दो - जबकि कुछ अन्य की राय थी कि यह संदेहों और तर्कबुद्धि पर आधारित है, अतः धर्म से मेल नहीं खाता क्योंकि धर्म आस्था पर आधारित होता है। दर्शन के सार तथा उद्देश्य के बारे में इस तरह से ही, आधुनिक चिंतकों तक के भी कई मत-मतांतर प्रचलित हैं, जिन पर यदि मौका मिला तो समय फिर कभी दर्शन के इतिहास की चर्चा के अंतर्गत बात करना चाहेगा।

फिलहाल दर्शन की अद्यतन समझ को जिस तरह से सामान्यीकृत कर दिया गया है उसे देखिए।

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यह विश्व प्रकृति और समाज से बना है। ज्ञान की अन्य प्रणालियां, मसलन, दैनिक अनुभव पर आधारित साधारण ज्ञान, राजनैतिक, वैज्ञानिक, तकनीकि ज्ञान, आदि वास्तविकता के अलग-अलग पहलुओ को परावर्तित करती हैं और दैनिक जीवन, उद्योग तथा राजनैतिक संघर्ष में, प्रकृति के संज्ञान के दौरान और अन्य मामलों में उनकी जरूरत पड़ती हैं। साथ ही मनुष्यजाति के इतिहास के प्रत्येक युग, प्रत्येक अवधि ने ऐसे कार्य और सवाल पेश किये हैं जो जीवन की सर्वाधिक बुनियादी समस्याओं को छूते हैं और जिनके समाधान पर संपूर्ण मानवजाति की और प्रत्येक व्यक्ति की नियति निर्भर है।

जनसाधारण के बुनियादी हितों को परावर्तित करने बाली इन समस्याओं को समझना, उनसे अवगत होना और उन्हें सटीकतः निरूपित करना अत्यंत कठिन है, और इससे भी अधिक कठिन है उनको हल करने के तरीक़ों और साधनों का पता लगाना। ऐसा करने के लिए विभिन्न विज्ञानों की उपलब्धियों के अत्यंत गहन ज्ञान, मनुष्यों के बुनियादी हितों को समझने और युगों के विभेदक लक्षणों तथा विशेषताओं को सही ढंग से निरूपित करने की योग्यता की जरूरत होती है।

जाहिर है कि इसके वास्ते ज्ञान की एक विशेष प्रणाली की, एक ऐसी प्रणाली की आवश्यकता है, जो वास्तविकता को उसके अलग-अलग पहलुओं और समस्याओं के बजाय एक साकल्य के रूप में देखने में सक्षम हो और जिसके केन्द्र में अपनी सारी आकांक्षाओं, प्रयासों, आशाओं, संदेहों तथा सवालों, अपने सारे अंतर्विरोधों, खोजों और भ्रमों सहित मनुष्य खडा़ हो।

फलतः दर्शन "अपने काल के बौद्धिक सारतत्व" के और "समसामयिक विश्व के दर्शन" की हैसियत से विश्व में मनुष्य के स्थान तथा अपने परिवेशीय जगत के प्रति उसके रुख़ के ज्ञान की एक विशेष प्रणाली है। वह मनुष्य के क्रियाकलाप के आधारों तथा उनकी नियमसंगतियों को जानने के प्रयत्न करता है।

जर्मनी के महान आधुनिक वैज्ञानिक दार्शनिक और चिंतक कार्ल मार्क्स ने दर्शन की व्याख्या करते हुए कहा था:
" चूंकि प्रत्येक सच्चा दर्शन अपने काल का बौद्धिक सारतत्व होता है, इसलिए वह समय अवश्यंभावि रूप से आता है जब दर्शन ना केवल आंतरिक दृष्टि से, ना केवल अपनी अंतर्वस्तु द्वारा, बल्कि अपने रूप के जरिए, बाह्य दृष्टी से भी अपने काल के वास्तविक जगत के संपर्क में आता है तथा उससे अंतर्क्रिया करता है। और तब दर्शन अन्य विशेष प्रणालियों के संदर्भ में सिर्फ़ एक विशेष प्रणाली भर नहीं रह जाता, बल्कि वह विश्व के संदर्भ में सामान्य दर्शन बन जाता है, समसामयिक विश्व का दर्शन बन जाता है। "

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आज इतना ही।
अगली बार चेतना के संदर्भ मे जारी इस चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।
इस श्रृंखला के बाद समय भारतीय दर्शन पर भी चर्चा करने की योजना रखता है।
आप यहां से गुजरते रहें।

आलोचनात्मक और जिज्ञासात्मक संवादों का स्वागत है।

समय

प्रस्तुतकर्ता : शरद कोकास 

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बुधवार, 13 मई 2026

16.मनुष्य की चेतना वास्तव मे है क्या



इस बार समय, चेतना की संकल्पना पर मानवजाति द्वारा की गयी अद्यानूतन विवेचना को जस की तस रख रहा है।
थोड़ी सी गंभीरता और ध्यान की दरकार है।

मनुष्य के मस्तिष्क में यथार्थ के प्रतिबिंब के तौर पर मन के कई स्तर होते हैं।

मन का उच्चतम स्तर चेतना है, यह मनुष्य की सक्रियता की सामाजिक-ऐतिहासिक परिस्थितियों और अन्य लोगों के साथ निरंतर भाषाई संपर्क की प्रक्रिया में पैदा होती है। इस दृष्टि से चेतना वास्तव में सत्त्व का ज्ञान ही है।

चेतना की संरचना और उसकी महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक विशेषताएं क्या हैं?

