शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

वे सुबह मछली को दाना चुगाते हैं और रात को फिशकरी खाते हैं ।

हरिशंकर
परसाई ने कहा था

आज 22 अगस्त परसाई जी के जन्म दिन पर बहुत पुरानी यह घटना याद आ रही है । यह 1983 की बात है बैंक की नई नई नौकरी थी और मैं ट्रेनिंग के लिये जबलपुर गया था । दुर्ग से निकलते समय सापेक्ष के सम्पादक महावीर अग्रवाल जी ने सापेक्ष की कुछ प्रतियाँ दीं और कहा “नेपिय टाउन में यह परसा जी के यहाँ दे देना ।“ जबलपुर में मैने रिक्शा किया और कहापरसाई जी के यहाँ चलो  

मोहल्ले में पहुंचकर रिक्शेवाले ने पूछा “भैया घर पता है ? “ 

मैने कहा “ पता तो नही है  लेकिन वे देश के बहु बड़े लेखक है उनका घर सब जानते होंगे । चलो किसीसे पूछ लेते हैं ।“ एक दो लोगों से पूछा तो उन्होने अनभिज्ञता जताई । 

एक ने कहा “ कौन परसाई...? अच्छा वो वकील हैं क्या ?” वहीं 3-4 छात्र खड़े थे जब उन्होने भी कहा कि वे नहीं जानते तो मुझे गुस्सा आ गया और मैने कहा “ शर्म नहीं आती आप लोगों को देश का इतना बड़ा लेखक आपके मोहल्ले में रहता है और आप उनका घर नहीं जानते ।“ खैर पूछते–पाछते घर तो कुछ देर में मिल गया लेकिन जैसे ही मैने परसाई जी से इसका ज़िक्र किया तो वे ज़ोर से हँस पड़े और कहा “ गनीमत है उसने वकील तो कहा , लेकिन आपको इतना परेशान होने की क्या ज़रूरत ..
अपने देश में लेखक ही तो सबसे कम जाना जाता है


फिर तो खैर हर साल उनके यहाँ जाना होता रहा । कभी जयप्रकाश पाण्डेय ,कभी हिमांशु भाई के साथ ।एक दो बार तो भाई हिमांशु राय अपनी साइकल पर बिठाकर भी ले गये । उन मुलाकातों के अपने अनुभव फिर कभी लिखूंगा । फिलहाल तो व्यंग्य पर परसाई जी के विचार जो उन्होने महावीर अग्रवाल के एक प्रश्न के उत्तर में प्रकट किये थे ।

व्यंग्य यथार्थ से उपजता है व्यंग्य का कार्य एक लहर उठाना है और समाज को झकझोर कर खड़ा कर देना है सभी विधाओं में व्यंग्य की भाषा शक्कर की तरह घुल जाती है सवाल यह है कि कोई लेखक अपने युग की विसंगतियों को कितने गहरे खोजता है उस विसंगति की व्यापकता क्या है और वह जीवन में कितनी अहमियत रखती है मात्र व्यक्ति की ऊपरी विसंगतिशरीर रचना की ,व्यवहार की ,बात के लहज़े की,एक चीज़ है और व्यक्ति तथा समाज के जीवन की भीतरी तहों में जाकर विसंगति खोजना उन्हे अर्थ देना और उसे विरोधाभास से पृथक कर जीवन से साक्षात्कार कराना दूसरी बात है  

यह समाज हमे भाषा सिखाता है अपने अध्ययन संस्कार और परिवेश से भी भाषा धीरे धीरे विकसित होती है पाखण्ड के बारे में कहानी कविता और कई तरह के लेख लिखे जाते हैं मै लेख लिखकर कुल यह कह दूंगा—‘ कुछ लोग इतने दयालु और धार्मिक होते हैं कि रोज़ सुबह मछली को दाना चुगाते हैं और रात को फिश करी खाते हैं

तो अब आप भी ढूंढ कर श्री हरिशंकर परसाई का समग्र साहित्य पढ़ ही डालिये वरना अगले साल आप भी पूछेंगे कौन परसाई ?

-आपका शरद कोकास

मंगलवार, 11 अगस्त 2009

क्या मुकुटधर पाण्डेय ने पागलपन में अच्छी कवितायें और लेख लिख डाले ?



