इस पर आगे की चर्चा को समय, यहां सभी के लिए फिर से प्रस्तुत कर रहा है।समय का उद्देश्य आपकी स्वतंत्र चिंतन प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने का रहता है। एक नज़रिया देने का, जिसे भी यदि चिंतन-मनन का हिस्सा बनाया जाए तो आपकी मेधा अपने सवालों के खुद जबाब ढूंढने की प्रक्रिया में जुट जाएगी।
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समय उक्त जिज्ञासा के संदर्भ में कुछ इशारों को दोहरा देता है।
पिछले आलेख से दोबारा गुजरें, और इन हिस्सों पर ध्यान दें:
‘ऐसी ही कई और व्याख्याएं की जा सकती हैं, और आसपास ऐसा होते हुए अक्सर देखा जा सकता है। संसार बहुत बडा है, इन बहुत छोटे अंतराल की छवियों की चिलकन यानि सपनों के सापेक्ष मनुष्य की ज़िंदगी काफ़ी बडी है, और ऐसे में इक्का-दुक्का संयोगो का मिलना, जिसमें कि वास्तविक रूप में सपनों की घटनाओं का दोहराव प्रत्यक्ष किए जाने के दावे किए जा सकते हैं, कोई ज्यादा अनोखी बात नहीं है।
वैसे मनुष्य खुद अपने अंदर टटोले तो इसका जबाव मिल सकता है, कि ऐसी भ्रामक और डरावनी परिस्थितियों में छला हुआ उसका मन कितनी तरह की बातें खुद गढ़ता है, कहानिया बनाता है, और ऐसे दावे करने की कोशिश करता है।’
‘तो इस तरह से हम समझ सकते हैं कि सपनों में इस तरह ही उच्छृंगल रूप से छवियां चिलकती रहती हैं, कभी उनमें कोई तरतीब निकल आती है, कभी वे बिल्कुल बेतरतीब होते हैं। मस्तिष्क में पहले से दर्ज़ चीज़ों का ही मामला है यह, इनमें कोई ऐसी चीज़ नहीं देखी जा सकती जिससे किसी ना किसी रूप में मनुष्य पहले से बाबस्ता ना रहा हो। हां, उनकी बेतरतीबी से, या छवियों, ध्वनियों, भाव-बोधों की आपस में अदला-बदली से अनोखेपन या नवीनता का भ्रामक अहसास हो सकता है।’
‘तो इस तरह से हम समझ सकते हैं कि सपनों में इस तरह ही उच्छृंगल रूप से छवियां चिलकती रहती हैं, कभी उनमें कोई तरतीब निकल आती है, कभी वे बिल्कुल बेतरतीब होते हैं। मस्तिष्क में पहले से दर्ज़ चीज़ों का ही मामला है यह, इनमें कोई ऐसी चीज़ नहीं देखी जा सकती जिससे किसी ना किसी रूप में मनुष्य पहले से बाबस्ता ना रहा हो। हां, उनकी बेतरतीबी से, या छवियों, ध्वनियों, भाव-बोधों की आपस में अदला-बदली से अनोखेपन या नवीनता का भ्रामक अहसास हो सकता है।’
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दरअसल सपनों में ऐसा कुछ हम देख ही नहीं सकते, जो की वस्तुगत नहीं हो यानि वास्तविक रूप से अस्तित्ववान नहीं हो। यानि कि सच नहीं हो। अमूर्त कल्पनाओं को भी आप इसी में रख सकते हैं, एक बार हो जाने के बाद वह भी वस्तुगत ही हैं।
जो सच है वह सपने में है, अतः जो सपने में है वह सच ही है।
पर उस बेतरतीबी में नहीं जिस रूप में यह सपने में है। अलग-अलग टुकडों में हम देखेंगे तो इसे महसूस कर सकते हैं।