चेतना की पहली विशेषता तो इसके नाम से ही मालूम हो जाती है, जो परिवेशी विश्व के ज्ञान अथवा बोध का पर्याय है। चेतना की संरचना में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संज्ञानात्मक प्रक्रियाएं शामिल हैं, जिनसे मनुष्य अपने ज्ञान की निरंतर वृद्धि करता रहता है। इन प्रक्रियाओं में संवेदनों, प्रत्यक्षों, स्मृति, कल्पना और चिंतन को सम्मिलित किया जा सकता है। संवेदन और प्रत्यक्ष, जो मस्तिष्क पर उत्तेजित करने वाले कारकों के प्रभाव को सीधे परावर्तित करते हैं, चेतना में वैसा ही इन्द्रियजनित चित्र बनाते हैं, जैसा कि वह मनुष्य को दत्त क्षण में प्रतीत हो रहा होता है। 
स्मृति की बदौलत मनुष्य अतीत के बिंबों को चेतना में सुरक्षित रखता है।कल्पना उसे प्रदत्त क्षण में अनुपलब्ध वस्तुओं के बिंबात्मक प्रतिरूप बनाने की संभावना देती है और चिंतन मनुष्य को संचित ज्ञान का तार्किक इस्तेमाल करके समस्याओं को हल करने में समर्थ बनाता है। उपरोक्त मानसिक संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं में किसी एक के भी क्षतिग्रस्त अथवा विकृत होने से चेतना में भी अनिवार्यतः विकृति पैदा हो जाती है।

चेतना की दूसरी विशेषता उसमें कर्ता और वस्तु (विषय) के बीच, अर्थात जो मनुष्य के आत्म का अंग है उसके और जो मनुष्य के अनात्म का अंग है, उसके बीच स्पष्ट भेद किया जाना है। जैव जगत के इतिहास में मनुष्य पहला जीवधारी था, जिसने इस जगत से अलग होकर अपने को परिवेशी वस्तुओं के मुकाबले में रखा। वह अकेला जीवधारी है, जो अपना संज्ञान कर सकता है, अर्थात अपने अहं को अन्वेषण व अध्ययन का विषय बना सकता है। मनुष्य सचेतन ढंग से अपने कार्यों और अपने आप का मूल्यांकन करता है। आत्म का अनात्म से पृथक्करण, जो एक ऐसा अनुभव है जिससे बचपन में हर कोई गुजरता है, मनुष्य की आत्मचेतना के निर्माण में एक महत्त्वपूर्ण चरण है।

चेतना की तीसरी विशेषता मनुष्य के सोद्देश्य क्रियाकलाप का सुनिश्चितीकरण है। चेतना का एक कार्य मनुष्य की सक्रियता के उद्देश्यों का निर्माण है, जिसमें उत्प्रेरकों का बनना तथा उन्हें तौला जाना, संकल्पमूलक निर्णय लेना, विशिष्ट उद्देश्यों की ओर लक्षित कार्यों पर नियंत्रण रखना, आवश्यक सुधार करना, आदि भी सम्मिलित हैं। रोगवश या अन्य किसी कारण से सोद्देश्य क्रियाकलाप में बाधा डालनेवाली सभी मानसिक विचलनों को चेतना का विकार माना जाता है।

चेतना की चौथी विशेषता परिवेश के प्रति एक निश्चित रवैया है। मनुष्य की चेतना का एक अनिवार्य अंग भावों की दुनिया है, जो जटिल वस्तुपरक और मुख्यतः सामाजिक संबंधों को प्रतिबिंबित करती है। मनुष्य जिन अंतर्वैयक्तिक संबंधों में भाग लेता है, उनके भावात्मक मूल्यांकन उसकी चेतना का मूल्यपरक पहलू होते हैं। कई अन्य मामलों की तरह यहां भी विकृतिविज्ञान सामान्य चेतना के सारतत्व को स्पष्ट करने में मदद देता है। 

कतिपय मानसिक रोगों में चेतना के विकार का लक्षण भावनाओं और संबंधों के क्षेत्र की गड़बड़ियां होती हैं: रोगी अपनी माँ तक से घृणा करता है, हालांकि पहले वह उसे बेहद प्यार करता था, या फिर वह अपने मित्रों और संबंधियों की बुराई करता है, इत्यादि।

चेतना और भाषा का संबंध 

चेतना के उपर्युक्त सभी विशिष्ट लक्षण भाषा के माध्यम से बनते और व्यक्त होते हैं और भाषा मन के विकास से अभिन्नतः जुड़ी हुई है। वास्तव में मनुष्य वाक् के जरिए, भाषा द्वारा होने वाले संप्रेषण के जरिए ही ज्ञान का संचय कर सकता है और मानवजाति द्वारा संचित तथा भाषा में अभिव्यक्त विचारों की संपदा से अपने को समृद्ध बना सकता है। भाषा एक विशेष वस्तुपरक प्रणाली है, जो मनुष्य के सामाजिक-ऐतिहासिक अनुभव अथवा सामाजिक चेतना का प्रतिनिधित्व करती है। व्यक्ति द्वारा आत्मसात् किये जाने पर भाषा एक तरह से उसकी वास्तविक चेतना बन जाती है।

एक सामाजिक उत्पाद होने के कारण चेतना केवल मनुष्य में पाई जाती है। पशुओं में चेतना नहीं होती।

मन का सबसे निचला स्तर अचेतन ( subconsious) है, जिसे यों परिभाषित किया जा सकता है: अचेतन उन मानसिक प्रक्रियाओं, कार्यों और अवस्थाओं की समष्टि है, जो ऐसे प्रभावों पर निर्भर है जिनका कि मनुष्य को बोध नहीं है। चेतन मन के विपरीत अचेतन मन व्यक्ति के कार्यों का सोद्देश्य नियंत्रण अथवा उनके परिणामों का मूल्यांकन करने में असमर्थ होता है।

अचेतन के क्षेत्र में निद्रावस्था के दौरान घटित मानसिक व्यापार ( स्वप्न ) ; असंवेदित, किंतु असल में क्षोभकों द्वारा उत्पन्न अनुक्रियाएं ; जो क्रियाएं पहले चेतनाधारित थी किंतु स्वतः होने या बारंबार आवृति के कारण चेतन मन से विस्थापित हो गयीं ; सक्रियता के कतिपय उत्प्रेरक, जिनमें लक्ष्य की चेतना का अभाव है, और बहुत सी चीज़ें आती हैं। अचेतन परिघटनाओं में बीमार मनुष्य के मन में पैदा होनेवाली प्रलाप, विभ्रम, आदि कतिपय विकृतिमूलक प्रक्रियाओं को भी शामिल किया जाता है। अचेतन मन को चेतन मन का विलोम मानकर, अचेतन को पशु मानस का प्रतिरूप समझ बैठना ठीक न होगा। अचेतन भी मानव मन की चेतना जैसी ही चारित्रिक विशेषता है और वह भी मनुष्य के अस्तित्व की सामाजिक परिस्थितियों द्वारा निर्धारित होता है, हालांकि वास्तव में वह मनुष्य के मन में विश्व का केवल आंशिक तथा अपर्याप्त प्रतिबिंब है।