ऐसा कहा जाता है कि कवि तो पागल होता है । यह पागलपन या दीवानापन उसका साहित्य के प्रति तो होता है लेकिन सम्भवत: अपने लेखन पर ध्यान केन्द्रित करने के फलस्वरूप अन्य दुनियावी बातों पर उसका ध्यान नहीं जाता। 

उसकी बेखयाली को उसका पागलपन समझ लिया जाता है । 

इसके अलावा वह भी एक साधारण मनुष्य होता है । अनेक किस्म के भय उसे भी हो सकते है । सन 1918 से 1923 के बीच श्री मुक़ुटधर पाण्डेय भी ऐसी ही मानसिक व्याधि या यात्रा के फोबिया से ग्रस्त थे । हाँलाकि इसी दौर में उन्होने हिन्दी में छायावाद शीर्षक से चार निबन्ध लिखे । उस दौर की कविता को छाया वाद नाम देने का श्रेय भी उन्ही को जाता है । अपनी मानसिक अवस्था के बारे में श्री क्षेमचन्द्र सुमन को एक पत्र उन्होने लिखा था प्रस्तुत है उस पत्र से यह अंश । इसे पढ़कर आप ही बतायें उन्हे क्या हुआ था ।

मुक़ुटधर पाण्डेय ने कहा था

"सन 1918 में मैं किसी काम से बिलासपुर जा रहा था । स्टेशन पर एक मित्र ने भांग की गोली खिला दी । बिलासपुर पहुंचते -पहुंचते मुझे घबराहट होने लगी । ऐसी घबराहट कि किसी प्रकार शांत नहीं हुई । मैं बिलासपुर में ठहर नहीं सका रायगढ़ लौट आया । तब तबियत ठीक हो गई । कुछ दिन बाद किसी काम से कलकत्ता जाने का विचार ठहरा । ठीक जाने के समय वही घबराहट फिर शुरू हो गई । हज़ारों बार समझने पर भी , शांत करने पर भी मन शांत नहीं हुआ । लाचार यात्रा रोक देनी पड़ी । तब घबराहट बन्द हो गई । जब कभी बाहर जाने का विचार होता बिलासपुर की याद आते ही घबराहट शुरू हो जाती मैने यह लक्षण प्रयाग के एक आयुर्वेद पंचानन, पंडित जगन्नाथ प्रसाद शुक्ल सम्पादक ' सुधानिधि ' को लिख भेजा । उन्होने मेरे एक मित्र से कहा -" यह पागलपन का लक्षण है "। मित्र ने मुझे लिखा । मैने बात हंसी में उड़ा दी । मैं उसे एक हवाई बीमारी समझता था । पागलपन का खयाल तक नहीं था । सन 1918 से 1923 तक मुझे यह शिकायत तो रही ,पर इन्ही वर्षों में मैने अच्छी कवितायें लिखीं और लेख लिखे । "

(प्रस्तुत अंश वर्तमान साहित्य के आलोचना अंक मे सम्मिलित सूरज पालिवाल के लेख से साभार । मुकुटधर पाण्डेय जी पर विस्तृत जानकारी संजीव तिवारी के ब्लॉग आरम्भ में )

आपका शरद कोकास

शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

बॉलीवुड में मुंशी प्रेमचन्द ने कहा था



जो लोग बड़े सफल समझे जाते हैं ,वे भी इसके सिवा और कुछ नहीं करते कि अंग्रेज़ी फ़िल्मों के सीन नकल कर लें और कोई अण्ट-सण्ट कथा गढ़कर उन सभी सीनों को उसमें खींच लायें  

साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बनाने का सिलसिला बहुत पुराना है । मुंशी प्रेमचन्द को भी उनके उपन्यास पर फिल्म निर्माण के लिये मुम्बई आमंत्रित किया गया था । अपने मुम्बई निवास के दौरान उन्होने श्री जयशंकर प्रसाद को एक पत्र लिखा जिसमें वे उस दौर की फिल्मी दुनिया का एक चित्र प्रस्तुत करते हैं .यह चित्र आज भी प्रासंगिक है । प्रसाद जी को लिखा यह पत्र डॉ.विजय बहादुर सिंह .सम्पादकवागर्थके सौजन्य से साभार यहाँ प्रस्तुत है ।

अजंता सिनेटोन लि. बम्बई-12 1-10-1934

प्रिय भाई साहब
वन्दे!
मैं कुशल से हूँ और आशा करता हूँ कि आप भी स्वस्थ्य हैं और बाल-बच्चे मज़े में हैं । जुलाई के अंत में बनारस गया था ,दो दिन घर से चला कि आपसे मिलूँ,पर दोनों ही दिन ऐसा पानी बरसा कि रुकना पड़ा । जिस दिन बम्बई आया हूँ ,सारे रास्ते भर भीगता आया और उसका फल यह हुआ कि कई दिन खाँसी आती रही मैं जबसे यहाँ आया हूँ मेरी केवल एक तस्वीर फिल्म हुई है । वह अब तैयार हो गई है और शायद 15 अक्टूबर तक दिखाई जाये । तब दूसरी तस्वीर शुरू होगी । यहाँ की फिल्म-दुनिया देखकर चित्त प्रसन्न नहीं हुआ । 

सब रुपये कमाने की धुन में हैं ,चाहे तस्वीर कितनी ही गन्दी और भृष्ट हो । 

सब इस काम को सोलहों आना व्यवसाय की दृष्टि से देखते हैं ,और जन- रुचि के पीछे दौड़ते हैं । किसी का कोई आदर्श ,कोई सिद्धांत नहीं है । मैं तो किसी तरह यह साल पूरा करके भाग आउंगा । शिक्षित रुचि की कोई परवाह नहीं करता । 

