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गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

12 .धूमिल के बहाने : कविता का शिल्प, कथ्य और सरोकार

कवि धूमिल 

इस बार समय के पास धूमिल जी की एक कविता और उसकी व्याख्या से संबंधित एक संवाद है। इस संवाद के जरिए कविता और उसके सरोकारों पर एक अच्छा दृष्टिकोण बनाने में मदद मिल सकती है।

दरअसल मनुष्य श्रेष्ठ श्री आदर्श राठौर ने अपने ब्लॉग पर धूमिल की एक कविता प्रस्तुत कर उसका अर्थ जानना चाहा था, जिस पर मनुष्य श्रेष्ठ श्री शशांक शुक्ला ने अपना सरलार्थ प्रस्तुत किया था। समय इस चल्ताऊ दृष्टि से थोडा आहत हुआ और उसने भी अपनी व्याख्या प्रस्तुत की।
इस पर आगे हुआ संवाद समय यहां भी रख रहा है, ताकि सनद रहे और वक्त-जरूरत काम आवे। आप भी अपनी समझ की पुनःजाँच करके कुछ जोड-घटा सकते हैं।

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पहले धूमिल जी की कविता:

शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो

अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो

क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज़ है या
मिट्टी में गिरे हुए
ख़ून का रंग।

लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।


००००

समय की व्याख्या पर श्री शशांक की टिप्पणी थी:

समय जी ने जो विचार रखें है उसे देखकर लगता है कि काफी हद तक वो सही है लेकिन एक बात जो इस कविता में छुपी हुई है कि यदि धूमिल जी ने इस कविता को लिखते वक्त क्या सोच रहे होंगे क्योंकि अक्सर होता क्या है कि कवितायें लिखी नहीं जाती पर बरबस यूंही कभी दिमाग में कोई सोच आती है भाव आता है शब्दों का जाल कविता बन जाता है समय जी ने जो गूढ़ आर्थ निकाला है उससे मैं संतुष्ठ हूं पर सही है पर क्यों धूमिल इस कविता के पहली चार पंक्तियों से अगली चार पंक्तियों के गूढ़ अर्थ से जुड़ती नज़र नही आ रही है क्योंकि शब्दों का गठन अलग हो सकता है चयन भी अलग हो सकता है पर अर्थ और भावार्थ अलग नहीं हो सकता क्यों कविता जब तक पहली चार पंक्तियों को अगली के ज़रियें नहीं समझाती तो उसे कविता नहीं कह सकते है समय जी के कविता भावार्थ से ये जुड़ाव कम ही दिखता है। कविता में जो कि बहुत ज़रुरी है वो ये कि शुरुआत से लेकर अंत तक शब्द चयन वाक्य का अर्थ अलग हो सकता है पर भावार्थ अलग नहीं हो सकता है।

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इस पर समय का कहना यह था:

आदरणीय शशांक जी,
आपने कुछ महत्वपूर्ण बिंदू उठाये हैं।

पहली जो उल्लेखनीय बात है वह कविता के शिल्प और कथ्य से संबंधित है
आप लगता है कविता के शिल्प के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं।
जिन मानव श्रेष्ठों के लिए कविता मानसिक शगल और व्यक्तिगत सरोकारों का वाइस होती है वहां आपका यह कहना सही है कि "कवितायें लिखी नहीं जाती पर बरबस यूंही कभी दिमाग में कोई सोच आती है भाव आता है शब्दों का जाल कविता बन जाता है", पर जिन मानव श्रेष्ठों के लिए कविता एक जिम्मेदारी का अहसास होती है, जिसे वे अपनी पूरी वैचारिक समझ के साथ एक परिवर्तन के हथियार की तरह प्रस्तुत करते है और अपनी संवेदनशीलता को व्याक्तिगत उंहापोहो से आगे ले जाकर उसे सामाजिक सरोकारों तक विस्तार देते हैं, उनके लिए कथ्य ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है।
फिर कविता ऐसे ही उभरी अस्पष्ट सी सोच या आशु भावों की शब्दों की तुरत-फुरत शिल्पगत अभिव्यक्ति मात्र नहीं रह जाती, वरन शिल्प की सीमाओं के अन्दर और यदि जरूरी है तो इन सीमाओं को तोडकर भी अपनी बात को, निश्चित सोच को पुरजोर तरीके से रखने की कोशिश करती है।
इसीलिए हम देखते हैं कि जब कविता ने यह जिम्मेदारी महसूस की, वह छंद-बंद के पुराने शिल्पगत बंधंनों से मुक्त होकर सरल अतुकांत नयी कविता के रूप में सामने आई। अब कई महान साहित्यकार इसमें भी शिल्प की जकडन उलझा कर वापस इसे स्वांतसुखाय की ओर ले जाना चाहते हैं।
यह कहने का मतलब ये कतई नहीं हैं की शिल्प से कोई मतलब ही नहीं होता कविता का। शिल्प का उचित गठन, कथ्य को प्रभावशाली और अचूक बनाता है, परंतु किसी एक का अतिरेक कविता को कमजोर करता है। कथ्य कविता के सामाजिक सरोकारों और सौद्देशीयता को मुखर करता है और शिल्प इसके प्रभाव को।