मन और मस्तिष्क, मन और परिवेश के सहसंबंधों की आगे की जांच के लिए और मानव सक्रियता के मानसिक नियमन तथा नियंत्रण के आगे विश्लेषण के लिए मन की, चेतना की उत्पत्ति के प्रश्न की अधिक विस्तार से विवेचना की आवश्यकता है। वास्तव में मन की मुख्य नियमसंगतियों और मानव चेतना के निर्माण के प्रश्नों का उदविकासीय दृष्टिकोण से विश्लेषण करके ही प्रकाश में लाया और ह्र्दयंगम किया जा सकता है।

समय 

प्रस्तुति :शरद कोकास 

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मंगलवार, 12 मई 2026

15. समलैंगिकता पर यह नहीं पढ़ा होगा कभी

समलेंगिकता पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, पढा़ जा चुका है।

अभी समय ब्लॉग पर है अतः यह भी कहेगा कि बहुत ब्लॉग काले किए जा चुके हैं।

समय अधिकतर से गुजरा है और यह कहने में कोई संकोच नहीं रखता कि इक्का-दुक्का जगहों को छोडकर अधिकतर जगह इस पर परंपरा में मिले बने-बनाए ढांचे के अंतर्गत ही अपने दिमाग़ का घोडा़ खूब दौडाया गया है।

तो चलिए आज दृष्टि डालते हैं और पडताल करते हैं, समलेंगिकता पर की गयी महान चर्चाओं में पेश की गई कुछ प्रवृतियों की। समय की दिलचस्पी इन्हीं में है, उसका इरादा यहां समलेंगिकता पर कोई नया पुराण लिखना नहीं है।

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एक बात तो यह कही गई कि यह प्रकृति की व्यवस्था के खिलाफ़ है।

चलिए पहले प्रकृति की व्यवस्था की ही बात कर लेते हैं। समय को सिर्फ़ इस तर्क में दिलचस्पी है।

अब यह बात बार-बार दोहराने की जरूरत नहीं रह गई है कि प्रकृति का हमसाया होकर नहीं वरन मनुष्य नाम का प्राणी सिर्फ़ इसी वज़ह से अस्तित्व में आया कि वह प्रकृति के खिलाफ़ खडा हो गया। उसने प्रकृति की हर व्यवस्था को चुनौती दी और प्रकृति को अपने हिसाब से ढ़ालना सीखा।आज मनुष्य के पास प्रकृति की व्यवस्था का कुछ नहीं बचा है, वरन उसने प्रकृति को अपनी व्यवस्था में ढा़ल लिया है। प्राकृतिक वर्षा का मामला कुछ जरूर निर्भरता रखता है, पर इससे भी कई जगह वह अपनी निर्भरता समाप्त कर चुका है। यह बात दीगर है कि प्रकृति के इस अनियोजित दोहन और निरूपण के प्रभावों के पश्चात अब वह इसके भी समुचित नियोजन की ओर उन्मुख हो रहा है।

अतएव इस तर्क के जरिए समलेंगिकता को खारिज़ करना उचित नहीं जान पडता।

अब जरा यह भी देख लें कि वास्तव में प्राकृतिक व्यवस्था के निमित्त मनुष्य का सामान्यतया क्या दृष्टिकोण है। यदि दो विपरीत लिंगियों का यौन आकर्षण और तदअनुरूप क्रियाएं प्राकृतिक व्यवस्था के अंतर्गत आती हैं, तो इनके लिए मनुष्य-समाज में कितनी सहजता है, यह कितनी सुलभ और सर्वमान्य हैं, यह किसी से भी छुपा नहीं है। मनुष्य का सारा धार्मिक इतिहास इन्हीं की वर्जनाओं और प्रतिबंधों से भरा पडा़ है। मनुष्य के इतिहास की अधिकतर उर्जा इन्हीं के दमन में नष्ट हुई है।

क्या ब्रह्मचर्य का पालन, उपवास, शरीर को कष्ट पहुंचाना, प्रेम की खिलाफ़त, अन्याय, शोषण आदि-आदि प्राकृतिक व्यवस्था के खिलाफ़ नहीं है?

एक और नज़रिया देखें।

यदि समलेंगिकता से कुछ देर के लिए यौन क्रियाओं को अलग कर देते हैं, तो हे मानव श्रेष्ठों क्या बचता है? दो समान लिंगियों के बीच के भावनात्मक और दोस्ताना संबंध ही ना।अब बताइये, दो विपरीत लिंगियों के बीच तो मनुष्यों ने इतनी बड़ी खाई खडी कर रखी है कि समाज में सहज रूप से उपलब्ध ये भावनात्मक और दोस्ताना संबंध सिर्फ़ और सिर्फ़ समान लिंगियों के बीच ही पनपते देखें जा सकते हैं।

पुरूषों के सिर्फ़ पुरूष मित्र होते है, स्त्रियों के सिर्फ़ स्त्री मित्र। 

दो विपरीत लिंगियों के बीच मित्रता, भावनात्मक और दोस्ताना संबंध की बात तो अभी भी अधिकतर रूप से सूली पर चढाने के योग्य मानी जाती है, असामाजिक और अनैतिक।

फिर जरा सोचिए, आज के इस असुरक्षा, अविश्वास और अनिश्चितता के माहौल में भावनात्मक, दोस्ताना, और सुरक्षित संबंधों को ढूंढ़ते ये समलेंगिक मित्र यदि साथ रहना निश्चित कर लेते हैं ( अभी यौन क्रियाएं की बात ही नहीं उठाई जा रही है), जीवन के इस संघर्ष में हमराही होने में ज्यादा निश्चिंतता पाते हैं तो क्या वाकई यह इतना असहज कार्य कर रहे हैं?

