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सोमवार, 25 मई 2026

34.मनुष्य और पशुओं के मानस में भेद

पिछली बार हमने मानसिक कार्यकलाप के भौतिक अंगरूप में, मस्तिष्क को समझने की कोशिश की थी। जैसा कि पिछली प्रविष्टियों में बार-बार मानव व्यवहार का पशुओं के साथ तुलनात्मक उल्लेख होता रहा है, यह समीचीन और रोचक रहेगा कि हम मनुष्य और पशुओं के बीच विभाजक रेखा को, उनके मानस के तात्विक अंतरों को देख लें और समझ का हिस्सा बनाने की कोशिश कर लें। यह मानव चेतना के आधार के रूप में श्रम पर चर्चा शुरू करने से पहले, प्रासंगिक भी रहेगा।

चलिए चर्चा को आगे बढाते हैं। यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समयअपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।

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मनुष्य और पशुओं के मानस में भेद

इसमें संदेह नहीं कि मनुष्य के मन और पशुओं के मानस में बहुत बड़ा अंतर है।

बहुसंख्य प्रयोगों ने दिखाया है के उच्चतर पशुओं का चिंतन पूर्णतः व्यवहारिक होता है। सभी जीव-जंतु केवल एक निश्चित, प्रत्यक्षतः अनुभूत स्थिति के दायरे में ही कार्य कर सकते हैं, वे इसकी सीमाओं को लांघने और इसकी विशिष्टताओं को अनदेखा करके, मात्र सामान्य मूलतत्व पर ध्यान देने तथा उसे ह्रदयंगम करने में असमर्थ हैं। हर पशु अपने सामने मौजूद स्थिति का दास होता है।

इसके विपरीत मानव व्यवहार की विशेषता यह है कि मनुष्य में अपने सामने मौजूद स्थिति से निरपेक्ष ( अनासक्त ) होने और उस स्थिति के कारण जो परिणाम पैदा हो सकते हैं, उनका पूर्वानुमान करने की क्षमता है। इसी कारण जहाज़ी, जहाज़ के पेटे में हुए मामूली छेद की तुरंत मरम्मत करने लगते हैं, और पायलट अपने विमान में थोड़ा ही ईंधन रह जाने पर निकटतम हवाई अड्डे की खोज करने लगता है। मनुष्य अपने सामने मौजूद स्थिति के दास नहीं होते और वे भविष्य का पूर्वानुमान भी कर सकते हैं।

इस प्रकार अगर पशुओं का ठोस, व्यवहारिक चिंतन उन्हें अपने सामने मौजूद स्थिति के प्रत्यक्ष प्रभाव की दया पर छोड़ता है, तो मनुष्य की अमूर्त चिंतन की क्षमता उसे अपने सामने मौजूद स्थिति से अपेक्षाकृत स्वतंत्र बनाती है।मनुष्य परिवेश के तात्कालिक प्रभावों का ही नहीं, उनके भावी परिणामों का भी परावर्तन कर सकता है। मनुष्य सचेतन ढ़ंग से, आवश्यकता के अपने ज्ञान के अनुसार कार्य कर सकता है। अन्य जीवधारियों के मानस से मनुष्य के मन का पहला मुख्य भेद यही है।

मनुष्य और पशु के बीच दूसरा भेद यह है कि मनुष्य में औज़ार बनाने और सुरक्षित रखने की योग्यता होती है। पशु किसी निश्चित, यथार्थतः अनुभूत स्थिति में अपनी तात्कालिक आवश्यकताओं के लिए ही चीज़ों का औज़ारों के रूप में प्रयोग करते हैं। उस ठोस स्थिति के बाहर वह औज़ार को ना तो पहचानता हैं ना उसे भावी उपयोग के लिए संभालकर ही रखता है। ज्यों ही औज़ार का काम पूरा हो जाता है, उसका औज़ार के रूप में अस्तित्व तुरंत खत्म हो जाता है। उदाहरण के लिए, वानर ने जिस डंडे को अभी-अभी वृक्ष से फल तोडने के लिए इस्तेमाल किया था, उसके कुछेक मिनट बाद ही वह उसके टुकड़े-टुकड़े कर सकता है अथवा किसी दूसरे वानर को यह करते देख सकता है। जीव-जंतु स्थायी वस्तुओं की दुनिया में नहीं रहते।

इसके अतिरिक्त, प्राणियों की औज़ार-निर्माण तथा उपयोग से संबंधित सक्रियता का स्वरूप कभी सामूहिक नहीं होता।वानर अपने साथी वानर के कार्य को अधिक से अधिक देख ही सकता है। वह उसमें कभी हाथ नहीं बंटायेगा या उसके साथ मिलकर कार्य नहीं करेगा। किंतु इसके विपरीत मनुष्य पूर्वनिर्मित योजना के अनुसार औज़ार बनाता है, वांछित उद्देश्य को पाने के लिए उसे इस्तेमाल करता है और समान भावी परिस्थितियों के लिए उसे संभालकर रखता है। मानव अपेक्षाकृत स्थाई वस्तुओं की दुनिया में रहता है। वह औज़ार को अन्य लोगों के साथ मिलकर भी इस्तेमाल करता है और कुछ से उसके उपयोग का अनुभव सीखता है तथा कुछ को उसे सिखाता है।

मनुष्य के मानस की तीसरी विभेदक विशेषता उसकी सामाजिक अनुभव को आत्मसात् करने की योग्यता है। सामजिक अनुभव व्यक्ति के व्यवहार का निर्धारक तत्व है और मनुष्य के मन के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। बच्चा जन्म के समय से ही सामाजिक संपर्क के व्यवहारों, उपकरणों तथा तकनीक के उपयोग की प्रणालियां सीखना शुरू कर देता है। मानवजाति की सांस्कृतिक प्रगति के आत्मसातिकरण की प्रक्रिया के दौरान उसकी मानसिक क्रियाओं में गुणात्मक परिवर्तन आता है। वह अपने से ऐच्छिक स्मृति, ऐच्छिक ध्यान और अमूर्त चिंतन जैसी सर्वोच्च मानवीय विशेषताएं विकसित करता है।

