मंगलवार, 19 मई 2026

21.दर्शन की अध्ययन विधियां - द्वंदवाद और अधिभूतवाद


पिछली बार दर्शन के बुनियादी सवाल और उसके जवाबों के अनुसार पैदा हुई दर्शन की भौतिकवादी और प्रत्ययवादी प्रवृत्तियों पर चर्चा की गई थी।

इस बार इन दोनों मुख्य प्रवृत्तियों द्वारा काम में ली जाने वाली तर्कणा और प्रमाणन की भिन्न-भिन्न अध्ययन विधियों को समझने की जुगत भिड़ाते हैं।

समय यहां मानवजाति के अद्यतन ज्ञान को सिर्फ़ समेकित कर रहा है।

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मनुष्य के गिर्द विद्यमान विश्व अविराम बदल रहा है, गतिमान और विकसित हो रहा है। इनमें से कुछ परिवर्तनों की तरफ़ ध्यान नहीं जाता, जबकि कुछ अन्य मनुष्यजाति तथा समग्र प्रकृति के लिए बहुत महत्त्व के होते हैं। असीम ब्रह्मांड अनवरत गतिमान है। यह भूमंडल, यह पृथ्वी निरंतर परिवर्तित हो रही है। जीव-जंतु व वनस्पतियां भी रूपातंरित हो रही हैं। अपने क्रमविकास की लंबी राह में मनुष्य और समाज में निरंतर परिवर्तन होते रहे हैं।

इस दुनियां में जीवित बचे रहने, उसके अनुकूल बन सकने और अपने लक्ष्यों तथा आवश्यकताओं के अनुरूप इसे बदलने के लिए मनुष्य को इसकी विविधता का अर्थ जानना और समझना होता है। प्राचीनकाल से ही लोग इन प्रश्नों में दिलचस्पी रखते हैं, जैसे विश्व क्या है और इसमें किस प्रकार के परिवर्तन हो रहे हैं? क्या विभिन्न वस्तुओं के बीच कोई संयोजन सूत्र है? विश्व गतिमान क्यों है और इस गति का मूल क्या है?

फलतः ये प्रश्न कि "क्या गति का अस्तित्व है?" और "इस गति का क्या कारण है?" दर्शन के सामने एक और अधिक तथा अत्यंत महत्त्वपूर्ण दार्शनिक प्रश्न के रूप में पेश आते हैं। गति के सार, उसके कारणों तथा उद्‍गमों की व्याख्या के साथ जुड़े दार्शनिक चिंतन में विश्व के क्रमविकास के स्पष्टीकरण की दो अध्ययन विधियां साकार हुईं, और विश्व को समझने के उपागम की दो विरोधी विधियां बन गईं - द्वंदवाद ( Dialectics ) और अधिभूतवाद ( Metaphysics )।

आइए, इन दोनों विधियों के सार की जांच करते हैं और यह समझने की कोशिश करते हैं कि इनमें से कौन उपरोक्त प्रश्नों के विज्ञानसम्मत समाधान मुहैया कराती है।

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द्वंदात्मक विधि:

भौतिकवादियों द्वारा प्रयुक्त विधि को द्वंदात्मक विधि कहा जाता है।

संज्ञान की द्वंदात्मक विधि यह मांग करती है कि हमारे गिर्द विश्व की सारी घटनाओं की छानबीन उनके अंतर्संबंधों, अंतर्क्रियाओं तथा उनके सतत विकास की प्रक्रियाओं में की जाए। यह विधि यह मानकर चलती है कि मनुष्य बाह्य जगत तथा स्वयं अपने को केवल तभी जान सकता है, जब वह सारी घटनाओं की जांच तथा अध्ययन उनकी गति में, अंतर्द्वंदों में, सतत परिवर्तन में करे और साथ ही सभी घटनाओं के पारस्परिक संक्रमणों तथा एक दूसरे में उनके पारस्परिक रूपांतरणों पर मुख्य रूप से ध्यान दे।

भौतिकवादी द्वंदवाद के दृष्टिकोण से संपूर्ण विश्व गतिमान और बदलती हुई वस्तुओं का एक समग्र संबंध है। इस सार्विक विश्व संबंध के बाहर न तो किसी अलग-थलग घटना को समझा जा सकता है, न प्रक्रिया को और न ही गति को। इसीलिए द्वंदवाद प्रत्येक विषय, प्रत्येक वस्तु की वैज्ञानिक, वस्तुगत जांच को उसके अधिकाधिक नये पक्षों, रिश्तों और संपर्क सूत्रों को प्रकाश में लाने की एक असीम प्रक्रिया के रूप में देखता है।

यह विधि प्रत्येक तथ्य में विकास के आंतरिक स्रोत का पता लगाने का प्रयत्न करती है। इन स्रोतों को वह अंतर्द्वंदों, अंतर्विरोधों के विश्लेषण में खोजती है, जो प्रत्येक घटना तथा प्रक्रिया के मूल में होते हैं, तथा जिनके आपसी संघर्ष और एकता की वज़ह से ही उस घटना तथा प्रक्रिया का अस्तित्व संभव हो पाता है।