और यदि यह साथ रहना, यह भावनात्मक लगाव, शारीरिक जरूरतों की यह प्राकृतिक आवश्यकता यदि उनके बीच थोडी बहुत तात्कालिक यौन क्रियाओं की संभावनाओं के हालात भी पैदा कर देती है, तो बताइये क्या यह उनकी सामाजिक व्यवस्थागत नियती नहीं है?

यहां प्राकृतिक असंतुलन या कमियों के चलते समलिंगियों के प्रति किसी मनुष्य के सहज आकर्षण को अलग से देखे जाने की जरूरत है। जाहिर है यह भी प्राकृतिक शक्तियों के कारण ही उनकी नियति है जो कि अंततः उन्हें प्राकृतिक विपरीत लिंगी व्यवस्था के खिलाफ़ जाने की प्राकृतिक आवश्यकता बन रही है। ऐसे लोगों को समाज में किस तरह उपहास और विलगता का विषयी बनाया जाता है यह जगजाहिर सी ही बात है। ऐसे सामाजिक व्यवहार के बीच उन्हें कोई अपने जैसा मिलजाना क्या एक नैमत की तरह नहीं है, जिसके लिए वे भगवान? का शुक्रिया अदा करें, और इस सृष्टि में अपना होना भी महसूस करें।

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दूसरी ओर समलेंगिकता को जायज ठहराने के लिए इतिहास से उदाहरण खोज कर लाने और इनके जरिए इसके अस्तित्व की शाश्वतता को स्थापित और प्रमाणित करने की प्रवृति भी दिखाई दी।

बात यहां तक तो ठीक है इतिहास की, अतीत की समालोचना के जरिए मनुष्य किसी भी समस्या के उत्स को खोजने, उसके विकास की प्रक्रिया को समझने और प्राप्त समझ को भावी निदान के लिए उपयोग करने की प्रक्रिया से गुजरे परंतु वर्तमान विसंगतियों को शाश्वत बताने और परिवर्तन के धार को कुंद करने के लिए इतिहास से गडे़ मुर्दे उखाड़ लाने की प्रवृति सामाजिक रूप से खतरनाक है।

अतीत से भविष्य संवारने के सबक सीखे जाने चाहिएं, ना कि यथास्थिति बनाए रखने के लिए चालाकी भरे नुस्ख़े।अतीत की किसी संवृति का उदाहरण देकर वर्तमान की किसी भी विसंगति को जायज नहीं ठहराया जा सकता। इस तरह तो वर्तमान समाज की कई नकारात्मक्ताओं के उदारहण इतिहास में खोजे जा सकते हैं और उनको कायम रखने के लिए पुरजोर बहसें की जा सकती हैं। यह प्रवृति ठीक नहीं है, हालांकि समाज में कई मनुष्यों और समूहों को ऐसे ही प्रयास करते देखा जा सकता है।

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समलेंगिकता को चार प्रकारों या अवस्थाओं में देखा जा सकता है:

१. व्यक्तिवादी, अहंवादी मानसिकता के चलते अक्सर साधन संपन्नों द्वारा यौन क्रीडा़ओं, यौन कुंठाओं की तृप्ति के लिए किए जाने वाले समलेंगिक यौन-व्यापार।

२. उपरोक्त विवेचना के आधार पर पैदा हुए समलेंगिक भावनात्मक संबंध जिनमें यौन क्रियाएं महत्त्वपूर्ण नहीं हैं।

३. ऐसे समलेंगिक भावनात्मक संबंध जिनमें यौन क्रियाएं भी अस्तित्व में आ जाती है और महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं।

४. शारीरिक हार्मोन असंतुलन और कमियों के चलते बनें समलेंगिक संबंध। ऐसे में कुछ पुरूषों में स्त्रेण प्रवृतियां और कुछ स्त्रियों में पौरुषेय प्रवृतियां देखी जा सकती हैं। यहां दो तरह के जोडे अस्तित्व में आ सकते हैं, एक तो ऐसा जोडा जहां एक सदस्य विपरीत प्रवृतियों में है जबकि दूसरा सामान्य, और दूसरा ऐसा जोडा जहां दोनों ही सदस्य विपरीत प्रवृतियों में हैं परंतु एक जैसे होने के कारण लगाव पैदा होने से एक दूसरे के साथ सामाजिक सुरक्षा और शांति पाते हैं।

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पहली अवस्था निस्संदेह एक व्यक्तिवादी विकृति है जो कि वर्तमान ढ़ांचे के अवशिष्ट की तरह है, इसका प्रतिकार किया जाना चाहिए परंतु इसका व्यवहारिक उन्मूलन इस राजनैतिक-सामाजिक ढ़ांचे में आमूलचूल परिवर्तन से ही संभव है।

दूसरी व तीसरी अवस्था भी इसी सामाजिक ढ़ांचे की अनिच्छित अभिव्यक्तियां हैं। जैसा कि ऊपर विवेचित किया गया है यह प्राकृतिक सहज संबंधों के बीच एक आप्राकृतिक असहजता के बंधनों की वज़ह से हैं और इस प्राकृतिक सहजता के निरूपण में ही इनके लोप होने की संभावनाएं हैं। जब मनुष्यों के बीच हर तरह के भेद समाप्त होने की सामाजिक परिस्थितियां विकसित कर ली जाएंगी तो लिंगभेद के हिसाब से भी कुछ तय होने की संभावनाएं नहीं रहेंगी।

तब तक यह वाजिब ही है उनकी उनकी इच्छाओं का सम्मान किया जाए, उन्हें अधिकार दिया जाए कि वे इस मामले में अपने निर्णयों के लिए स्वतंत्र हैं। स्वतंत्रता का यह अहसास ही उनके मूल धारा में लौटने का अवसर प्रदान करेगा। वरना यहां भी कई मामलों में, प्रेम के मामलों की तरह ही मनुष्य इन अपेक्षाकृत कम महत्त्व की चीज़ों को, प्रतिबंधों की प्रतिक्रियास्वरूप ज्यादा ही तूल देता है और एक मानसिक घटाघोप में फंसकर जबरन अपनी इच्छापूर्ति करने की कोशिश करता है और फलतः कई और तरह के अंतर्विरोधों में उलझकर रह जाता है। यह एक सनक और उसकी असहजपूर्ति बनकर रह जाता है।

