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रविवार, 4 जुलाई 2021
5.अपने समय के साथ होना
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
गुरुवार, 1 जुलाई 2021
4.ज्ञान और समझ को निर्धारित करने वाले कारक
मैं भी चाह ही रहा था, और एक बंधु ने भी मेरे ई-मेल पर सफ़ाई चाहते हुए कारकों के निर्धारण की ऐसी ही मांग रखी थी,अतएव...
अब इस बात को बिंदुबार तरीके से रेखांकित किया जा सकता है कि मनुष्य के ज्ञान का स्तर कैसा होगा, यानि मनुष्य मानव जाति द्वारा समेटे गये ज्ञान के सापेक्ष किस स्तर पर होगा। इसका निर्धारण करने वाले कारकों को यूं सूचिबद्ध किया जा सकता है:
१. मनुष्य के निकट का परिवेशी समाज, जिसमें सबसे पहले उसका परिवार, माता-पिता रिश्तेदार शामिल होते हैं, वे खुद ज्ञान और सभ्यता के किस स्तर पर हैं? उन्हें इस बात की कितनी समझ और
जिम्मेदारी है कि एक सुव्यवस्थित लालन-पालन किस प्रकार मनुष्य के जीवन की दशा और
दिशा का निर्धारण करता है?
२. मनुष्य से संबंधित वृहद समाज, जहां वह रहता और अंतर्क्रियाएं करता
है, की
सामाजिक चेतना का स्तर क्या है? ज्ञान और सभ्यता का सामान्य स्तर पर क्या है? सामाजिक क्रियाकलापों को उद्वेलित और नियमित करने वाले
मूल कारकों का नैतिक स्तर क्या है?ये दोनों बिंदु मनुष्य के सामान्य व्यक्तित्व एवं समाज के
साथ अंतर्क्रियाओं के मूल्यों का निर्धारण करते हैं और मनुष्य के व्यवहार की मूल
कसौटी तय करते हैं।
३. मनुष्य को व्यवस्थित रूप से प्रकृति के वृहद ज्ञान से परिचित कराने वाली शिक्षण-प्रशिक्षण प्रणाली का मूल उद्देश्य और उसकी सामान्य संरचना कैसी है? वह ज्ञान और व्यवहार की एकता निश्चित करने में कितना सक्षम है? वह मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास,ज्ञानवृद्धि, उसके वैज्ञानिक दृष्टिकोण को विकसित करने और व्यवस्थित चिंतन प्रणाली से लैस उसे एक जिम्मेदार सामाजिक प्राणी के रूप में तैयार करने के मूल उद्देश्य के लिए कितना अभिकल्पित है?
४. मनुष्य के मस्तिष्क के साथ अंतर्क्रिया करने वाले अन्य
साधन जैसे सूचना और संचार माध्यम, मीडिया, सहज उपलब्ध पुस्तकें आदि उसके सूचना संसार और चिंतन
प्रक्रिया को किस तरह और दिशा में प्रभावित कर रहे हैं? वे एक सोचने समझने वाले, बुद्धिमान और स्वतंत्र मनुष्य को
विकसित करना चाहते हैं या कुंद और कुंठित, भावातिरेक से भरे हुए ऐसे मंदबुद्धि व्यक्तित्वों का
निर्माण, जिनकी
सोच और समझ का नियंत्रण भी उनके हाथों में हो?
५. सभी जीवों की प्राथमिकता उनकी जिजीविषा होती है, ऐसे ही मनुष्य की प्राथमिकता भी
जीवनयापन हेतु मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ती ही होती है। इनकी पूर्ती की
सुनिश्चितता के बाद ही मनुष्य ज्ञान और समझ के स्तर को परिष्कृत करने हेतु प्रवृत हो सकता है।
अतएव किसी भी मनुष्य के ज्ञान और समझ के स्तर की संभावना इस बात पर
भी निर्भर करती है कि उसकी सामाजिक और राजानैतिक व्यवस्था में इस जिजीविषा की
तुष्टि के आयाम कितने विस्तृत हैं, साथ ही यह भी कि इस तुष्टि की चिंताओं से मुक्त मनुष्यों
के लिए व्यवस्था किन सभ्यता और संस्कृतिगत मूल्यों को प्रश्रय देती है।
प्रस्तुति : शरद कोकास
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
शनिवार, 19 जून 2021
3. एतिहासिक क्रम-विकास का दोहराव...
आपका ‘समय’
प्रस्तुति : शरद कोकास
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
रविवार, 13 जून 2021
2.संचित अनुभवों का हस्तांतरण
दरअसल, वर्तमान इतना उथल-पुथल भरा है कि मैं चश्मदीद होने का लोभ
संवरण नहीं कर पाता।
चलिए, फिर से बात शुरू करते हैं।
मैं समय, आपको किस्से-कहानियां सुनाते हुए यह बताना चाहता था कि
लोग मुझ तक क्यों नहीं पहुंच पाते।
तो हे मानव श्रेष्ठों, कहानी आगे बढ़ती है.....