वही औरतों का उठा ले जाना,बलात्कार, हत्या नकली और हास्यजनक लड़ाइयाँ सभी तस्वीरों में जाती हैं । 

जो लोग बड़े सफल समझे जाते हैं ,वे भी इसके सिवा और कुछ नहीं करते कि अंग्रेज़ी फ़िल्मों के सीन नकल कर लें और कोई अण्ट-सण्ट कथा गढ़कर उन सभी सीनों को उसमें खींच लायें ।

कई दिन हुए मि.हिमांशु राय से मुलाकात हुई । वह मुझे कुछ समझदार आदमी मालूम हुए । फिल्मों के विषय में देर तक उनसे बातें होती रहीं । वह सीता पर कोई नई फिल्म बनाना चाहते हैं । उनकी एक कम्पनी कायम हो गई है और शायद दिसम्बर से काम शुरू कर दें । सीता पर दो-एक चित्र बन चुके हैं ,लेकिन उनके खयाल में अभी इस विषय पर एक अच्छे चित्र का माँग है । कलकत्ता वालों की सीता कुछ चली नहीं । मैने तो नहीं देखा , लेकिन जिन लोगों ने देखा है उनके खयाल में चित्र असफल रहा । अगर आप सीता पर कोई फिल्म लिखना चाहें तो मैं हिमांशु राय से ज़िक्र करूँ । मेरे खयाल मे सीता का जितना सुन्दर चित्र आप खींच सकते हैं ,दूसरा नहीं खींच सकता । आपने तो ‘ सीता ‘ देखी होगी । उसमें जो कमी रह गई है, उस पर भी आपने विचार किया होगा । आप उसका कोई उससे सुन्दर रूप खींच सकते हैं तो खींचिये । उसका स्वागत होगा ।

भवदीय
धनपतराय


मुंशी प्रेमचन्द के उपन्यासों पर बनी फिल्मों के बारे में आप यहाँ जानकारी प्राप्त कर सकते हैं
शरद कोकास

मंगलवार, 21 जुलाई 2009

आप तो कविता पढिये गाईये नहीं

प्रमोद वर्मा ने कहा था


मै अपने आप को कहता हूँ कि मै कवि यशप्रार्थी हूँ .

बाबा नागार्जुन ,निराला ,नीरज और गिरिजा कुमार माथुर,लता मंगेशकर ,मोहम्मद रफी,किशोर कुमार

प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान छत्तीसगढ की ओर से रायपुर छत्तीसगढ़ में 10 एवं 11 जुलाई 2009 को हिन्दी के महत्वपूर्ण आलोचक ,नाटककार,कवि और शिक्षाविद डॉ.प्रमोद वर्मा की स्मृति

में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया । इस अवसर पर यहाँ प्रस्तुत है दुर्ग ज़िला हिन्दी साहित्य समिति के तुलसी जयंती के कार्यक्रम में 10 वर्ष पूर्व श्री प्रमोद वर्मा द्वारा दिए गए व्याख्यान का लिप्यांतर । प्रमोद जी यहाँ तुलसी पर व्याख्यान देने आये थे लेकिन कुछ मूढ़ लोगों द्वारा कविता में गद्य की घुसपैठ व्यर्थ है, या छन्दबद्ध कविता ही असली कविता है और मंच के लोकप्रिय कवि ही असली कवि हैं , जैसे निरर्थक प्रश्न उछाले गये , फलस्वरूप प्रमोद जी को तुलसी पर अपना भाषण स्थगित कर उनके प्रश्नों के उत्तर में यह समाधान प्रस्तुत करना पड़ा । उनका यह व्याख्यान उनके तेवर और भाषा पर अधिकार की बानगी स्वरूप जस का तस , तीन किश्तों में ब्लॉग ‘आलोचक’ पर प्रस्तुत किया जा रहा है । इस व्याख्यान का ध्वन्यांकन से लिप्यांकन किया है शरद कोकास ने । इस व्याख्यान को मई 2001 के ‘अक्षरपर्व’ में श्री ललित सुरजन ने प्रकाशित किया था ,साभार प्रस्तुत है-

तीसरी और अंतिम किश्त
आपको पता है एक बार तो नीरज बंबई में हूट हो गए ।

हमारे यहां माना गया है कि दो तरह की प्रतिभाएँ होती है । जो पाठक है वह भी कवि है दरअसल सहदय जो कहा गया है उसे । हदयहीन तो नहीं होगा वह । एक बार तो नीरज बंबई में हूट हो गए लोगों ने कहा –आप गाकर कविता मत सुनाइए यहां कविता पढ़िए ,गाइए नहीं । यह अतिरिक्त साधन जो आप कविता के साथ जोड़ रहें है इसके साथ कविता को मत दीजिए । यहां गाना सुनना हो तो लता मंगेशकर हैं , मोहम्मद रफी हैं, किशोर कुमार हैं । हम उनको सुन लेगें। आप तो कविता पढ़िए ,गाईये नहीं । 