आपने यह बिल्कुल सही पकडा है कि धूमिल जी की उक्त कविता में पंक्तियों के बीच जुडाव और निरंतरता की कमी खलती है। परंतु धूमिल जी का कविता शिल्प शब्दों की मितव्ययता पर टिका है, वे कम से कम शब्दों का प्रयोग करते हुए प्रतीकों और अभिव्यंजनाओं में अपने कथ्य को प्रस्तुत करते हैं और पाठक से एक गंभीर संवाद कायम करना चाहते हैं, जिसमें पाठक की चेतना को संस्कारित करने का, उसके मस्तिष्क का सचेत परिष्कार करने का उद्देश्य शामिल होता है।
जिन मनुष्य श्रेष्ठों का उद्देश्य यही होता है, वे इन कविताओं से गुजरकर इन्हें अपने व्यक्तित्व और समझ के विकास का जरिया बना सकते हैं, और जो मनुष्य सिर्फ़ मनोरंजन का एकान्तिक आनंद भोगने के लिए इन पर सरसरी नज़र डालते हैं उनके लिए ये कविताएं एक अबूझ पहेली बनकर रह जाती हैं या वे चलताऊ ढंग से इनकी तुरत-फुरत मनचाही व्याख्या कर अपनी तात्कालिक संतुष्टि प्राप्त कर लेते हैं।

और उक्त कविता के संदर्भ में एक और अंतिम बात। ऐसा कतई नहीं है कि यहां जुडाव और निरंतरता सिरे से ही गायब हो।

यह गरीब इस कविता से पहले नहीं गुजरा है, और ना ही इसके मूल पाठ के बारे में कुछ पता है कि यही पूरी कविता है या कुछ छूट गया है, फिर भी दोबारा देखने से जो लगा वो यह है कि पहली तीन पंक्तियों में वे शब्द और कविता की बात करते हैं, अगली दो पंक्तियों में कविता के सरोकारों के रूप में आदमी को केन्द्र में रखे जाने की बात करते हैं, फिर आगे की चार पंक्तियों में कौनसे आदमी को केन्द्र में रखा जाना है, किस आदमी का आपको पक्ष लेना है उनका जो मार रहे हैं या उनका जो मारे जा रहे हैं, आपकी संवेदनशीलता किस चीज़ पर द्रवित हो रही है। जाहिरा तौर पर यहां धूमिल आपके मन में मिट्टी और खून के रंग की चर्चा कर उसकी सिर्फ़ आवाज़ से तुलना कर हमें प्रेरित कर रहे हैं कि हम शोषितों के पक्ष को अपनी संवेदना से जोडें।
उसके आगे की चार पंक्तियों में धूमिल जी अब साफ़-साफ़ इशारा करते हैं आपकी आगे के क्रियाकलाप और व्यवहारों की दिशा क्या होनी चाहिए, अगर आप वाकई में उन लोगों का पक्ष चुनना चाह रहे हैं जो दमित और शोषित हैं तो आपको अपनी समझ और क्रियाशीलता का उत्स उन्हीं के बीच से खोजना होगा, वहीं आपको सही राह मिल पाएगी क्योंकि उनसे अलगाव के साथ, आपके पक्षपोषण की ईमानदारी कायम रहने के बाबजूद आपके वैचारिक और क्रियात्मक भटकाव की पूरी संभावनाएं हैं।

अरे वाह। दोबारा पढ़ने पर तो यह गरीब भी खुद अभिभूत हो उठा है कि इन आठ-दस पंक्तियों में तो साहित्य, उसके सरोकारों और क्रियाशीलता की सही दशा-दिशा का पूरा दर्शन छिपा हुआ था।

आदर्श जी और शशांक जी का अब मैं वाकई तहे-दिल से शुक्रिया करना चाहता हूं जिनकी कि जुंबिशों की वजह से इस खाकसार को अपनी चेतना के परिष्कार का अवसर मिला और वह अपनी समझ में काफ़ी-कुछ जोड पाया।

एक बार फिर शुक्रिया !!
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तो हे मानव श्रेष्ठों,
आप भी यहां पर इस संवाद को आगे बढा़ सकते हैं, कुछ जोड़ घटा सकते हैं।


अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त कर सकते हैं।

( समय के ब्लॉग से साभार - शरद कोकास )