चौथी अवस्था महत्त्वपूर्ण है और जाहिर है मनुष्य समाज में और भी कई शारीरिक अयोग्यताओं पर सामान्यतया अपनाई जाने वाली सामाजिक व्यवस्थाओं और मान्यताओं के सापेक्ष ही इन्हें तौले जाने की जरूरत है। यह भी एक तरह की शारीरिक अयोग्यता ( physical disability ) है क्योंकि यह भी शारीरिक कमियों के चलते ही पैदा होती है। इसीलिए इस मामले को भी उसी नज़रिए से देखे जाने की जरूरत है जैसे कि अपंगता, मानसिक अयोग्यताओं, लाईलाज या गंभीर बीमारियों से ग्रस्त मनुष्यों या समाजिक अन्याय झेल रहे मनुष्यों के मामलों में विचार करते वक्त अपनाया जाता है।

उपरोक्त सभी तरह की समलेंगिकताओं को एक साथ नहीं समेटा जा सकता। तात्कालिक प्रतिक्रियाओं में यह भूल हो रही है कि बिना इनकी बारीकी में गये सभी को एक ही लाठी से हांका जा रहा है। इन्हें अलग-अलग ही देखा जाना चाहिए और तदअनुरूप ही इन पर समुचित नज़रिया अपनाया जाना चाहिए।

समझदारी का तो यही तकाज़ा है।

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लंबा हो ही जाता है, बक-बक में ध्यान ही नहीं रहता।

खैर जी, जरूरी लगता है तो मनु्ष्य लंबे रास्तों पर चलता ही है।

एक जगह एक नारा देखा था:

`shortcuts may cut short your life'

यह दिमाग़ में रखा जा सकता है।

समय

प्रस्तुति :शरद कोकास 

सोमवार, 11 मई 2026

14. कुछ सपने आखिर सच होते क्यों प्रतीत होते हैं ?

पिछली चर्चा ‘आखिर क्या है सपनों का मनोविज्ञान’ पर एक जिज्ञासा थी कि हमें कुछ ऐसे भी सपने आते हैं, जो कभी-कभी सच हो जाते हैं, इनका क्या कारण है?

इस पर आगे की चर्चा को समय, यहां सभी के लिए फिर से प्रस्तुत कर रहा है।समय का उद्देश्य आपकी स्वतंत्र चिंतन प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने का रहता है। एक नज़रिया देने का, जिसे भी यदि चिंतन-मनन का हिस्सा बनाया जाए तो आपकी मेधा अपने सवालों के खुद जबाब ढूंढने की प्रक्रिया में जुट जाएगी।

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समय उक्त जिज्ञासा के संदर्भ में कुछ इशारों को दोहरा देता है।
पिछले आलेख से दोबारा गुजरें, और इन हिस्सों पर ध्यान दें:

‘ऐसी ही कई और व्याख्याएं की जा सकती हैं, और आसपास ऐसा होते हुए अक्सर देखा जा सकता है। संसार बहुत बडा है, इन बहुत छोटे अंतराल की छवियों की चिलकन यानि सपनों के सापेक्ष मनुष्य की ज़िंदगी काफ़ी बडी है, और ऐसे में इक्का-दुक्का संयोगो का मिलना, जिसमें कि वास्तविक रूप में सपनों की घटनाओं का दोहराव प्रत्यक्ष किए जाने के दावे किए जा सकते हैं, कोई ज्यादा अनोखी बात नहीं है। 

वैसे मनुष्य खुद अपने अंदर टटोले तो इसका जबाव मिल सकता है, कि ऐसी भ्रामक और डरावनी परिस्थितियों में छला हुआ उसका मन कितनी तरह की बातें खुद गढ़ता है, कहानिया बनाता है, और ऐसे दावे करने की कोशिश करता है।’

‘तो इस तरह से हम समझ सकते हैं कि सपनों में इस तरह ही उच्छृंगल रूप से छवियां चिलकती रहती हैं, कभी उनमें कोई तरतीब निकल आती है, कभी वे बिल्कुल बेतरतीब होते हैं। मस्तिष्क में पहले से दर्ज़ चीज़ों का ही मामला है यह, इनमें कोई ऐसी चीज़ नहीं देखी जा सकती जिससे किसी ना किसी रूप में मनुष्य पहले से बाबस्ता ना रहा हो। हां, उनकी बेतरतीबी से, या छवियों, ध्वनियों, भाव-बोधों की आपस में अदला-बदली से अनोखेपन या नवीनता का भ्रामक अहसास हो सकता है।’

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दरअसल सपनों में ऐसा कुछ हम देख ही नहीं सकते, जो की वस्तुगत नहीं हो यानि वास्तविक रूप से अस्तित्ववान नहीं हो। यानि कि सच नहीं हो। अमूर्त कल्पनाओं को भी आप इसी में रख सकते हैं, एक बार हो जाने के बाद वह भी वस्तुगत ही हैं।

जो सच है वह सपने में है, अतः जो सपने में है वह सच ही है।

पर उस बेतरतीबी में नहीं जिस रूप में यह सपने में है। अलग-अलग टुकडों में हम देखेंगे तो इसे महसूस कर सकते हैं।

समय जानता है, उक्त जिज्ञासा का मतलब यह नहीं था, परंतु यहीं से होकर असली मतलब तक पहुंचा जाना चाहिए।

उक्त जिज्ञासा का मतलब था कि इसी बेतरतीबी से आए सपनों को भावी ज़िंदगी में लगभग वैसा ही सच हो उठना।

यह अक्सर हमारी तात्कालिक चिंताओं के क्षोभको से उत्पन्न सपनों के साथ ही ज्यादा होता है। इन तात्कालिक समस्याओं या चिंताओ या गहन इच्छाओं पर मनुष्य का चेतन मस्तिष्क मननरत होता ही है, और संभावित या इच्छित हलों की कल्पनाओं में होता है।

