रविवार, 4 जुलाई 2021

5.अपने समय के साथ होना

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मनुष्य जिस तरह शारीरिक और मानसिक रूप से अपने इतिहास को दोहराता है, उसी तरह जिज्ञासाओं और समझ के स्तर के परिष्करण की प्रक्रियाओं में, मानव जाति के ज्ञान के क्रमिक विकास को दोहराता है। मनुष्य का हर बच्चा प्रकॄति की हर शै, हर चीज़ को वैसे ही देखता और चमत्कृत होता है जैसे कि आदिम मनुष्य होता था, हर चीज़ और उसके साथ अंतर्क्रिया उसके अंदर वैसे ही जिज्ञासा पैदा करती है जैसे कि मानव जाति को पहले करती रही है। वह अपने परिवेश की हर चीज़ के प्रति वैसे ही जिज्ञासापूर्ण प्रतिक्रिया करता है, जैसे उसके पूर्वज करते रहे थे। वह अपनी तात्कालिक समझ के हिसाब से हर चीज़ को अपने दिमाग़ में प्रतिबिंबित करता है, उसका विश्लेषण करता है। वह वैसे ही उंगलियों के सहारे गिनना सीखता है, ऊलजलूल आवाज़ों से शुरू होकर धीरे-धीरे भाषा सीखता है, लिखने का अभ्यास तो जैसे उसकी जान ही ले लेता है, वह वैसी ही आड़ी-टेड़ी आकृतियों से अपने कागज़ भरता है जैसे कि उसके आदिम पूर्वज चट्टानो पर उकेरा करते थे। वह प्रकृति की शक्तियों और नियमों को जानने और उनके सापेक्ष अपने अस्तित्व को समझने के शाश्वत कार्य में जुटा रहता है।

अपने पूर्वजों की तरह ही, उसकी अविकसित समझ भी इस तथ्य को मानने में उतना ही विद्रोह करती है कि पृथ्वी सूर्य के चारों और परिक्रमण करती है, क्योंकि यहां उसकी सहज बुद्धि आडे आती है जिसका प्रेक्षण होता है कि वह तो स्थिर है और सूर्य आसमान में पूर्व से पश्चिम की यात्रा कर रहा है। आप कई ऐसे व्यक्तियों को जानते होंगे जो अपनी सारी उम्र गुजार देते हैं पर चंद्रमा की कलाओं का रहस्य उन्हें समझ नहीं आता।


अब तक की संपूर्ण विवेचना से अब हम दो सामान्य निष्कर्ष निकाल सकते हैं, पहला तो यह कि प्रत्येक मनुष्य ज्ञान और समझ के स्तर पर शून्य से शुरू होते हैं, और अपनी परिवेशी परिस्थितियों के अनुरूप धीरे-धीरे इसका विकास करते हैं, निरंतर इसका परिष्कार करते हैं। इसीलिए अलग-अलग मनुष्य, एक ही समय में ज्ञान और समझ के समय-सापेक्ष विभिन्न स्तरों पर होते हैं, कुछ इनके विकास की प्रक्रिया में रहते हैं और कहीं यह प्रक्रिया रुक भी जाती है। दूसरा यह कि इस ज्ञान और समझ के स्तर को और आगे विकसित करने की संभावनाएं निरंतर मौजूद रहती हैं गोया कि मानव जाति का सापेक्ष आधुनिक स्तर इस मुआमले में काफ़ी आगे निकल आया है, अतएव ज्ञान और समझ के अद्यतन स्तर पर होना अपने समय के साथ होना है।


अगर आपको मानव जाति के इतिहास का थोडा भी सामान्य ग्यान है तो आप यह आसानी से देख सकते हैं कि व्याक्ति-विशेष या आप स्वयं समय के किस स्तर पर हैं, समय के किस अंतराल के सापेक्ष अवस्थित हैं। यहां यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि एक ही मनुष्य, अपने से संबंधित विभिन्न मुआमलों में, समय के विभिन्न स्तरों पर हो सकता है गोया कि अलग-अलग क्षेत्रों में उसका हस्तक्षेप अलग-अलग होता है।