अमूर्त चिंतन के विकास की भांति ज्ञानेन्द्रियों का विकास भी यथार्थ के अधिक पर्याप्त परावर्तन का एक तरीका है। अतः मनुष्य और पशुओं के बीच चौथा बुनियादी भेद उनकी ज्ञानेन्द्रियों में भेद से संबंध रखता है। बेशक, मनुष्य और पशु दोनों ही अपने इर्द-गिर्द की घटनाओं से उदासीन नहीं रहते हैं। परिवेशी विश्व की परिघटनाएं और वस्तुएं उनमें बाह्य प्रभावों के प्रति कुछ ख़ास प्रकार के रवैये, सकारात्मक और नकारात्मक संवेग जगा सकती है। फिर भी केवल मनुष्य में दूसरे के दुख या हर्ष में सहभागी होने की विकसित क्षमता है और केवल मनुष्य ही प्रकृति के सौंदर्य का आनंद उठा सकता है अथवा संज्ञान की प्रक्रिया में बौद्धिक संतोष की भावना अनुभव कर सकता है।

मनुष्यों और पशुओं के मानस में जो भेद हैं, उसकी जड़ उनके विकास की परिस्थितियों में हैं। यदि पशुजगत में मानस की प्रगति जैव उदविकास के नियमों पर आधारित थी, तो मनुष्य मन, मानव चेतना का विकास सामाजिक-ऐतिहासिक विकास के नियमों से निर्देशित होता है। मानव समाज के अनुभव को आत्मसात् किये बिना, अन्य मनुष्यों के संपर्क में आए बिना कोई भी व्यक्ति अपने में परिपक्व मानवीय भावनाओं, ऐच्छिक ध्यान, स्मृति तथा अमूर्त चिंतन का विकास नहीं कर सकता और सच्चे अर्थों में व्यक्ति नहीं बन सकता। जंगली जानवरों के बीच पले तथा बड़े हुए मानव शिशुओं की सच्ची कहानिया इसका प्रमाण हैं। बंदर का बच्चा दुर्भाग्यवश अपने झुंड़ से बिछड़ जाने पर भी बंदर जैसे ही व्यवहार करेगा, मगर मनुष्य का बच्चा मनुष्य तभी बनेगा, जब वह लोगों के बीच पलेगा तथा बड़ा होगा।

मनुष्य के मानस की उत्पत्ति जैव पदार्थ के लंबे उदविकास का परिणाम थी। मन के विकास के वैज्ञानिक विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि चेतना की उत्पत्ति के लिए कुछ जैव पूर्वापेक्षाएं थी। मनुष्य के पुरखे में निश्चय ही वस्तुमूलक सक्रिय चिंतन की योग्यता थी और वह बहुत से साहचर्य भी बना सकता था। हाथों जैसे अग्र अंगों वाले मानवपूर्व प्राणी निश्चित परिस्थितियों में साधारण औज़ार बना और इस्तेमाल कर सकते थे। यह सब हमें आज पाये जाने वाले मानवाभ वानरों में भी मिलता है।

किंतु मन, चेतना को सीधे पशुओं के उदविकास का परिणाम मानना गलत होगा : मनुष्य सामाजिक संबंधों का उत्पाद है। सामाजिक संबंधों की जैव पूर्वापेक्षा यूथ या झुंड़ था। मनुष्य के पूर्वज यूथ बनाकर रहते थे, जिससे परस्पर सहायता और बहुसंख्य शत्रुओं से रक्षा के लिए अनुकूलतम परिस्थितियां पैदा होती थीं।

वानर के नर बनने में, यूथ के समाज में परिवर्तित होने में निर्णायक भूमिका श्रम ने, यानि औज़ारों के संयुक्त निर्मा्ण तथा उपयोग पर आधारित सक्रियता ने अदा की।

प्रस्तुति :शरद कोकास 






सोमवार, 4 मई 2026

13A. पुरस्कार होंगे तो तिकड़म तो होगी ही



समय ने कहा था,‘पुरस्कार होंगे तो तिकड़म तो होगी ही । पुरस्कारों की चर्चा करते-करते आप भी आखिरकार पुरस्कार के चक्कर में पड़ गए’।पहली बात शायद ज्यादा साफ़ है। जब पुरस्कार होंगे, उनके जरिए धन और प्रतिष्ठा प्राप्त होने के अवसर होंगे, और मानव-श्रेष्ठों के मन में धन और प्रतिष्ठा प्राप्त करने की महत्त्वाकांक्षाएं होंगी, तो फिर पुरस्कारों को पाने के लिए मानव-श्रेष्ठ हर संभव कोशिश भी करेंगे। तिकडमें भी होंगी, बहुत कुछ होगा और होता भी है, सभी जानते ही हैं। पहले वाक्य से समय का मतलब यही था।

दूसरा वाक्य यदि इस तरह लिखा गया होता जैसा कि इसे होना चाहिए था, और जैसा कि समय का आशय था, "पुरस्कारों की चर्चा करते-करते आप भी आखिरकार एक और पुरस्कार की स्थापना की चर्चा के चक्कर में पड़ गए." तो शायद ज्यादा ठीक होता।

समय यही कहना चाहता था कि जब आप पुरस्कारों के पीछे की तिकडमों को समझते हैं, तो फिर लेख के अंत में एक और पुरस्कार स्थापित करने की चर्चा क्यूं कर करने लगे। क्योंकि समय को लगता है, इसका भी वही हश्र होने की अधिक संभावनाएं है और इसके पीछे की सोच को समय ने पहले वाक्य में रख ही दिया था।

आपने इसके बाद के वाक्य की चर्चा नहीं की, और वही समय की समझ के अनुसार ज्यादा महत्वपूर्ण था। समय आपके और पाठकों के चिंतन में इस दिशा को भी शामिल करवाना चाह रहा था, और इसीलिए इसका जिक्र पुनः कर रहा है।

समय ने कहा था:
"लेखन के उद्देश्यों पर ही दोबारा विचार करना होगा।"

यहां समय अपना आशय स्पष्ट कर देना चाहता है।

लेखकों को यह भी विचार दोबारा से करना होगा (जो अब तक नहीं कर पाएं है, या इस पर कुछ और विचार रखते हैं) कि आखिरकार लेखन का उद्देश्य क्या है, लेखन के वास्तविक सरोकार क्या हैं? बहुत से मानव-श्रेष्ठ लेखकों ने इस पर अपने विचारों को लिख छोडा है, उनसे गुजरना चाहिए।
क्या लेखन का उद्देश्य स्वान्तसुखाय है? क्या यह केवल व्यक्तिगत मनोविलास का माध्यम है, और आत्मसंतुष्टि इसका लक्ष्य? क्या सिर्फ़ यह अहम की तुष्टी, व्यक्तिगत महत्तवाकांक्षाओं की पूर्ति, सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करने का जरिया भर है?