जाहिरा तौर पर अवचेतन मानसिक क्रियाकलापों में भी यही क्षोभक काम कर रहे होते हैं, और सपनों में भी यही कार्य-व्यापार संपन्न होता है। यही संभावित या इच्छित हलों की कल्पनाएं वहां भी आकार लेती हैं।

मनुष्य किसी अनुकूल हल या आनंद देने वाली किसी वास्तविकता में हो सकने वाली परिस्थिति की कल्पना को चुन लेता है।

अब इसकी संभावनाएं तो है ही ये सपनों के हल या इच्छाएं सच में आकार लेलें, क्योंकि मनुष्य सच की परिस्थितियों के हिसाब से ही इनकों बुन रहा था।

मनु्ष्य ऐसी ही चीज़ों में, इस सच हो जाने वाली परिघटना का नोटिस लेता है।

वह सपनों में उडता है, उसके सिर पर सींग आजाते हैं, खून का रंग हरा हो जाता है, वह स्वर्गीय गांधी जी के साथ खाना खा रहा है, साक्षात भगवान या देवी सामने खडे होते हैं...ऐसे अवास्तविक बेतरतीबियों को सच होते वह देख ही नही सकता, इसीलिए इनका नोटिस भी नहीं लेता कि यह सच हो रही हैं या नहीं।

मनुष्य परंपरा से मिली अपनी आस्था या मान्यताओं के अनुकूल पड़ने वाली संवृतियों का ही नोटिस लेता है और अपनी मान्यताओं को और पुख़्ता करता जाता है। परंतु सत्य का संधान संदेहों के जरिए ही संभव हो सकता है।

अगर संदेह पैदा हुआ हो तो आगे विचार के लिए शायद इससे आपकी कुछ मदद हो सके?

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चर्चा में एक और बात सामने आई थी:

‘बौद्ध एवं जैन कथाओं में बुद्ध एव तीर्थंकरों के जन्म से पूर्व उनकी गर्भवती माताओं द्वारा देखे गए '' विशिष्ट-स्वप्न '' और विद्वानों द्वारा उनकी सटीक विवेचनाओं का बड़ा रोचक विवरण उपलब्ध है उस समय में सिंगमन्ड फ्रायड जैसों का कहीं कोई अस्तित्व ही नहीं था ; हाँ स्वप्नों का उनका अपना मनो -विज्ञान उस काल में भी था , उनकी अपनी विवेचनाएँ थी,उनकी अपनी परिभाषाएं थी जो आज भी यदि उन्हें युगानुसार सही परिपेक्ष्य में सही ढंग से आधुनिक सन्दर्भों में परिभाषित किया जाये तो वे सटीक हैं।’

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बहुत बेहतर बात उठाई गई थी।
समय इस पर भी वही बात दोहराना चाहता है कि परंपरा से मिली मान्यताओं पर संदेह किया ही जाना चाहिए तभी सही समझ विकसित की जा सकती है।

इस पर भी पहली जिज्ञासा पर पेश किए गए नज़रिये से विचार किया जाना चाहिए।

कथाएं, कथाएं ही होती हैं। वहां पर कल्पनाशीलता की बहुत गुंजाइशें होती हैं। एक निर्विवाद सत्य पहले ही सामने आ चुका है, बुद्ध या महावीर के रूप में। अब कथा कहते वक्त माताओं के विशिष्ट-स्वप्नों की अतिश्योक्ति पूर्ण चर्चा कथा में की जा सकती है। सच होना पहले ही सामने है, यहां तो उसके हिसाब से कथा में सपनों की सिर्फ़ अनुकूल व्याख्याएं ही करनी है। हर गर्भवती माता अपने गर्भस्थ शिशु के भावी जीवन के बारे में अच्छे सपने ही बुनती है।

महानता और सफलता के युगानुसार परिप्रेक्ष्यों के अंतर्गत ही अपने शिशु के लिए महत्त्वाकांक्षाओं के संभावित सोपान चुनती है। इस पर तुर्रा यह और कि उक्त कथाओं की माताएं तो संपन्न और संभ्रांत कुल की और थी, जाहिर है दिग्विजय की आकांक्षाएं ही वहां पेश होनी थी। अतएव ऐसे में माताओं को वास्तव में भी तथाकथित वही सपने भी आए हों तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नज़र नहीं आती।

वैसे यह बात भी अपनी जगह है ही कि अक्सर मनुष्य बाद में होने वाली परिघटनाओं पर ऐसे ही प्रतिक्रिया देता है कि उसे तो यह पहले ही मालूम था, उसने तो यह पहले ही कह दिया था, उसे सपनों में बिल्कुल ऐसी ही बात नज़र आई थी...आदि-आदि। कुछ समझदार मनुष्य इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि अच्छा तो मेरे सपने का यह मतलब था, उफ़ तो सपनों में इसका इशारा पहले ही मिल गया था, पर यह अज्ञानी उसे पहचान ही नहीं पाया।

सफलताओं की इकतरफ़ा ज़मीन पर ऐसी ही कई विजयगाथाएं लिखी गयी हैं।

हर युग की अपनी समस्याएं होती हैं, उस युग के अनुसार ही ज्ञान और समझ के स्तर हुआ करते हैं, उन्हीं के हिसाब से उनके हल की संभावनाएं टटोली जाती हैं। अगर हम किसी और समय की चीज़ों की व्याख्या करते हैं तो उस समय की तत्कालीन परिस्थितियों और ज्ञान के स्तर को नहीं भूलना चाहिए। बुद्ध अपने समय की देन होते हैं, फ़्रायड अपने समय की। समय आगे बढता है, मनुष्य के ज्ञान और समझ का स्तर बढता है और वह बुद्धों और फ़्रायडों का अतिक्रमण कर नये-नये परिस्थितिजन्य मानवश्रेष्ठ बनाता जाता है।

इसलिए यह कहा जाना कि, उनकी अपनी विवेचनाएँ थी,उनकी अपनी परिभाषाएं थी जो आज भी यदि उन्हें युगानुसार सही परिपेक्ष्य में सही ढंग से अधुनिक सन्दर्भों में परिभाषित किया जाये तो वे सटीक हैं।’, ज्यादा उचित दृष्टिकोण नहीं है।