यदि किसी मनुष्य को प्रकृति की सामान्य शक्तियां रहस्यमयी और चमत्कारी लगती हैं, तो यह समझा जा सकता है कि वह आदिम युग में यानि लाखों वर्ष पूर्व के समय में अवस्थित है। यदि ये शक्तियां उसके मस्तिष्क में अलौकिक देव-शक्तियों के रूप में प्रतिबिंबित होती हैं जिन्हें खुश करके नियंत्रित किया जा सकता है तो वह दसियों हजार साल पहले के समय में अवस्थित है। जो मनुष्य इस तरह से सोचता है कि इस अनोखी और विराट सृष्टि की नियामक एवं रचयिता एक अलौकिक दिव्य शक्ति है जिसकी इच्छानुसार दुनिया का कार्य-व्यापार चल रहा है, तो यह कहा जा सकता है कि वह समय के सापेक्ष चार-पांच हजार साल पहले उत्तर-वैदिक काल में अवस्थित है। यदि कोई मनुष्य इस अलौकिक शक्ति के विचार में संदेह करता है और दुखों से मुक्ति हेतु, यथास्थिति बनाए रखते हुए अपने आत्मिक आचरण की शुद्धि वाले विचार से आकर्षित होता है, तो उसे बुद्ध-ईसा के काल यानि दो-ढ़ाई हजार साल पहले के समय मे अवस्थित माना जा सकता है। यदि वह चीज़ों के पारंपरिक ज्ञान और प्रयोग से संतुष्ट नहीं है और उनमें नये नियम और संभावनाएं खोजने की प्रवृति रखता है और ऐसा ही क्यों हैके नज़रिये से सोचने लगा है तो मान लीजिये वह सोलहवी शताब्दी तक आ पहुंचा है।

यदि वह प्रकृति के सुव्यवस्थित ज्ञान मतलब विज्ञान को आत्त्मसात करके अपना वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित कर चुका है तो वह अठारहवीं शताब्दी में पहुंच गया है, और इसी विकसित वैज्ञानिक दृष्टिकोण से वह जीव विकासवाद और प्राचीन समाज के क्रमिक विकास के अध्ययन और निष्कर्षों को आत्मसात करने की अवस्थाओं मे है तो वह १५० साल पहले तक पहुंच गया है। यदि वह दर्शन के क्षेत्र में द्वंदात्मक और एतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांतों और निष्कर्षों को आत्मसात करके अपना एक द्वंदवादी विश्वदृष्टिकोण निर्मित कर चुका है तो यक़ीन मानिए वह १००-१२५ साल पूर्व से आधुनिक समय के अंतराल में पहुंच गया है और समझ और विवेक के मुआमले में लगभग समय के साथ चल रहा है।


लगता है अब तो यह बात साफ़ हो गयी होगी कि अधिकतर लोग मुझ तक क्यों नहीं पहुंच पाते। यह भी कि आज के समय में पैदा हो जाने मात्र से कोई मनुष्य समय के साथ नहीं आ जाता, मानव जाति के ऐतिहासिक ज्ञान, विज्ञान व तकनीकि द्वारा प्रदत्त सुविधाओं का उपभोग करना सीख कर ही वह आधुनिक नहीं हो जाता। दरअसल वह सही अर्थों में तभी आधुनिक हो सकता है, तभी अपने समय के साथ हो सकता है जब वह अपने ज्ञान, समझ और विवेक के स्तर को विकसित करके उसे संपूर्ण मानव जाति के ज्ञान, समझ और

विवेक के अद्यतन स्तर तक नहीं ले आता।
तो हे मानव श्रेष्ठों !
एक जरा सी बात पर समय की यह विस्तृत विवेचना पची या नहीं ?
आत्मालोचना और सत्य के अन्वेषण की माथापच्ची, दिमाग़ को थोडा़ कष्ट तो देगी ही।

आपका समय

प्रस्तुति : शरद कोकास

 

गुरुवार, 1 जुलाई 2021

4.ज्ञान और समझ को निर्धारित करने वाले कारक


मैं भी चाह ही रहा था, और एक बंधु ने भी मेरे ई-मेल पर सफ़ाई चाहते हुए कारकों के निर्धारण की ऐसी ही मांग रखी थी,अतएव...