या लेखन के उद्देश्यों को इनका अतिक्रमण नहीं करना चाहिए? क्या इसे सामाजिक सरोकारों से नहीं जुडना चाहिए? क्या सामाजिक चेतना की बेहतरी की चिंताएं इसमें शामिल नहीं होनी चाहिएं? क्या तार्किक और वैज्ञानिक सोच को आम करने की जिम्मेदारी इसमें शामिल नहीं होनी चाहिए? क्या अपनी बेहतरी के लिए चिंतित और संघर्षरत आमजन का पक्षपोषण इसमें नहीं झलकना चाहिए? क्या लेखन की दिशा को एक ऐसे आदर्श समाज की स्थापना, जिसमें समता और भाईचारा हो, जिसमें किसी भी मनुष्य का किसी भी तरह का शोषण संभव ना हो, जिसमें सभी की खुशहाली हो, हेतु प्रेरणास्रोत नहीं होना चाहिए?

और क्या लेखन के मूल में यही वास्तविक चिंताएं नहीं होनी चाहिएं?

और अगर ये चिंताए वाकई में लेखक के लेखन के मूल में हैं, तो जाहिर है, पुरस्कारों-सम्मानों का कोई विशेष मतलब नहीं रह जाता। फिर लेखक, अपनी आत्मसंतुष्टि के लिए अपने इन्हीं आदर्शों और उनकी प्राप्ति को ही अपनी कसौटी बनाता है।
बस, समय का उद्देश्य यही कहना था।.....

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शनिवार, 2 मई 2026

13. टिप्पणियों के अंशों से दिमाग़ को कुछ खुराक


रवि कुमार रावतभाठा  उर्फ समय 
मित्रों हमारे मित्र 'समय' अर्थात कामरेड रवि कुमार रावतभाटा अपने ब्लॉग में आने वाली टिप्पणियों के जवाब भी देते थे और उस पर अच्छी चर्चा भी होती थी । यह ब्लॉग पोस्ट ऐसी ही कुछ टिप्पणियों पर दिए गए 'समय' के जवाब पर आधारित है ।  ऐसी ही दो पोस्ट और रहेंगी इस ब्लॉग की तारीख थी रविवार, २१ जून २००९, पढिए आपको अच्छा लगेगा । 

फिलहाल समय द्वारा की गई टिप्पणियों के अंशों से दिमाग़ को कुछ खुराक दीजिए।


"कविताएं और कवि भी" पर की गई टिप्पणी के अंश:( यह एक ब्लॉग का नाम है )

.....आपकी यह बात ही कि “ऋत की विराट परिकल्पना पतित होकर ईश्वर की सर्व सुलभ समझ में प्रतिष्ठित हुई और उसके आगे सम्पूर्ण समर्पण ही एक मात्र राह दिखाई गई। जन के लिए यह आवश्यक था लेकिन इससे हानि यह हुई कि संशय और प्रश्न नेपथ्य में चले गए। इसके कारण धीरे धीरे एक असहिष्णु मानस विकसित हुआ।” सभी कुछ कह देती है।

यह प्रक्रिया पूरे विश्व में लगभग एक ही तरह से विकसित हुई, और जाहिर है इसके पीछे आत्मगत या मनोगत कारणों के बजाए शुद्ध भौतिक कारणों का अस्तित्व रहा है।

आप यदि इसे व्यापकता दें तो आपकी यह अवधारणा सभी आदर्शवादी विचारधाराओं को, इस्लाम को भी अपने में समेट लेने की क़ूवत रखती है। अलग से कुछ कहने की प्रासंगिकता समय को महसूस नहीं हुई, इसलिए ही यह गरीब संशय में आ गया।

भारतीय चिंतन परंपरा में भी दोनों धाराएं यानि संशय और विश्वास, समानान्तर रूप से चले हैं ना कि एक ही विकसित होती परंपरा में। जाहिर है कि इस विरोधी विचार धाराओं  में असहिष्णुता ही हो सकती थी, और इतिहास साक्षी है कि संशय की परंपरा का परिस्थितियों के अनुकूलन के कारण बलपूर्वक दमन कर दिया गया।

बृहस्पतियों, न्याय-वैशैषिकों, चार्वाकों, सुश्रुतों, योगियों, बुद्धों, धर्मकीर्तियों आदि-आदि को समूल नष्ट कर दिया गया, उनकी संशयवादी विचारधारा को या तो खत्म कर दिया गया या आदर्शवादी मुलम्में में प्रक्षिप्त।

भक्तिकाल तो बहुत बाद की चीज़ है। परंतु आपका इस पर यह कहना सही है कि इसी के बाद आम मानस में ईश्वर के आगे संपूर्ण समर्पण या ईश्वर की वर्तमान अवधारणा का बोलबाला हुआ।

खैर, समय की चिंताएं ऐसे ही व्यापक परिप्रेक्ष्यों के संदर्भ में थी, और जाहिर है आपकी जुंबिश में भी ये ही शुमार हैं।

आप इस पर खुद भी संशय में है, परंतु नग्न सत्यों और ज्वलंत समस्याओं के नाम पर बौद्धिक प्रगतिशीलता को तो दाव पर लगाना या स्थगित कर देना सही कदम नहीं हो सकता ना।

आप ही के शब्दों में आज संशय और ऋत की पुनर्प्रतिष्ठा की आवश्यकता है, जो बस मानव मेधा की सतत प्रगतिशील और विकसित होने की प्रवृत्ति को मान दे और उसका पोषण करे। ना कि इनके खिलाफ़ संघर्ष में खुद बर्बर खिलाफती, तालिबानी,प्रतिगामी और प्रतिक्रियावादी तरीके अपनाने को विवश हो जाए।.....