बजाए इसके समुचित दृष्टिकोण यह होगा कि, उनकी अपनी विवेचनाएँ थी, उनकी अपनी परिभाषाएं थी, आज भी यदि उन्हें, युगानुसार सही परिपेक्ष्य में, सही ढंग से, आधुनिक सन्दर्भों के सापेक्ष समालोचित किया जाये तो वे हमें सटीक राह दिखाने की क्षमता रखती हैं।’

इनके जरिए मनुष्य, ज्ञान और समझ के क्रमिक विकास को महसूस कर सकता है।

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समय इस सार्थक चर्चा के लिए, शामिल मानवश्रेष्ठों का शुक्रिया अदा करता है। उनकी कृपापूर्ण भागीदारी के बिना यह अवसर संभव ही नहीं था।

आपका समय 

प्रस्तुति : शरद कोकास 

13 B "अनवरत" ब्लॉग पर एक प्रतिटिप्पणी


दिनेश राय द्विवेदी जी का एक प्रश्न है । मानवजाति के अभी तक के ज्ञान के अनुसार इसको ऐसे कहा जाना कि विचार मस्तिष्क का आधार पाते है, पूरा सच नहीं है। इसके कारण विचारों की एक स्वतंत्र वस्तुगतता का बोध होता है जो कि मस्तिष्क पर अवलंबित है।

इसको ऐसे कहा जाना चाहिए कि वस्तुतः विचार मस्तिष्क का प्रकार्य है, उसके क्रियाकलापों का उत्पाद है। और इसके लिए आधार सामग्री उसे ऐन्द्रिक संवेदनों के जरिए मिलती है।

जाहिर है विचार अचानक आसमान से नहीं टपकते, वे किसी भी मनुष्य की प्रकृति और समाज के साथ के अंतर्संबंधों एवं अंतर्क्रियाओं के स्तर और विकास की प्रक्रियाओं में पैदा होते हैं, आकार लेते हैं।

इसीलिए आपका यह कहना सही है कि वस्तुगत जगत के बोध का स्तर विचारों का विकास करता है, उन्हें परिवर्तित या परिवर्धित करता है।

नये विचार भी इसी प्रक्रिया से जन्म लेते हैं, वे भी किसी आधारहीन कल्पना से अचानक पैदा नहीं होते। हर नयी समस्या वैचारिक जगत में अवरोध पैदा करती है और मनुष्य अपने पूर्व के संज्ञानों के आधार पर उन्हें विश्लेषित कर उनके हल की संभावनाओं की परिकल्पनाएं करता है, जाहिर है नये विचार करता है।

रथ की संकल्पना या विचार का जन्म, पहिए की वस्तुगतता के बिना नहीं हो सकता। पक्षियों की उडानों के वस्तुगतता के बगैर वायुयान के विचार की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। बिना सोलिड स्टेट इलेक्ट्रोनिक्स के विकास के कंप्यूटर का नया विचार पैदा नहीं हो सकता था।

नये विचार, विचारों की एक सतत विकास की प्रक्रिया से ही व्युत्पन्न होते हैं, जिनके की पीछे वस्तुगत जगत के बोध और संज्ञान की अंतर्क्रियाएं होती हैं।


आपका समय
रविवार 21 जून 2009

प्रस्तुति: शरद कोकास

सोमवार, 4 मई 2026

13A. पुरस्कार होंगे तो तिकड़म तो होगी ही



समय ने कहा था,‘पुरस्कार होंगे तो तिकड़म तो होगी ही । पुरस्कारों की चर्चा करते-करते आप भी आखिरकार पुरस्कार के चक्कर में पड़ गए’।पहली बात शायद ज्यादा साफ़ है। जब पुरस्कार होंगे, उनके जरिए धन और प्रतिष्ठा प्राप्त होने के अवसर होंगे, और मानव-श्रेष्ठों के मन में धन और प्रतिष्ठा प्राप्त करने की महत्त्वाकांक्षाएं होंगी, तो फिर पुरस्कारों को पाने के लिए मानव-श्रेष्ठ हर संभव कोशिश भी करेंगे। तिकडमें भी होंगी, बहुत कुछ होगा और होता भी है, सभी जानते ही हैं। पहले वाक्य से समय का मतलब यही था।

दूसरा वाक्य यदि इस तरह लिखा गया होता जैसा कि इसे होना चाहिए था, और जैसा कि समय का आशय था, "पुरस्कारों की चर्चा करते-करते आप भी आखिरकार एक और पुरस्कार की स्थापना की चर्चा के चक्कर में पड़ गए." तो शायद ज्यादा ठीक होता।

समय यही कहना चाहता था कि जब आप पुरस्कारों के पीछे की तिकडमों को समझते हैं, तो फिर लेख के अंत में एक और पुरस्कार स्थापित करने की चर्चा क्यूं कर करने लगे। क्योंकि समय को लगता है, इसका भी वही हश्र होने की अधिक संभावनाएं है और इसके पीछे की सोच को समय ने पहले वाक्य में रख ही दिया था।

आपने इसके बाद के वाक्य की चर्चा नहीं की, और वही समय की समझ के अनुसार ज्यादा महत्वपूर्ण था। समय आपके और पाठकों के चिंतन में इस दिशा को भी शामिल करवाना चाह रहा था, और इसीलिए इसका जिक्र पुनः कर रहा है।

समय ने कहा था:
"लेखन के उद्देश्यों पर ही दोबारा विचार करना होगा।"

यहां समय अपना आशय स्पष्ट कर देना चाहता है।

लेखकों को यह भी विचार दोबारा से करना होगा (जो अब तक नहीं कर पाएं है, या इस पर कुछ और विचार रखते हैं) कि आखिरकार लेखन का उद्देश्य क्या है, लेखन के वास्तविक सरोकार क्या हैं? बहुत से मानव-श्रेष्ठ लेखकों ने इस पर अपने विचारों को लिख छोडा है, उनसे गुजरना चाहिए।
क्या लेखन का उद्देश्य स्वान्तसुखाय है? क्या यह केवल व्यक्तिगत मनोविलास का माध्यम है, और आत्मसंतुष्टि इसका लक्ष्य? क्या सिर्फ़ यह अहम की तुष्टी, व्यक्तिगत महत्तवाकांक्षाओं की पूर्ति, सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करने का जरिया भर है?