समय जानता है, उक्त जिज्ञासा का मतलब यह नहीं था, परंतु यहीं से होकर असली मतलब तक पहुंचा जाना चाहिए।
उक्त जिज्ञासा का मतलब था कि इसी बेतरतीबी से आए सपनों को भावी ज़िंदगी में लगभग वैसा ही सच हो उठना।
यह अक्सर हमारी तात्कालिक चिंताओं के क्षोभको से उत्पन्न सपनों के साथ ही ज्यादा होता है। इन तात्कालिक समस्याओं या चिंताओ या गहन इच्छाओं पर मनुष्य का चेतन मस्तिष्क मननरत होता ही है, और संभावित या इच्छित हलों की कल्पनाओं में होता है।
जाहिरा तौर पर अवचेतन मानसिक क्रियाकलापों में भी यही क्षोभक काम कर रहे होते हैं, और सपनों में भी यही कार्य-व्यापार संपन्न होता है। यही संभावित या इच्छित हलों की कल्पनाएं वहां भी आकार लेती हैं।
मनुष्य किसी अनुकूल हल या आनंद देने वाली किसी वास्तविकता में हो सकने वाली परिस्थिति की कल्पना को चुन लेता है।
अब इसकी संभावनाएं तो है ही ये सपनों के हल या इच्छाएं सच में आकार लेलें, क्योंकि मनुष्य सच की परिस्थितियों के हिसाब से ही इनकों बुन रहा था।
मनु्ष्य ऐसी ही चीज़ों में, इस सच हो जाने वाली परिघटना का नोटिस लेता है।
वह सपनों में उडता है, उसके सिर पर सींग आजाते हैं, खून का रंग हरा हो जाता है, वह स्वर्गीय गांधी जी के साथ खाना खा रहा है, साक्षात भगवान या देवी सामने खडे होते हैं...ऐसे अवास्तविक बेतरतीबियों को सच होते वह देख ही नही सकता, इसीलिए इनका नोटिस भी नहीं लेता कि यह सच हो रही हैं या नहीं।
मनुष्य परंपरा से मिली अपनी आस्था या मान्यताओं के अनुकूल पड़ने वाली संवृतियों का ही नोटिस लेता है और अपनी मान्यताओं को और पुख़्ता करता जाता है। परंतु सत्य का संधान संदेहों के जरिए ही संभव हो सकता है।
अगर संदेह पैदा हुआ हो तो आगे विचार के लिए शायद इससे आपकी कुछ मदद हो सके?
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चर्चा में एक और बात सामने आई थी:
‘बौद्ध एवं जैन कथाओं में बुद्ध एव तीर्थंकरों के जन्म से पूर्व उनकी गर्भवती माताओं द्वारा देखे गए '' विशिष्ट-स्वप्न '' और विद्वानों द्वारा उनकी सटीक विवेचनाओं का बड़ा रोचक विवरण उपलब्ध है उस समय में सिंगमन्ड फ्रायड जैसों का कहीं कोई अस्तित्व ही नहीं था ; हाँ स्वप्नों का उनका अपना मनो -विज्ञान उस काल में भी था , उनकी अपनी विवेचनाएँ थी,उनकी अपनी परिभाषाएं थी जो आज भी यदि उन्हें युगानुसार सही परिपेक्ष्य में सही ढंग से आधुनिक सन्दर्भों में परिभाषित किया जाये तो वे सटीक हैं।’
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बहुत बेहतर बात उठाई गई थी।
समय इस पर भी वही बात दोहराना चाहता है कि परंपरा से मिली मान्यताओं पर संदेह किया ही जाना चाहिए तभी सही समझ विकसित की जा सकती है।
इस पर भी पहली जिज्ञासा पर पेश किए गए नज़रिये से विचार किया जाना चाहिए।