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समय को तो मानवजाति द्वारा समेटा गया यह ज्ञान बहुत उद्वेलित करता है।

सामान्य तौर पर समय फिर हाज़िर होगा।

प्रस्तुति : शरद कोकास 

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

12 .धूमिल के बहाने : कविता का शिल्प, कथ्य और सरोकार

कवि धूमिल 

इस बार समय के पास धूमिल जी की एक कविता और उसकी व्याख्या से संबंधित एक संवाद है। इस संवाद के जरिए कविता और उसके सरोकारों पर एक अच्छा दृष्टिकोण बनाने में मदद मिल सकती है।

दरअसल मनुष्य श्रेष्ठ श्री आदर्श राठौर ने अपने ब्लॉग पर धूमिल की एक कविता प्रस्तुत कर उसका अर्थ जानना चाहा था, जिस पर मनुष्य श्रेष्ठ श्री शशांक शुक्ला ने अपना सरलार्थ प्रस्तुत किया था। समय इस चल्ताऊ दृष्टि से थोडा आहत हुआ और उसने भी अपनी व्याख्या प्रस्तुत की।
इस पर आगे हुआ संवाद समय यहां भी रख रहा है, ताकि सनद रहे और वक्त-जरूरत काम आवे। आप भी अपनी समझ की पुनःजाँच करके कुछ जोड-घटा सकते हैं।

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पहले धूमिल जी की कविता:

शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो

अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो

क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज़ है या
मिट्टी में गिरे हुए
ख़ून का रंग।

लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।


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समय की व्याख्या पर श्री शशांक की टिप्पणी थी:

समय जी ने जो विचार रखें है उसे देखकर लगता है कि काफी हद तक वो सही है लेकिन एक बात जो इस कविता में छुपी हुई है कि यदि धूमिल जी ने इस कविता को लिखते वक्त क्या सोच रहे होंगे क्योंकि अक्सर होता क्या है कि कवितायें लिखी नहीं जाती पर बरबस यूंही कभी दिमाग में कोई सोच आती है भाव आता है शब्दों का जाल कविता बन जाता है समय जी ने जो गूढ़ आर्थ निकाला है उससे मैं संतुष्ठ हूं पर सही है पर क्यों धूमिल इस कविता के पहली चार पंक्तियों से अगली चार पंक्तियों के गूढ़ अर्थ से जुड़ती नज़र नही आ रही है क्योंकि शब्दों का गठन अलग हो सकता है चयन भी अलग हो सकता है पर अर्थ और भावार्थ अलग नहीं हो सकता क्यों कविता जब तक पहली चार पंक्तियों को अगली के ज़रियें नहीं समझाती तो उसे कविता नहीं कह सकते है समय जी के कविता भावार्थ से ये जुड़ाव कम ही दिखता है। कविता में जो कि बहुत ज़रुरी है वो ये कि शुरुआत से लेकर अंत तक शब्द चयन वाक्य का अर्थ अलग हो सकता है पर भावार्थ अलग नहीं हो सकता है।

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इस पर समय का कहना यह था:

आदरणीय शशांक जी,
आपने कुछ महत्वपूर्ण बिंदू उठाये हैं।

पहली जो उल्लेखनीय बात है वह कविता के शिल्प और कथ्य से संबंधित है
आप लगता है कविता के शिल्प के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं।
जिन मानव श्रेष्ठों के लिए कविता मानसिक शगल और व्यक्तिगत सरोकारों का वाइस होती है वहां आपका यह कहना सही है कि "कवितायें लिखी नहीं जाती पर बरबस यूंही कभी दिमाग में कोई सोच आती है भाव आता है शब्दों का जाल कविता बन जाता है", पर जिन मानव श्रेष्ठों के लिए कविता एक जिम्मेदारी का अहसास होती है, जिसे वे अपनी पूरी वैचारिक समझ के साथ एक परिवर्तन के हथियार की तरह प्रस्तुत करते है और अपनी संवेदनशीलता को व्याक्तिगत उंहापोहो से आगे ले जाकर उसे सामाजिक सरोकारों तक विस्तार देते हैं, उनके लिए कथ्य ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है।
फिर कविता ऐसे ही उभरी अस्पष्ट सी सोच या आशु भावों की शब्दों की तुरत-फुरत शिल्पगत अभिव्यक्ति मात्र नहीं रह जाती, वरन शिल्प की सीमाओं के अन्दर और यदि जरूरी है तो इन सीमाओं को तोडकर भी अपनी बात को, निश्चित सोच को पुरजोर तरीके से रखने की कोशिश करती है।
इसीलिए हम देखते हैं कि जब कविता ने यह जिम्मेदारी महसूस की, वह छंद-बंद के पुराने शिल्पगत बंधंनों से मुक्त होकर सरल अतुकांत नयी कविता के रूप में सामने आई। अब कई महान साहित्यकार इसमें भी शिल्प की जकडन उलझा कर वापस इसे स्वांतसुखाय की ओर ले जाना चाहते हैं।
यह कहने का मतलब ये कतई नहीं हैं की शिल्प से कोई मतलब ही नहीं होता कविता का। शिल्प का उचित गठन, कथ्य को प्रभावशाली और अचूक बनाता है, परंतु किसी एक का अतिरेक कविता को कमजोर करता है। कथ्य कविता के सामाजिक सरोकारों और सौद्देशीयता को मुखर करता है और शिल्प इसके प्रभाव को।