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

प्रो. मैनेजर पाण्डेय को जन्मदिन की शुभकामनायें 23 सितम्बर


" मैं ‘ शब्द और कर्म ‘ के साथ ‘ साहित्य और इतिहास दृष्टि ‘ लेकर हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में आया "

प्रो मैनेजर पाण्डेय बता रहे हैं कि वे आलोचना के क्षेत्र में कैसे आए । प्रो मैनेजर पाण्डेय से महावीर अग्रवाल द्वारा लिए गए साक्षात्कार का एक अंश साहित्यिक पत्रिका ‘ सापेक्ष ‘ से साभार ।
महावीर अग्रवाल : अपनी रचना प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए बताइये की आपकी आलोचना के क्षेत्र में रुचि कैसे जागृत हुई ? आप कब से यह कार्य कर रहे हैं ? इस क्षेत्र को आपने क्यों चुना ?
प्रो मैनेजर पाण्डेय : आलोचना में रुचि आलोचना पढ़ते पढ़ते ही जगी । मैंने अपने छात्र जीवन में जिन आलोचकों को विशेष रूप से पढ़ा था उनमें आचार्य रामचंद्र शुक्ल , हजारी प्रसाद द्विवेदी , रामविलास शर्मा ,नन्ददुलारे वाजपेयी प्रमुख थे । एक तरह से इन आलोचकों की आलोचनाओं में निहित और व्यक्त अन्तर्विरोधों के बारे में सोचते हुए ही मुझे आलोचना के क्षेत्र में काम करने की प्रेरणा मिली । मैं उस समय अपनी पी एच डी के लिए ‘ भक्ति आंदोलन और सूरदास ‘ पर काम कर रहा था । मैंने अपना पहला आलोचनात्मक लेख ‘ भक्ति काव्य की लोकधर्मिता ‘ लिखा था जो डॉ त्रिभुवन सिंह द्वारा सम्पादित ‘ साहित्यिक निबंध ‘ नामक पुस्तक में 1968 में छपा था ।
            उस समय प्रगतिशील लेखक संघ कम सक्रिय था लेकिन बनारस में प्रगतिशील लेखक बहुत सक्रिय थे । मैं बनारस के प्रगतिशील लेखकों की गोष्ठियों में भाग लेते हुए अपने विचारों को व्यवस्थित और विकसित कर रहा था । यह मेरी आलोचनात्मक चेतना के निर्माण का आरंभिक दौर था ।बाद में मैं 1971 में जोधपुर विश्वविद्यालय पहुँचा जहाँ डॉ नामवर सिंह पहले से मौजूद थे । वहाँ उनके साथ विभिन्न साहित्यिक प्रश्नों पर बातचीत करते हुए मैं आलोचना के क्षेत्र में बहुत अधिक सजग रूप से सक्रिय होने की कोशिश करने लगा । उस समय नामवर सिंह के सम्पादन में निकलने वाली पत्रिका ‘ आलोचना ‘ में मेरे लेख छपने लगे । 1975 में मैं सतना के प्रगतिशील लेखक सम्मेलन में शामिल हुआ था जिसमें परसाई जी भी मौजूद थे । उसमें मैंने एक लेख ‘ साहित्य के नये सौन्दर्यशास्त्र की ज़रूरत ‘ पढ़ा था जो बाद में पहल में प्रकाशित हुआ था ।
            उस समय मैं मुक्तिबोध के आलोचनात्मक लेख से परिचित हुआ था । बाद में मैंने साहित्य के इतिहास दर्शन के क्षेत्र में काम करना शुरू किया और ‘ आलोचना ‘ पत्रिका में साहित्य व इतिहास दर्शन से संबन्धित चार लेख छपे , जिन्हे पाठकों ने बहुत पसन्द किया । वे लेख मेरी पुस्तक “ साहित्य व इतिहास दृष्टि में हैं । उसी बीच मेरे लेख विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में छपे थे वे ‘ शब्द और कर्म ‘ नामक मेरी पुस्तक मे संकलित हैं । इस तरह मैं ‘ शब्द और कर्म ‘ के साथ ‘ साहित्य और इतिहास दृष्टि ‘ लेकर हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में आया ।

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

"समुद्र चांद और मैं .". मैं यानि कवि अशोक सिंघई

अशोक सिंघई का पाँचवाँ काव्य संग्रह
 ‘समुद्र, चाँद और मैं’ लोकार्पित
विगत दिनों शीर्ष कवि व समर्थ समालोचक डॉ0 केदार नाथ सिंह भिलाई आये थे । 75 वर्षीय केदार जी अपनी 90 वर्षीय माता जी से मिलने  कोलकाता जा रहे थे , बीच में थोड़ा सा समय मिला तो छत्तीसगढ़ के मित्रों से मिलने के लिये ठहर गये ।  इस अवसर पर उनका काव्यपाठ हुआ और दुर्ग- भिलाई के मित्रों ने समकालीन कविता पर उनसे बातचीत की । इसी दिन केदार जी को शलाका सम्मान दिये जाने की भी घोषणा हुई थी ।जब उन्हे इस बात की बधाई  हम लोगों ने दी तो उन्होने कहा कि इस घोषणा से ज़्यादा प्रसन्नता मुझे आप लोगों से मिलने की है । केदार जी लगभग दो दिन यहाँ रहे , हम लोगों के साथ घूमते-फिरते रहे ,गपियाते रहे ।  
 
