गुरुवार, 23 सितंबर 2010

प्रो. मैनेजर पाण्डेय को जन्मदिन की शुभकामनायें 23 सितम्बर


" मैं ‘ शब्द और कर्म ‘ के साथ ‘ साहित्य और इतिहास दृष्टि ‘ लेकर हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में आया "

प्रो मैनेजर पाण्डेय बता रहे हैं कि वे आलोचना के क्षेत्र में कैसे आए । प्रो मैनेजर पाण्डेय से महावीर अग्रवाल द्वारा लिए गए साक्षात्कार का एक अंश साहित्यिक पत्रिका ‘ सापेक्ष ‘ से साभार ।
महावीर अग्रवाल : अपनी रचना प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए बताइये की आपकी आलोचना के क्षेत्र में रुचि कैसे जागृत हुई ? आप कब से यह कार्य कर रहे हैं ? इस क्षेत्र को आपने क्यों चुना ?
प्रो मैनेजर पाण्डेय : आलोचना में रुचि आलोचना पढ़ते पढ़ते ही जगी । मैंने अपने छात्र जीवन में जिन आलोचकों को विशेष रूप से पढ़ा था उनमें आचार्य रामचंद्र शुक्ल , हजारी प्रसाद द्विवेदी , रामविलास शर्मा ,नन्ददुलारे वाजपेयी प्रमुख थे । एक तरह से इन आलोचकों की आलोचनाओं में निहित और व्यक्त अन्तर्विरोधों के बारे में सोचते हुए ही मुझे आलोचना के क्षेत्र में काम करने की प्रेरणा मिली । मैं उस समय अपनी पी एच डी के लिए ‘ भक्ति आंदोलन और सूरदास ‘ पर काम कर रहा था । मैंने अपना पहला आलोचनात्मक लेख ‘ भक्ति काव्य की लोकधर्मिता ‘ लिखा था जो डॉ त्रिभुवन सिंह द्वारा सम्पादित ‘ साहित्यिक निबंध ‘ नामक पुस्तक में 1968 में छपा था ।
            उस समय प्रगतिशील लेखक संघ कम सक्रिय था लेकिन बनारस में प्रगतिशील लेखक बहुत सक्रिय थे । मैं बनारस के प्रगतिशील लेखकों की गोष्ठियों में भाग लेते हुए अपने विचारों को व्यवस्थित और विकसित कर रहा था । यह मेरी आलोचनात्मक चेतना के निर्माण का आरंभिक दौर था ।बाद में मैं 1971 में जोधपुर विश्वविद्यालय पहुँचा जहाँ डॉ नामवर सिंह पहले से मौजूद थे । वहाँ उनके साथ विभिन्न साहित्यिक प्रश्नों पर बातचीत करते हुए मैं आलोचना के क्षेत्र में बहुत अधिक सजग रूप से सक्रिय होने की कोशिश करने लगा । उस समय नामवर सिंह के सम्पादन में निकलने वाली पत्रिका ‘ आलोचना ‘ में मेरे लेख छपने लगे । 1975 में मैं सतना के प्रगतिशील लेखक सम्मेलन में शामिल हुआ था जिसमें परसाई जी भी मौजूद थे । उसमें मैंने एक लेख ‘ साहित्य के नये सौन्दर्यशास्त्र की ज़रूरत ‘ पढ़ा था जो बाद में पहल में प्रकाशित हुआ था ।
            उस समय मैं मुक्तिबोध के आलोचनात्मक लेख से परिचित हुआ था । बाद में मैंने साहित्य के इतिहास दर्शन के क्षेत्र में काम करना शुरू किया और ‘ आलोचना ‘ पत्रिका में साहित्य व इतिहास दर्शन से संबन्धित चार लेख छपे , जिन्हे पाठकों ने बहुत पसन्द किया । वे लेख मेरी पुस्तक “ साहित्य व इतिहास दृष्टि में हैं । उसी बीच मेरे लेख विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में छपे थे वे ‘ शब्द और कर्म ‘ नामक मेरी पुस्तक मे संकलित हैं । इस तरह मैं ‘ शब्द और कर्म ‘ के साथ ‘ साहित्य और इतिहास दृष्टि ‘ लेकर हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में आया ।

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

"समुद्र चांद और मैं .". मैं यानि कवि अशोक सिंघई

अशोक सिंघई का पाँचवाँ काव्य संग्रह
 ‘समुद्र, चाँद और मैं’ लोकार्पित
विगत दिनों शीर्ष कवि व समर्थ समालोचक डॉ0 केदार नाथ सिंह भिलाई आये थे । 75 वर्षीय केदार जी अपनी 90 वर्षीय माता जी से मिलने  कोलकाता जा रहे थे , बीच में थोड़ा सा समय मिला तो छत्तीसगढ़ के मित्रों से मिलने के लिये ठहर गये ।  इस अवसर पर उनका काव्यपाठ हुआ और दुर्ग- भिलाई के मित्रों ने समकालीन कविता पर उनसे बातचीत की । इसी दिन केदार जी को शलाका सम्मान दिये जाने की भी घोषणा हुई थी ।जब उन्हे इस बात की बधाई  हम लोगों ने दी तो उन्होने कहा कि इस घोषणा से ज़्यादा प्रसन्नता मुझे आप लोगों से मिलने की है । केदार जी लगभग दो दिन यहाँ रहे , हम लोगों के साथ घूमते-फिरते रहे ,गपियाते रहे ।  
 