आपने यह बिल्कुल सही पकडा है कि धूमिल जी की उक्त कविता में पंक्तियों के बीच जुडाव और निरंतरता की कमी खलती है। परंतु धूमिल जी का कविता शिल्प शब्दों की मितव्ययता पर टिका है, वे कम से कम शब्दों का प्रयोग करते हुए प्रतीकों और अभिव्यंजनाओं में अपने कथ्य को प्रस्तुत करते हैं और पाठक से एक गंभीर संवाद कायम करना चाहते हैं, जिसमें पाठक की चेतना को संस्कारित करने का, उसके मस्तिष्क का सचेत परिष्कार करने का उद्देश्य शामिल होता है।
जिन मनुष्य श्रेष्ठों का उद्देश्य यही होता है, वे इन कविताओं से गुजरकर इन्हें अपने व्यक्तित्व और समझ के विकास का जरिया बना सकते हैं, और जो मनुष्य सिर्फ़ मनोरंजन का एकान्तिक आनंद भोगने के लिए इन पर सरसरी नज़र डालते हैं उनके लिए ये कविताएं एक अबूझ पहेली बनकर रह जाती हैं या वे चलताऊ ढंग से इनकी तुरत-फुरत मनचाही व्याख्या कर अपनी तात्कालिक संतुष्टि प्राप्त कर लेते हैं।

और उक्त कविता के संदर्भ में एक और अंतिम बात। ऐसा कतई नहीं है कि यहां जुडाव और निरंतरता सिरे से ही गायब हो।

यह गरीब इस कविता से पहले नहीं गुजरा है, और ना ही इसके मूल पाठ के बारे में कुछ पता है कि यही पूरी कविता है या कुछ छूट गया है, फिर भी दोबारा देखने से जो लगा वो यह है कि पहली तीन पंक्तियों में वे शब्द और कविता की बात करते हैं, अगली दो पंक्तियों में कविता के सरोकारों के रूप में आदमी को केन्द्र में रखे जाने की बात करते हैं, फिर आगे की चार पंक्तियों में कौनसे आदमी को केन्द्र में रखा जाना है, किस आदमी का आपको पक्ष लेना है उनका जो मार रहे हैं या उनका जो मारे जा रहे हैं, आपकी संवेदनशीलता किस चीज़ पर द्रवित हो रही है। जाहिरा तौर पर यहां धूमिल आपके मन में मिट्टी और खून के रंग की चर्चा कर उसकी सिर्फ़ आवाज़ से तुलना कर हमें प्रेरित कर रहे हैं कि हम शोषितों के पक्ष को अपनी संवेदना से जोडें।
उसके आगे की चार पंक्तियों में धूमिल जी अब साफ़-साफ़ इशारा करते हैं आपकी आगे के क्रियाकलाप और व्यवहारों की दिशा क्या होनी चाहिए, अगर आप वाकई में उन लोगों का पक्ष चुनना चाह रहे हैं जो दमित और शोषित हैं तो आपको अपनी समझ और क्रियाशीलता का उत्स उन्हीं के बीच से खोजना होगा, वहीं आपको सही राह मिल पाएगी क्योंकि उनसे अलगाव के साथ, आपके पक्षपोषण की ईमानदारी कायम रहने के बाबजूद आपके वैचारिक और क्रियात्मक भटकाव की पूरी संभावनाएं हैं।

अरे वाह। दोबारा पढ़ने पर तो यह गरीब भी खुद अभिभूत हो उठा है कि इन आठ-दस पंक्तियों में तो साहित्य, उसके सरोकारों और क्रियाशीलता की सही दशा-दिशा का पूरा दर्शन छिपा हुआ था।

आदर्श जी और शशांक जी का अब मैं वाकई तहे-दिल से शुक्रिया करना चाहता हूं जिनकी कि जुंबिशों की वजह से इस खाकसार को अपनी चेतना के परिष्कार का अवसर मिला और वह अपनी समझ में काफ़ी-कुछ जोड पाया।

एक बार फिर शुक्रिया !!
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तो हे मानव श्रेष्ठों,
आप भी यहां पर इस संवाद को आगे बढा़ सकते हैं, कुछ जोड़ घटा सकते हैं।


अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त कर सकते हैं।

( समय के ब्लॉग से साभार - शरद कोकास )

गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

11.सौन्दर्यबोध और व्यवहार


हे मानव श्रेष्ठों,

"पाषाण युग में गुफाओं की दीवारों पर चित्र बनाए जाते थे, उपलब्ध संसाधनों के तालमेल से संगीत भी गाया-बजाया जाता था, ग्रामीण लोग आज भी घरों के आगे मांडने बनाते हैं, लोकगीतों की धुन आज भी आकर्षित करती है। ऐसे में इलीट वर्ग के फ़्यूजन संगीत और महंगी तस्वीरों को अपने संग्रह का हिस्सा बनाने की होड़ और प्रकृति से परे इलेक्ट्रोनिक मनोरंजन को क्या ‘सौन्दर्यबोध’ कहा जा सकता है?"

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कुलमिलाकर यह जिज्ञासा सौन्दर्यबोध के निरूपण और तुलना के संदर्भ में है।
चलिए बात शुरू करते हैं...

उपरोक्त जिज्ञासा में पूर्वोक्त तथ्य सामूहिक श्रम-जीवन के सौन्दर्यबोध की सहज और सरल अभिव्यक्तियां हैं, वहीं पश्चोक्त तथ्य सौन्दर्यबोध के विकास की व्यक्तिवादी और अहमवादी दिशा का द्योतक है। इलेक्ट्रोनिक मनोरंजन में भी दोनों तरह की प्रवृतियां मौजूद हैं।