अब इस बात को बिंदुबार तरीके से रेखांकित किया जा सकता है कि मनुष्य के ज्ञान का स्तर कैसा होगा, यानि मनुष्य मानव जाति द्वारा समेटे गये ज्ञान के सापेक्ष किस स्तर पर होगा। इसका निर्धारण करने वाले कारकों को यूं सूचिबद्ध किया जा सकता है:


१. मनुष्य के निकट का परिवेशी समाज, जिसमें सबसे पहले उसका परिवार, माता-पिता रिश्तेदार शामिल होते हैं, वे खुद ज्ञान और सभ्यता के किस स्तर पर हैं? उन्हें इस बात की कितनी समझ और जिम्मेदारी है कि एक सुव्यवस्थित लालन-पालन किस प्रकार मनुष्य के जीवन की दशा और दिशा का निर्धारण करता है?


२. मनुष्य से संबंधित वृहद समाज, जहां वह रहता और अंतर्क्रियाएं करता है, की सामाजिक चेतना का स्तर क्या हैज्ञान और सभ्यता का सामान्य स्तर पर क्या है? सामाजिक क्रियाकलापों को उद्वेलित और नियमित करने वाले मूल कारकों का नैतिक स्तर क्या है?ये दोनों बिंदु मनुष्य के सामान्य व्यक्तित्व एवं समाज के साथ अंतर्क्रियाओं के मूल्यों का निर्धारण करते हैं और मनुष्य के व्यवहार की मूल कसौटी तय करते हैं।

३. मनुष्य को व्यवस्थित रूप से प्रकृति के वृहद ज्ञान से परिचित कराने वाली शिक्षण-प्रशिक्षण प्रणाली का मूल उद्देश्य और उसकी सामान्य संरचना कैसी है? वह ज्ञान और व्यवहार की एकता निश्चित करने में कितना सक्षम है? वह मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास,ज्ञानवृद्धि, उसके वैज्ञानिक दृष्टिकोण को विकसित करने और व्यवस्थित चिंतन प्रणाली से लैस उसे एक जिम्मेदार सामाजिक प्राणी के रूप में तैयार करने के मूल उद्देश्य के लिए कितना अभिकल्पित है?


४. मनुष्य के मस्तिष्क के साथ अंतर्क्रिया करने वाले अन्य साधन जैसे सूचना और संचार माध्यम, मीडिया, सहज उपलब्ध पुस्तकें आदि उसके सूचना संसार और चिंतन प्रक्रिया को किस तरह और दिशा में प्रभावित कर रहे हैं? वे एक सोचने समझने वाले, बुद्धिमान और स्वतंत्र मनुष्य को विकसित करना चाहते हैं या कुंद और कुंठित, भावातिरेक से भरे हुए ऐसे मंदबुद्धि व्यक्तित्वों का निर्माण, जिनकी सोच और समझ का नियंत्रण भी उनके हाथों में हो?


५. सभी जीवों की प्राथमिकता उनकी जिजीविषा होती है, ऐसे ही मनुष्य की प्राथमिकता भी जीवनयापन हेतु मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ती ही होती है। इनकी पूर्ती की सुनिश्चितता के बाद ही मनुष्य ज्ञान और समझ के स्तर को परिष्कृत करने हेतु प्रवृत हो सकता है। अतएव किसी भी मनुष्य के ज्ञान और समझ के स्तर की संभावना इस बात पर भी निर्भर करती है कि उसकी सामाजिक और राजानैतिक व्यवस्था में इस जिजीविषा की तुष्टि के आयाम कितने विस्तृत हैं, साथ ही यह भी कि इस तुष्टि की चिंताओं से मुक्त मनुष्यों के लिए व्यवस्था किन सभ्यता और संस्कृतिगत मूल्यों को प्रश्रय देती है।

 आपका समय

प्रस्तुति : शरद कोकास



 

शनिवार, 19 जून 2021

3. एतिहासिक क्रम-विकास का दोहराव...


 

हां तो हे मानव श्रेष्ठों,
समय फिर आपकी सेवा में हाज़िर है।
पिछली बार बात यहां छोडी़ थी कि मनुष्य अपने जीवन में, खासकर जीवन की शुरुआत में मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास को जैसे क्रमबद्ध तरीके से दोहराता है।
चलिए बात आगे बढाते है....

