शनिवार, 19 जून 2021

3. एतिहासिक क्रम-विकास का दोहराव...


 

हां तो हे मानव श्रेष्ठों,
समय फिर आपकी सेवा में हाज़िर है।
पिछली बार बात यहां छोडी़ थी कि मनुष्य अपने जीवन में, खासकर जीवन की शुरुआत में मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास को जैसे क्रमबद्ध तरीके से दोहराता है।
चलिए बात आगे बढाते है....

मनुष्य अपने जीवन की शुरुआत में लगभग एक मांस के लोथडे़ की तरह होता है, एक संवेदनशील हरकतशुदा ज़िंदा मांस। वह धीरे-धीरे अपने पैरों और हाथों की क्रियाओं को मस्तिष्क के साथ समन्वित करना सीखता है। दृष्टि, श्रवण, घ्राण, स्वाद और स्पर्श इन्द्रियों का प्रयोग और संबंधित अनुभवों का नियमन सीखता है एवं इनकी संवेदनशीलता को परिष्कृत करता है। शरीर का संतुलन साधता है, खडा़ होता है, चलना सीखता है, भाषा सीखता है, सारे जीवन संबंधी क्रिया-व्यवहार सीखता है, बिल्कुल वैसे ही जैसे कि मनुष्य जाति अपने क्रमिक विकास से गुजरी है।

मनुष्य के पास चूंकि इन सारी संभावनाओं से युक्त प्राथमिक ढांचा पहले से ही है अतः प्रत्येक कदम उसके विकास में गुणात्मक परिवर्तन लाता है जिससे कि शारीरिक क्रियाओं और उनसे संबंधित तंत्रिका-मस्तिष्क प्रणाली के समन्वय की सामान्य उन्नत अवस्था उसे समय के छोटे अंतराल में ही प्राप्त हो जाती है परन्तु इसमें परिवेशी समाज द्वारा जीवन के सामान्य व्यवहारिक ज्ञान के आधार पर उसकी मदद की भूमिका निर्णायक होती है।

अब बात आती है, मानव जाति द्वारा समेटे गए प्रकृति के बृहद ज्ञान, विशिष्ट ज्ञान एवं क्रियाकलाप, विज्ञान, तकनीक, व दर्शन के संदर्भ में। इस ज्ञान की परास बहुत अधिक है, इसीलिए अब यह संभव नहीं रह गया है कि मनुष्य का परिवेशी समाज, जो खु़द भी संपूर्ण ज्ञान स्रोतों से बावस्ता नहीं होता, उसको ज्ञान का हर पाठ सिखा सके, उसकी जिज्ञासाओं का पूर्णतया समाधान कर सके, जिम्मेदारी से उसकी ज्ञान पिपासा की सही दिशा निर्धारित कर सके। वह उसे सिर्फ़ वहीं तक पहुंचा सकता है जहां तक खु़द परिवेशी समाज के ज्ञान और समझ की सीमाएं हैं, सभ्यता और संस्कृति का स्तर है, और खु़द समाज के भीतर इन सीमाओं और स्तरों के अपने-अपने व्यक्तिगत स्तर हैं।

मानव-समाज ने इन सीमाओं को समझा, और परिवेशी समाज से इतर एक शिक्षण-प्रशिक्षण प्रणाली विकसित की, ताकि उपलब्ध ज्ञान का सामान्य सत्व, मानव जाति के नये सदस्यों को क्रमबद्ध तरीके से व्यवस्थित रूप में दिया जा सके और फ़िर उन्हें ज्ञान की शाखा विशेष में विशेषज्ञता भी ताकि वे उसका अतिक्रमण कर मानव जाति को और समृद्ध कर सकें। यानि कि अब मनुष्य और ज्ञान की संभावनाओं के बीच एक सामाजिक व्यवस्था विकसित हो जाती है, और यह संभावना भी कि इस तंत्र का नियमन कर रही राजनैतिक व्यवस्था इन संभावनाओं को अपने हितों के हिसाब से नियंत्रित और निर्धारित कर सकती है।

उफ़ ! फ़िर ज़ियादा हो गया, समय हूं ना, इधर-उधर भटकने और समय खींचने की आदत है।
पर ये बात ही ऐसी है कि नहीं चाहते हुए भी बात बढ़ रही है।
चलिए, फ़िर बात करेंगे।

 

आपका ‘समय’

 

प्रस्तुति : शरद कोकास

रविवार, 13 जून 2021

2.संचित अनुभवों का हस्तांतरण

 

2.कहानी आगे बढ़ती है.....