                       केदार जी ने  इस अवसर पर लिट्ररी क्लब, भिलाई इस्पात संयंत्र के अध्यक्ष व राजभाषा प्रमुख श्री अशोक सिंघई के मेधा बुक्स, नई दिल्ली से प्रकाशित पाँचवें काव्य संग्रह ‘समुद्र, चाँद और मैं’ का लोकार्पण ‘सिंघई विला’ में किया। इस सादे किन्तु गरिमामय आयोजन की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध गाँधीवादी चिन्तक व कानूनविद् श्री कनक तिवारी ने की। प्रसंगवश अशोक सिंघई के पहले प्रकाशन प्रदीर्घ कविता ‘अलविदा बीसवीं सदी’ का लोकार्पण फरवरी, 2000 में विश्व पुस्तक मेला में एवं तीसरे काव्य संग्रह ‘सम्भाल कर रखना अपनी आकाशगंगा’ का भी लोकार्पण छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में नवम्बर, 2004 में प्रख्यात साहित्यकार स्वर्गीय श्रीकान्त वर्मा एवं कीर्तिशेष सम्पादक, कवि व उपन्यासकार गुलशेर अहमद शानी की स्मृति में आयोजित ‘कविता की पंचाट‘ में श्री केदार नाथ सिंह ने ही किया था।
 
श्री केदार नाथ सिंह ने अशोक सिंघई को अपना प्रिय कवि बताते हुये कहा कि प्रगतिशील चेतना से युक्त अशोक उन विरले कवियों में से हैं जिनकी नई कविता में दुर्लभ लयात्मकता है। हिंदी की नई कविता में एक खास तरह की गीतात्मकता को इन्होंने बचाये रखा है। ये उम्र में मुझसे बहुत छोटे हैं, अतः इनके पास अभी साहित्य में सक्रिय बने का वक्त है और क्षमता भी। ये साहित्य में कार्यरत रहें, जीवन में यह मेरी कामना है ।
 
                      अध्यक्षीय वक्तव्य में श्री कनक तिवारी ने कहा कि ‘समुद्र, चाँद और मैं’ मुझे आकर्षित करता है और अँग्रेज़ी का मेरा सर्वाधिक प्रिय कवि कालरिज़ बरबस मुझे याद आता है जिन्होंने सागर पर सर्वश्रेष्ठ कवितायें विश्व साहित्य को दी हैं। चाँदनी रात में समुद्र के किनारे मनुष्य रूमानी हो जाता है पर अशोक अपनी ऐसी बौद्धिकता को बचाये रखते हैं जो भावुकता से पगी रहती है। अशोक का यह सौभाग्य है कि उन्हें केदारजी प्राप्त होते रहते हैं। अमूमन कवि अपने क्लाईमेक्स में मर जाता है पर केदारजी के साथ यह नहीं है, अशोक के साथ भी यही घटे, मेरी शुभकामना है।

                              इस अवसर पर भिलाई-दुर्ग के साहित्यकारों ने कवि केदार को 23 मार्च को प्राप्त होने वाले शलाका सम्मान की बधाई दी तथा उनके दीर्घ व कीर्तिमय जीवन की शुभकामनायें भी दीं। युवा कवि श्री शरद कोकास ने लोकार्पण कार्यक्रम का संचालन किया व इस्पातनगरी भिलाई के साहित्यकारों की ओर से श्री केदार नाथ सिंह का भिलाई पधारने पर और इस आत्मीय आयोजन में उनके तथा समस्त साहित्यकारों के प्रति समय देने के लिये आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर सापेक्ष के संपादक श्री महावीर अग्रवाल, डॉ0 सियाराम शर्मा, डॉ0 तीर्थेश्वर सिंह, प्रलेस अध्यक्ष श्री लोकबाबू, शायर मुमताज़, कवयित्री श्रीमती पुष्पा तिवारी, वरिष्ठ पत्रकार श्री अजय पाण्डेय आदि संस्कृतिकर्मी उपस्थित थे।

रपट - शरद कोकास    

रविवार, 29 नवंबर 2009

बैलगाड़ी रचना है, गाड़ीवान कवि, आलोचक कुत्ता , तो क्या पाठक बैल है ?