इसके अनुसार विकास का तात्पर्य आवर्तता या एक वृत्तीय गति नहीं है, बल्कि एक वर्तुलाकार ( spiral ) गति है जिसमें नूतन का सतत आविर्भाव होता रहता है, और जो अभिलक्षण पुनरावर्तित होते प्रतीत होते हैं वे पूर्ववर्ती अवस्थाओं से गुणात्मक रूप से भिन्न होते हैं, उनसे उच्चतर अवस्थाओं में होते हैं। विकास के दौरान पुरातन का सतत विखंड़न तथा विलोपन होता है और इस प्रक्रिया में सभी मूल्यवान तथा जीवंत गुणों को संरक्षित रखते हुए नूतन का आविर्भाव होता है।

अधिभूतवादी विधि:

द्वंदवाद की प्रतिपक्षी विधि को अधिभूतवादी विधि कहते हैं।

इसमें प्रत्येक घटना का अलग-थलग ढ़ंग से, घटनाओं के पारस्परिक संबंधों, अंतर्द्वंदों व अंतर्क्रियाओं से अलग करके स्वतंत्र रूप से अध्ययन किया जाता है। यदि उसे इन संबंधों तथा अंतर्क्रियाओं को ध्यान में रखना भी पड़े तो वह सतही तौर पर ही ऐसा करती है। परिवर्तन तथा गति का अध्ययन करते समय अधिभूतवादी विधि वास्तविक विकास को नहीं देखती और इसीलिए प्रकृति, समाज तथा मनुष्य के चिंतन में मूलतः नयी धटनाओं तथा प्रक्रियाओं के उद्‍भव की संभावनाओं को स्वीकार नहीं करती।

इस विधि के अंतर्गत वस्तुओं और परिघटनाओं को अपरिवर्तनीय और एक दूसरे से स्वंतंत्र माना जाता है और इस बात से इन्कार किया जाता है कि आंतरिक अंतर्द्वंद प्रकृति और समाज के विकास के स्रोत हैं।

अधिभूतवादी दृष्टिकोण से विश्व में सब कुछ देर-सवेर पुनरावर्तित होता है, हर चीज़ ऐसे गतिमान होती है, मानो एक वृत में घूम रही हों। इसके अनुसार गति तथा परिवर्तन के स्रोत वस्तुओं और घटनाओं के अंदर नहीं, बल्कि किसी बाहरी प्रेरकों में, उन शक्तियों में निहित होते हैं जो विचाराधीन घटना के संबंध में बाहरी होती हैं।

अधिभूतवादी विधि बाह्य जगत में आमूल गुणात्मक रूपांतरणों और क्रांतिकारी परिवर्तनों को मान्यता नहीं देती, फलतः यह एक विकासविरोधी, यथास्थितिवादी प्रवृत्ति के रूप में समाज के प्रभुत्वशाली लोगों के साथ नाभिनालबद्ध हो जाती है।

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आज इतना ही।

संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय





20.दर्शन का बुनियादी सवाल और इसकी प्रवृत्तियां



पिछली बार हमने दर्शन और विश्व को देखने के मनुष्य के नज़रिए यानि उसके विश्वदृष्टिकोण के बीच क्या संबंध होता है, इसे समझने की कोशिश की थी।