 काफ़ी अन्तराल हो गया।

दरअसल, वर्तमान इतना उथल-पुथल भरा है कि मैं चश्मदीद होने का लोभ संवरण नहीं कर पाता।
चलिए, फिर से बात शुरू करते हैं।
मैं समय, आपको किस्से-कहानियां सुनाते हुए यह बताना चाहता था कि लोग मुझ तक क्यों नहीं पहुंच पाते।


तो हे मानव श्रेष्ठों, कहानी आगे बढ़ती है.....
मनुष्य ने अपने लाखों वर्षों के एतिहासिक क्रमिक उदविकास के दौरान अपनी आज की लचीली और उन्नत शरीर संरचना को पाया है। शरीर के विभिन्न अंगों का नयी-नयी परिस्थितियों और कार्यों के लिए संचालन, संचालन क्रियाओं का दिमाग़ के साथ समन्वयन और आपसी अनुक्रिया, इन सबका उत्पाद है अत्यंत परिष्कृत मस्तिष्क संगठन और शारीरिक संरचना। यह सब कपि-मानव और उसके हाथ द्वारा किए गए श्रम का परिणाम है। श्रम का मतलब है, मनुष्य द्वारा अपने किसी विशेष प्रयोजन के लिए प्रकृति में किया जा रहा सचेत परिवर्तन।


मनुष्य अपने संचित अनुभवों को आगे वाली पीढी़ को देता था और इस प्रकार आने वाली पीढ़ियां उनका अतिक्रमण कर, अपने अनुभवों को और समृद्ध करती जाती थी। मनुष्य का ज्ञान समृद्ध होता गया, भाषा और लिपी ने इस संचित ज्ञान का आने वाली पीढ़ियों तक का संचरण और आसान व सटीक बना दिया। क्रमिक विकास की यह उर्ध्वगामी प्रक्रिया निरन्तर चलती रही, मनुष्य के क्रियाकलापों और अनुभवों के परिस्थितिजन्य क्षेत्र निरन्तर विस्तृत होते गये।


मनुष्य जाति बिखर रही थी, विकास की प्रक्रिया बिखर रही थी, इस ग्रह की भौगोलिक परिस्थितियां बदल रही थी। शनैःशनैः मानव जाति का यह बिखराव एक दूसरे से काफ़ी विलगित हो गया और पृथ्वी के अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग विकास श्रृंखलाएं स्थापित हो गयी। परिस्थितिजन्य संघर्षों और आवश्यकताओं के अनुरूप, विकास की यह प्रक्रिया कहीं लगभग स्थिर हो गयी, कहीं धीमी, तो कहीं गुणात्मक रूप से काफ़ी तेज़ हो गयी। यह स्थिति आज भी बनी हुई है, और मनुष्य अपने नीले ग्रह के अलग-अलग स्थानों पर मानव जाति के क्रमिक विकास की अलग-अलग अवस्थाओं की समानान्तर उपस्थिति पाते हैं। कहीं कहीं तो यह बिल्कुल आदिम अवस्थाओं में हैं।


कुलमिलाकर लाबलुब्बोआब यह है कि मनुष्य को एक सुसंगठित मस्तिष्क और परिष्कृत शारीरिक संरचना, गुणसूत्रीय संरक्षण के जरिए विरासत में मिलती है, जिसमें भरपूर विकास की असीम भौतिक संभावनाएं मौजूद होती हैं। परन्तु इस परिष्कृत शारीरिक संरचना और सुसंगठित मस्तिष्क संरचना का क्रियान्वयन और नियमन उसे विरासत में नहीं मिलता, इस हेतु वह विकास की एक निश्चित प्रक्रिया से गुजरता है जहां वह परिवेशी समाज की सहायता से अपनी शारीरिक और मानसिक क्रियाकलापों को श्रृंखलाबद्ध तरीके से नियमित और परिष्कृत करना सीखता है, और इसे इस तरह देखना काफ़ी रोमांचक रहेगा कि इस प्रक्रिया के दौरान, यानि पैदा होने से लेकर विकसित युवा होने तक, मनुष्य अपने जीवन में मानवजाति के पूरे इतिहास को छोटे रूप में क्रमबद्ध तरीके से दोहराता है।

