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शनिवार, 19 अगस्त 2017

रचना संवाद-5 -रचना में सन्दर्भों की आवश्यकता और उपयोगिता

साहित्य में 'मजनू' आ जाये तो क्या होगा 


किसी भी रचना में खास तौर पर कविता में ऐतिहासिक या माइथोलॉजीकल सन्दर्भों की अधिकता की वज़ह से उसे तत्काल समझने में व्यवधान उत्पन्न होता है । यह हमारे अध्ययन और जानकारी पर निर्भर करता है कि हम उस सन्दर्भ को कितना समझ सकते हैं । सामान्यतः हम अपने बचपन से कुछ ऐतिहासिक और माइथोलॉजीकल सन्दर्भों को जानते हैं जिनकी शिक्षा हमें शाला और महाविद्यालय में मिलती है । दादी नानी की कहानियों में भी हमने बहुत सी बातें सुनी होती हैं । इसके बाद हम अपनी रूचि से बहुत कुछ पढ़ते हैं । इस तरह हमारे मस्तिष्क में बचपन से अपनी इन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त किया हुआ ज्ञान का खजाना होता है । जिन लोगों की स्कूली शिक्षा नहीं होती वे भी अपने समाज द्वारा प्राप्त ज्ञान से अपने आप को अपडेट करते रहते हैं ।

यदि किसी कविता को पढ़ते हुए हमें कोई माइथोलॉजीकल सन्दर्भ प्राप्त होता है तो हम तत्काल उसका अर्थ समझ जाते हैं । हिंदी के अनेक मुहावरे इन्ही सन्दर्भों को लेकर बने हैं ।जैसे हमें लिखना है “वह गहरी नींद में सो रहा था” तो हम लिखेंगे “वह कुम्भकर्ण की तरह सो रहा था” अब हमें रामायण के सन्दर्भ से यह याद है की कुम्भकर्ण गहरी नींद सोता था । “द्रौपदी की साड़ी” शब्द पढ़ते ही हमें द्रौपदी चीरहरण की कथा याद आ जाती है , एकलव्य का नाम पढ़ते ही हमें उसके साथ हुआ छल याद आ जाता है । वर्तमान सन्दर्भों में भी देखें तो 'निर्भया' शब्द सुनते या पढ़ते ही हमें पूरी घटना का स्मरण हो जाता है ।

उसी तरह हर सभ्यता के अपने मुहावरे होते हैं जो हमें ज्ञात नहीं होते। अब अगर किसी कविता में “एकिलिस की एड़ी” शब्द आता है तो हम इस ग्रीक पात्र को नहीं पहचानते इसलिए इसका अर्थ समझ नही पाएंगे । एकिलिस दुर्योधन की तरह एक पात्र था जिसकी माँ ने उसे एड़ी से पकड़कर स्टिक नदी में डुबाया था जिससे उसका पूरा शरीर वज्र की तरह बन गया था केवल एड़ी बची रही सो उसकी मृत्यु एड़ी में तीर लगने की वज़ह से हुई । इसलिए योरोप की कहावत में मर्मस्थल को ‘एकिलिस की एड़ी’ कहा जाता है । लेकिन हमें इसके लिए ग्रीक माइथोलॉजी का ज्ञान होना अनिवार्य है ।

कविता सांस्कृतिक आदान –प्रदान का माध्यम होती है अब हिंदी की कविता में यदि कुम्भकर्ण शब्द आता है तो रामायण से अनभिग्य होने के कारण योरोप के लोग इसका अर्थ समझ नहीं पाएंगे लेकिन इस आधार पर वे इसे कविता कहने से ख़ारिज तो नहीं कर देंगे ।
योरोप की बात छोड़ भी दें तो हमारे देश में इतनी सारी घटनाएँ घट चुकी हैं जिनके बारे में हमें पता ही नहीं है अगर कविता में उन घटनाओं का सन्दर्भ आता है तो हम उन्हें न जान पाने की वज़ह से उनका आस्वाद ग्रहण नहीं कर सकेंगे ।