                       केदार जी ने  इस अवसर पर लिट्ररी क्लब, भिलाई इस्पात संयंत्र के अध्यक्ष व राजभाषा प्रमुख श्री अशोक सिंघई के मेधा बुक्स, नई दिल्ली से प्रकाशित पाँचवें काव्य संग्रह ‘समुद्र, चाँद और मैं’ का लोकार्पण ‘सिंघई विला’ में किया। इस सादे किन्तु गरिमामय आयोजन की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध गाँधीवादी चिन्तक व कानूनविद् श्री कनक तिवारी ने की। प्रसंगवश अशोक सिंघई के पहले प्रकाशन प्रदीर्घ कविता ‘अलविदा बीसवीं सदी’ का लोकार्पण फरवरी, 2000 में विश्व पुस्तक मेला में एवं तीसरे काव्य संग्रह ‘सम्भाल कर रखना अपनी आकाशगंगा’ का भी लोकार्पण छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में नवम्बर, 2004 में प्रख्यात साहित्यकार स्वर्गीय श्रीकान्त वर्मा एवं कीर्तिशेष सम्पादक, कवि व उपन्यासकार गुलशेर अहमद शानी की स्मृति में आयोजित ‘कविता की पंचाट‘ में श्री केदार नाथ सिंह ने ही किया था।
 
श्री केदार नाथ सिंह ने अशोक सिंघई को अपना प्रिय कवि बताते हुये कहा कि प्रगतिशील चेतना से युक्त अशोक उन विरले कवियों में से हैं जिनकी नई कविता में दुर्लभ लयात्मकता है। हिंदी की नई कविता में एक खास तरह की गीतात्मकता को इन्होंने बचाये रखा है। ये उम्र में मुझसे बहुत छोटे हैं, अतः इनके पास अभी साहित्य में सक्रिय बने का वक्त है और क्षमता भी। ये साहित्य में कार्यरत रहें, जीवन में यह मेरी कामना है ।
 
                      अध्यक्षीय वक्तव्य में श्री कनक तिवारी ने कहा कि ‘समुद्र, चाँद और मैं’ मुझे आकर्षित करता है और अँग्रेज़ी का मेरा सर्वाधिक प्रिय कवि कालरिज़ बरबस मुझे याद आता है जिन्होंने सागर पर सर्वश्रेष्ठ कवितायें विश्व साहित्य को दी हैं। चाँदनी रात में समुद्र के किनारे मनुष्य रूमानी हो जाता है पर अशोक अपनी ऐसी बौद्धिकता को बचाये रखते हैं जो भावुकता से पगी रहती है। अशोक का यह सौभाग्य है कि उन्हें केदारजी प्राप्त होते रहते हैं। अमूमन कवि अपने क्लाईमेक्स में मर जाता है पर केदारजी के साथ यह नहीं है, अशोक के साथ भी यही घटे, मेरी शुभकामना है।

                              इस अवसर पर भिलाई-दुर्ग के साहित्यकारों ने कवि केदार को 23 मार्च को प्राप्त होने वाले शलाका सम्मान की बधाई दी तथा उनके दीर्घ व कीर्तिमय जीवन की शुभकामनायें भी दीं। युवा कवि श्री शरद कोकास ने लोकार्पण कार्यक्रम का संचालन किया व इस्पातनगरी भिलाई के साहित्यकारों की ओर से श्री केदार नाथ सिंह का भिलाई पधारने पर और इस आत्मीय आयोजन में उनके तथा समस्त साहित्यकारों के प्रति समय देने के लिये आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर सापेक्ष के संपादक श्री महावीर अग्रवाल, डॉ0 सियाराम शर्मा, डॉ0 तीर्थेश्वर सिंह, प्रलेस अध्यक्ष श्री लोकबाबू, शायर मुमताज़, कवयित्री श्रीमती पुष्पा तिवारी, वरिष्ठ पत्रकार श्री अजय पाण्डेय आदि संस्कृतिकर्मी उपस्थित थे।

रपट - शरद कोकास    

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

हम शिविर में कवि-कथाकार बनाते हैं


छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का युवा रचना शिविर


यह माना जाता है कि कवि – कथाकार व कलाकार जन्मजात होते हैं । लेकिन ऐसा नहीं है । एक रचनाकार बनने के लिये साधना करनी पड़ती है और विधिवत अध्ययन करना पड़ता है । यह न भी किया जाये तो कवि को कवि बनने से कोई रोक नहीं सकता लेकिन उसकी रचना में परिपक्वता आने में समय तो लग ही जाता है । इस उद्देश्य को ध्यान में रख कर हमारे देश के विभिन्न लेखक संघों और साहित्य सम्मेलनों द्वारा लेखक शिविर या रचना शिविर आयोजित किये जाते रहे हैं । स्व. मायाराम सुरजन जी के प्रयासों से मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा 27-28 वर्ष पूर्व यह परम्परा प्रारम्भ की गई थी । इस शिविर का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इस बहाने वरिष्ठ और अनुभवी लेखक नवोदित रचनाकारों के साथ मिल बैठकर बात करते हैं । इन शिविरों में रचना के हर पहलू पर बातचीत होती है ।
हिन्दी के कई ब्लॉगर एवं लेखक इन्ही शिविरों में भाग ले चुके हैं जिनमें फिलहाल तो मुझे कुमार अम्बुज , शरद कोकास गिरीश पंकज और वन्दना अवस्थी दुबे का नाम याद आ रहा है । शमशेर बहादुर सिंह , हरिशंकर परसाई , हबीब तनवीर , डॉ. मलय , डॉ.कमला प्रसाद , भगवत रावत, राजेश जोशी , उदय प्रकाश ,राजेन्द्र शर्मा ,धनंजय वर्मा जैसे वरिष्ठ रचनाकारों ने विषय विशेषज्ञों के रूप में इन शिविरों में अपनी भागीदारी दर्ज की है ।
 