 

समय

 

प्रस्तुति : शरद कोकास


रविवार, 6 जून 2021

 1. मित्रों, आपने  रवि कुमार स्वर्णकार या रवि कुमार रावतभाठा का नाम अवश्य सुना होगा .रवि कुमार कवि , चित्रकार , ब्लॉगर मार्क्सवाद के गहरे अध्येता साथ ही एक बेहतर इंसान भी थे . सन 2008 में ब्लोगिंग के दौरान उनसे परिचय हुआ था . उन दिनों वे ' समय' के नाम से  ब्लॉग पोस्ट लिखा करते थे उनके ब्लॉग का  शीर्षक था ' समय के साए में' .  रवि कुमार स्वर्णकार ही 'समय' के नाम से ब्लॉग लिखते थे यह बात उनके निधन तक किसी को मालूम नहीं थी . तीन वर्ष पूर्व वे इस दुनिया से विदा लेकर चले गए . मित्रता के नाते मैं प्रारंभ से ही उनके लेख  सहेज कर रखता था . लगभग एक सौ पचास ऐसे लेख मेरे पास हैं जिन्हें मैं अपने ब्लॉग 'आलोचक' पर प्रकाशित करना चाहता हूँ . उम्मीद करता हूँ आपको यह श्रंखला पसंद आयेगी : शरद कोकास 


*मैं समय हूँ*

 *आख़िर क्यों है मुझे आप में इतनी दिलचस्पी* ..

 

तो हे मानव श्रेष्ठों,
समय के किस्से-कहानियां, गप्पबाज़ी अब से शुरू होती है।
आज जरा अपने और आपके बीच के संबंधों की पृष्ठभूमि पर बात कर लूं।
आख़िर क्यों है मुझे आप में इतनी दिलचस्पी......
तो बात यूं शुरू होती है:


ब्रह्मांड़ के सापेक्ष पृथ्वी की और पृथ्वी के सापेक्ष मनुष्य जाति की उम्र काफ़ी छोटी है, परन्तु अपने आप में मनुष्य जाति के उदविकास का लाखो वर्षों के अन्तराल में फैला हुआ काल, एक मनुष्य की उम्र के लिहाज से काफी लंबा है।

मैंनें आग के पिण्ड़ से आज की पॄथ्वी को उभरते देखा है। मैं गवाह हूं उन सारी विस्मयकारी घटनाओं की श्रॄंखलाओं का जिनसे यह नीला ग्रह जूझा है। मैंनें पृथ्वी की एक-एक चीज़ को बनते-बिगडते देखा है, मैं इसकी तपन में तपा हूं, इसके पहाड़ों में ऊंचा उठा हूं, इसकी समुद्री गहराईयों में डूबा हूं। मैं हरा हुआ हूं इसकी हरियाली में, हिमयुगों में जमा हूं, रेगिस्तानों में पिघला हूं।


मैंनें पदार्थ के कई रूपों को साकार होते देखा है, परन्तु सबसे रोचक पल मैंनें उस वक़्त जिए हैं जब पदार्थ के एक ऐसे संशलिष्ट रूप ने आकार लिया था जिसमें कि स्पन्दन था। यह थी प्रकृति के जड़ पदार्थों से जीवन की महान उत्पत्ति, और उसके बाद तो मैं एक मूक दर्शक की भांति, करोडों वर्षों तक पदार्थ की जिजीविषा का नये-नये रूपों में पूरे ग्रह पर विस्तार देखता रहा।

प्रकृति बहुत कठोर थी और जीवन उसकी ताकत के आगे नतमस्तक, उसे अपने आपको प्रकृति के हिसाब से अनुकूलित करना था। और फिर वह क्रांतिकारी दौर आया, जब जीवन प्रकृति की वज़ह से ही प्रकृति के ख़िलाफ़ खडा़ हो गया, उसने सचेत हस्तक्षेप करके, अनुकूलन को धता बता कर प्रकृति को अपने हिसाब से अनुकूलित करना शुरू कर दिया। ओह, कितना रोमांचक था, आदिम कपि-मानव को प्रकृति से सचेत संघर्ष करते देखना, और यह कि वही कपि-मानव अपने सचेत क्रियाकलापों से प्रकृति को समझता हुआ, उसे बदलता हुआ, खु़द भी कितना बदल गया। वह आज के आधुनिक मानव यानि कि आप के रूप में तब्दील हो गया।