चर्चा आगे बढ़ाते हैं।
आज हम दर्शन के बुनियादी सवाल से गुजरेंगे।
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प्रत्येक विज्ञान का अपना प्रमुख बुनियादी सवाल होता है, यानि उन घटनाओं और प्रक्रियाओं का परास (range) जिनका वह अध्ययन करता है और अंत में अनुसंधान की उसकी अपनी विशेष विधि होती है। फलतः दर्शन की गहन समझ के लिए जरूरी है कि उसके बुनियादी सवाल, विषयवस्तु तथा अध्ययन-विधि को परिभाषित किया जाए।
जर्मनी के दार्शनिक इमानुएल कांट का विश्वास था कि दार्शनिक को तीन प्रश्नों का उत्तर देना ही चाहिए: "मैं क्या जान सकता हूं?", "मुझे क्या करना चाहिए?" और "मैं किसकी उम्मीद कर सकता हूं?" आइए, यह देखें कि इन तीन प्रश्नों में कोई अधिक सामान्य प्रश्न तो छुपा नहीं है।
वास्तव में मनुष्य सीखता है, उम्मीदें करता है और केवल इसी कारण से कि वह एक मन, चेतना और संकल्प से संपन्न है और अपने इर्द-गिर्द होने वाले सब कुछ का अवबोध व व्याख्या करने में समर्थ है। मनुष्य पेशियों और तंत्रिकाओं का ढे़र मात्र नहीं है, केवल एक शरीर नहीं है, वह जैसा कि प्राचीन काल में कहा जाता था, एक "आत्मा" से भी संपन्न है। सारे विशेष प्रश्नों का उत्तर इस बात पर पूर्णतः निर्भर है कि इस मुख्य प्रश्न का उत्तर किस तरह से दिया जाता है कि आत्मा, चित्त या चेतना क्या है? यह कहां से आती है और अजैव प्रकृति से किस प्रकार जुड़ी है? परिवेशीय जगत के साथ मनुष्य का संबंध क्या है और क्या वह उसे जान तथा परिवर्तित कर सकता है?
यही दर्शन के बुनियादी सवाल का सार है। चूंकि अन्य प्राणियों से भिन्न चिंतनशील, तर्कबुद्धिसंपन्न, सचेत सत्व होने की अपनी विशेषता को लोग बहुत पहले ही जान गए थे, इसलिए विश्व के साथ मनुष्य के संबंध की समस्या को आम तौर पर इस प्रकार निरुपित किया जाता था: सत्व के साथ आसपास की वास्तविकता के या भूतद्रव्य के साथ चेतना और चिंतन का संबंध।
अतः दर्शन का मूल प्रश्न मन और प्रकृति, चेतना और पदार्थ के अंतर्संबंध का प्रश्न है। दर्शन के उपरोक्त बुनियादी सवाल के दो पक्ष हैं जिनके आधार पर दर्शन के क्षेत्र की दिशाओं का निर्धारण होता है। आइए उन्हें समझने की कोशिश करते हैं।
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दर्शन के बुनियादी सवाल का पहला पक्ष:
भूतद्रव्य तथा चिंतन के संबंध पर विचार व्यक्त करते समय यह समुचित प्रश्न पैदा होता है कि इनमें से प्राथमिक कौन है? निर्धारक तत्व कौनसा है? भौतिक जगत या चिंतन और चेतना? दर्शन के बुनियादी सवाल का पहला पक्ष यही है।
हमारा जीवन अनुभव यह दर्शाता है कि प्रत्येक ठोस मामले में इस प्रश्न का उत्तर देना बिल्कुल सहज है। मसलन, चंद्रमा की संकल्पना ( विचार ) तथा उसके कविता बिंबों के प्रकट होने से बहुत पहले ही चंद्रमा विद्यमान था। फलतः यह कहा जा सकता है भौतिक वस्तु ( चंद्रमा ) अपने वैज्ञानिक या कवित्वमय रूप की,