तीसरे आलोचक का वक्तव्य                                                                                                                                                         
           










कुछ समय पूर्व ब्लॉग “साहित्य शिल्पी” में काव्यालोचना के अंतर्गत मेरा एक लेख प्रकाशित हुआ था “ हर कविता तीन स्तरों पर आलोचना से गुजरती है” इस आलेख पर प्राप्त टिप्पणियों की ओर राजीव रंजन जी ने ध्यान आकर्षित करवाया । मेरे बहुत से मित्रों सर्वश्री अनिल कुमार,नंदन, आचार्य संजीव वर्मा , रितुरंजन,तेजेन्द्र शर्मा,दिगम्बर नासवा,अभिषेक सागर,मोहिन्दर कुमार, सुश्री अनन्या,गीता पंडित,तथा किरण सन्धु ने प्रश्नों के माध्यम से अपनी शंकायें प्रस्तुत की थीं । 

यह एक स्वस्थ्य परम्परा है । यह सहज मानवीय स्वभाव है कि मनुष्य को जब तक अपने मानस में उठ रहे प्रश्नों का समाधानकारक उत्तर नहीं मिल जाता वह आगे की किसी भी बात को ग्रहण कर सकने में असमर्थ होता है । वह किसी न इसी माध्यम से उन शंकाओं का ऐसा समाधान चाहता है जो उसकी धारणाओं में परिवर्तन कर सके अथवा उन्हे पुष्ट कर सके। लचीलापन उसके सहज स्वभाव में होता है और अपने विवेकानुसार सही अथवा गलत के बीच भेद कर अपने लिये जो उचित है उसे वह स्वीकार कर लेता है। 

मैने प्रयास किया कि इन प्रश्नों के उचित समाधान प्रस्तुत कर सकूँ ।हो सकता है कि यह प्रश्न अनेक मित्रों के मन में उठ रहे हों इसलिये "साहित्यशिल्पी" पर दिये गये उत्तर को मैं अपने ब्लॉग "आलोचक " पर भी प्रस्तुत करना चाहता हूँ । इसमें मत भिन्नता सहज स्वाभाविक है ।

            अनिल कुमार जी ने कविता के सम्बन्ध में यह आदिम प्रश्न किया है कि कविता को किसी वाद की आवश्यकता क्यों है ? आदरणीय संजीव वर्मा सलिल जी ने भी पूछा है क्या किसी रचना के साथ वाद विशेष या विचारधारा विशेष के प्रतिबद्ध रह कर न्याय किया जा सकता है ? वस्तुत: ‘कविता’ को किसी वाद की आवश्यकता नहीं है । वाद कवि के भीतर होता है और वह यदि इसे अपने जीवन दर्शन में शामिल कर लेता है तो वह उसकी रचना में सहज रूप से आ जाता है । किसी वाद को जानबूझकर कविता में प्रक्षेपित करने का अर्थ कवि द्वारा अपनी मूलभूत पहचान के साथ खिलवाड़ भी हो सकता है । मूलत: यह प्रश्न मार्क्सवाद और कलावाद की बरसों से चली आ रही बहस को लेकर है ।

    कुछ के अनुसार बरसों से चली आ रही यह बहस अब समाप्त हो चुकी है और कुछ के अनुसार यह और तेज हुई है । दर असल कविता में मूल्यों की उपस्थिति से उसका स्थान तय किया जाता है स्वतंत्रता,समता,न्याय जैसे मूल्य उसके लिये अनिवार्य हैं । कवि से यह अपेक्षा की जाती है कि उसकी कविता में मूल्यों के प्रति चिंता और चिंतन दोनों ही हो । वैज्ञानिक दृष्टि की आवश्यकता वर्तमान में सहज अपेक्षित है ।धर्म ,पूंजीवाद और बाज़ारवाद के दुष्परिणामों से कोई अछूता नहीं है अत: कविता में अघोषित रूप से यह सब शामिल हो ही जाता है । कवि की राजनैतिक प्रतिबद्धता भी प्रभाव डालती है । कविता में सौन्दर्य,उदात्तता और कवि के सामाजिक सरोकारों की भी अपेक्षा की जाती है अत: अब केवल वाद को प्रक्षेपित कर रचना करना सम्भव नहीं है।

अनिल जी ने पूछा है कि कविता को कौनसी संस्था मानकीकृत करती है तथा किन पत्रिकाओं में छपनेवाले कवि कहलाते हैं? कविता के मानकीकरण के लिये अभी तक किसी संस्था का गठन नहीं हुआ है जो आई.एस.आई. मार्का कविताओं पर लगा सके । कुछ संस्थायें स्वयम्भू रूप से कविता पर फतवे जारी कर सकती हैं लेकिन यह समाज ही है जो कविता के मानक तय करता है और कालानुसार उनमें परिवर्तन कर सकता है। समाज का प्रशिक्षण समय करता है जो आदिकाल से अब तक जारी है । वैसे ही सिर्फ पत्रिकाओं मे छपने वाले कवि नहीं कहलाते । कवि हर मनुष्य के भीतर होता है उसकी अभिव्यक्ति के माध्यम भिन्न हो सकते हैं। “पाथेर पांचाली” में हवा से हिलते हुए काँस का दृश्य देखिये आपको कैमरे से की गई कविता का आभास होगा ।