मनुष्य ने अपने लाखों वर्षों के एतिहासिक क्रमिक उदविकास
के दौरान अपनी आज की लचीली और उन्नत शरीर संरचना को पाया है। शरीर के विभिन्न
अंगों का नयी-नयी परिस्थितियों और कार्यों के लिए संचालन, संचालन क्रियाओं का दिमाग़ के साथ
समन्वयन और आपसी अनुक्रिया, इन सबका उत्पाद है अत्यंत परिष्कृत मस्तिष्क संगठन और
शारीरिक संरचना। यह सब कपि-मानव और उसके हाथ द्वारा किए गए श्रम का परिणाम है। श्रम
का मतलब है, मनुष्य
द्वारा अपने किसी विशेष प्रयोजन के लिए प्रकृति में किया जा रहा सचेत परिवर्तन।
मनुष्य अपने संचित अनुभवों को आगे वाली पीढी़ को देता था
और इस प्रकार आने वाली पीढ़ियां उनका अतिक्रमण कर, अपने अनुभवों को और समृद्ध करती जाती थी। मनुष्य का ज्ञान
समृद्ध होता गया, भाषा और
लिपी ने इस संचित ज्ञान का आने वाली पीढ़ियों तक का संचरण और आसान व सटीक बना दिया।
क्रमिक विकास की यह उर्ध्वगामी प्रक्रिया निरन्तर चलती रही, मनुष्य के क्रियाकलापों और अनुभवों
के परिस्थितिजन्य क्षेत्र निरन्तर विस्तृत होते गये।
मनुष्य जाति बिखर रही थी, विकास की प्रक्रिया बिखर रही थी, इस ग्रह की भौगोलिक परिस्थितियां बदल
रही थी। शनैःशनैः मानव जाति का यह बिखराव एक दूसरे से काफ़ी विलगित हो गया और
पृथ्वी के अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग विकास श्रृंखलाएं स्थापित हो गयी।
परिस्थितिजन्य संघर्षों और आवश्यकताओं के अनुरूप, विकास की यह प्रक्रिया कहीं लगभग स्थिर हो गयी, कहीं धीमी, तो कहीं गुणात्मक रूप से काफ़ी तेज़ हो
गयी। यह स्थिति आज भी बनी हुई है, और मनुष्य अपने नीले ग्रह के अलग-अलग स्थानों पर मानव
जाति के क्रमिक विकास की अलग-अलग अवस्थाओं की समानान्तर उपस्थिति पाते हैं। कहीं
कहीं तो यह बिल्कुल आदिम अवस्थाओं में हैं।
कुलमिलाकर लाबलुब्बोआब यह है कि मनुष्य को एक सुसंगठित
मस्तिष्क और परिष्कृत शारीरिक संरचना, गुणसूत्रीय संरक्षण के जरिए विरासत में मिलती है, जिसमें भरपूर विकास की असीम भौतिक
संभावनाएं मौजूद होती हैं। परन्तु इस परिष्कृत शारीरिक संरचना और सुसंगठित
मस्तिष्क संरचना का क्रियान्वयन और नियमन उसे विरासत में नहीं मिलता, इस हेतु वह विकास की एक निश्चित
प्रक्रिया से गुजरता है जहां वह परिवेशी समाज की सहायता से अपनी शारीरिक और मानसिक
क्रियाकलापों को श्रृंखलाबद्ध तरीके से नियमित और परिष्कृत करना सीखता है, और इसे इस तरह देखना काफ़ी रोमांचक
रहेगा कि इस प्रक्रिया के दौरान, यानि पैदा होने से लेकर विकसित युवा होने तक, मनुष्य अपने जीवन में मानवजाति के
पूरे इतिहास को छोटे रूप में क्रमबद्ध तरीके से दोहराता है।
समय
प्रस्तुति : शरद कोकास
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
रविवार, 6 जून 2021
रवि कुमार स्वर्णकार या रवि कुमार रावतभाठा ही समय हैं
*आख़िर क्यों है मुझे आप में इतनी दिलचस्पी* ..
*समय के ब्लॉग से*
*प्रस्तुति* : *शरद कोकास*
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
मंगलवार, 20 मार्च 2018
कवि केदारनाथ सिंह नहीं रहे .
कल दिनांक 19 मार्च को कवि केदारनाथ सिंह नहीं रहे .आज उनसे सुनिए उनकी कविता "हिंदी के बारे में एक हिंदी कवि का बयान "से यह अंश और पढ़िए उनकी पूरी कविता . (कृपया ऊपर के प्लेयर पर आवाज़ सुनें .)
| केदारनाथ जी के साथ शरद कोकास |
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।