या लेखन के उद्देश्यों को इनका अतिक्रमण नहीं करना चाहिए? क्या इसे सामाजिक सरोकारों से नहीं जुडना चाहिए? क्या सामाजिक चेतना की बेहतरी की चिंताएं इसमें शामिल नहीं होनी चाहिएं? क्या तार्किक और वैज्ञानिक सोच को आम करने की जिम्मेदारी इसमें शामिल नहीं होनी चाहिए? क्या अपनी बेहतरी के लिए चिंतित और संघर्षरत आमजन का पक्षपोषण इसमें नहीं झलकना चाहिए? क्या लेखन की दिशा को एक ऐसे आदर्श समाज की स्थापना, जिसमें समता और भाईचारा हो, जिसमें किसी भी मनुष्य का किसी भी तरह का शोषण संभव ना हो, जिसमें सभी की खुशहाली हो, हेतु प्रेरणास्रोत नहीं होना चाहिए?

और क्या लेखन के मूल में यही वास्तविक चिंताएं नहीं होनी चाहिएं?

और अगर ये चिंताए वाकई में लेखक के लेखन के मूल में हैं, तो जाहिर है, पुरस्कारों-सम्मानों का कोई विशेष मतलब नहीं रह जाता। फिर लेखक, अपनी आत्मसंतुष्टि के लिए अपने इन्हीं आदर्शों और उनकी प्राप्ति को ही अपनी कसौटी बनाता है।
बस, समय का उद्देश्य यही कहना था।.....

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शनिवार, 2 मई 2026

13. टिप्पणियों के अंशों से दिमाग़ को कुछ खुराक


रवि कुमार रावतभाठा  उर्फ समय 
मित्रों हमारे मित्र 'समय' अर्थात कामरेड रवि कुमार रावतभाटा अपने ब्लॉग में आने वाली टिप्पणियों के जवाब भी देते थे और उस पर अच्छी चर्चा भी होती थी । यह ब्लॉग पोस्ट ऐसी ही कुछ टिप्पणियों पर दिए गए 'समय' के जवाब पर आधारित है ।  ऐसी ही दो पोस्ट और रहेंगी इस ब्लॉग की तारीख थी रविवार, २१ जून २००९, पढिए आपको अच्छा लगेगा । 

फिलहाल समय द्वारा की गई टिप्पणियों के अंशों से दिमाग़ को कुछ खुराक दीजिए।


"कविताएं और कवि भी" पर की गई टिप्पणी के अंश:( यह एक ब्लॉग का नाम है )

.....आपकी यह बात ही कि “ऋत की विराट परिकल्पना पतित होकर ईश्वर की सर्व सुलभ समझ में प्रतिष्ठित हुई और उसके आगे सम्पूर्ण समर्पण ही एक मात्र राह दिखाई गई। जन के लिए यह आवश्यक था लेकिन इससे हानि यह हुई कि संशय और प्रश्न नेपथ्य में चले गए। इसके कारण धीरे धीरे एक असहिष्णु मानस विकसित हुआ।” सभी कुछ कह देती है।

यह प्रक्रिया पूरे विश्व में लगभग एक ही तरह से विकसित हुई, और जाहिर है इसके पीछे आत्मगत या मनोगत कारणों के बजाए शुद्ध भौतिक कारणों का अस्तित्व रहा है।

आप यदि इसे व्यापकता दें तो आपकी यह अवधारणा सभी आदर्शवादी विचारधाराओं को, इस्लाम को भी अपने में समेट लेने की क़ूवत रखती है। अलग से कुछ कहने की प्रासंगिकता समय को महसूस नहीं हुई, इसलिए ही यह गरीब संशय में आ गया।

भारतीय चिंतन परंपरा में भी दोनों धाराएं यानि संशय और विश्वास, समानान्तर रूप से चले हैं ना कि एक ही विकसित होती परंपरा में। जाहिर है कि इस विरोधी विचार धाराओं  में असहिष्णुता ही हो सकती थी, और इतिहास साक्षी है कि संशय की परंपरा का परिस्थितियों के अनुकूलन के कारण बलपूर्वक दमन कर दिया गया।

बृहस्पतियों, न्याय-वैशैषिकों, चार्वाकों, सुश्रुतों, योगियों, बुद्धों, धर्मकीर्तियों आदि-आदि को समूल नष्ट कर दिया गया, उनकी संशयवादी विचारधारा को या तो खत्म कर दिया गया या आदर्शवादी मुलम्में में प्रक्षिप्त।

भक्तिकाल तो बहुत बाद की चीज़ है। परंतु आपका इस पर यह कहना सही है कि इसी के बाद आम मानस में ईश्वर के आगे संपूर्ण समर्पण या ईश्वर की वर्तमान अवधारणा का बोलबाला हुआ।

खैर, समय की चिंताएं ऐसे ही व्यापक परिप्रेक्ष्यों के संदर्भ में थी, और जाहिर है आपकी जुंबिश में भी ये ही शुमार हैं।

आप इस पर खुद भी संशय में है, परंतु नग्न सत्यों और ज्वलंत समस्याओं के नाम पर बौद्धिक प्रगतिशीलता को तो दाव पर लगाना या स्थगित कर देना सही कदम नहीं हो सकता ना।

आप ही के शब्दों में आज संशय और ऋत की पुनर्प्रतिष्ठा की आवश्यकता है, जो बस मानव मेधा की सतत प्रगतिशील और विकसित होने की प्रवृत्ति को मान दे और उसका पोषण करे। ना कि इनके खिलाफ़ संघर्ष में खुद बर्बर खिलाफती, तालिबानी,प्रतिगामी और प्रतिक्रियावादी तरीके अपनाने को विवश हो जाए।.....

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समय को तो मानवजाति द्वारा समेटा गया यह ज्ञान बहुत उद्वेलित करता है।

सामान्य तौर पर समय फिर हाज़िर होगा।

प्रस्तुति : शरद कोकास