कबीर और तुलसी के समय पत्रिकाएं नहीं थीं । तुलसी यदि विनय पत्रिका न भी लिखते तो बड़े कवि कहलाते {यहाँ पत्रिका का अर्थ पत्रिका के वर्तमान में प्रचलित अर्थ मेगजीन या रिसाले से नहीं है } वैसे वर्तमान में पत्रिकाओं की भी अलग राजनीति चल रही है ,लघु पत्रिका,व्यावसायिक पत्रिका,सामाजिक पत्रिका, जैसे अनेक विभाजन हैं । एक समय में अखबार में लिखना कवि की गरिमा के अनुकूल नहीं माना जाता था । खैर इस विषय पर विस्तार से फिर कभी लिखूंगा । आपने पूछा है ऐसे कौनसे कवि हैं जिनकी कवितायें आम आदमी तक पहुंचती हैं।ऐसे बहुत से कवि हैं जो अपने समय में जन जन के बीच लोकप्रिय रहे हैं, बाबा नागार्जुन ,त्रिलोचन,बच्चन, शील कई नाम हैं ।

कवि बिसम्भर यादव ‘मरहा’ कौन हैं जानते हैं ?

हमारे यहाँ दुर्ग मे एक कवि बिसम्भर यादव ‘मरहा’ हैं जो तीन हजार से अधिक कार्यक्रमो में कविता पाठ कर चुके हैं जिनका प्रमाण आयोजक के हस्ताक्षर सहित उनकी डायरियों में दर्ज़ है ।विशेष बात यह कि छत्तीसगढ़ी में कविता पढ़ने वाले यह कवि निरक्षर है और उन्हे अपनी सारी कविताएँ कंठस्थ हैं वे मस्तिष्क में कविता रचते हैं और उन्हें अपने स्मृति भंडार में दर्ज़ कर लेते हैं। डॉ  कमला प्रसाद  जी ने बिसंभर जी को असली जनकवि  कहा था । ऐसे कवि कम हैं जिनकी जटिल कविताएँ भी आम आदमी तक पहुंचती हैं । जटिल कविता को आम आदमी तक पहुंचाने हेतु कवि के भीतर सशक्त पाठ या प्रस्तुतिकरण द्वारा उन्हे सम्प्रेषित करने का गुण होना चाहिये ।

अनिल जी ने पूछा है मुख्यधारा क्या है व इसे कौन निर्धारित करता है ? मेरा मानना है कि मुख्यधारा समय निर्धारित करता है । किसी कवि ,आलोचक ,पत्रिका या संस्था को यह अधिकार नहीं है । यह मुख्य धारा काल सापेक्ष होती है । आज जो लोकप्रिय या चर्चित कवि है आवश्यक नहीं भविष्य में समय के क्षितिज पर सितारे की तरह दैदिप्यमान रहे । आपने सुना भी होगा ‘हुए नामवर बेनिशाँ कैसे कैसे ,ज़मीं खा गई आसमाँ कैसे कैसे’ । अत: मुख्य धारा की परवाह ना करते हुए कवि को अपना कवि कर्म जारी रखना चाहिये ।

संजीव जी ने पूछा है कोई रचना मानकों पर खरी होने के बाद सिर्फ इसलिये हीन कही जाये कि समीक्षक उस में प्रतिपादित विचारधारा से असहमत है । संजीव जी मानकों पर खरी उतरने के बाद रचना हीन कैसे हो सकती है । वैसे दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं का प्रतिपादन करने वाली रचनाओं के मानक समान हो सकते हैं । मेरा मत है कि रचना को यदि पूर्वाग्रह के साथ पढ़ा जायेगा तो यह न केवल रचना और रचनाकार की अवमानना होगी बल्कि आलोचक की बुद्धि पर भी सन्देह किया जायेगा । रचनाकार का जीवन दर्शन,दृष्टि ,अनुभूतियों को कथ्य में परिवर्तित करने की क्षमता, एवं उसकी शिल्पगत विशेषता रचना के भीतर जब प्रस्फुटित होती है तो देश काल के अनुसार मानक स्वयं बनते जाते हैं । इस दृष्टि से किसी भी रचना को श्रेष्ठ या हीन साबित करना उचित नहीं है।