कविता में कवि बहुत कम शब्दों का प्रयोग करता है और घटनाओं को बिम्बों प्रतीकों और सन्दर्भों में ही व्यक्त करता है । कविता का अर्थ लेख नहीं होता अतः उसे विस्तार से देने की आवश्यकता भी नहीं है । यहाँ कवि की विवशता नहीं है । यह हमारे मस्तिष्क की सीमा है । हमारे अवचेतन में जो सन्दर्भ और बिम्ब हैं हम उन्ही के माध्यम से कविता को समझने की कोशिश करते हैं और उससे आगे जानने की कोशिश भी नहीं करते । यह कठिनाई न केवल हिंदी की बल्कि अन्य भाषाओँ की कविता समझने में भी आती है । उर्दू की अनेक नज़्म और गज़लें ऐसी हैं जिनमे उर्दू के शब्द और इस्लामिक माइथोलॉजीकल शब्दों का प्रयोग होता है ,जैसे फ़रिश्ते , नोहा की नाव , आदि । हम कविता का आनंद लेने के लिए इनका अर्थ ढूँढते हैं या नहीं ? जगजीत सिंह की गाई एक प्रसिद्ध गज़ल है “ बाज़ीचाए अत्फाल है दुनिया मेरे आगे , होता है शबो रोज़ तमाशा मेरे आगे “ अब हम इस ग़ज़ल को समझाने के लिए उर्दू का शब्द कोश देखते हैं या नहीं । उसी तरह बांगला या पंजाबी की कविता में अनेक शब्द ऐसे होते हैं जिनका हिंदी में अनुवाद करते समय भी सन्दर्भों को जस का तस रखा जाता है । हम किसी न किसी माध्यम से उनका अर्थ जानने की कोशिश भी करते ही हैं ।

इसी तरह हिंदी की कविता में कई स्थानीय शब्द और स्थानीय संदर्भ भी होते हैं ।लैला मजनू की कहानी सबको पता है लेकिन अमी गूजर और सस्सी पुन्नू की कहानी कितनों को पता है ? तो कविता में अगर यह सन्दर्भ आयेंगे तो हमें उनकी तलाश तो करनी ही पड़ेगी । फिर केवल सन्दर्भों की बात ही नहीं है कविता में ऐसे अनेक शब्द होते हैं जिनका अर्थ हमें नहीं मालूम होता तब हम उनका अर्थ जानने के लिए शब्द कोश देखते हैं या नहीं । हिंदी हमारी भाषा है और हम उसे निरंतर समृद्ध करते रहते हैं उस समय हम उन क्लिष्ट शब्दों को नकारते तो नहीं ,अगर नकारेंगे तो यह भाषा का अपमान होगा । एक साधारण व्यक्ति भले ही भाषा का ऐसा अपमान कर सकता है लेकिन एक रचनाकार के लिए तो यह अक्षम्य होगा ।

आज हमारे पास संचार के इतने माध्यम हैं , तमाम पुस्तकें हैं , शब्दकोष हैं , इंटरनेट है , गूगल सर्च के माध्यम से हम किसी भी भाषा में वह शब्द टाइप कर उसका अर्थ और तमाम सन्दर्भ जान सकते हैं । एक साधारण पाठक भी यह कर सकता है और इसके लिए बहुत ज़्यादा प्रयास करने की जरुरत नहीं है । एक बार यदि हम उस सन्दर्भ का अर्थ भली भांति समझ लेंगे तो फिर आगे हमें कठिनाई नहीं जायेगी । और यह इतना कठिन भी नहीं है । आज से दो सौ या तीन सौ साल पहले हिंदी में अंग्रेजी का या योरोप की अन्य भाषाओं का कोई शब्द नहीं था,उससे पांच सौ साल पहले उर्दू ,फारसी का कोई शब्द नहीं होता था ,मुहावरों और कहावतों की तो बात ही दूर लेकिन जैसे जैसे हमारा वैश्विक स्तर पर विकास होता जा रहा है विश्व की अनेक भाषाओँ के और वहां घटित होने वाली घटनाओं के सन्दर्भ हमारे साहित्य में बढ़ते जा रहे हैं । टेक्नोलोजी में जब नए शब्द आते हैं तो हम उन्हें किस तरह आत्मसात कर लेते हैं डाटा ,केबल, सॉफ्ट वेयर , यदि यह शब्द कविता में आते हैं तो क्या हम इन्हें अस्वीकार कर देते हैं ? सो हमें साहित्य का आनंद लेने के लिए और वैश्विक स्तर पर अपने साहित्य को स्थापित करने के लिए उन सबको आत्मसात करना ही होगा बल्कि अपनी कविता में उनका प्रयोग भी करना होगा । हमारी इस संकुचित मानसिकता का खामियाज़ा हम भुगत चुके हैं । आज वैश्विक स्तर पर हिंदी की कविता को वह स्थान प्राप्त नहीं है जो उसे मिलना चाहिए था । हम तमाम विदेशी अनुदित साहित्य पढ़ते हैं और सोचते हैं हमारे यहाँ ऐसा साहित्य क्यों नहीं रचा जा रहा । इसके पीछे सबसे बड़ा कारण हमारी कूप मंडूकता ही है सो हमें इससे उबरना आवश्यक है ।

आपका
शरद कोकास 

रविवार, 29 नवंबर 2009

बैलगाड़ी रचना है, गाड़ीवान कवि, आलोचक कुत्ता , तो क्या पाठक बैल है ?