मनुष्य अपने जीवन की शुरुआत में लगभग एक मांस के लोथडे़ की तरह होता है, एक संवेदनशील हरकतशुदा ज़िंदा मांस। वह धीरे-धीरे अपने पैरों और हाथों की क्रियाओं को मस्तिष्क के साथ समन्वित करना सीखता है। दृष्टि, श्रवण, घ्राण, स्वाद और स्पर्श इन्द्रियों का प्रयोग और संबंधित अनुभवों का नियमन सीखता है एवं इनकी संवेदनशीलता को परिष्कृत करता है। शरीर का संतुलन साधता है, खडा़ होता है, चलना सीखता है, भाषा सीखता है, सारे जीवन संबंधी क्रिया-व्यवहार सीखता है, बिल्कुल वैसे ही जैसे कि मनुष्य जाति अपने क्रमिक विकास से गुजरी है।

मनुष्य के पास चूंकि इन सारी संभावनाओं से युक्त प्राथमिक ढांचा पहले से ही है अतः प्रत्येक कदम उसके विकास में गुणात्मक परिवर्तन लाता है जिससे कि शारीरिक क्रियाओं और उनसे संबंधित तंत्रिका-मस्तिष्क प्रणाली के समन्वय की सामान्य उन्नत अवस्था उसे समय के छोटे अंतराल में ही प्राप्त हो जाती है परन्तु इसमें परिवेशी समाज द्वारा जीवन के सामान्य व्यवहारिक ज्ञान के आधार पर उसकी मदद की भूमिका निर्णायक होती है।

अब बात आती है, मानव जाति द्वारा समेटे गए प्रकृति के बृहद ज्ञान, विशिष्ट ज्ञान एवं क्रियाकलाप, विज्ञान, तकनीक, व दर्शन के संदर्भ में। इस ज्ञान की परास बहुत अधिक है, इसीलिए अब यह संभव नहीं रह गया है कि मनुष्य का परिवेशी समाज, जो खु़द भी संपूर्ण ज्ञान स्रोतों से बावस्ता नहीं होता, उसको ज्ञान का हर पाठ सिखा सके, उसकी जिज्ञासाओं का पूर्णतया समाधान कर सके, जिम्मेदारी से उसकी ज्ञान पिपासा की सही दिशा निर्धारित कर सके। वह उसे सिर्फ़ वहीं तक पहुंचा सकता है जहां तक खु़द परिवेशी समाज के ज्ञान और समझ की सीमाएं हैं, सभ्यता और संस्कृति का स्तर है, और खु़द समाज के भीतर इन सीमाओं और स्तरों के अपने-अपने व्यक्तिगत स्तर हैं।

मानव-समाज ने इन सीमाओं को समझा, और परिवेशी समाज से इतर एक शिक्षण-प्रशिक्षण प्रणाली विकसित की, ताकि उपलब्ध ज्ञान का सामान्य सत्व, मानव जाति के नये सदस्यों को क्रमबद्ध तरीके से व्यवस्थित रूप में दिया जा सके और फ़िर उन्हें ज्ञान की शाखा विशेष में विशेषज्ञता भी ताकि वे उसका अतिक्रमण कर मानव जाति को और समृद्ध कर सकें। यानि कि अब मनुष्य और ज्ञान की संभावनाओं के बीच एक सामाजिक व्यवस्था विकसित हो जाती है, और यह संभावना भी कि इस तंत्र का नियमन कर रही राजनैतिक व्यवस्था इन संभावनाओं को अपने हितों के हिसाब से नियंत्रित और निर्धारित कर सकती है।

उफ़ ! फ़िर ज़ियादा हो गया, समय हूं ना, इधर-उधर भटकने और समय खींचने की आदत है।
पर ये बात ही ऐसी है कि नहीं चाहते हुए भी बात बढ़ रही है।
चलिए, फ़िर बात करेंगे।

 

आपका ‘समय’

 

प्रस्तुति : शरद कोकास

रविवार, 13 जून 2021

2.संचित अनुभवों का हस्तांतरण

 

2.कहानी आगे बढ़ती है.....