यानि चंद्रमा के प्रत्यय ( संकल्पना ) की पूर्ववर्ती थी।
इसके विपरीत चंद्रमा पर साक्षात पदार्पण करने से पहले वहां पहुंचने की कल्पना, साधनों के अभिकल्पन ( design ) का विचार निश्चय ही पहले पैदा हुआ और इसके बाद ही इन्हें मूर्त रूप दिया जा सका। फलतः इस मामले में यह कहा जा सकता है कि वैज्ञानिक प्रत्यय ( विचार ), रॉकेटों तथा स्वचालित प्रयोगशालाओं के रूप में भौतिक वस्तुओं की रचना का पूर्ववर्ती था।
यदि यह ऐसी ही स्थितियों का मामला होता, तो दर्शन के बुनियादी सवाल का पहला पक्ष निहायत ही सरल होता। लेकिन दर्शन में ऐसे सरल मामलों की पड़ताल नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के प्रति मनुष्य के रुख़ पर विचार किया जाता है। यह स्पष्ट है कि सवाल के इस पहले भाग को समझना और सार्विक रूप में व्याख्यायित करना इतना आसान नहीं है। वास्तव में यह स्पष्ट करना आवश्यक है के ब्रह्मांड़ के संपूर्ण ऐतिहासिक क्रमविकास के पैमाने पर प्राथमिक और निर्धारक है: चिंतन या भौतिक जगत, और मनुष्य के क्रियाकलाप के किसी भी रूप में निर्धारक कौन है? केवल इसी संदर्भ में यह प्रश्न सार्थक है।
इस प्रश्न के उत्तर के अनुसार सारे दार्शनिकगण दो बड़े शिविरों या प्रवृत्तियों - भौतिकवाद ( Materialism ) और प्रत्ययवाद ( Idealism ) - में बंटे हुए हैं। भौतिकवादी इस बात पर जोर देते हैं कि भूतद्रव्य, पदार्थ प्राथमिक व निर्धारिक है और चेतना द्वितीयक तथा निर्धारित है। प्रत्ययवादी ( भाववादी, आदर्शवादी पर्याय शब्द भी काम में लिए जाते हैं ) विचार, चेतना को प्राथमिक और भूतद्रव्य, पदार्थ को द्वितीयक मानते हैं।
दर्शन के इतिहास में ऐसे भी चिंतक हुए हैं, जिन्होनें एक मध्यवर्ती स्थिति अपनाने की कोशिश की। उन्होंने दोनो विश्व तत्वों , अर्थात भूतद्रव्य तथा चेतना के बीच एक प्रकार की समांतरता, स्वाधीनता तथा समानता को मान्यता दी। इन्हें द्वेतवादी कहा जाता है। द्वेतवाद का कोई स्वाधीन महत्व नहीं है क्योंकि इसके महान प्रवक्ता देर-सवेर या तो प्रत्ययवाद की स्थिति पर जा पहुंचे या भौतिकवाद की।
दर्शन के बुनियादी सवाल का दूसरा पक्ष:
जब हम भूतद्रव्य और चिंतन तथा चेतना के बीच संबंध की जांच करते हैं, तो यह प्रश्न पूछा जा सकता है कि क्या हमारा चिंतन बाह्य जगत का सही-सही संज्ञान प्राप्त कर सकता है, क्या हम अपने आसपास की घटनाओं और प्रक्रियाओं के बारे में सही अंदाज़ा लगा सकते है और कि क्या हम उनके संबंध में सच्ची राह जाहिर कर सकते हैं और अपने निर्णयों तथा कथनों के आधार पर सफलतापूर्वक कर्म कर सकते हैं?
यह प्रश्न कि क्या विश्व संज्ञेय है और अगर ऐसा है, तो किस सीमा तक तथा क्या मनुष्य बिल्कुल सही या लगभग सही ढ़ंग से अपने आसपास की यथार्थता का संज्ञान प्राप्त कर सकता है, उसे समझ तथा उसकी छानबीन कर सकता है। यही दर्शन के बुनियादी सवाल का दूसरा पक्ष है।
विश्व की संज्ञेयता के प्रश्न के उत्तर के अनुसार सारे दार्शनिक दो प्रवृत्तियों में विभाजित हो जाते हैं। एक प्रवृत्ति में विश्व की संज्ञेयता के समर्थक शामिल हैं ( भौतिकवादियों तथा प्रत्ययवादियों की एक विशेष धारा, वस्तुगत प्रत्ययवादियों की एक बड़ी संख्या ) ; दूसरी प्रवृत्ति में इस संज्ञेयता के विरोधी शामिल हैं, जो यह मानते हैं कि विश्व पूर्णतः या अंशतः अज्ञेय है ( वे प्रत्ययवादियों की एक विशेष धारा, आत्मगत प्रत्ययवादी होते हैं )। विश्व की ज्ञेयता के विरोधियों को सामान्यतः अज्ञेयवादी कहते हैं।
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अधिकांश लोग साधारण जीवन के व्यवहार में स्वाभाविक तथा अचेतन रूप से भौतिकवादी होते हैं। वे ज़िंदगी के भौतिक पक्ष से भली-भांति परिचित होते हैं और अपने दैनन्दिनी कार्यकलापों में भौतिक सिंद्धांतों से परिचालित होते हैं। यह बात दीगर है कि जब जीवन से जुड़ी जिन चीज़ों में अनिश्चितता या असुरक्षा शामिल हो जाती है, तब वे पारंपरिक रूप से प्राप्त अपनी समझ के हिसाब से प्रत्ययवादी चिंतन का सहारा लेते हैं।
इसलिए समस्त भौतिकवादी गतिविधियों के बाबजूद, प्रत्ययवादी चिंतन के अस्तित्व में कोई आश्चर्य की बात नहीं है। प्रत्ययवाद के उद्‍भव का कारण सामाजिक-ऐतिहासिक परिस्थितियां हैं। प्राचीन काल में जिन प्रांरभिक दार्शनिक मतों का जन्म हुआ, वे उन दशाओं में विकसित हुए, जब धर्म का प्रभाव बहुत ही प्रबल था। अधिकांश धार्मिक मतों के अनुसार, विश्व की रचना एक ईश्वर या देवताओं के द्वारा, अभौतिक, आध्यात्मिक, सर्वशक्तिमान सत्वों के द्वारा हुई। विश्व के धार्मिक-प्रत्ययवादी स्पष्टीकरण को स्वीकारने वाले अनेक दार्शनिक मतों पर इन विचारों का निश्चित प्रभाव पड़ा था।
फिर क्या कारण है कि वर्तमान युग में जब विज्ञान तथा इंजीनियरी के विकास ने भौतिकवाद की सत्यता की अनगिनत अकाट्य पुष्टियां कर दी हैं, तब भी प्रत्ययवाद ज्यों का त्यों बना हुआ है? मुद्दा यह है कि स्वयं मानव जीवन में और सामाजिक जीवन की दशाओं में प्रत्ययवाद की निश्चित जड़ें विद्यमान हैं। प्रत्ययवाद, प्रभावी वर्गों के विश्वदृष्टिकोण तथा वैचारिकी के साथ जुड़ा है और कुछ सामाजिक शक्तियों के लिए उपयोगी है, क्योंकि यह मौजूदा विश्व व्यवस्था की शाश्वतता तथा निरंतरता के पक्ष में दलीले मुहैया कराता है। यथास्थिति को बनाए रखने और सामाजिक-राजनैतिक परिवर्तनों को गैरजरूरी सिद्ध कर उनकी धार को कुंद करने के लिए कटिबद्ध होता है। यह सत्ता से नाभिनालबद्ध है इसीलिए उसे भरपूर प्रश्रय, संजीवनी और प्रचार मिलता है।
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आज के लिए काफ़ी हो गया।
अब काफ़ी आधारभूत सामग्री हो गई है जो दर्शन के अवबोध के लिए एक सुसंगत स्थिति पैदा करने में सक्षम लगती है।