आदिम कपि-मानव से आधुनिक मनुष्य तक के उदविकास को मैंनें काफी करीब से देखा है, एक बेहद रोचक और रोमांचक अनुभव, और यह अभी तक जारी है। मैं मनुष्य जाति का इसीलिये ऋणी हूं, और इसलिये भी कि उसी से मुझे यह भाषा, लिपि और अंततः यह ब्लोग तक्नीक मिली, जिसकी वज़ह से मैं समय, आपसे मुख़ातिब हो सका हूं।
आज इतना ही, लोग मुझ तक क्यों नही पहुंच पाते उसकी बात अगली बार।
असल में यह उसीकी भूमिका है।

 *समय के ब्लॉग से*

 *प्रस्तुति* : *शरद कोकास*

 


मंगलवार, 20 मार्च 2018



कल दिनांक 19 मार्च को कवि केदारनाथ सिंह नहीं रहे .आज उनसे सुनिए उनकी कविता "हिंदी के बारे में एक हिंदी कवि का बयान "से यह अंश और पढ़िए उनकी पूरी कविता . (कृपया ऊपर के प्लेयर पर आवाज़ सुनें .)



हिंदी के बारे में एक हिंदी कवि का बयान

मेरी भाषा के लोग


केदारनाथ जी के साथ शरद कोकास 
मेरी सड़क के लोग हैं
सड़क के लोग सारी दुनिया के लोग

पिछली रात मैंने एक सपना देखा
कि दुनिया के सारे लोग
एक बस में बैठे हैं
और हिंदी बोल रहे हैं
फिर वह पीली-सी बस
हवा में गायब हो गई
और मेरे पास बच गई सिर्फ़ मेरी हिंदी
जो अंतिम सिक्के की तरह
हमेशा बच जाती है मेरे पास
हर मुश्किल में

कहती वह कुछ नहीं
पर बिना कहे भी जानती है मेरी जीभ
कि उसकी खाल पर चोटों के
कितने निशान हैं
कि आती नहीं नींद उसकी कई संज्ञाओं को
दुखते हैं अक्सर कई विशेषण

पर इन सबके बीच
असंख्य होठों पर
एक छोटी-सी खुशी से थरथराती रहती है यह !

केदार जी के साथ शरद कोकास और सियाराम शर्मा 
तुम झांक आओ सारे सरकारी कार्यालय
पूछ लो मेज से
दीवारों से पूछ लो
छान डालो फ़ाइलों के ऊंचे-ऊंचे
मनहूस पहाड़
कहीं मिलेगा ही नहीं
इसका एक भी अक्षर
और यह नहीं जानती इसके लिए
अगर ईश्वर को नहीं
तो फिर किसे धन्यवाद दे !

मेरा अनुरोध है
भरे चौराहे पर करबद्ध अनुरोध
कि राज नहीं —      भाषा
भाषा —     भाषा —   सिर्फ़ भाषा रहने दो
मेरी भाषा को ।

इसमें भरा है
पास-पड़ोस और दूर-दराज़ की
इतनी आवाजों का बूंद-बूंद अर्क
कि मैं जब भी इसे बोलता हूं
तो कहीं गहरे
अरबी   तुर्की   बांग्ला   तेलुगु
यहां तक कि एक पत्ती के
हिलने की आवाज भी
सब बोलता हूं जरा-जरा
जब बोलता हूं हिंदी

पर जब भी बोलता हूं
यह लगता है
पूरे व्याकरण में
एक कारक की बेचैनी हूं
एक तद्भव का दुख
तत्सम के पड़ोस में

केदार नाथ सिंह

प्रस्तुति: शरद कोकास 




सोमवार, 15 जनवरी 2018

शरद कोकास की लम्बी कविता 'देह' पर राजेश जोशी की चिठ्ठी



इस दुनिया में जो कुछ भी घटता है ,वह इस देह पर ही घटता है .