मनुष्य अपने सामाजिक व्यवहार के दौरान, विभिन्न सौन्दर्यात्मक गुणों, मुख्य रूप से सुंदर और कुरूप का भावनात्मक मूल्यांकन करने की योग्यता विकसित करता है। यह योग्यता उसके सृजनात्मक कार्यों में प्रकट होती है और उसके आनंद की प्रेरणा स्रोत होती है। उत्तम सौन्दर्याभिरूचियों का अर्थ है वास्तविक सौन्दर्य से आनंद प्राप्त करने की योग्यता, अपने कार्य में, दैनंदिन जीवन, आचरण, कला में सौन्दर्य का सृजन करने की अपेक्षा। निकृष्ट सौन्दर्याभिरूचियां यथार्थ के प्रति मनुष्य के सौन्दर्यात्मक दृष्टिकोण को विकृत करती हैं, वास्तविक सौन्दर्य के प्रति उदासीन बनाती हैं और कभी-कभी परिणाम यहां तक पहुंचता है कि मनुष्य कुरूप वस्तुओं और प्रवृतियों से भी आनंद प्राप्त करता है।


सौन्दर्यबोध सुंदर के चयन और निरूपण से संबंधित मात्र नहीं होता, वरन् सुंदर का असुंदर से भेद और फिर असुंदर को सुंदर बनाने के सचेत क्रियाकलापों से भी संबंधित है। यह सिर्फ़ विश्व के वस्तुगत रूप का मामला ही नहीं, वरन् विचारों की सुंदरता का मामला भी है। यह सौन्दर्य के निरूपण के साथ-साथ असौन्दर्य के साथ संघर्ष और उसके खात्में की प्रक्रिया पर निर्भर है।


विचारों के मामले में शिव और अशिव यानि सुंदर और असुंदर के निर्धारण की कसौटी क्या हो, यह मनुष्य की वर्गपक्षधरता और सौन्दर्याभिरूचियों पर निर्भर करता है। परंतु यदि सामाजिक नज़रिए से देखा जाए तो मोटे तौर पर यह कसौटी निर्धारित की जा सकती है जो विचार अंतत्वोगत्वा संपूर्ण मानव समाज या अधिकतर हिस्से के हितों के अनुरूप हो तो वह शिव है, सुंदर है जबकि जो विचार व्यक्तिगत हितों और प्रभुत्व प्राप्त समूहों के हितों के अनुरूप हो वह अशिव है, असुंदर है।


अब होता यह है कि प्रभुत्व/सत्ता प्राप्त समूह, चूंकि सारे साधन उनकी पहुंच और प्रभाव में होते हैं, ऐसे विचारों और विचारधाराओं का प्रचार और पक्षपोषण करता है जो उनके हितों के अनुरूप हों या ख़िलाफ़ नहीं जाते हों। अंतत्वोगत्वा समाज में और प्रभुत्व प्राप्ति की इच्छाएं रखने वालों में इन्हीं विचारों का बोलबाला हो जाता है, और सभी क्षेत्रों की सृजनात्मकता और रचनात्मकता इसी प्रभुत्व प्राप्ति के आकांक्षा के साथ गर्भनालबद्ध हो जाती हैं।


उपरोक्त जिज्ञासा को, इसकी पश्चोक्त विकृतियों को इसी नज़रिए के साथ विश्लेषित करना चाहिए।

दरअसल किसी भी क्रिया को बेहतर तरीके से करने की प्रवृति मनुष्य के सौन्दर्यबोध पर निर्भर करती है। एक समुचित और उच्चतर सौन्दर्यबोध का विकास और निर्माण मनुष्य के द्वारा होने वाली प्रत्येक क्रिया या व्यवहार को सचेत नियंत्रित और निर्देशित करता है।


सौन्दर्यबोध यानि सुंदरता का अहसास, सौन्दर्य के आदर्श प्रतिमानों की समझ, हर वस्तु, क्रिया या विचारों का उन प्रतिमानों के साथ तुलनात्मक विश्लेषण, सुंदर और असुंदर के बीच तार्किक विभेद स्थापित कर सकने की योग्यता और साथ ही मनुष्य की संवेदनाओं का सौन्दर्य के हित और हेतु परिष्कार।


सौन्दर्यबोध मनुष्यों को हर क्रिया को बेहतर रूप से करने, आदर्श रूप में करने के लिए सचेत प्रेरित करता है, मनुष्यों के विचारों को बेहतरी की ओर अग्रसर करता है। स्वयं को और बेहतर, पर्यावरण और दुनियां को और बेहतर बनाने में मनुष्य की दिशा तय करता है।
जाहिर है एक उत्तम सौन्दर्यबोध का निर्माण और विकास, सिर्फ़ एक निश्चित क्रियाकलाप तक अपने आपको सीमित नहीं रख सकता, यह मनुष्य को जीवन के हर पहलू में अपनी श्रेष्ठता के साथ सक्रिय रहने की क्षमता प्रदान करता है।
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आज इतना ही...
अगली बार कुछ और नयी जिज्ञासाएं.......

आपका समय

प्रस्तुति :शरद कोकास 

बुधवार, 4 अगस्त 2021

9. प्रेम एक भौतिक अवधारणा है.....



पिछली बार हमने प्रेम पर बात करते हुए मनुष्य की सामाजिक सापेक्षता की चर्चा की थी, इस बार हम प्रेम की भौतिक अवधारणा को समझने की कोशिश करेंगे....