म.प्र .हिन्दी साहित्य सम्मेलन के बाद अब छत्तीसगढ़ प्रदेश साहित्य सम्मेलन ने भी इस परम्परा को पुन: प्रारम्भ किया है और आगामी 4 मार्च से 7 मार्च 2010 तक दुर्ग ज़िले के बालोद जनपद में ऐसा ही एक रचना शिविर आयोजित किया जा रहा है । सम्मेलन के महामंत्री रवि श्रीवास्तव ,तथा प्रबन्ध मंत्री राजेन्द्र चांडक ने यह जानकारी दी है कि इस शिविर में 40 युवाओं को आमंत्रित किया जायेगा । इन प्रतिभागियों के नाम विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से आमंत्रित किये जा रहे हैं ।
 
इस शिविर में जो युवा भाग लेना चाहते हैं उनकी आयु 30 वर्ष से अधिक नहीं होना चाहिये । यह ज़रूरी है कि वे कम से कम एक-दो साल से लिख रहे हों और उनमें आगे बढ़ने की सम्भावना और इच्छा हो । दुर्ग से 50 किलोमीटर दूरी पर स्थित बालोद तक उन्हे स्वयं के व्यय से आना होगा । शिविर में चार दिनों तक भोजन एवं आवास की व्यवस्था सम्मेलन द्वारा की जायेगी । उन्हे शिविर में एक अनुशासित प्रशिक्षार्थी की तरह रहना होगा और शिविर के नियमों का पालन करना होगा ।

श्री चांडक ने बताया कि इस शिविर में वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना , कथाकार डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव , वरिष्ठ कवि एवं “देशबन्धु” के प्रधान सम्पादक ललित सुरजन , कवि रवि श्रीवास्तव , सहित देश के अन्य साहित्यकार भी नवोदित रचनाकारों के साथ रहकर उन्हे मार्गदर्शन देंगे । इस शिविर में रचना प्रक्रिया पर लेख और चर्चा के सत्र होंगे , समूह चर्चा होगी , समकालीन मुद्दों पर बातचीत होगी , जाने –माने लेखकों की रचनाओं का विश्लेषणपरक अध्ययन होगा , रचना के तत्व, रचनाकार की आंतरिक स्वतंत्रता , रचना की भाषा , कल्पना व बिम्बों का प्रयोग जैसे विषयों पर चर्चा होगी साथ ही वरिष्ठ रचनाकारों का काव्य व कहानीपाठ होगा तथा शिविरार्थी युवाओं की रचनाओं पर आत्मीय बातचीत होगी ।
 
यदि आप इस रचना शिविर में भाग लेना चाहते है तो देर न करें ।वरिष्ठ रचनाकारों व ब्लॉगर्स से भी निवेदन है कि वे युवाओं को इस कार्य हेतु निर्देशित करें । श्री राजेन्द्र चांडक से मोबाइल नम्बर 9425207425 या रायपुर स्थित छत्तीसगढ़ प्रदेश साहित्य सम्मेलन कार्यालय के दूरभाष क्रमांक 0771-2292011 पर सम्पर्क करें । ई मेल पता है – info@msfraipur.com
 
मैं अपनी ओर से केवल इतना ही कहना चाहूंगा कि मैने 1984 में ,जबलपुर में सम्मेलन के दस दिवसीय “ कविता रचना शिविर “ में भाग लिया था और उन दस दिनों में जो कुछ मैने पाया उसे दस वर्षों मे भी नहीं पा सकता था । शीघ्र ही इस ब्लॉग पर उस शिविर के अनुभव साथ ही रचना के विभिन्न तत्वों पर अपनी बातें ,और नवोदित रचनाकारों के लिये आवश्यक टिप्स एक लेखमाला के रूप में प्रस्तुत करूंगा ।
 
आपका – शरद कोकास

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

मानक आलोचना वह है जो पाठक को फिर रचना की ओर लौटा दे ।



हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी का आज 16 फरवरी 2010 को भिलाई आगमन हो रहा है । सायं सात बजे कवि अशोक सिंघई के निवास पर दुर्ग-भिलाई के साहित्यकारों के बीच उनका काव्यपाठ आयोजित है । कल 17 फरवरी को प्रात: 11 बजे कल्याण कॉलेज के सभागार में " आज का समय " इस विषय पर उनका व्याख्यान भी होगा  । श्री अशोक वाजपेयी के भिलाई आगमन पर प्रस्तुत है  ' सापेक्ष ' के सम्पादक महावीर अग्रवाल से उनकी बातचीत का एक अंश ,' सापेक्ष " से साभार ।
 महावीर अग्रवाल: आप मानक आलोचना किसे मानते हैं मानक आलोचना का मानदंड क्या होना चाहिये ?
अशोक वाजपेयी : इसके कोई सिद्धांत हमेशा के लिये निर्धारित नहीं किये जा सकते । साहित्य की अन्य विधाओं की तरह आलोचना भी परिवर्तनशील है फिर भी कुछ गुण पहचाने जा सकते हैं ।मानक आलोचना वह है जिसमें साहित्य का अनुराग प्रकट हो ,जिसमें रचना को धीरज और जतन से समझ- बूझ कर पढ़ने का साक्ष्य हो ,जो रचना के अंतर्निहित अभिप्रायों और आशयों को स्पष्ट करने की चेष्टा करती हो जिसमे रचना की विशिष्टता को पहचानने का प्रयत्न हो ,रचना को परम्परा में अवस्थित करने का उत्साह हो , जिसमें अपने पूर्वग्रहों और रचनाकारों के पूर्वग्रहों के तादाम्य या टकराव को स्पष्ट ईमानदारी से स्वीकार किया गया हो और उनके बावज़ूद रचना के रसास्वादन का प्रमाण हो ।
          आलोचक को भी रचनाकार की तरह सामान्यीकरणों से गुरेज करना चाहिये ।आलोचक रचना को उसके व्यापक सांस्कृतिक- सामाजिक सन्दर्भ में तभी रख सकता है जब उसकी उस सन्दर्भ की समझ आश्वस्तकारी हो ,कोई बन्धा-बन्धाया फार्मूला नहीं ।मानक आलोचना वह है जो पाठक को फिर रचना की ओर लौटा दे ।
         ऐसी मानक आलोचना हिन्दी में है । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल,आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय , मुक्तिबोध , निर्मल वर्मा , नामवर सिंह जैसे मूर्धन्यों के अलावा मलयज, विजयदेव नारायण साही , विष्णु खरे , मैनेजर पाण्डेय , नन्दकिशोर नवल , वागीश शुक्ल , रमेशचन्द्र शाह , कुँवर नारायण , पुरुषोत्तम अग्रवाल , कृष्ण कुमार , मदन सोनी आदि ने ऐसी आलोचना लिखी है ।
          श्री अशोक वाजपेयी जी का स्वागत है ,,उनके यह विचार आपको कैसे लगे अवश्य बताइये । कविता पाठ व व्याख्यान की रपट अगली पोस्ट में - शरद कोकास