तो ये कविता है ,”नंगी कर लो छाती, दग रही है गोलियां “, आप सीधे वहां चले जा रहे हैं तो वह कविताई हुई । आप में इतना साहस हो तो करिए वरना कोई बात नहीं । उस हुजूम में कविता पढ़कर अगर हम मुगालते में आ जाते हैं कि हमने कविता सिध्द कर ली तो मै कहता हूँ कि इतने साल तक , कविता सिध्द करने की अनथक कोशिश करने के बाद भी 

मै अपने आप को कहता हूँ कि मै कवि यशप्रार्थी हूँ

कविता का गांव बहुत दूर है । कोई दो कदम चल पाता है कोई चार कदम , कोई आठ – दस कदम । जो सिध्द कर ले कविता को वो कवि होता है , कवि का परम पद उसे हासिल होता है । वह जो कविता होती है वह अमरों की वाणी होती है । इसी रुप में हमारे पुराणों ने कविता को प्रतिष्ठित किया था । इसी रुप में मैं समझता हूँ उन कवियों की प्रतिष्ठा होगी जो दरअसल कवि होगें चाहे उन्होनें छंदोबध्द कविता लिखी हो अथवा मुक्त छंद में लिखी हो । इसका निर्णय आज नहीं होगा ,कल भी नहीं होगा ,हमारे जीते जी भी नहीं होगा , वो हमारे मरने के बाद होगा ।

सही कवि अविष्कृत होता है, पुनराविष्कृत होता है , बार बार पढ़ा जाता है इंटरप्रेट किया जाता है। समझा और समझाया जाता है वह फिर खारिज भी कर दिया गया तो उसके गुणों की खोज होती है, वह फिर स्थापित होता है। इस प्रकार कविता होती है ।

सन 1971 की बात है । मैं रायपुर में था बाबा नागार्जुन वहाँ आए थे । आते थे तो रम जाते थे । यदा कदा वो मेरे घर भी आने के कृपा करते थे । एक दिन वो आए तो बातचीत होने लगी तो उन्होनें विव्हल स्वर में कहा – ‘’ यार बहुत कविता लिखी । अब मेरा मन हो रहा है मै दोहा और सोरठा में कुछ लिखूं अगर दोहा और सोरठा सध जाए तो मैं समझूं कि हां कविता सधी । ‘’ यानी छोटी ज़मीन लेकर के अगर आप अपनी बात पूरी की पूरी कह सकें यह सामर्थ्य आप में आ गया । कवि कैसे अपने आपको , अपने सामर्थ्य को तौलता है ,अपने पंखों से लंबी उड़ानें भरता है । तो नागार्जुन ने कहा “मैं कुछ दोहा लिख रहा हूँ “उन्होनें कृपापूर्वक मेरी डायरी में पांच दोहे , ‘ दोहा पंचक ‘ लिखकर दिए उनमें से एक है-

जले ठूंठ पर बैठकर गई कोकिला कूक ।
बाल न बांका कर सकी शासन की बंदूक ।


अब आप देखिए इन कविताओ को मैनें ,आप विश्वास मानिए रहीम से ,तुलसी से , कबीर से, बिहारी से मिलकर देखा, कोई फर्क नहीं उन कवियों की श्रेणी में जाकर पहुंच गया यह कवि । कवि का परमपद हासिल कर लिया ।

कुल मिलाकर यह कि दीर्घ साधना की बात है । आपने गिरिजा कुमार माथुर को पढ़ा होगा । वैसे तो वे मुक्त छंद के कवि हैं लेकिन उनका वह गीत लाजवाब हैं –

“छाया मत छूना मन
दुख होगा दूना मन”


बहुत प्यारा गीत है ।

वैसे ही निराला का गीत-

“बांधों न नाव इस ठांव बंधु
पूछेगा सारा गांव बंधु “

‘ तो यूं लिखिए आप । सर माथे उठाएंगे हम आपको ,हम आपकी जय जयकार करेगें । हम आपकी पालकी लेकर अपने कंधों पर ढोएंगें। ऐसा लिखिए नहीं तो ठीक कहा आपने कुकुरमुत्ते तो जैसे एक फसल देतें है फिर खत्म हो जाते हैं । जो सर्वाइव करता है वही कवि बनता है शेष जैसा कि मैनें कहा कवि यशप्रार्थी ही होते हैं तो किसी को पोजीशन देने की बात नहीं है अंतिम रुप से किसी निर्णय पर पहुंचने की भी बात भी नहीं है ।