अगली बार दर्शन की अध्ययन विधियों पर चर्चा करते हुए आगे बढ़ेंगे।
जिज्ञासाओं और संवाद का स्वागत है।

समय



19.टिप्पणियों के अंशों से दिमाग़ को कुछ खुराक



समय यहां श्रृंखला के बीच में कुछ टिप्पणियों को देने की गुस्ताख़ी कर रहा है।

समय का उद्देश्य इन्हें यहां दस्तावेज़ीकृत करना है, और साथ ही उन मानवश्रेष्ठों तक इन्हें पंहुचाना है जो इनसे महरूम रहे हैं। उम्मीद है आपके दिमाग़ को कुछ खुराक मिलने की संभावनाएं तो हैं ही।
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प्रणय संबंध, विज्ञान और कुछ विचार..पोस्ट पर ‘संचिका’ पर टिप्पणी:

‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण का मतलब किसी एक पक्ष के साथ जड़ता से बंधना नहीं होता, वरन वस्तुगतता का सापेक्ष, तार्किक और तथ्यात्मक विश्लेषण करने की योग्यता पैदा कर सकने वाले नज़रिए से होता है।
किसी भी दृष्टिकोण या सिद्धांत का असली परीक्षण, व्यवहार के जरिए ही हो सकता है। यही इसकी कसौटी होती है कि वह प्रकृति और जीवन की वास्तविक परिघटनाओं को कितनी सटीकता और accuracy के साथ समझाने की सामर्थ्य रखता है। उसका सामान्यीकरण किया जा सकता है या नहीं? प्राप्त निष्कर्षों और नियमसंगीतियों से उसके जरिए भावी परिघटनाओं या संबंद्ध अन्य प्रक्रियाओं को नियत किया जा सकता है या नहीं?
.....और यह बात आपके प्रथम मत ‘मैं अपना मत स्पस्ट कर दूँ मेरे अनुसार १०० प्रतिशत प्रेम की भावना दिमाग में पनपती है’ से जाहिर नहीं होती।
वरन यह जाहिर होती है इसके सापेक्ष बालिका वधु वाले प्रसंग को रखने और यह प्रश्न उठाने में कि,‘क्यों उसने फिर कहीं और प्रेम तलास नही किया,क्यों वह उसकी याद में तडपता रहा..?’।
यह बात थोड़ी अंतर्विरोधी लग सकती है।
पर यह बात इसलिए कही गयी है कि यदि वाकई में मस्तिष्क का केमिकल लोचा वाला सिद्धांत इस प्रेम की रूहानी? भावनात्मक, तथ्यात्मक वस्तुगतता को अगर समझाने में समर्थ नहीं लग रहा है तो इसका मतलब सिद्धांत में ही कहीं लोचा है। कहीं ना कहीं उसमें लूपहोल्स हैं और वह पूरी तरह से एक सही सिद्धांत होने की काबिलियत रखने से अभी दूर है।
तो एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण वही है जो इन अंतर्विरोधों को भी परखे, इन पर संदेह करे, और सापेक्षता में भी चीज़ों को देखे। यही आप ने किया भी है। आपको सलाम।
जाहिर है, उपरोक्त बात को कह देने के बाद, यह कहना अब प्रांसंगिक नहीं रह गया है कि समय के यहां संदर्भित आलेख से जो यह निष्कर्ष आपने निकाला है कि,‘हमारे मित्रों का मानना है की रूहानी प्रेम एक मायाजाल से ज्यादा कुछ नही है’,पूरी तरह वस्तुगत नहीं है, एकांगी है।
समय को मौका मिलेगा तो यह कोशिश होगी कि इसी संदर्भ में भावनाओं की भौतिकता, वस्तुगतता और सक्रिय आवेगों के आपसी अंतर्संबंधों पर मानवजाति के अद्यानूतन ज्ञान को अपने ब्लॉग पर समेकित कर सके।
समय, यहां कुछ इशारे भर कर रहा है।
मनुष्य द्वारा अनुभव की गयी भावनाएं (अनुभूतियां), प्रेम की भावना जिनका कि एक अंग मात्र है, मनुष्य के वे आंतरिक, मानसिक रवैये हैं, वह एक मानसिक अवस्था है, जिन्हें वह अपने जीवन से जुड़ी घटनाओं में और अपने सक्रियता की लक्ष्य वस्तुओं के प्रति विभिन्न रूपों में महसूस करता है।
इनके पैदा होने का निश्चय ही अपना भौतिक आधार होता है, और जाहिरा तौर पर यह केमिकल/भौतिक लोचों की प्रक्रियाओं से गुजर कर ही महसूसने जैसी अवस्था पाती हैं।