प्रेम मनुष्य का, विशेषतः युवावस्था में, एक स्थायी भावनात्मक संवेग है। इसे मनुष्य की प्राकृतिक और सामाजिक सापेक्षताओं, जिनका कि पूर्व में थोडा़ विवेचन हुआ है, की सीमाओं के संदर्भ में ही सही-सही समझा जा सकता है।
मनोविज्ञान में ‘प्रेम’ शब्द को इसके संकीर्ण और व्यापक अर्थों में प्रयोग किया जाता है। अपने व्यापक अर्थों में प्रेम एक प्रबल सकारात्मक संवेग है, जो अपने लक्ष्य को अन्य सभी लक्ष्यों से अलग कर लेता है और उसे मनुष्य अपनी जीवनीय आवश्यकताओं एवं हितों का केंद्र बना लेता है। मातृभूमि, मां, बच्चों, संगीत आदि से प्रेम इस कोटि में आता है।
अपने संकीर्ण अर्थों में प्रेम मनुष्य की एक प्रगाढ़ तथा अपेक्षाकृत स्थिर भावना है, जो शरीरक्रिया की दृष्टि से यौन आवश्यकताओं की उपज होती है। यह भावना, मनुष्य में अपनी महत्वपूर्ण वैयक्तिक विशेषता द्वारा दूसरे व्यक्ति के जीवन में इस ढंग से अधिकतम स्थान पा लेने की इच्छा में अभिव्यक्त होती है कि उस व्यक्ति में भी वैसी ही प्रगाढ़ तथा स्थिर जवाबी भावना रखने की आवश्यकता पैदा हो जाये।
इस तरह प्रेम के दो पहलू सामने आते हैं, एक आत्मिक और दूसरा शारीरिक। प्रेम को या तो केवल कामवृति का पर्याय मान लिया जाता है, या फिर उसके शारीरिक पहलू को नकारकर अथवा महत्वहीन बताकर उसे मात्र एक ‘आत्मिक’ भावना का दर्जा दे दिया जाता है। सत्य यह है कि शारीरिक आवश्यकताएं निश्चय ही पुरूष तथा स्त्री के बीच प्रेम की भावना के पैदा होने तथा बने रहने की एक पूर्व अपेक्षा है, किंतु अपनी अंतरंग मानसिक विशेषताओं की दृष्टि से प्रेम एक समाजसापेक्ष भावना है, क्योंकि मनुष्य के व्यक्तित्व में शारीरिक तत्व दब जाता है, बदल जाता है और सामाजिक रूप ग्रहण कर लेता है।

यहां किशोरावस्था के प्रेम का भी अलग से जिक्र किया जाना चाहिये, क्योंकि अपने विशिष्ट स्वरूप के कारण यह विशेष महत्व रखता है। व्यस्कों की तरह ही, किशोर अवस्था में किया जाने वाला प्रेम भी यौन आवश्यकता की उपज होता है परंतु यह व्यस्क प्रेम से बहुत भिन्न होता है। आम तौर पर किशोर इसके मूल में निहित आवश्यकताओं के बीच स्पष्ट भेद नहीं कर पाते और यह भी पूरी तरह नहीं जानते कि इन्हें कैसे तुष्ट किया जाता है। अक्सर व्यस्क लोग उनकी इस कोमल भावना को अपने निजी यौन अनुभवों की दृष्टि से देखते है, और यह अहसास की उन्हें गलत नजरिए से देखा जा रहा है किशोरों के अंदर अविश्वास, अवमानना और धृष्टता के भाव पैदा होने की संभावना देता है। हालांकि इस आयु में प्रेम वस्तुपरक रूप से कामेच्छा पर आधारित होता है पर प्रेमियों के व्यवहार का स्वरूप इस कामेच्छा की बात को नकारता है और प्रेम की भावना को मानसिक ताने-बाने में उलझाकर एक ऐसा घटाघोप तैयार कर लेता है, जिसकी परिणति नकारात्मक स्वरूप ग्रहण कर लेती है।

अब मनोविज्ञान से बाहर निकलते हैं और देखते हैं कि उपरोक्त विवेचना के आधार पर और भावनाओं के भौतिक आधार के मद्दे-नज़र, यह कहा जा सकता है कि प्रेम वस्तुतः एक भौतिक अवधारणा है जिसका कि सार अंत्यंत समृद्ध तथा विविध है। लोगों के बीच प्रेम एक ऐसे अंतर्संबंध का द्योतक है, जो एक दूसरे की संगति के लिए लालायित होने, अपनी दिलचस्पियों और आकांक्षाओं को तद्‍रूप करने, एक दूसरे को शारीरिक और आत्मिक रूप से समर्पित करने के लिए प्रेरित करता है। प्रेम की भावना प्राकृतिक आधार रखती है परंतु मूलतः यह सामाजिक है।

जो मनुष्य प्रेम की इस भावना को सिर्फ़ प्राकृतिक आधारों पर निर्भर रखते है, जिनके लिए व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ति ही सबसे महत्वपूर्ण होती है, वे इसके सामाजिक पहलू और सरोकारों को जबरन नज़रअंदाज करते हैं और अपनी भौतिक जरूरतों और अहम् की तुष्टि के लिए आसमान सिर पर उठा लेते हैं। जो मनुष्य प्रेम इस भावना को सिर्फ़ सामाजिक आधारों के हिसाब से तौलते हैं, वे अपने सामाजिक सरोकारों के सामने इसका दमन करते हैं, और कुंठाओं का शिकार बनते हैं।

जो मनुष्य प्रेम की इस भावना के प्राकृतिक आधारों को समझते हुए सामाजिक आधारों तक इसे व्यापकता देते हैं, प्रेम के सही अर्थों को ढूढ़ने की कोशिश करते हैं, इसे व्यक्तिगत और सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में समझने की कोशिश करते हैं वे इस अंतर्विरोध से भी जिम्मेदारी से जूझते हैं और अपनी व्यक्तिगत जरूरतों और सामाजिक सरोकारों के बीच एक तारतम्य बिठाते हैं। मनुष्य को यह समझना चाहिए कि ये भावनाएं, ये अंतर्विरोध, ये द्वंद वास्तविक भौतिक परिस्थितियों से निगमित हो रहे हैं, इसलिए इनका हल भी वास्तविक भौतिक क्रियाकलापों और परिस्थितियों के अनूकूलन से ही निकल सकता है न कि मानसिक क्रियाकलापों और कुंठाओं से जो कि अंततः गहरे अवसादों का कारण बन सकते हैं।

आपका समय

प्रस्तुति : शरद कोकास

शनिवार, 10 जुलाई 2021

6.दिमाग को कभी दिल के रूबरू करके देखिये.


समय
 के साये में एक सम्माननीय आगन्तुक ने एक टिप्पणी में क्या खू़ब बातकही है, एक खू़बसूरत अंदाज़ में.....