रविवार, 29 नवंबर 2009

बैलगाड़ी रचना है, गाड़ीवान कवि, आलोचक कुत्ता , तो क्या पाठक बैल है ?

तीसरे आलोचक का वक्तव्य                                                                                                                                                         
           










कुछ समय पूर्व ब्लॉग “साहित्य शिल्पी” में काव्यालोचना के अंतर्गत मेरा एक लेख प्रकाशित हुआ था “ हर कविता तीन स्तरों पर आलोचना से गुजरती है” इस आलेख पर प्राप्त टिप्पणियों की ओर राजीव रंजन जी ने ध्यान आकर्षित करवाया । मेरे बहुत से मित्रों सर्वश्री अनिल कुमार,नंदन, आचार्य संजीव वर्मा , रितुरंजन,तेजेन्द्र शर्मा,दिगम्बर नासवा,अभिषेक सागर,मोहिन्दर कुमार, सुश्री अनन्या,गीता पंडित,तथा किरण सन्धु ने प्रश्नों के माध्यम से अपनी शंकायें प्रस्तुत की थीं । 

यह एक स्वस्थ्य परम्परा है । यह सहज मानवीय स्वभाव है कि मनुष्य को जब तक अपने मानस में उठ रहे प्रश्नों का समाधानकारक उत्तर नहीं मिल जाता वह आगे की किसी भी बात को ग्रहण कर सकने में असमर्थ होता है । वह किसी न इसी माध्यम से उन शंकाओं का ऐसा समाधान चाहता है जो उसकी धारणाओं में परिवर्तन कर सके अथवा उन्हे पुष्ट कर सके। लचीलापन उसके सहज स्वभाव में होता है और अपने विवेकानुसार सही अथवा गलत के बीच भेद कर अपने लिये जो उचित है उसे वह स्वीकार कर लेता है। 

मैने प्रयास किया कि इन प्रश्नों के उचित समाधान प्रस्तुत कर सकूँ ।हो सकता है कि यह प्रश्न अनेक मित्रों के मन में उठ रहे हों इसलिये "साहित्यशिल्पी" पर दिये गये उत्तर को मैं अपने ब्लॉग "आलोचक " पर भी प्रस्तुत करना चाहता हूँ । इसमें मत भिन्नता सहज स्वाभाविक है ।

            अनिल कुमार जी ने कविता के सम्बन्ध में यह आदिम प्रश्न किया है कि कविता को किसी वाद की आवश्यकता क्यों है ? आदरणीय संजीव वर्मा सलिल जी ने भी पूछा है क्या किसी रचना के साथ वाद विशेष या विचारधारा विशेष के प्रतिबद्ध रह कर न्याय किया जा सकता है ? वस्तुत: ‘कविता’ को किसी वाद की आवश्यकता नहीं है । वाद कवि के भीतर होता है और वह यदि इसे अपने जीवन दर्शन में शामिल कर लेता है तो वह उसकी रचना में सहज रूप से आ जाता है । किसी वाद को जानबूझकर कविता में प्रक्षेपित करने का अर्थ कवि द्वारा अपनी मूलभूत पहचान के साथ खिलवाड़ भी हो सकता है । मूलत: यह प्रश्न मार्क्सवाद और कलावाद की बरसों से चली आ रही बहस को लेकर है ।

    कुछ के अनुसार बरसों से चली आ रही यह बहस अब समाप्त हो चुकी है और कुछ के अनुसार यह और तेज हुई है । दर असल कविता में मूल्यों की उपस्थिति से उसका स्थान तय किया जाता है स्वतंत्रता,समता,न्याय जैसे मूल्य उसके लिये अनिवार्य हैं । कवि से यह अपेक्षा की जाती है कि उसकी कविता में मूल्यों के प्रति चिंता और चिंतन दोनों ही हो । वैज्ञानिक दृष्टि की आवश्यकता वर्तमान में सहज अपेक्षित है ।धर्म ,पूंजीवाद और बाज़ारवाद के दुष्परिणामों से कोई अछूता नहीं है अत: कविता में अघोषित रूप से यह सब शामिल हो ही जाता है । कवि की राजनैतिक प्रतिबद्धता भी प्रभाव डालती है । कविता में सौन्दर्य,उदात्तता और कवि के सामाजिक सरोकारों की भी अपेक्षा की जाती है अत: अब केवल वाद को प्रक्षेपित कर रचना करना सम्भव नहीं है।