परंतु महसूसने के पश्चात अब यह नितांत भौतिक चीज़ नहीं रह जाती, यह मनुष्य के वैचारिक जगत से अंतर्क्रिया के दौरान उसका ही एक हिस्सा हो जाती हैं, उसी वैचारिक जगत का जो कि ख़ुद उसकी भौतिक परिस्थितियों से निगमित है।
वैचारिक जगत के पूर्वाधारों के अनुसार ही ये भावनाएं मनुष्य के संवेगों और सक्रियताओं को निश्चित करती हैं, यानि उसके व्यवहार को निश्चित करती हैं, जैसा कि आपके एडगर एलन पो का वह व्यवहार आपकी चिंता का विषय है।
भौतिक और वैचारिक जगत जीवन का अलग-अलग हिस्सा नहीं है, वह दोनों एक दूसरे पर अन्योन्याश्रित हैं।
........ज्ञान का मामला ही ऐसा है। चीज़ों को अधिभूतवादी नज़रिए से अलग-अलग विश्लेषित करने से उलझनें पैदा होती है, और द्वंदात्मक तरीके से विश्लेषित संक्षेप में नहीं किया जा सकता।’
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यह इश्क कमीना-क्या सचमुच?...पोस्ट पर ‘साईब्लाग’ पर टिप्पणी:

‘आलेख की सूचनाओं को मानवश्रेष्ठ अरुणप्रकाश की टिप्पणी से अंतर्संबंधित करके भी देखे जाने की आवश्यकता है।
मानवव्यवहार को मात्र कुछ रसायनों तक सीमित कर देने से, इन्हें वैज्ञानिक रूप से, प्रगतिशील मूल्यों के रूप में स्थापित कर देने से, जाहिरा तौर पर इन रसायनों से संबंधित एक गैरजरूरी बाज़ार खड़ा किया जा सकता है और मुनाफ़ो का ढ़ेर लगाया जा सकता है।
दूसरा ऐसा स्थापित करने से मानवीय व्यवहार की सामाजिक अंतर्निर्भरता के बज़ाए व्यक्तिवादी आत्मकेन्द्रिता को आधार मिलता है, क्योंकि यह भ्रम स्थापित किया जाता है कि इन्हें कुछ रसायनों के जरिए पैदा और नियंत्रित किया जा सकता है।
जाहिरा तौर पर ऐसे आत्मकेन्द्रित व्यक्तिवादी सोच के मनुष्य आज की व्यवस्था के इच्छित हैं जो मनुष्य की सोच और दृष्टिकोणों तक को गुलाम मानसिकता में बदल डालने की कोशिशों में हैं।
जैसा कि आपने अपने एक आलेख में पहले कहा था कि विज्ञान धर्म के बिना अंधा होता है, और समय की इल्तिज़ा थी कि यहां धर्म के स्थान पर दर्शन शब्द का प्रयोग किया जाना चाहिए क्योंकि इच्छित अर्थ इसी में समाहित हैं। उसी परिप्रेक्ष्य में यह है कि वैज्ञानिक सूचनाओं को, ऐतिहासिक और क्रम-विकास के संदर्भों में परखे बिना सही समझ विकसित नहीं की जा सकती, या कि इन्हें सही समाजिक सोद्देश्यता प्रदान नहीं की जा सकती।
आपने आलेख में इसी दृष्टि को उठाया भी है।
इन हारमोनों के खेल को हम लगभग पूरी जैवीय प्रकृति में (फिलहाल मानव को छोड दें) अस्तित्वमान देखते हैं और इन्हीं की वज़ह से उत्प्रेरित सहजवृत्तियों से सक्रिय कई जीवों को समयआधारित प्रजनन संबंधों की प्रक्रिया में संलग्न देखते हैं। जाहिर है इसी वज़ह से यह विचार और शोध की आवश्यकताएं पैदा हुईं कि इन्हीं के परिप्रेक्ष्य में मनुष्यों के व्यवहार को भी समझा जाना चाहिए।
मनुष्य भी इसी जैव प्रकृति का अंग है तो नियमसंगति यहां भी मिलनी चाहिए, और इसी के अवशेषों को जाहिर है उक्त खोजों के अंतर्गत संपन्न कर लिया गया लगता है।
मानव प्रकृति की सहजवृत्तियों के खिलाफ़ अपने सोद्देश्य क्रियाकलापों के जरिए हुए क्रमविकास के कारण ही अस्तित्व में आ पाया है। मनुष्य अपनी इस चेतना के जरिए ही यानि सचेतन क्रियाकलापों के जरिए ही, अन्य