तीसरे आलोचक का वक्तव्य                                                                                                                                                         
           










कुछ समय पूर्व ब्लॉग “साहित्य शिल्पी” में काव्यालोचना के अंतर्गत मेरा एक लेख प्रकाशित हुआ था “ हर कविता तीन स्तरों पर आलोचना से गुजरती है” इस आलेख पर प्राप्त टिप्पणियों की ओर राजीव रंजन जी ने ध्यान आकर्षित करवाया । मेरे बहुत से मित्रों सर्वश्री अनिल कुमार,नंदन, आचार्य संजीव वर्मा , रितुरंजन,तेजेन्द्र शर्मा,दिगम्बर नासवा,अभिषेक सागर,मोहिन्दर कुमार, सुश्री अनन्या,गीता पंडित,तथा किरण सन्धु ने प्रश्नों के माध्यम से अपनी शंकायें प्रस्तुत की थीं । 

यह एक स्वस्थ्य परम्परा है । यह सहज मानवीय स्वभाव है कि मनुष्य को जब तक अपने मानस में उठ रहे प्रश्नों का समाधानकारक उत्तर नहीं मिल जाता वह आगे की किसी भी बात को ग्रहण कर सकने में असमर्थ होता है । वह किसी न इसी माध्यम से उन शंकाओं का ऐसा समाधान चाहता है जो उसकी धारणाओं में परिवर्तन कर सके अथवा उन्हे पुष्ट कर सके। लचीलापन उसके सहज स्वभाव में होता है और अपने विवेकानुसार सही अथवा गलत के बीच भेद कर अपने लिये जो उचित है उसे वह स्वीकार कर लेता है। 

मैने प्रयास किया कि इन प्रश्नों के उचित समाधान प्रस्तुत कर सकूँ ।हो सकता है कि यह प्रश्न अनेक मित्रों के मन में उठ रहे हों इसलिये "साहित्यशिल्पी" पर दिये गये उत्तर को मैं अपने ब्लॉग "आलोचक " पर भी प्रस्तुत करना चाहता हूँ । इसमें मत भिन्नता सहज स्वाभाविक है ।

            अनिल कुमार जी ने कविता के सम्बन्ध में यह आदिम प्रश्न किया है कि कविता को किसी वाद की आवश्यकता क्यों है ? आदरणीय संजीव वर्मा सलिल जी ने भी पूछा है क्या किसी रचना के साथ वाद विशेष या विचारधारा विशेष के प्रतिबद्ध रह कर न्याय किया जा सकता है ? वस्तुत: ‘कविता’ को किसी वाद की आवश्यकता नहीं है । वाद कवि के भीतर होता है और वह यदि इसे अपने जीवन दर्शन में शामिल कर लेता है तो वह उसकी रचना में सहज रूप से आ जाता है । किसी वाद को जानबूझकर कविता में प्रक्षेपित करने का अर्थ कवि द्वारा अपनी मूलभूत पहचान के साथ खिलवाड़ भी हो सकता है । मूलत: यह प्रश्न मार्क्सवाद और कलावाद की बरसों से चली आ रही बहस को लेकर है ।

    कुछ के अनुसार बरसों से चली आ रही यह बहस अब समाप्त हो चुकी है और कुछ के अनुसार यह और तेज हुई है । दर असल कविता में मूल्यों की उपस्थिति से उसका स्थान तय किया जाता है स्वतंत्रता,समता,न्याय जैसे मूल्य उसके लिये अनिवार्य हैं । कवि से यह अपेक्षा की जाती है कि उसकी कविता में मूल्यों के प्रति चिंता और चिंतन दोनों ही हो । वैज्ञानिक दृष्टि की आवश्यकता वर्तमान में सहज अपेक्षित है ।धर्म ,पूंजीवाद और बाज़ारवाद के दुष्परिणामों से कोई अछूता नहीं है अत: कविता में अघोषित रूप से यह सब शामिल हो ही जाता है । कवि की राजनैतिक प्रतिबद्धता भी प्रभाव डालती है । कविता में सौन्दर्य,उदात्तता और कवि के सामाजिक सरोकारों की भी अपेक्षा की जाती है अत: अब केवल वाद को प्रक्षेपित कर रचना करना सम्भव नहीं है।