इस केन्द्रीय विचार के साथ रची गई है लम्बी कविता 'देह' जो प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका 'पहल' के अंक 104 में प्रकाशित हुई थी . इस कविता को पंद्रह भागों में विभक्त कर मैंने अपने ब्लॉग के पाठकों के लिए उसके ऑडियो तैयार किया हैं . आज की इस पोस्ट में इस कविता पर प्रतिक्रिया स्वरूप सुप्रसिद्ध कवि राजेश जोशी की चिठ्ठी के साथ ऑडियो का एक छोटा सा अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ . शेष ऑडियो अगली पोस्ट में ....


राजेश जोशी की चिठ्ठी

प्रिय शरद ,


बहुत दिन बाद तुम्हारी लम्बी कविता 'देह' को पढ़ा है । हालांकि एक पाठ कविता के लिये और खासतोर से लम्बी कविता के लिये नाकाफ़ी है । गहन आवेगात्मक लय के साथ चलती यह एक महत्वपूर्ण कविता है । इसमें देह की विकासगाथा भी है और देह के इतिहास का आख्यान भी । एक साथ कई स्तरों पर चलती कविता की कई परतें हैं । पृथ्वी सहित अनेक ग्रहों की देह के आकार लेने की गाथा से शुरू कविता धरती पर जीवन के आकार लेने की गाथा में प्रवेश करती है और अमीबा के निराकार से आकार तक की यात्रा की तरफ जाती है । कहना न होगा कि तुम एक साथ विज्ञान इतिहास ,दर्शन और क्लासिकल साहित्य की स्मृतियों को एक दूसरे से बहुत खूबसूरती से गूंथ देते हो। यह रास्ते बड़ी कविता की ओर जाते हैं । इसमें किस तरह हमारे पुरखों की कई बार हमारे विस्मृत पुरखों की परछाइयाँ उनकी सन्ततियों तक जाती हैं इसका भी बहुत खूबसूरती से तुमने इस्तेमाल किया है । यह सच है कि मनुष्य की देह सचमुच एक पहेली है । जितना उसे ज़्यादा से ज़्यादा जानने की कोशिश होती रही है उतनी ही वह अबूझ भी बनी ही रहती है ।


"एक देह की जिम्मेदारी में शामिल  होती हैं / अन्य देहों की ज़रूरतें ।"

यह एक महत्वपूर्ण विचार भी है और पंक्ति भी । तुम इतिहास में मनुष्य देह के साथ किये गये अनेक अत्याचारों की स्मृतियों के साथ ही तात्कालिक इतिहास की यूनीयन कार्बाइड नरोड़ा पाटिया आदि को भी समेट लेते हो । इस तरह एक बड़ा वृत्त यह कविता बनाती है । इसमें उन भविष्यवाणियों की ओर भी संकेत है जो खतरों की तरह मंडरा रही हैं । देह के मशीनों में बदलने के प्रयास का भी जिक्र यहाँ है । कहना न होगा कि बिना एक सही और प्रगतिशील विचारधारा के इतना बड़ा वृत्त खींचना और उनके बीच के सम्बंधों के महीन तागों को छूना संभव नहीं था । उपलब्धि खतरे और भयावह सच्चाइयों के साथ कहीं लगता है कि एक बड़े स्वप्न को भी इसमें जगह मिलनी चाहिये थी । लेकिन एक महागाथा की तरह यह कविता बहुत सारे मनों को बेचैन करेगी ।
  
शुभकामनाओं के साथ

तुम्हारा
राजेश जोशी
भोपाल ,14.10.16    

इस ऑडियो और राजेश जी की चिठ्ठी पर आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी . पूरी कविता आप साइड बार में दिए गये लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं . धन्यवाद.  

आपका 

शरद कोकास 

शनिवार, 19 अगस्त 2017

रचना संवाद-5 -रचना में सन्दर्भों की आवश्यकता और उपयोगिता

साहित्य में 'मजनू' आ जाये तो क्या होगा 


किसी भी रचना में खास तौर पर कविता में ऐतिहासिक या माइथोलॉजीकल सन्दर्भों की अधिकता की वज़ह से उसे तत्काल समझने में व्यवधान उत्पन्न होता है यह हमारे अध्ययन और जानकारी पर निर्भर करता है कि हम उस सन्दर्भ को कितना समझ सकते हैं सामान्यतः हम अपने बचपन से कुछ ऐतिहासिक और माइथोलॉजीकल सन्दर्भों को जानते हैं जिनकी शिक्षा हमें शाला और महाविद्यालय में मिलती है दादी नानी की कहानियों में भी हमने बहुत सी बातें सुनी होती हैं इसके बाद हम अपनी रूचि  से बहुत कुछ पढ़ते हैं । इस तरह हमारे मस्तिष्क में बचपन से अपनी इन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त किया हुआ ज्ञान का खजाना होता है । जिन लोगों की स्कूली शिक्षा नहीं होती वे भी अपने समाज द्वारा प्राप्त ज्ञान से अपने आप को अपडेट करते रहते हैं ।