 काफ़ी अन्तराल हो गया।

दरअसल, वर्तमान इतना उथल-पुथल भरा है कि मैं चश्मदीद होने का लोभ संवरण नहीं कर पाता।
चलिए, फिर से बात शुरू करते हैं।
मैं समय, आपको किस्से-कहानियां सुनाते हुए यह बताना चाहता था कि लोग मुझ तक क्यों नहीं पहुंच पाते।


तो हे मानव श्रेष्ठों, कहानी आगे बढ़ती है.....
मनुष्य ने अपने लाखों वर्षों के एतिहासिक क्रमिक उदविकास के दौरान अपनी आज की लचीली और उन्नत शरीर संरचना को पाया है। शरीर के विभिन्न अंगों का नयी-नयी परिस्थितियों और कार्यों के लिए संचालन, संचालन क्रियाओं का दिमाग़ के साथ समन्वयन और आपसी अनुक्रिया, इन सबका उत्पाद है अत्यंत परिष्कृत मस्तिष्क संगठन और शारीरिक संरचना। यह सब कपि-मानव और उसके हाथ द्वारा किए गए श्रम का परिणाम है। श्रम का मतलब है, मनुष्य द्वारा अपने किसी विशेष प्रयोजन के लिए प्रकृति में किया जा रहा सचेत परिवर्तन।


मनुष्य अपने संचित अनुभवों को आगे वाली पीढी़ को देता था और इस प्रकार आने वाली पीढ़ियां उनका अतिक्रमण कर, अपने अनुभवों को और समृद्ध करती जाती थी। मनुष्य का ज्ञान समृद्ध होता गया, भाषा और लिपी ने इस संचित ज्ञान का आने वाली पीढ़ियों तक का संचरण और आसान व सटीक बना दिया। क्रमिक विकास की यह उर्ध्वगामी प्रक्रिया निरन्तर चलती रही, मनुष्य के क्रियाकलापों और अनुभवों के परिस्थितिजन्य क्षेत्र निरन्तर विस्तृत होते गये।


मनुष्य जाति बिखर रही थी, विकास की प्रक्रिया बिखर रही थी, इस ग्रह की भौगोलिक परिस्थितियां बदल रही थी। शनैःशनैः मानव जाति का यह बिखराव एक दूसरे से काफ़ी विलगित हो गया और पृथ्वी के अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग विकास श्रृंखलाएं स्थापित हो गयी। परिस्थितिजन्य संघर्षों और आवश्यकताओं के अनुरूप, विकास की यह प्रक्रिया कहीं लगभग स्थिर हो गयी, कहीं धीमी, तो कहीं गुणात्मक रूप से काफ़ी तेज़ हो गयी। यह स्थिति आज भी बनी हुई है, और मनुष्य अपने नीले ग्रह के अलग-अलग स्थानों पर मानव जाति के क्रमिक विकास की अलग-अलग अवस्थाओं की समानान्तर उपस्थिति पाते हैं। कहीं कहीं तो यह बिल्कुल आदिम अवस्थाओं में हैं।


कुलमिलाकर लाबलुब्बोआब यह है कि मनुष्य को एक सुसंगठित मस्तिष्क और परिष्कृत शारीरिक संरचना, गुणसूत्रीय संरक्षण के जरिए विरासत में मिलती है, जिसमें भरपूर विकास की असीम भौतिक संभावनाएं मौजूद होती हैं। परन्तु इस परिष्कृत शारीरिक संरचना और सुसंगठित मस्तिष्क संरचना का क्रियान्वयन और नियमन उसे विरासत में नहीं मिलता, इस हेतु वह विकास की एक निश्चित प्रक्रिया से गुजरता है जहां वह परिवेशी समाज की सहायता से अपनी शारीरिक और मानसिक क्रियाकलापों को श्रृंखलाबद्ध तरीके से नियमित और परिष्कृत करना सीखता है, और इसे इस तरह देखना काफ़ी रोमांचक रहेगा कि इस प्रक्रिया के दौरान, यानि पैदा होने से लेकर विकसित युवा होने तक, मनुष्य अपने जीवन में मानवजाति के पूरे इतिहास को छोटे रूप में क्रमबद्ध तरीके से दोहराता है।

 

समय

 

प्रस्तुति : शरद कोकास