अनिल जी ने पूछा है कि कविता को कौनसी संस्था मानकीकृत करती है तथा किन पत्रिकाओं में छपनेवाले कवि कहलाते हैं? कविता के मानकीकरण के लिये अभी तक किसी संस्था का गठन नहीं हुआ है जो आई.एस.आई. मार्का कविताओं पर लगा सके । कुछ संस्थायें स्वयम्भू रूप से कविता पर फतवे जारी कर सकती हैं लेकिन यह समाज ही है जो कविता के मानक तय करता है और कालानुसार उनमें परिवर्तन कर सकता है। समाज का प्रशिक्षण समय करता है जो आदिकाल से अब तक जारी है । वैसे ही सिर्फ पत्रिकाओं मे छपने वाले कवि नहीं कहलाते । कवि हर मनुष्य के भीतर होता है उसकी अभिव्यक्ति के माध्यम भिन्न हो सकते हैं। “पाथेर पांचाली” में हवा से हिलते हुए काँस का दृश्य देखिये आपको कैमरे से की गई कविता का आभास होगा ।

कबीर और तुलसी के समय पत्रिकाएं नहीं थीं । तुलसी यदि विनय पत्रिका न भी लिखते तो बड़े कवि कहलाते {यहाँ पत्रिका का अर्थ पत्रिका के वर्तमान में प्रचलित अर्थ मेगजीन या रिसाले से नहीं है } वैसे वर्तमान में पत्रिकाओं की भी अलग राजनीति चल रही है ,लघु पत्रिका,व्यावसायिक पत्रिका,सामाजिक पत्रिका, जैसे अनेक विभाजन हैं । एक समय में अखबार में लिखना कवि की गरिमा के अनुकूल नहीं माना जाता था । खैर इस विषय पर विस्तार से फिर कभी लिखूंगा । आपने पूछा है ऐसे कौनसे कवि हैं जिनकी कवितायें आम आदमी तक पहुंचती हैं।ऐसे बहुत से कवि हैं जो अपने समय में जन जन के बीच लोकप्रिय रहे हैं, बाबा नागार्जुन ,त्रिलोचन,बच्चन, शील कई नाम हैं ।

कवि बिसम्भर यादव ‘मरहा’ कौन हैं जानते हैं ?

हमारे यहाँ दुर्ग मे एक कवि बिसम्भर यादव ‘मरहा’ हैं जो तीन हजार से अधिक कार्यक्रमो में कविता पाठ कर चुके हैं जिनका प्रमाण आयोजक के हस्ताक्षर सहित उनकी डायरियों में दर्ज़ है ।विशेष बात यह कि छत्तीसगढ़ी में कविता पढ़ने वाले यह कवि निरक्षर है और उन्हे अपनी सारी कविताएँ कंठस्थ हैं वे मस्तिष्क में कविता रचते हैं और उन्हें अपने स्मृति भंडार में दर्ज़ कर लेते हैं। डॉ  कमला प्रसाद  जी ने बिसंभर जी को असली जनकवि  कहा था । ऐसे कवि कम हैं जिनकी जटिल कविताएँ भी आम आदमी तक पहुंचती हैं । जटिल कविता को आम आदमी तक पहुंचाने हेतु कवि के भीतर सशक्त पाठ या प्रस्तुतिकरण द्वारा उन्हे सम्प्रेषित करने का गुण होना चाहिये ।

अनिल जी ने पूछा है मुख्यधारा क्या है व इसे कौन निर्धारित करता है ? मेरा मानना है कि मुख्यधारा समय निर्धारित करता है । किसी कवि ,आलोचक ,पत्रिका या संस्था को यह अधिकार नहीं है । यह मुख्य धारा काल सापेक्ष होती है । आज जो लोकप्रिय या चर्चित कवि है आवश्यक नहीं भविष्य में समय के क्षितिज पर सितारे की तरह दैदिप्यमान रहे । आपने सुना भी होगा ‘हुए नामवर बेनिशाँ कैसे कैसे ,ज़मीं खा गई आसमाँ कैसे कैसे’ । अत: मुख्य धारा की परवाह ना करते हुए कवि को अपना कवि कर्म जारी रखना चाहिये ।