यदि किसी कविता को पढ़ते हुए हमें कोई माइथोलॉजीकल सन्दर्भ प्राप्त होता है तो हम तत्काल उसका अर्थ समझ जाते हैं । हिंदी के अनेक मुहावरे इन्ही सन्दर्भों को लेकर बने हैं ।जैसे हमें लिखना है “वह गहरी नींद में सो रहा था” तो हम लिखेंगे “वह कुम्भकर्ण की तरह सो रहा था” अब हमें रामायण के सन्दर्भ से यह याद है की कुम्भकर्ण गहरी नींद सोता था । “द्रौपदी की साड़ी” शब्द पढ़ते ही हमें द्रौपदी चीरहरण की कथा याद आ जाती है , एकलव्य का नाम पढ़ते ही हमें उसके साथ हुआ छल याद आ जाता है । वर्तमान सन्दर्भों में भी देखें तो 'निर्भया' शब्द सुनते या पढ़ते ही हमें पूरी घटना का स्मरण हो जाता है ।

उसी तरह हर सभ्यता के अपने मुहावरे होते हैं जो हमें ज्ञात नहीं होते। अब अगर किसी कविता में “एकिलिस की एड़ी” शब्द आता है तो हम इस ग्रीक पात्र को नहीं पहचानते इसलिए इसका अर्थ समझ नही पाएंगे । एकिलिस दुर्योधन की तरह एक पात्र था जिसकी माँ ने उसे एड़ी से पकड़कर स्टिक नदी में डुबाया था जिससे उसका पूरा शरीर वज्र की तरह बन गया था केवल एड़ी बची रही सो उसकी मृत्यु एड़ी में तीर लगने की वज़ह से हुई । इसलिए योरोप की कहावत में मर्मस्थल को ‘एकिलिस की एड़ी’ कहा जाता है  । लेकिन हमें इसके लिए ग्रीक माइथोलॉजी का ज्ञान होना अनिवार्य है

कविता सांस्कृतिक आदान –प्रदान का माध्यम होती है अब हिंदी की कविता में यदि कुम्भकर्ण शब्द आता है तो रामायण से अनभिग्य होने के कारण योरोप के लोग इसका अर्थ समझ नहीं पाएंगे लेकिन इस आधार पर वे इसे कविता कहने से ख़ारिज तो नहीं कर देंगे
योरोप की बात छोड़ भी दें तो हमारे देश में इतनी सारी घटनाएँ घट चुकी हैं जिनके बारे में हमें पता ही नहीं है अगर कविता में उन घटनाओं का सन्दर्भ आता है तो हम उन्हें न जान पाने की वज़ह से उनका आस्वाद ग्रहण नहीं कर सकेंगे ।

कविता में कवि बहुत कम शब्दों का प्रयोग करता है और घटनाओं को बिम्बों प्रतीकों और सन्दर्भों में ही व्यक्त करता है । कविता का अर्थ लेख नहीं होता अतः उसे विस्तार से देने की आवश्यकता भी नहीं है । यहाँ कवि की विवशता नहीं है । यह हमारे मस्तिष्क की सीमा है । हमारे अवचेतन में जो सन्दर्भ और बिम्ब हैं हम उन्ही के माध्यम से कविता को समझने की कोशिश करते हैं और उससे आगे जानने की कोशिश भी नहीं करते । यह कठिनाई न केवल हिंदी की बल्कि अन्य भाषाओँ की कविता समझने में भी आती है । उर्दू की अनेक नज़्म और गज़लें ऐसी हैं जिनमे उर्दू के शब्द और इस्लामिक माइथोलॉजीकल शब्दों का प्रयोग होता है ,जैसे फ़रिश्ते , नोहा की नाव , आदि हम कविता का आनंद लेने के लिए इनका अर्थ ढूँढते हैं या नहीं ? जगजीत सिंह की गाई एक प्रसिद्ध गज़ल है “ बाज़ीचाए अत्फाल है दुनिया मेरे आगे , होता है शबो रोज़ तमाशा मेरे आगे “ अब हम इस ग़ज़ल को समझाने के लिए उर्दू का शब्द कोश देखते हैं या नहीं । उसी तरह बांगला या पंजाबी की कविता में अनेक शब्द ऐसे होते हैं जिनका हिंदी में अनुवाद करते समय भी सन्दर्भों को जस का तस रखा जाता है । हम किसी न किसी माध्यम से उनका अर्थ जानने की कोशिश भी करते ही हैं