आज दरअसल कविता , जैसे एक बेहद कठिन तिलिस्म तोड़ने जैसी है । जिस तिलिस्म को तोड़ने की कोशिश हजारों साल से लोग कर रहें है । कोई किस्मत वाला हुआ जिसके हाथ चाबी लग गई इस तिलिस्म की तो यह मुमकिन है कि एकाध दरवाजा खुल गया । कोई मणि – मणिक मिल गया वरना कोई बात नहीं वह संतोष कर ही सकता है कि मैनें कोशिश तो की । मेरी किस्मत में नहीं है उस तिलिस्म को तोड़ना इसलिए मैं वापस लौट आया ।

(स्व. प्रमोद वर्मा जी का यह व्याख्यान आपको कैसा लगा .इस पर आपके विचार सादर आमंत्रित हैं)

प्रस्तुति और कॉपी राईट - शरद कोकास 

सोमवार, 13 जुलाई 2009

लन्दन में कवि-गोष्ठी ऐसे होती है.

प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान की ओर से रायपुर छत्तीसग में 10 एवं 11 जुलाई 2009 को हिन्दी के महत्वपूर्ण आलोचक ,नाटककार,कवि और शिक्षाविद डॉ.प्रमोद वर्मा की स्मृति

में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया इस अवसर पर यहाँ प्रस्तुत है दुर्ग ज़िला हिन्दी साहित्य समिति के तुलसी जयंती के कार्यक्रम में 10 वर्ष पूर्व श्री प्रमोद वर्मा द्वारा दिए गए व्याख्यान का लिप्यांतर प्रमोद जी यहाँ तुलसी पर व्याख्यान देने आये थे लेकिन कुछ मू लोगों द्वारा कविता में गद्य की घुसपैठ व्यर्थ है, या छन्दबद्ध कविता ही असली कविता है और मंच के लोकप्रिय कवि ही असली कवि हैं , जैसे निरर्थक प्रश्न उछाले गये , फलस्वरूप प्रमोद जी को तुलसी पर अपना भाषण स्थगित कर उनके प्रश्नों के उत्तर में यह समाधान प्रस्तुत करना पड़ा उनका यह व्याख्यान उनके तेवर और भाषा पर अधिकार की बानगी स्वरूप जस का तस , तीन किश्तों में ब्लॉग ‘आलोचक’ पर प्रस्तुत किया जा रहा है इस व्याख्यान का ध्वन्यांकन से लिप्यांकन किया है शरद कोकास ने । इस व्याख्यान को मई 2001 के ‘अक्षरपर्व’ में श्री ललित सुरजन ने प्रकाशित किया था ,साभार प्रस्तुत है दूसरी किश्त

गद्य में रिदम,तुलसीदास और
प्रेमचन्द की लोकप्रियता,मुक्तिबोध की जनस्वीकृति, ,नीरज की साहित्यिक स्वीकृति और गुलशन नन्दा की बिक्री,जैनेन्द्र की भैंस, लन्दन की कवि गोष्ठी - 

दूसरी बात ,मैं आपसे कहता हूँ क्या गद्य में रिदम नहीं होता ? क्या बोलते हुए,सामान्य बोलचाल की भाषा में , जैसा हम बोलते हैं उसमें यति और गति नहीं होती क्या ? हम कभी मन्द स्वर में ,कभी मध्य में कभी तार सप्तक में नहीं बोलते क्या? हमारे बोलने में ये उतार –चढ़ाव नहीं आया करते क्या,हममें से हर एक आदमी अपनी-अपनी तरह से नहीं बोलता? भाषा के साथ तो है ही यह बात । तो कुल मिलाकर यदि आप कहें कि प्रोज़ में रिदम नहीं होता तो मैं इस बात को नहीं मानता ।

कविता में जो रिदम है वह उसके भावों का रिदम है,वह गतिमयता हैतो इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आप मात्रिक छन्द लिख रहे हैं,तुकांत लिख रहे हैं या अतुकांत लिख रहे हैं । संस्कृत में तो तमाम कवितायें अतुकांत हैं । तुकांत कविताओं की प्रगति तो हिन्दी ,उर्दू, और इधर की अन्य भाषाओं की कविता में है । ब्रह्म की परिभाषा नहीं हो सकती, ईश्वर क्या है यह नहीं जान सकते तो कविता को कैसे परिभाषित करेंगे ? तो कविता को अपरिभाषित ही रहने दीजिये ।इन चीज़ों का निर्णय नहीं होगा फिलहाल और ये बहस चलती रहेगी ।

अब नीरज और मुक्तिबोध को ही लीजिये । एक को साहित्य में स्वीकृति नहीं मिली,दूसरे को जनस्वीकृति नहीं मिली । मुक्तिबोध को जनस्वीकृति नहीं मिली नीरज को साहित्यिक स्वीकृति नहीं मिली ।मैं आपसे पूछता हूँ कौनसा लेखक आज सबसे ज़्यादा पढ़ा जाता है ? 