संजीव जी ने पूछा है कोई रचना मानकों पर खरी होने के बाद सिर्फ इसलिये हीन कही जाये कि समीक्षक उस में प्रतिपादित विचारधारा से असहमत है । संजीव जी मानकों पर खरी उतरने के बाद रचना हीन कैसे हो सकती है । वैसे दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं का प्रतिपादन करने वाली रचनाओं के मानक समान हो सकते हैं । मेरा मत है कि रचना को यदि पूर्वाग्रह के साथ पढ़ा जायेगा तो यह न केवल रचना और रचनाकार की अवमानना होगी बल्कि आलोचक की बुद्धि पर भी सन्देह किया जायेगा । रचनाकार का जीवन दर्शन,दृष्टि ,अनुभूतियों को कथ्य में परिवर्तित करने की क्षमता, एवं उसकी शिल्पगत विशेषता रचना के भीतर जब प्रस्फुटित होती है तो देश काल के अनुसार मानक स्वयं बनते जाते हैं । इस दृष्टि से किसी भी रचना को श्रेष्ठ या हीन साबित करना उचित नहीं है।

दिगम्बर जी से भी मैं यही कहना चाहूंगा कि आलोचना के लिये मापदंडों का लचीलापन आवश्यक है । आलोचक रचना के लिये पैरामीटर्स या तो स्वयं तय करता है या रचना उसके लिये पैरामीटर्स का निर्माण करती है । यह रचना की ताकत पर भी निर्भर करता है । पूर्वाग्रह से ग्रस्त रहना ना आलोचना के लिये सुखद है ना रचना के लिये ।

संजीव जी ने आलोचना,समालोचना,समीक्षा व व्याख्या मे भेद जानना चाहा है । आलोचना व समालोचना दोनो में मूलभूत कोई अंतर नहीं है । दोनों सैद्धांतिक,व्यावहारिक व विस्तृत होती हैं । सामान्यत: आलोचना का अर्थ केवल निन्दा से तथा समालोचना का अर्थ निन्दा व प्रशंसा दोनों से लिया जाता है लेकिन साहित्य में ऐसा नहीं है । आलोचना व समालोचना दोनो में निन्दा व प्रशंसा शामिल होती है । साहित्य में आलोचना शब्द ही प्रचलन में है । समीक्षा सामान्यत: एक कृति की, एक अवसर (event) की, हो सकती है इसमें निहितार्थ को इंगित (point out) किया जा सकता है । व्याख्या से तात्पर्य विस्तारपूर्वक विश्लेषण से है यह एक ग्रंथ से लेकर एक पंक्ति तक की हो सकती है ।

अंत मे नन्दन जी की शंका जो खेमों में बँट चुकी रचना व आलोचना को लेकर है । रचनाकर्म व आलोचना दोनो के प्रभावित होने का मुख्य कारण यही है कि दोनों ने अपने आपको प्रथम आलोचक मानना छोड़ दिया है , जो मान रहे हैं वे बेहतर रच रहे हैं । तेजेन्द्र जी के विनोद से अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा । तेजेन्द्र जी आलोचक को बैलगाड़ी के नीचे चलने वाले कुत्ते की उपमा दिये जाने का युग शेक्स्पीयर के साथ ही समाप्त हो चुका है । आज आलोचना अपने आप में एक महत्वपूर्ण रचना कर्म है ।

ब्रिटेन की छोड़िये हमारे यहाँ भी कहा जाता था कि असफल कवि आलोचक बन जाता है लेकिन आज देखिये बहुत से महत्वपूर्ण कवि आलोचना के क्षेत्र में हैं । वैसे कुत्ते वाली उपमा में यदि हम बैलगाड़ी को रचना मान लें,गाड़ीवान को कवि,उसके नीचे चलते हुए भौंकने वाले कुत्ते को आलोचक मान लें तो पाठक बैल ही हुए ना । लेकिन सबसे महत्वपूर्ण भी वे ही हैं यदि वे गाड़ी को खींचना बन्द कर देंगे तो बैलगाड़ी,गाड़ीवान और कुत्ता क्या कर लेंगे ? अत: अच्छी रचना का स्वागत करें तथा कवि और आलोचक को अपना काम करने दें ।( चित्र :महावीर प्रसाद द्विवेदी )

--- आपका -शरद कोकास