अनिल जी ने पूछा है कि कविता को कौनसी संस्था मानकीकृत करती है तथा किन पत्रिकाओं में छपनेवाले कवि कहलाते हैं? कविता के मानकीकरण के लिये अभी तक किसी संस्था का गठन नहीं हुआ है जो आई.एस.आई. मार्का कविताओं पर लगा सके । कुछ संस्थायें स्वयम्भू रूप से कविता पर फतवे जारी कर सकती हैं लेकिन यह समाज ही है जो कविता के मानक तय करता है और कालानुसार उनमें परिवर्तन कर सकता है। समाज का प्रशिक्षण समय करता है जो आदिकाल से अब तक जारी है । वैसे ही सिर्फ पत्रिकाओं मे छपने वाले कवि नहीं कहलाते । कवि हर मनुष्य के भीतर होता है उसकी अभिव्यक्ति के माध्यम भिन्न हो सकते हैं। “पाथेर पांचाली” में हवा से हिलते हुए काँस का दृश्य देखिये आपको कैमरे से की गई कविता का आभास होगा ।

कबीर और तुलसी के समय पत्रिकाएं नहीं थीं । तुलसी यदि विनय पत्रिका न भी लिखते तो बड़े कवि कहलाते {यहाँ पत्रिका का अर्थ पत्रिका के वर्तमान में प्रचलित अर्थ मेगजीन या रिसाले से नहीं है } वैसे वर्तमान में पत्रिकाओं की भी अलग राजनीति चल रही है ,लघु पत्रिका,व्यावसायिक पत्रिका,सामाजिक पत्रिका, जैसे अनेक विभाजन हैं । एक समय में अखबार में लिखना कवि की गरिमा के अनुकूल नहीं माना जाता था । खैर इस विषय पर विस्तार से फिर कभी लिखूंगा । आपने पूछा है ऐसे कौनसे कवि हैं जिनकी कवितायें आम आदमी तक पहुंचती हैं।ऐसे बहुत से कवि हैं जो अपने समय में जन जन के बीच लोकप्रिय रहे हैं, बाबा नागार्जुन ,त्रिलोचन,बच्चन, शील कई नाम हैं ।

कवि बिसम्भर यादव ‘मरहा’ कौन हैं जानते हैं ?

हमारे यहाँ दुर्ग मे एक कवि बिसम्भर यादव ‘मरहा’ हैं जो तीन हजार से अधिक कार्यक्रमो में कविता पाठ कर चुके हैं जिनका प्रमाण आयोजक के हस्ताक्षर सहित उनकी डायरियों में दर्ज़ है ।विशेष बात यह कि छत्तीसगढ़ी में कविता पढ़ने वाले यह कवि निरक्षर है और उन्हे अपनी सारी कविताएँ कंठस्थ हैं वे मस्तिष्क में कविता रचते हैं और उन्हें अपने स्मृति भंडार में दर्ज़ कर लेते हैं। डॉ  कमला प्रसाद  जी ने बिसंभर जी को असली जनकवि  कहा था । ऐसे कवि कम हैं जिनकी जटिल कविताएँ भी आम आदमी तक पहुंचती हैं । जटिल कविता को आम आदमी तक पहुंचाने हेतु कवि के भीतर सशक्त पाठ या प्रस्तुतिकरण द्वारा उन्हे सम्प्रेषित करने का गुण होना चाहिये ।

अनिल जी ने पूछा है मुख्यधारा क्या है व इसे कौन निर्धारित करता है ? मेरा मानना है कि मुख्यधारा समय निर्धारित करता है । किसी कवि ,आलोचक ,पत्रिका या संस्था को यह अधिकार नहीं है । यह मुख्य धारा काल सापेक्ष होती है । आज जो लोकप्रिय या चर्चित कवि है आवश्यक नहीं भविष्य में समय के क्षितिज पर सितारे की तरह दैदिप्यमान रहे । आपने सुना भी होगा ‘हुए नामवर बेनिशाँ कैसे कैसे ,ज़मीं खा गई आसमाँ कैसे कैसे’ । अत: मुख्य धारा की परवाह ना करते हुए कवि को अपना कवि कर्म जारी रखना चाहिये ।

संजीव जी ने पूछा है कोई रचना मानकों पर खरी होने के बाद सिर्फ इसलिये हीन कही जाये कि समीक्षक उस में प्रतिपादित विचारधारा से असहमत है । संजीव जी मानकों पर खरी उतरने के बाद रचना हीन कैसे हो सकती है । वैसे दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं का प्रतिपादन करने वाली रचनाओं के मानक समान हो सकते हैं । मेरा मत है कि रचना को यदि पूर्वाग्रह के साथ पढ़ा जायेगा तो यह न केवल रचना और रचनाकार की अवमानना होगी बल्कि आलोचक की बुद्धि पर भी सन्देह किया जायेगा । रचनाकार का जीवन दर्शन,दृष्टि ,अनुभूतियों को कथ्य में परिवर्तित करने की क्षमता, एवं उसकी शिल्पगत विशेषता रचना के भीतर जब प्रस्फुटित होती है तो देश काल के अनुसार मानक स्वयं बनते जाते हैं । इस दृष्टि से किसी भी रचना को श्रेष्ठ या हीन साबित करना उचित नहीं है।

दिगम्बर जी से भी मैं यही कहना चाहूंगा कि आलोचना के लिये मापदंडों का लचीलापन आवश्यक है । आलोचक रचना के लिये पैरामीटर्स या तो स्वयं तय करता है या रचना उसके लिये पैरामीटर्स का निर्माण करती है । यह रचना की ताकत पर भी निर्भर करता है । पूर्वाग्रह से ग्रस्त रहना ना आलोचना के लिये सुखद है ना रचना के लिये ।