प्रेमचंद और गुलशन नंदा 

एक ज़माने में गुलशन नन्दा बहुत बड़े लेखक थे । एक संस्करण उनका निकलता था पाँच लाख प्रतियाँ उसकी बिक जाती थीं । तीन बरस बाद आप उसे ढूँढिये नहीं मिलती थी । तीन बरस क्या छह माह बाद नहीं मिलती थी । प्रेमचन्द के कितने संस्करण निकले होंगे ज़रा सोचिये आप । 1920-21 से लिख रहा है जो लेखक और जो आज भी खरीदा,पढ़ा और पढ़ाया जा रहा है,उसकी कितनी कापियाँ बिकी होंगी । 

तुलसीदास और मंचीय कवि 

सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला कवि ,तुलसीदास है । बावज़ूद इसके हम में से बहुत से कवि मंच में एक-एक लाख में कविता पढ़ जाते हैं कौन अधिक लोकप्रिय है ? लोकप्रियता की कसौटी दर असल क्या है कि आप एक साल में एक लाख पाठकों द्वारा पढ़ लिये गये या एक लाख श्रोताओं द्वारा सुन लिये गये या कि आप सौ साल दो सौ साल पाँच सौ साल या हज़ार साल तक पढ़े और सुने जाते रहे । कौन ज़्यादा लोकप्रिय है ?

तो ये बड़े हवाई शब्द हैं ।इनके कोई मायने नहीं हैं । मुक्तिबोध को जन स्वीकृति मिली हुई है । कौन जन किस जन की बात कर रहे हैं ? वो जन ? आज़ादी के पचास साल बाद भी शर्म नहीं आती हम को स्वीकार करते हुए कि बावन प्रतिशत भारतीय निरक्षर हैं और जो साक्षर हैं उनमें से कितने वास्तविक तौर पर शिक्षित हैं ..यह तो छोड़िये बड़ी बड़ी डिग्रियाँ हासिल करने वालों को भी मैं मात्र साक्षर मानता हूँ ..यह ऐसे लोग हैं । 

अकल बड़ी की भैंस 

जैनेन्द्र जी से किसीने पूछा था जैनेन्द्र जी यह बताइये अकल बड़ी की भैंस ? जैनेन्द्र जी ने छूटते ही यह प्रश्न किया कि पहले यह बताओ मुझे कि किसकी अकल और किसकी भैंस ? अगर तुम ये कहोगे कि तुम्हारी अकल और मेरी भैंस तो मैं कहूंगा , जैनेन्द्र की भैंस बड़ी है । कुल मिलाकर ये कि किसकी स्वीकृति ?

लन्दन में कवि गोष्ठी कैसे होती है 

लन्दन के एक अखबार में पढ़ा कि अमुक अमुक गार्डन में एक कवि गोष्ठी होने वाली है ,जिसमें टिकट लेकर सब आमंत्रित हैं । मैड्रिड पोएटिक सोसायटी की ओर से थी गोष्ठी ,सो टिकट ली और चले गये ।अद्भुत था वहाँ । हर महीने वह गोष्ठी होती थी जिसमें सौ-दो सौ कविता प्रेमी इकठ्ठे होते थे ।टी.वी.और बी.बी.सी. के तीन अच्छे उद्घोषक आमंत्रित होते थे जो उस महीने छपी श्रेष्ठ्तम पाँच –पाँच कविताओं का पाठ करते थे ।उसके बाद तीन आमंत्रित कवि अपनी कविताओं का पाठ करते थे ।

तो कुछ लोगों को मालूम हुआ कि यह भारतीय आया है , यह भी कवि है । अब यह ब्राउन चेहरा तो वहाँ अलग से पहचान लिया जायेगा , तो उन्होने हमारा परिचय-वरिचय दिया और जब कॉफी ब्रेक हुआ तो उन्होने पूछा “ आपके यहाँ काव्यपाठ होता है? “ “हाँ” मैने कहा “हमारे यहाँ तो काव्य पाठ की काफी पुरानी परम्परा है ,अभी भी पच्चीस तीस हज़ार लोगों की भीड़ इकठ्ठी होती है, सुनने के लिये । बहुत कविता प्रेमी है हमारे यहाँ । “ 

तो उन्होने कहा “आइ वुड सिम्पली लाइक टू रीड माई पोयम देयर । “ “ना” मैने कहा “यू विल बी डिसअपांइटेड “आप अपनी कविता वहाँ नहीं पढ़ेंगी क्योंकि वहाँ जो भीड़ इकठ्ठी होती है वह मज़े लूटने के लिये इकठ्ठी होती है । कविता का रसास्वादन करने के लिये इकठ्ठी नहीं होती ।इसलिये हम मुगालते में ना रहें कि कविता के रसिक वहाँ उपास्थित हैं । पुराने ज़माने में यह होता था 

(प्रस्तुतकर्ता- शरद कोकास)