दिगम्बर जी से भी मैं यही कहना चाहूंगा कि आलोचना के लिये मापदंडों का लचीलापन आवश्यक है । आलोचक रचना के लिये पैरामीटर्स या तो स्वयं तय करता है या रचना उसके लिये पैरामीटर्स का निर्माण करती है । यह रचना की ताकत पर भी निर्भर करता है । पूर्वाग्रह से ग्रस्त रहना ना आलोचना के लिये सुखद है ना रचना के लिये ।

संजीव जी ने आलोचना,समालोचना,समीक्षा व व्याख्या मे भेद जानना चाहा है । आलोचना व समालोचना दोनो में मूलभूत कोई अंतर नहीं है । दोनों सैद्धांतिक,व्यावहारिक व विस्तृत होती हैं । सामान्यत: आलोचना का अर्थ केवल निन्दा से तथा समालोचना का अर्थ निन्दा व प्रशंसा दोनों से लिया जाता है लेकिन साहित्य में ऐसा नहीं है । आलोचना व समालोचना दोनो में निन्दा व प्रशंसा शामिल होती है । साहित्य में आलोचना शब्द ही प्रचलन में है । समीक्षा सामान्यत: एक कृति की, एक अवसर (event) की, हो सकती है इसमें निहितार्थ को इंगित (point out) किया जा सकता है । व्याख्या से तात्पर्य विस्तारपूर्वक विश्लेषण से है यह एक ग्रंथ से लेकर एक पंक्ति तक की हो सकती है ।

अंत मे नन्दन जी की शंका जो खेमों में बँट चुकी रचना व आलोचना को लेकर है । रचनाकर्म व आलोचना दोनो के प्रभावित होने का मुख्य कारण यही है कि दोनों ने अपने आपको प्रथम आलोचक मानना छोड़ दिया है , जो मान रहे हैं वे बेहतर रच रहे हैं । तेजेन्द्र जी के विनोद से अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा । तेजेन्द्र जी आलोचक को बैलगाड़ी के नीचे चलने वाले कुत्ते की उपमा दिये जाने का युग शेक्स्पीयर के साथ ही समाप्त हो चुका है । आज आलोचना अपने आप में एक महत्वपूर्ण रचना कर्म है ।

ब्रिटेन की छोड़िये हमारे यहाँ भी कहा जाता था कि असफल कवि आलोचक बन जाता है लेकिन आज देखिये बहुत से महत्वपूर्ण कवि आलोचना के क्षेत्र में हैं । वैसे कुत्ते वाली उपमा में यदि हम बैलगाड़ी को रचना मान लें,गाड़ीवान को कवि,उसके नीचे चलते हुए भौंकने वाले कुत्ते को आलोचक मान लें तो पाठक बैल ही हुए ना । लेकिन सबसे महत्वपूर्ण भी वे ही हैं यदि वे गाड़ी को खींचना बन्द कर देंगे तो बैलगाड़ी,गाड़ीवान और कुत्ता क्या कर लेंगे ? अत: अच्छी रचना का स्वागत करें तथा कवि और आलोचक को अपना काम करने दें ।( चित्र :महावीर प्रसाद द्विवेदी )

--- आपका -शरद कोकास

बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

अपनी कविता किसे अच्छी नहीं लगती

                     ब्लॉग जगत में कविताओं के अनेक ब्लॉग हैं । यहाँ कविताओं के पाठक भी अनगिनत हैं ।सामान्यत: यह देखा गया है कि हर ब्लॉगर कहीं न कहीं कविता से जुड़ा है कहीं कवि के रूप में कहीं पाठक के रूप में । मैं भी मूल रूप से कवि हूँ और ब्लॉग जगत में प्रवेश से पूर्व ही देश की लगभग पचास साहित्यिक पत्रिकाओं में 300 से अधिक कवितायें प्रकाशित होने के अलावा एक संग्रह और एक लम्बी कविता " पुरातत्ववेत्ता " भी प्रकाशित है। कविता संग्रहों की समीक्षा भी मैं करता हूँ सो थोड़ी बहुत आलोचक के रूप में भी पहचान है। कविता के ब्लॉग्स  में कविताओं को प्रशंसा भी बहुत मिलती है। इसके अनेक कारण हो सकते हैं । लेकिन साहित्य जगत में अभी ब्लॉग की कविताओं को उस दृष्टि से नहीं देखा जाता जिस दृष्टि से साहित्यिक पत्रिकाओं में छपने वाली कविताओं को देखा जाता है । इसका एक कारण यह भी है कि यहाँ सम्पादक भी स्वयं कवि  है और उसे बिना किसी अवरोध के अपनी कविता प्रकाशित करने का अधिकार है । पाठक और कवि के बीच से सम्पादक की यह कड़ी गायब होने के कारण और कई बार अपनी कविता को परिपूर्ण समझने के मोह में हम अपनी कविता की आलोचना नहीं कर पाते हैं और कविता कहीं न कहीं कमज़ोर रह जाती है । हम इसे स्वीकार नहीं करते क्योंकि तुलसी दास जी ने कहा भी है  " निज कवित्त केहि लागि न नीका ,होय सरस वा हो अति फीका " । कई ब्लॉगर मित्रों का यह आग्रह है कि मैं इस विषय पर कुछ लिखूँ  और अपने ' कविता वर्कशॉप ' मे जो टिप्स नये लिखने वालों को देता हूँ उन्हे भी बताऊँ । सो अपने लेख " हर कविता तीन स्तरों पर आलोचना से गुजरती है" की यह पहली किश्त यहाँ जारी कर रहा हूँ । चर्चा के दौरान और जो मुद्दे आयेंगे उन पर भी लिखने की कोशिश करूंगा ।
                         