संजीव जी ने आलोचना,समालोचना,समीक्षा व व्याख्या मे भेद जानना चाहा है । आलोचना व समालोचना दोनो में मूलभूत कोई अंतर नहीं है । दोनों सैद्धांतिक,व्यावहारिक व विस्तृत होती हैं । सामान्यत: आलोचना का अर्थ केवल निन्दा से तथा समालोचना का अर्थ निन्दा व प्रशंसा दोनों से लिया जाता है लेकिन साहित्य में ऐसा नहीं है । आलोचना व समालोचना दोनो में निन्दा व प्रशंसा शामिल होती है । साहित्य में आलोचना शब्द ही प्रचलन में है । समीक्षा सामान्यत: एक कृति की, एक अवसर (event) की, हो सकती है इसमें निहितार्थ को इंगित (point out) किया जा सकता है । व्याख्या से तात्पर्य विस्तारपूर्वक विश्लेषण से है यह एक ग्रंथ से लेकर एक पंक्ति तक की हो सकती है ।

अंत मे नन्दन जी की शंका जो खेमों में बँट चुकी रचना व आलोचना को लेकर है । रचनाकर्म व आलोचना दोनो के प्रभावित होने का मुख्य कारण यही है कि दोनों ने अपने आपको प्रथम आलोचक मानना छोड़ दिया है , जो मान रहे हैं वे बेहतर रच रहे हैं । तेजेन्द्र जी के विनोद से अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा । तेजेन्द्र जी आलोचक को बैलगाड़ी के नीचे चलने वाले कुत्ते की उपमा दिये जाने का युग शेक्स्पीयर के साथ ही समाप्त हो चुका है । आज आलोचना अपने आप में एक महत्वपूर्ण रचना कर्म है ।

ब्रिटेन की छोड़िये हमारे यहाँ भी कहा जाता था कि असफल कवि आलोचक बन जाता है लेकिन आज देखिये बहुत से महत्वपूर्ण कवि आलोचना के क्षेत्र में हैं । वैसे कुत्ते वाली उपमा में यदि हम बैलगाड़ी को रचना मान लें,गाड़ीवान को कवि,उसके नीचे चलते हुए भौंकने वाले कुत्ते को आलोचक मान लें तो पाठक बैल ही हुए ना । लेकिन सबसे महत्वपूर्ण भी वे ही हैं यदि वे गाड़ी को खींचना बन्द कर देंगे तो बैलगाड़ी,गाड़ीवान और कुत्ता क्या कर लेंगे ? अत: अच्छी रचना का स्वागत करें तथा कवि और आलोचक को अपना काम करने दें ।( चित्र :महावीर प्रसाद द्विवेदी )

--- आपका -शरद कोकास

गुरुवार, 5 नवंबर 2009

नामवर जी पर उठे सवालों के जवाब द्विवेदी जी और अशोक द्वारा




कल उड़न तश्तरी पर समीर भाई के सुभाषित का आनंद ले रहा था कि उनके एक सुभाषित पर नज़र पड़ी ..”प्रशंसा और आलोचना में वही फर्क है जो सृजन और विंध्वस में “ अरे.. मैने कहा यह तो मेरे ब्लॉग के काम की चीज़ है ।

याद आया अभी पिछले दिनों मैने एक पोस्ट में महावीर अग्रवाल द्वारा लिये गये नामवर सिंह के साक्षात्कार का एक अंश प्रस्तुत किया था । पब्लिश होने के बाद जब मैने टिप्पणियाँ देखीं तो एक बेनामी टिप्पणी ।

मेरे तो हाथ पाँव फूल गये ,भई सीधे - सादे आदमी के घर एक अनजान आदमी मेहमान बन कर जबरन आ जाये तो उसकी हालत कैसी होगी बस वही मेरी हालत थी । सोचा टिप्पणी मॉडरेट कर दूँ.. अस्वीकार .. हाँलाकि यह बेनामी पढ़ा-लिखा तो दिखाई देता था और इस बहाने कई लोगो के मन मे उठ रहे प्रश्नों के जवाब भी दिये जा सकते थे ।

पसोपेश में था कि मुझे “ फोन ए फ्रैंड” का विकल्प याद आया सोचा मित्र से सम्वाद कर पूछ लूँ , पता नहीं यहाँ की क्या परम्पराएँ हैं ? क्या पता किसी से गलती से बेनामी वाले बॉक्स मे टिक हो गया हो और वास्तव में वह जानकारी चाहता हो .. उसके प्रश्न देखने से तो ऐसा ही लगता था ...

बेनामी ने कहा…

मुझे तो बिहारी में बहुत रस दिखता है। लगता है मेरी रस की ग्रन्थि सही नहीं है। कुछ सवाल है महोदय.....
1 रस में डुबने के लिये तुलसी के पास जाना पड़ेगा से नामवर जी का क्या तात्पर्य है, क्या इस लोक को छोड़ना पड़ेगा ?
2 आलोचक क्या होता है ? 3. ये मार्क्सवादी आलोचना क्या है? अन्य किस किस तरही की वादी आलोचनायें होती हैं ।

मैने मित्र अशोक कुमार पाण्डेय से सम्पर्क किया । वे टिप्पणी देकर जा चुके थे लेकिन मेरे आग्रह पर फिर लौटकर आये । लेकिन वहाँ देखा तो दिनेशराय द्विवेदी जी पहले ही उस बेनामी की तलाशी ले चुके थे और उसे साफ साफ हिन्दी में समझा चुके थे ..कुछ इस तरह ..