कथाएं, कथाएं ही होती हैं। वहां पर कल्पनाशीलता की बहुत गुंजाइशें होती हैं। एक निर्विवाद सत्य पहले ही सामने आ चुका है, बुद्ध या महावीर के रूप में। अब कथा कहते वक्त माताओं के विशिष्ट-स्वप्नों की अतिश्योक्ति पूर्ण चर्चा कथा में की जा सकती है। सच होना पहले ही सामने है, यहां तो उसके हिसाब से कथा में सपनों की सिर्फ़ अनुकूल व्याख्याएं ही करनी है। हर गर्भवती माता अपने गर्भस्थ शिशु के भावी जीवन के बारे में अच्छे सपने ही बुनती है।
महानता और सफलता के युगानुसार परिप्रेक्ष्यों के अंतर्गत ही अपने शिशु के लिए महत्त्वाकांक्षाओं के संभावित सोपान चुनती है। इस पर तुर्रा यह और कि उक्त कथाओं की माताएं तो संपन्न और संभ्रांत कुल की और थी, जाहिर है दिग्विजय की आकांक्षाएं ही वहां पेश होनी थी। अतएव ऐसे में माताओं को वास्तव में भी तथाकथित वही सपने भी आए हों तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नज़र नहीं आती।
वैसे यह बात भी अपनी जगह है ही कि अक्सर मनुष्य बाद में होने वाली परिघटनाओं पर ऐसे ही प्रतिक्रिया देता है कि उसे तो यह पहले ही मालूम था, उसने तो यह पहले ही कह दिया था, उसे सपनों में बिल्कुल ऐसी ही बात नज़र आई थी...आदि-आदि। कुछ समझदार मनुष्य इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि अच्छा तो मेरे सपने का यह मतलब था, उफ़ तो सपनों में इसका इशारा पहले ही मिल गया था, पर यह अज्ञानी उसे पहचान ही नहीं पाया।
सफलताओं की इकतरफ़ा ज़मीन पर ऐसी ही कई विजयगाथाएं लिखी गयी हैं।
हर युग की अपनी समस्याएं होती हैं, उस युग के अनुसार ही ज्ञान और समझ के स्तर हुआ करते हैं, उन्हीं के हिसाब से उनके हल की संभावनाएं टटोली जाती हैं। अगर हम किसी और समय की चीज़ों की व्याख्या करते हैं तो उस समय की तत्कालीन परिस्थितियों और ज्ञान के स्तर को नहीं भूलना चाहिए। बुद्ध अपने समय की देन होते हैं, फ़्रायड अपने समय की। समय आगे बढता है, मनुष्य के ज्ञान और समझ का स्तर बढता है और वह बुद्धों और फ़्रायडों का अतिक्रमण कर नये-नये परिस्थितिजन्य मानवश्रेष्ठ बनाता जाता है।
इसलिए यह कहा जाना कि, उनकी अपनी विवेचनाएँ थी,उनकी अपनी परिभाषाएं थी जो आज भी यदि उन्हें युगानुसार सही परिपेक्ष्य में सही ढंग से अधुनिक सन्दर्भों में परिभाषित किया जाये तो वे सटीक हैं।’, ज्यादा उचित दृष्टिकोण नहीं है।
बजाए इसके समुचित दृष्टिकोण यह होगा कि, उनकी अपनी विवेचनाएँ थी, उनकी अपनी परिभाषाएं थी, आज भी यदि उन्हें, युगानुसार सही परिपेक्ष्य में, सही ढंग से, आधुनिक सन्दर्भों के सापेक्ष समालोचित किया जाये तो वे हमें सटीक राह दिखाने की क्षमता रखती हैं।’
इनके जरिए मनुष्य, ज्ञान और समझ के क्रमिक विकास को महसूस कर सकता है।
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समय इस सार्थक चर्चा के लिए, शामिल मानवश्रेष्ठों का शुक्रिया अदा करता है। उनकी कृपापूर्ण भागीदारी के बिना यह अवसर संभव ही नहीं था।
आपका समय
प्रस्तुति : शरद कोकास