नीरज के बारे में जानने के लिए यहाँ फ़ोटो पर क्लिक करें और फिर वापस पुनः ब्लाग  पर आएं 



बुधवार, 8 जुलाई 2009

नीरज यूँ ही साहित्य में अचर्चित नहीं रह गये




प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान की ओर से रायपुर छत्तीसगढ़ में 10 एवं 11 जुलाई 2009 को हिन्दी के महत्वपूर्ण आलोचक ,नाटककार,कवि और शिक्षाविद डॉ.प्रमोद वर्मा की स्मृति में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया है । इस अवसर पर यहाँ प्रस्तुत है दुर्ग ज़िला हिन्दी साहित्य समिति के तुलसी जयंती के कार्यक्रम में 10 वर्ष पूर्व श्री प्रमोद वर्मा द्वारा दिए गए व्याख्यान का लिप्यांतर ।

प्रमोद जी यहाँ तुलसी पर व्याख्यान देने आये थे लेकिन कुछ मूढ़ लोगों द्वारा कविता में गद्य की घुसपैठ व्यर्थ है, या छन्दबद्ध कविता ही असली कविता है और मंच के लोकप्रिय कवि ही असली कवि हैं , जैसे निरर्थक प्रश्न उछाले गये , फलस्वरूप प्रमोद जी को तुलसी पर अपना भाषण स्थगित कर उनके प्रश्नों के उत्तर में यह समाधान प्रस्तुत करना पड़ा ।

उनका यह व्याख्यान उनके तेवर और भाषा पर अधिकार की बानगी स्वरूप जस का तस , तीन किश्तों में ब्लॉग ‘आलोचक’ पर प्रस्तुत किया जा रहा है । 

इस व्याख्यान का ध्वन्यांकन से लिप्यांकन किया है शरद कोकास ने । इस व्याख्यान को मई 2001 के ‘अक्षरपर्व’ में श्री ललित सुरजन ने प्रकाशित किया था ,साभार प्रस्तुत है प्रथम किश्त ।

कविता में गद्य की उपस्थिति-एक 

कविता में गद्य की उपस्थिति के सन्दर्भ में मेरा यह कहना है कि गद्य और पद्य आपस में गड्डमड्ड नहीं होना चाहिये । गद्य और पद्य के उचित मेल से ही कविता तेजस्विनी होती है । छायावाद के युग में अगर प्रेमचन्द और रामचन्द्र शुक्ल जैसे बड़े गद्यकार नहीं होते तो उस युग में बीस बरस के भीतर खड़ी बोली की कविता ने प्रसाद और निराला जैसे महाकवि न दे दिये होते । उनकी चुनौती प्रेमचन्द और रामचन्द्र शुक्ल जैसे लोग हैं । अब गद्य और पद्य के बीच मुठभेड़ तो होनी ही है ,कैसे आप सीमा रेखा खींच देंगे इन दोनो के बीच । गद्य ,पद्य में घुसता ही जायेगा जैसे कि पद्य गद्य में घुसता जा रहा है ।

आज की कहानियाँ उठाकर देखिये आप ।आज जिसे आप ललित निबन्ध कहते हैं और मुग्ध होते हैं क्या है वह ललित निबन्ध ? वह ललित निबन्ध है गीत/कविता और विचार इन दोनों के बीच कहानी । गीत/कविता,कहानी और वैचारिक गद्य इन तीनों का एक समूचा सा रूप है, ,विधा है ललित निबन्ध । यह तो सम्भव है ही नहीं कि इनमे आप कम्पार्टमेंटलाइज़ेशन कर देंगे ,गद्य को आप अलग कर देंगे,कविता को आप अलग कर देंगे यह सम्भव ही नहीं है । रही बात छन्द की तो मैं आपसे पूछता हूँ इसे मुक्त छन्द कहा गया है ,छन्द है उसके आगे । तो अगर यह छन्द है तो उसमें आपको आपत्ति क्या है ?

दिवसावसान का समय मेघमय आसमान से
उतर रही वह सन्ध्या सुन्दरी परी सी
सीधी रेख धीरे – धीरे
तिमिरांचल में चंचलता का नहीं कहीं आभास


या जिस कविता को विरूपित कर डॉ.त्रिलोकीनाथ आगे बढ़ गये....(प्रश्न उछालकर हॉल से बाहर चले गये )
( दुर्ग के मानस भवन में यह कार्यक्रम चल रहा था जब डॉक्टर त्रिलोकी नाथ क्षत्रीय  एक प्रश्न पर बाहर चले गए उस पर डॉ प्रमोद वर्मा जवाब दे रहे हैं)

अगर मै तुमको लगाती सांझ के नभ की
अकेली तारिका अब नहीं कहता
या शरद के भोर की कोई टपकी कली चम्पे की
नहीं कारण कि मेरा हृदय उथला या के सूना है
या कि मेरा प्यार मैला है
बल्कि केवल यही ये उपमान मैले हो गये

देवता इन प्रतीकों के कर गये हैं कूच...