इसी तरह हिंदी की कविता में कई स्थानीय शब्द और स्थानीय संदर्भ भी होते हैं लैला मजनू की कहानी सबको पता है लेकिन अमी गूजर और सस्सी पुन्नू की कहानी कितनों को पता है ? तो कविता में अगर यह सन्दर्भ आयेंगे तो हमें उनकी तलाश तो करनी ही पड़ेगी । फिर केवल सन्दर्भों की बात ही नहीं है कविता में ऐसे अनेक शब्द होते हैं जिनका अर्थ हमें नहीं मालूम होता तब हम उनका अर्थ जानने के लिए शब्द कोश देखते हैं या नहीं । हिंदी हमारी भाषा है और हम उसे निरंतर समृद्ध करते रहते हैं उस समय हम उन क्लिष्ट शब्दों को नकारते तो नहीं ,अगर नकारेंगे तो यह भाषा का अपमान होगा । एक साधारण व्यक्ति भले ही भाषा का ऐसा अपमान कर सकता है लेकिन एक रचनाकार के लिए तो यह अक्षम्य होगा ।

आज हमारे पास संचार के इतने माध्यम हैं , तमाम पुस्तकें हैं , शब्दकोष हैं , इंटरनेट है , गूगल सर्च के माध्यम से हम किसी भी भाषा में वह शब्द टाइप कर उसका अर्थ और तमाम सन्दर्भ जान सकते हैं । एक साधारण पाठक भी यह कर सकता है और इसके लिए बहुत ज़्यादा प्रयास करने की जरुरत नहीं है । एक बार यदि हम उस सन्दर्भ का अर्थ भली भांति समझ लेंगे तो फिर आगे हमें कठिनाई नहीं जायेगी । और यह इतना कठिन भी नहीं है । आज से दो सौ  या तीन सौ साल पहले हिंदी में अंग्रेजी का या योरोप की अन्य भाषाओं का कोई शब्द नहीं था,उससे पांच सौ साल पहले उर्दू ,फारसी का कोई शब्द नहीं होता था ,मुहावरों और कहावतों की तो बात ही दूर लेकिन जैसे जैसे हमारा वैश्विक स्तर पर विकास होता जा रहा है विश्व की अनेक भाषाओँ के और वहां घटित होने वाली घटनाओं के सन्दर्भ हमारे साहित्य में बढ़ते जा रहे हैं । टेक्नोलोजी में जब नए शब्द आते हैं तो हम उन्हें किस तरह आत्मसात कर लेते हैं डाटा ,केबल, सॉफ्ट वेयर , यदि यह शब्द कविता में आते हैं तो क्या हम इन्हें अस्वीकार कर देते हैं ? सो हमें साहित्य का आनंद लेने के लिए और वैश्विक स्तर पर अपने साहित्य को स्थापित करने के लिए उन सबको आत्मसात करना ही होगा बल्कि अपनी कविता में उनका प्रयोग भी करना होगा । हमारी इस संकुचित मानसिकता का खामियाज़ा हम भुगत चुके हैं । आज वैश्विक स्तर पर हिंदी की कविता को वह स्थान प्राप्त नहीं है जो उसे मिलना चाहिए था । हम तमाम विदेशी अनुदित साहित्य पढ़ते हैं और सोचते हैं हमारे यहाँ ऐसा साहित्य क्यों नहीं रचा जा रहा । इसके पीछे सबसे  बड़ा कारण हमारी कूप मंडूकता ही है सो हमें इससे उबरना आवश्यक है ।

आपका
शरद कोकास