दिमाग को कभी दिल के रूबरू करके देखिये.. फिर कहिए..
समय ने सोचा चलो आज इस बेहद प्रचलित जुमले पर ही बात की जाए।
अक्सर इसका कई विभिन्न रूपों में प्रयोग किया जाता है। दिल की सुनों....दिल से सोचो...दिमाग़ और दिल के बीच ऊंहापोह....दिमाग़ कुछ और कह रहा था, दिल कुछ और....मैं तो अपने दिल की सुनता हूं...दिल को दिमाग़ पर हावी मत होने दो....दिल अक्सर सही कहता है, पर हम दिमाग़ लगा लेते हैं...बगैरा..बगैरा..
इस तरह दिल और दिमाग़ दो प्रतिद्वन्दी वस्तुगत बिंबों, अलग-अलग मानसिक क्रिया करने वाले दो ध्रुवो के रूप में उभरते हैं, जोहमारे अस्तित्व से बावस्ता हैं।

चलिए देखते हैं, वस्तुगतता क्या है।
अधिकतर जानते हैं कि शारीरिक संरचना के बारे में मानवजाति के उपलब्ध ग्यानयानि शरीर-क्रिया विग्यान के अनुसार दिमाग़ यानि मस्तिष्क सारी संवेदनाओं औरविचारों का केन्द्र है जबकि दिल का कार्य रक्त-संचार हेतु आवश्यक दबाब पैदा करना है,यह एक पंप मात्र है जिसकी वज़ह से शरीर की सारी कोशिकाओं और मस्तिष्क को भीरक्त के जरिए आवश्यक पदार्थों की आपूर्ति होती है। 

ऐसा नहीं है कि इन जुमलों को प्रयोग करने वाले इस तथ्य को नहीं जानते, फिर भीइनका प्रयोग होता है।
एक तो भाषागत आदतों के कारण, दूसरा कहीं ना कहीं समझ में यह बात पैठी होती हैकि मनुष्य के मानस में भावनाओं और तार्किक भौतिक समझ के वाकई में दोअलग-अलग ध्रुव हैं।

अक्सर ’दिल के हिसाब से’ का मतलब होताहै, प्राथमिक रूप से मनुष्य के दिमाग़ में जोप्रतिक्रिया या इच्छा उत्पन्न हुई है उसकेहिसाब से या अपनी विवेकहीन भावनाओं केहिसाब से मनुष्य का क्रियाशील होना।जबकि ’दिमाग के हिसाब से’ का मतलबहोता है, मनुष्य का प्राप्त संवेदनों औरसूचनाओं का समझ और विवेक के स्तर केअनुसार विश्लेषण कर लाभ-हानि के हिसाबसे या आदर्शों के सापेक्ष नाप-तौल करक्रियाशील होना।
कोईकोई ऐसे सोचता है कि प्राथमिकप्रतिक्रिया या इच्छा शुद्ध होती है, दिल कीआवाज़ होती है अतएव सही होती है, जबकिदिमाग़ लगाकर हम अपनी क्रियाशीलता कोस्वार्थी बना लेते हैं। कुछ-कुछ ऐसे भी सोचतेहैं कि दिमाग़ से नाप-तौल कर ही कार्यसंपन्न करने चाहिए।

क्या सचमुच ही प्राथमिक प्रतिक्रिया या इच्छा अर्थात दिल की आवाज़ शुद्ध और सही होती है?
चलिए देखते हैं।
आप जानते हैं कि एक ही वस्तुगत बिंब अलग-अलग मनुष्यों में अलग-अलग भावना का संचार करता है। एक ही चीज़ अगर कुछमनुष्यों में तृष्णा का कारण बनती है तो कुछ मनुष्यों में वितृष्णा का कारण बनती है जैसे कि शराब, मांस आदि। जाहिर है ऐसे मेंइनके सापेक्ष क्रियाशीलता भी अलग-अलग होगी। किसी स्त्री को देखकर पुरूष मन में, नरमादा के अंतर्संबंधों के सापेक्ष उसे पाने कीपैदा हुई प्राथमिक प्रतिक्रिया या इच्छा अर्थात दिल की आवाज़ को सामाजिक आदर्शों के सापेक्ष कैसे शुद्ध और सही कहा जा सकताहै? ऐसे ही कई और चीज़ों पर भी सोचा जा सकता है।

दरअसल, एक जीव होने के नाते हर मनुष्य अपनी जिजीविषा हेतु बेहद स्वार्थीप्रवृत्तियों और प्राथमिक प्रतिक्रियाओं या इच्छाओं का प्रदर्शन करता है या करनाचाहता है, परंतु एक सामाजिक प्राणी होने के विवेक से संपन्नता और आदर्शप्रतिमानों की समझ उसे सही दिशा दिखाती है और उसके व्यवहार को नियमित औरनियंत्रित करती है। अब हो यह रहा है कि आज की व्यवस्था द्वारा प्रचलित औरस्थापित मूल्यों में सामाजिकता गायब हो रही है और व्यक्तिगत स्वार्थपूर्ति केहितसाधन को प्रतिष्ठित किया जा रहा है अतएव जब सामान्य स्तर का मनुष्य जबदिमाग़ लगाता है तो नापतौल कर अपनी व्यक्तिगत स्वार्थपूर्ति हेतु प्रवृत होता है।

इसीलिए यह विचार पैदा होता है कि वह यदि अपने दिल की आवाज़ पर जो कि साधारणतयाः अपने विकास हेतु समाज पर निर्भर होने के कारण कुछ-कुछ सामाजिक मूल्यों से संतृप्त होती है, के हिसाब से कार्य करे तो शायद ज़्यादा बेहतररहेगा।
समय के उक्त सम्माननीय आगन्तुक की टिप्पणी का शायद यही मतलब है।
जाहिर है, जिस मनुष्य का ग्यान और समझ का स्तर अपेक्षाकृत निचले स्तर पर होता है, उसके व्यवहार का स्तर इन प्राथमिकप्रतिक्रियाओं या इच्छाओं या दिल की आवाज़ पर ज़्यादा निर्भर करता है और जो अपने ग्यान और समझ के स्तर को निरंतरपरिष्कृत करते एवं विवेक को ज़्यादा तार्किक बनाते जाते हैं, उनके व्यवहार का स्तर भी तदअनुसार ही ज़्यादा संयमित,विवेकसंगत और सामाजिक होता जाता है।

समय 

प्रस्तुति : शरद कोकास