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…


नामवर जी के उपरोक्त वक्तव्य से किसे आपत्ति हो सकती है? उन्हों ने जो कुछ कहा सच कहा। यूँ तो एक बात के अनेक अर्थ समझे जा सकते हैं। चाहें तो बेनामी जी ऊपर जाने के बजाय अपने पास के तुलसी के पौधे तक भी जा सकते हैं या फिर सीरियल वाली तुलसी तक भी। यहाँ तुलसी के पास जाने का अर्थ तुलसी साहित्य पढ़ने से है। मार्क्सवादी आलोचक से है मार्क्सवादी आलोचना से नहीं। खैर, जाकी रही भावना जैसी। वैसे उन की बात से असहमति हो तो यहाँ लिखा जा सकता है। आलोचना का महत्व इस बात से है कि अच्छी और बुरी दोनों तरह की आलोचना लोगों की कृतियों को अधिक पाठकों तक पहुँचाती है। लेकिन बहुत लोग आलोचकों को पसंद ही नहीं करते ।

मैने सोचा बेनामी पढ़ा लिखा भले न हो ,लिखा_पढ़ा , मतलब लेखक प्रजाति का होगा तो द्विवेदी जी की बात समझ जायेगा , लेकिन अशोक जी ने इतनी गम्भीरता से यह समझाया था कि मुझे उन्हे प्रस्तुत करना ज़रूरी लगा , सो लीजिये आप भी पढ़िये बेनामी जी के सवाल के यह महत्वपूर्ण जवाब ।



अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…



वैसे तो बेनामी होकर की गयी बात को गंभीरता से लेने का जी नहीं करता। फिर भी चूंकि सवाल हैं और गम्भीर हैं तो जवाब देना ही है--

1] अब आपकी रस ग्रन्थि के बारे में आप ही फ़ैसला कीजिए। आपने ख़ुद लिखा है कि बिहारी में आपको रस दिखाई देता है। तो यह नामवर जी से अलग क्या है? वह भी शुक्ल जी के हवाले से यही कह रहे हैं कि जिन्हें रस का आस्वादन नक्काशी की तरह (आशय ऊपरी सजावट से है) करना है उसके लिये निश्चित तौर पर बिहारी काफ़ी हैं। लेकिन रस का आस्वादन करना है, उसमें डूबना है उसे कविता के भीतर प्रवेश करना होगा। ऐसे में कविता की आत्मा उसके लिये एक आवश्यक संघटक तत्व है। एक ऐसा आंतरिक सौन्दर्य जो कविता को बहुअर्थी तो बनाता ही है, साथ ही अपने अंतस में एक ऐसा स्पेस बनाता है जहां तक पहुंच कर पाठक कविता के साथ एकाकार होता है। इसके लिये कविता की अपने समय और जन के साथ एक अनन्य सहानूभूति ज़रूरी है। यही विभेद कबीर या तुलसी से बिहारी को अलग करता है।

2) अब आलोचक क्या होता है यह सवाल मुझे तो अजीब लगता है। फिर भी आलोचक अपने समय तथा समाज को समझने वाला ऐसा विशेषज्ञ होता है जो कविता को पुनर्प्रस्तुत करता है। वह अपने समय की कसौटी पर कविता को कसता है। लोग आलोचक को लेकर अक्सर कुछ ज़्यादा ही असहिष्णु होते हैं। अब अगर यह पूछा जाये कि बिहारी हों या कबीर या फिर तुलसी हों अगर उनके अध्येताओं ने आधुनिक समय में उनको फिर से पढकर पुनर्प्रस्तुत और पुनर्व्याख्यायित नहीं किया होता तो क्या केवल स्मृतियों और चन्द पाण्डुलिपियों के भरोसे उनको इस तरह समग्र में पढ पाना संभव होता?

3]मार्क्सवादी आलोचना एक वैज्ञानिक पद्धति के सहारे कविता को समझने तथा व्याख्यायित करने का उन्नत औज़ार है। यह उस भौतिकवादी अवधारणा के आधार पर कविता की व्याख्या करती है जो जीवन की भाववादी अवधारणा को ख़ारिज़ करती है। यानि वह विचार जो मानता है कि कोई इश्वरीय प्रेरणा रचना नहीं करवाती और न ही कोई कवि बन कर पैदा होता है। एक आदमी अपने चतुर्दिक संसार के अनुभवों से सीखता है और इस सामाजिक संपत्ति , ज्ञान और परिवेश जनित संवेदना के सहारे अलग-अलग तरीके से प्रतिक्रिया करता है…कविता उनमें से एक है। आप इस दर्शन की जडें भारतीय दर्शन की परम्परा में तलाश सकते हैं। यह पद्धति भी कविता को कलाकर्म ही मानती है लेकिन साथ ही वह कला के सामाजिक सरोकारों को भी मान्यता देती है।

उदाहरण दूं तो इस मानवविरोधी दौर में अगर एक गीत ऐसा लिखा जाये जो किसानों की आत्महत्या की बात का मज़ाक उडाये और खेती बारी के दुश्मनो की प्रशंसा के गीत गाये ( जैसे गुलामी के दौर में अंग्रेज़ों के समर्थन में लिखे गीत) तो मार्क्सवादी पद्धति का सही आलोचक उसको रेशा-रेशा खोलकर साबित करेगा कि यह गीत ख़ारिज़ करने योग्य है। इसके उलट आत्महत्याओ के संताप से आतुर जो गीत इस हालात को बदलने की बात करेगा उसे यह पद्धति आगे ले आयेगी।

अब मार्क्सवादी आलोचकों ने किया कि नहीं यह एक अलग बात है। इसे लेकर भी तमाम असहमतियां हैं मेरी।

रहा सवाल दूसरी पद्धतियों का तो भाई भाववादी आलोचना की भी एक पद्धति है…आप चाहें तो एक आह-वाह वादी आलोचना भी है…जनविरोधी और दक्षिणपंथी आलोचना पद्धति है…पर ये आपकी तरह बेनामी होके ही आना पसंद करते हैं। देखिये ना प्रतिबद्धता का मतलब मार्क्सवाद से प्रतिबद्धताओं को ही मान लिया जाता है। संघ के और दूसरी विचारधाराओं के हिमायती शायद केवल अवसरवाद से ही संबद्ध होते हैं प्रतिबद्धता से नहीं ।



तो अब तक उन बेनामी जी की समस्या का समाधान हो गया होगा इसलिये वे दोबारा नहीं आये लेकिन अलबेला भाई जाते जाते एक फुलझड़ी छोड़ ही गये ।




AlbelaKhatri.com ने कहा…

साधुवाद इस उम्दा पोस्ट के लिए..........
वैसे कहना नहीं किसी से, अपनी आलोचकों से पटती नहीं है
अरे भाई प्रशंसक जो प्यारे लगते हैं..........हा हा हा

मैं क्या जवाब देता उनका यह गम्भीर मज़ाक हँसाने के लिये ही था सो हँस लिया फिर भी कुछ तो कहना ही था सो ..एकदम सीरियसली कहा ..