क्या इस कविता में लय नहीं है ? या यह पढ़ी नहीं जा सकती ? या याद नहीं की जा सकती ? और याद करने की.. मैं कहता हूँ ज़रूरत भी क्या है ? अब तो किताबें उपलब्ध हैं ,आप रख लीजिये रैक में और पढ़ लीजिये । अब नहीं है वो ज़माना कि आप चार वेद को याद करके चतुर्वेदी कहलाएँ या दो वेद को याद करके दुबे कहलाएँ । कतई इस बात की ज़रूरत नहीं है । 

और एक बात पूछना चाहता हूँ अपने उन मित्रों से जो छन्द की वकालत करते हैं ।

आपने कभी यह सोचने की या यह तलाश करने की कोशिश की है कि खड़ी बोली कविता का औरस छन्द क्या है ? हर भाषा का अपना एक औरस छन्द हुआ करता है ,या कई औरस छन्द हुआ करते हैं । जिन कवियों की फेहरिस्त एक साहित्यकार ने गिना दी उनमें से किन कवियों ने छन्दों के इतने विविध प्रयोग किये हैं । 

सबसे अधिक छन्दों के प्रयोग अगर हिन्दी में किसी ने किये हैं तो वो कवि है निराला जिसने मुक्तछन्द की रचना की । 

निराला से अधिक छन्दों के विविध प्रयोग किसी कवि ने नहीं किये । इन गीतकारों ने , जिन की बात की जाती है क्या किया है ? खड़ी बोली हिन्दी जो है उसका मिज़ाज़ ही कुछ अलग है । वैसे तो उर्दू और हिन्दी दोनों एक ही स्त्रोत से निकली हुई हैं लेकिन आप देखिये कि दोनों के मिज़ाज में कितना फर्क है । उर्दू में जो छन्द है वो वज़न का छन्द है । अवधी में आप पढ़ कर देखिये । र्ह्स्व को दीर्घ ,दीर्घ को र्ह्स्व पढ़ने की सुविधा इन भाषाओं ने आपको दे रखी है । खड़ी बोली ये आज़ादी आपको नहीं देती । जैसा आपने लिखा है वैसा आपको पढ़ना है । तब आपको छन्द निजात देता है ।

आज का औरस छन्द क्या है इस बात की सबसे गम्भीर चर्चा आज से सत्तर-अस्सी साल पहले हुई थी । आज के गीतकार इस बात की चर्चा क्यों नहीं करते मेरी समझ में नहीं आता । पंत और निराला में इस बात की चर्चा हुई थी कि हिन्दी का औरस छन्द क्या है ? कवित्त है या रोला है ।पंत जी कहते थे कि रोला है और ये कहते थे कि कवित्त है ।
इस शिद्दत के साथ खड़ी बोली के जातीय छन्द को पकड़ने की,जो उसके मिज़ाज के अनुरूप है ,जो उसके उच्चारण के अनुरूप है खोजने की कोशिश कहाँ हुई है ? कुछ कोशिश बच्चन ने की थी । नीरज ने क्या किया है भाई ? नीरज यूँ ही साहित्य में अचर्चित नहीं रह गये । उनके अचर्चित रहने के कुछ कारण हैं ।अगर छन्द की दिशा में उन्होने इतने विविध प्रयोग कर लिये होते , हिन्दी को उसका औरस छन्द दे दिया होता तो मुमकिन है नीरज का नाम भी आ जाता । तो इस बात की आप लोग शिद्दत से कोशिश कीजिये । (जारी)




प्रस्तुति : शरद कोकास

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ललित सुरजन
lalit surjan










मंगलवार, 7 जुलाई 2009

प्रियंकर पालीवाल ने कहा


"हिन्दी कविता की समृद्ध परम्परा का मूल्यांकन करने में आलोचना असफल रही है . आलोचक नये कवियों पर लिखने से बचते रहे हैं उदासीनता और उपेक्षा का एक विराट सन्नाटा पसरा है जहाँ न्याय और अन्याय के प्रश्न बेमानी हैं .सवाल तो यह है कि आलोचकों के उदासीन रवैये पर दुखी कवि मित्रों ने स्वयं कितना साथियों पर लिखा है .मूल्यांकन तो बहुत बडा शब्द है.हिन्दी के बडे आलोचक अपनी बडी भूलों के लिये भी जाने जाते हैं."


(युवा आलोचक प्रियंकर पालीवाल का यह कथन साहित्यिक पत्रिका'समकालीन सृजन'(सम्पादक मानिक बच्छावत) के कविता अंक 'कविता इस समय ' से साभार,अपने कवि मित्रों और आलोचकों की प्रतिक्रिया के लिये .श्री प्रियंकर पालीवाल फेसबुक पर भी उपलब्ध हैं उनसे भी हम सम्वाद की अनुमति चाहते हैं)


आपका शरद कोकास