                                       हर कविता तीन स्तरों पर आलोचना से गुजरती है


                     पहला आलोचक स्वयं कवि होता है  - कवि कर्म ईश्वरीय देन नहीं है । कविता लिखने की प्रेरणा हमे साहित्य और समाज से मिलती है लेकिन उसके लिए तैयारी स्वयं करनी होती है ।इसके लिए स्वयं का अध्ययन,अनुभवों को रचना में ढालने की शक्ति, साहित्य के इतिहास से परिचय, भाषा की समझ , कल्पनाशीलता , विचारधारा , दृष्टि , शब्दभंडार, राजनैतिक समझ और ऐसे ही अनेक तत्वों की आवश्यकता होती है । कविता लिखते समय कवि को निर्मम होकर अपनी रचना की आलोचना करनी चाहिये ।
                   दूसरा आलोचक कविता का पाठक है - कविता प्रकाशित होने के पश्चात जब पाठक के सन्मुख आती है तो वह उसका आस्वादन करता है ।मुख्यत: पाठक उस रचना में भाव ढूंढता है , कोई बिम्ब, कोई प्रतीक या कोई विचार उसे उद्वेलित करता है वह उस कविता में अपने आसपास के परिदृश्य की तलाश करता है ।पाठक के मन की कोई बात यदि उस कविता में हो तो वह उसे पढ़कर प्रसन्न होता है। यदि कविता में उसके आक्रोश को अभिव्यक्ति मिलती है या उसे अपनी समस्याओं का समाधान नज़र आता है तो वह कविता उसकी प्रिय कविताओं में शामिल हो जाती है । कुछ पाठक कविता में गेयता को पसंद करते है, वे उसकी लय एवं ताल पर मोहित होते हैं और कथ्य उनके लिए गौण हो जाता है ।
                    इस तरह पाठक के पास कविता का रसग्रहण करने का अपना पैमाना होता है ।कविता की ग्राह्यता पाठक के स्वयं के अध्ययन , उसकी विचारधारा तथा जानकारियों अथवा सूचनाओं के भंडार पर भी निर्भर करती है । कविता में पाठक की रुचि इन्ही सब बातों की वज़ह से होती है ।उसके लिए सबसे अच्छी कविता वह होती है जिसे पढ़कर अनायास उसका मन कह उठे .. ‘ अरे ! ऐसा तो मैं भी लिख सकता था ।‘
                     तीसरा आलोचक तो आलोचक है ही - इस आलोचक का काम इससे एक कदम आगे का है ।उसका काम कविता को पढ़ना या देखना मात्र नहीं है ।आलोचक का कार्य है कविता में अंतर्निहित अन्य तत्वों को पाठकों के सन्मुख रखना ताकि वे एक नई दृष्टि एवं नये उपकरणों के साथ कविता में मूल्यों की तलाश कर सकें ।आलोचक का यह कार्य उन कवियों के लिए भी ज़रुरी है जो केवल शब्दों की जोड़-तोड़ को या किसी विचार को तीव्रता के साथ कविता में प्रक्षेपित करने को ही कविता समझते हैं या जिनका कविता लिखने का उद्देश्य महज स्वांत:सुखाय, आत्माभिव्यक्ति या पाठकों का मनोरंजन है ।
                      वर्तमान समय में इस में लोकप्रियता का तत्व और जुड गया है जिसकी वज़ह से साहित्य में प्रदूषण की संभावनाएँ बढ़ गई हैं । इसके अतिरिक्त साहित्य में व्यक्तिवाद भी बढ़ता जा रहा है , व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के कारण जोड़-तोड़ की राजनीति साहित्य में भी प्रारंभ हो गई है , इस वजह से बहुत सारे अच्छे रचनाकार निराश हो चले हैं ।आलोचक का काम इस स्तर पर और भी महत्वपूर्ण हो जाता है । ( आगे जारी )

यह विचार आपको  कैसे लगे ,आप कवि हों या कविता के पाठक , या साहित्य प्रेमी ,इस पर आपकी राय जानना ज़रूरी है - शरद कोकास