शरद कोकास ने कहा…

@अलबेला भाई, आलोचना का अर्थ केवल निन्दा नहीं होता है ,प्रशंसा भी होता है ( विस्तार के लिये पढ़ें अशोक जी का जवाब क्र. 2) वैसे आप भी किसी से कहना नहीं ..लेखक लिखेगा ही नहीं तो आलोचक क्या खाक आलोचना करेगा ..हा हा हा ।

आप भी इसी परिप्रेक्ष्य में अपने मन में उठ रहे सवालों के उत्तर इस सम्वाद में ढूंढिये और अपनी पोस्ट पर मेरी टिप्पणियों का बुरा मत मानिये । कुल मिलाकर हम सभी का प्रयास यही है ना कि ब्लॉग जगत में स्तरीय साहित्य की प्रस्तुति करें । द्विवेदी जी, अशोक भाई ,समीर भाई , अलबेला भाई और अन्य सभी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापिता करते हुए - आपका शरद कोकास

रविवार, 1 नवंबर 2009

नामवर सिंह अगर ब्लॉग लिखते तो....


डॉ. नामवर सिंह का जन्म 28 जुलाई 1927 को वाराणसी जिले के जीयनपुर नामक गाँव में हुआ । काशी विश्वविद्यालय से उन्होने हिन्दी में एम.ए.और पी.एच डी . की । 82 वर्ष की उम्र पूर्ण कर चुके नामवरजी विगत 65 से भी अधिक वर्षो से साहित्य के क्षेत्र में हैं । पिछले 30-35 वर्षों से वे भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर व्याख्यान भी दे रहे हैं । हमारे एक मित्र ने पिछले दिनों पूछा कि आखिर यह नामवर जी हैं कौन ? तो मन में आया कि उनका यह सन्क्षिप्त सा परिचय प्रस्तुत कर ही दूँ , शायद बहुतों के मन में यह सवाल हो । उनका यह परिचय मुझे सापेक्ष के आलोचना अंक में मिल गया सो जस का तस प्रस्तुत कर रहा हूँ । डॉ. नामवर सिंह का परिचय

अध्यापन : अध्यापन कार्य का आरम्भ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से (1953-1959) जोधपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के प्रोफेसर और अध्यक्ष(1970-74 ) आगरा विश्वविद्यालय के क.मु.हिन्दी विद्यापीठ के प्रोफेसर निदेशक (1974) जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली में भारतीय भाषा केन्द्र के संस्थापक अध्यक्ष तथा हिन्दी प्रोफेसर (1965-92) और अब उसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर इमेरिट्स । महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति ।

सम्पादन : “आलोचना” त्रैमासिक के प्रधान सम्पादक।“जनयुग”साप्ताहिक (1965-67) और “आलोचना” का सम्पादन(1967-91) 2000 से पुन: आलोचना का सम्पादन ।1992 से राजा राममोहन राय पुस्तकालय प्रतिष्ठान के अध्यक्ष । अब तक साहित्य अकादमी पुरस्कार 1971 ।

सम्मान: हिन्दी अकादमी दिल्ली के “शलाका सम्मान”(1991) उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान के “ साहित्य भूषण सम्मान (1993) से सम्मानित ।
कृतियाँ : 1996 बकलम खुद ,हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग ,पृथ्वीराज रासो की भाषा, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ, छायावाद, इतिहास और आलोचना ।
सम्पादित ग्रंथ : कहानी:नई कहानी , कविता के नये प्रतिमान,दूसरी परम्परा की खोज, वाद विवाद सम्वाद, कहना न होगा । चिंतामणि भाग-3 , रामचन्द्र शुक्ल संचयन , हजारीप्रसाद द्विवेदी:संकलित निबन्ध, आज की हिन्दी कहानी, आधुनिक अध्यापन रूसी कवितायें , नवजागरण के अग्रदूत : बालकृष्ण भट्ट ।
            नामवर जी ने पिछले वर्षों मे बहुत कुछ कहा है , उनके व्याख्यानों का संकलन अभी होना है । जो नहीं कहा है और लिखा है वह भी बहुत सारा है । मैं सोच रहा हूँ कि नामवर जी अगर ब्लॉग लिखते तो इतने सब कहे-लिखे की कितनी हज़ार पोस्ट तैयार होती और कितने वर्षों तक प्रकाशित होतीं ।- शरद कोकास 
(प्रथम चित्र रायपुर में नामवर सिंह साथ में मुक्तिबोध के पुत्र दिवाकर ,बच्चू जांजगिरी, रमेश अनुपम,महावीर अग्रवाल , दूसरे चित्र में दिल्ली मे मनोहर बाथम की पुस्तक का विमोचन बाँये से विष्णु नागर,मनोहर बाथम,नामवर सिंह,केदारनाथ सिंह, चन्द्रकांत देवताले , कमला प्रसाद ।-चित्र शरद कोकास के कैमरे से )