जैवीय प्रकृति की सहजवृत्तियों से अपने आपको अलग करता है। (आपने इन सहजवृत्तियों के लिए अपने प्रश्न में सहजबोध शब्द काम में लिया है, ये दोनों पर्यायवाची नहीं हैं)
जाहिर है अब मनुष्य कई सहजवृत्तियों के हारमोनों संबंधी उत्प्रेरकता की आदतों से आगे निकल आया है और कई नई तरह की सचेत क्रियाकलापों के लिए अनुकूलित हो गया है।
इस आलेख में उल्लिखित हारमोन और अंडविसर्जन संबंधित व्यवहार को इसी ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में जांचा जाना चाहिए।
यह आसानी से जाना जा सकता है, अपने स्वयं के व्यवहार से महसूस किया जा सकता है कि मनुष्य में अब इस गंध संबंधी सहजवृत्ति का कोई सामान्य अस्तित्व नहीं रह गया है। मनुष्य के यहां यौन संबंधों की सिर्फ़ प्रजनन आवश्यकता का लोप हो गया है और यह कई तरह के आनंदों और गहरे आत्मिक संबंधों के आधार के रूप में अस्तित्व में आ गया है। अब शारीरिक और मानसिक जरूरतों के अतिरिक्त भी कई ऐसे उत्प्रेरक हैं जो मनुष्य में यौन संबंधों की प्रेरणा पैदा कर सकते हैं।
अंड़विसर्जन के वक्त स्त्रियों में आ रहे हार्मोनिक बदलावों की वज़ह से उत्प्रेरित यौन आकांक्षाओं के कारण से हुए व्यवहार परिवर्तन से ही कोई पुरूष शायद यह अहसास पा सकता है कि अंड़विसर्जन हो रहा होगा। गंध संबंधी कोई अनुभव सामान्यतयाः नहीं महसूस किया जाता, इसे अपने खु़द के अनुभवों की कसौटी पर भी परखा जा सकता है।
पसीने में गंध को भी ऐसे ही देखा जा सकता है। इससे भी कई फ़िल्मी और साहित्यिक प्रंसंगों के कारण विश्वास मिलता हो, तथ्य यही है कि वर्जनाओं से युक्त कुछ कैशोर्य व्यवहारों में इसका कुछ अस्तित्व भले ही मिल जाए, सामान्यतयाः व्यस्क जोडो में इस पसीने की गंध से वितृष्णा ही देखी जा सकती है, और सामान्यतयाः जहां तक संभव होता है सचेत यौन संबंधों हेतु शयनकक्ष में स्नान करके जाना ही श्रेयस्कर समझा जाता है।’
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धर्म और विज्ञान...पोस्ट पर ‘साईब्लाग’ पर टिप्पणी:

‘शब्दों का आशय वही होता है जो प्रदत्त समय में उसके प्रचलित अर्थ में ध्वनित होता है।
धर्म के मूल में आस्थाएं और परंपराएं होती है।
वहां संदेह और तर्क के लिए सामान्यतयाः कोई जगह नहीं होती।
तर्कबुद्धि के जरिए जब विश्व और मनुष्य के साथ उसके संबंधों की तार्किक व्याख्याएं की जाने लगी तो उसे एक नये शब्द फ़िलासाफ़ी से पुकारा जाने लगा।
इस शब्द का ही हमारा पारंपरिक पर्याय दर्शन है।
संदेहों ने विज्ञान तक पहुंचाया, और तर्कों ने दर्शन तक। दोनों एक दूसरे से नाभिनालबद्ध हैं।
दर्शन के तार्किक निष्कर्षों ने विज्ञान के लिए ऊर्वर भूमि प्रदान की, वहीं विज्ञान की खोजों और नियमसंगीतियों ने दर्शन को एक सार्विक रूपता प्रदान की।
आप के लेख और अन्योनास्ति की टिप्पणी में जो आकांक्षा ‘धर्म’ शब्द से इच्छित है, वह आपको इस ‘दर्शन’ शब्द में ही मिल सकती है।’
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ज्योतिष: पौराणिक संदर्भों से निकली....पोस्ट पर ‘तस्लीम’ पर टिप्पणी:

‘यहां यह जो सत्संग चर्चा चल रही है, उस पर इस नाचीज़ को कुछ नहीं कहना है।
आस्था को तर्कों के जरिए दिमाग़ से नहीं निकाला जा सकता, बिल्कुल उसी तरह जैसे ड़र को तर्कों के सहारे नहीं जीता जा सकता।
वैसे इस बात को देखने में मज़ा आता है, कि आस्थावान मनुष्य जो कि तर्क को किनारे रखता है, इसके बचाव में सबसे ज़्यादा तर्क-कुतर्क करता है। जिस पर विश्वास नहीं उसी पद्धति का सहारा। खैर जी।
ज्ञान और समझ हमारे सारे बचकानेपन को शनै-शनै खत्म करती जाती हैं।
इस पोस्ट पर समय का भी प्रतिवाद है, और गहरा है। कृपया इसे भी दर्ज़ कर लें।
आप वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के लिए यहां जिस पद्धति को काम में ले रहे हैं, मुआफ़ कीजिएगा समय को लगता है यह कतई भी वैज्ञानिक नहीं है।
दर्शन की भाषा में कहें तो यह चीज़ों को समझने का अधिभूतवादी तरीका (metaphysical method)है, वैज्ञानिक द्वंदवादी तरीका नहीं है।
आप अपने विरोधी विचार को उन्हीं की ज़्यादा प्रचलित पद्धति के जरिए मात देने की खाम्ख़्वाह कोशिश कर रहे हैं।
विवाद इसी वजह से होता है। जब इसी कार्य को प्रतिगामी शक्तियां करती हैं तो गलत है, तो सही चीज़ों को ही सही, सामने लाने के लिए प्रगतिशील शक्तियां भी इसी गलत चीज़ का इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं। जाहिर है उनके तर्कजाल में उलझने की पृष्ठभूमि तो पहले से ही तैयार है।
इस तरह से पुरातन ग्रंथों से, जो कि अपने ऐतिहासिक काल की समझ की उत्पत्ति होते हैं, उदाहरण ढ़ूंढ़ कर लाने और उसे वर्तमान में प्रतिष्ठित करने का यह पुनीत कार्य ही तो आज की प्रतिगामी शक्तियां कर रही है। तो फिर इस पोस्ट के जरिए उलटबासी में ही सही, क्या यही कार्य यहां नहीं हो रहा है, क्या उन्हीं की पद्धति नहीं अपनाई जा रही है।
पुरातन ग्रंथों की कई वैज्ञानिक द्वंदवादी व्याख्याएं मानवजाति द्वारा पूर्व में ही की जा चुकी हैं, आपका समूह उनसे गुजरेगा तो सही मायनों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाया जा सकेगा।
इस हेतु भारतभूमि पर भी काफ़ी मानवश्रेष्ठ यह कार्य संपन्न कर चुके हैं। आप अमृत डांगे, देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय, दामोदर धर्मानंद कोसांबी आदि विद्वानों और इतिहासकारों की पुस्तकें पढ़ सकते हैं। आपके समूह को दर्शन से भी गुजरना चाहिए। द्वंदवादी ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टिकोण से भी माथापच्ची करनी चाहिए।
आपने जो उद्धरण दिये हैं, क्या उनमें यह नहीं देखा जाना चाहिए था कि आखिर धर्म और ज्योतिष की नाभीनालबद्धता के बाबजूद इन धर्मग्रंथों में ज्योतिष पर यह दृष्टिकोण क्यों अपनाया गया है? क्या इसमें आपकों कोई पेच नज़र नहीं आया?
आप जल्दबाज़ी में थे, अपने अनुकूल लगती सी इस नई प्राप्त बात को सामने लाने के लिए।
धर्मग्रंथों में अपने विरोधी विचारों के ख़िलाफ़ निर्देश जारी किये जाते हैं, नाकि अपने अनुकूल साबित होने वाली चीज़ों को नकारा जाता है।
यही तथ्य क्या काफ़ी नहीं था, कि शक होना चाहिए था कि जाहिरातौर पर यहां उस वक्त भी प्रचलित फ़लित ज्योतिष के बारे में तो यह बातें कही ही नहीं जा सकती थी। आखिर कौनसा दृष्टिकोण अपने पैरों पर खु़द कुल्हाडी मारेगा।

हालांकि समय अभी इनकी गहराई में नहीं गया है, परंतु उपरोक्त बात तो कही ही जा सकती है।
भाववादी या आदर्शवादी या प्रत्ययवादी धर्मग्रंथों में उस वक्त में प्रचलित भौतिकवादी, यथार्थवादी दृष्टिकोणों पर फ़तवे जारी किए जाते थे। ज्ञान और समझ विकसित करने वाले हर वैज्ञानिक दृष्टिकोण को कुचलने की कोशिश की जाती थी। सांख्यों, चार्वाकों आदि के खिलाफ़ यही किया गया था।
अगर यह सही है, तो जाहिर है कि ग्रहों और नक्षत्रों का ज्ञान रखने वालों या इनपर शोध करने वालों या इन्हें पढ़ने-पढा़ने वाले जिन लोगों की चर्चा की जा रही है, वे उन धर्मग्रंथकारों के लिए खटकने वाले ही रहे होंगे।
जाहिर है फिर वे फलित ज्योतिष के जरिए मनुष्य के भाग्य की भविष्यवाणियां करने वाले तो नहीं ही रहे होंगे। हां वे लोग वे हो सकते हैं, जो कि ग्रहों और नक्षत्रों की स्थितियों और गतियों का प्रेक्षण करने और इनका विज्ञान विकसित करने की कोशिश कर रहे थे, और जाहिरा तौर पर ग्रंथिक प्रस्थापनाओं को चुनौती दे रहे होंगे।
यहां यह भी हो सकता है कि ये उक्तियां भौतिकवादी दार्शनिक परंपरा के ग्रंथों और उनके उद्धरणों से ली गयी हो। सीधे वहीं से, या किसी कारण भाववादी ग्रंथों में भी स्थान पा गई हों। अगर यह भौतिकवादी परंपराओं की हैं, तो जाहिर है इनका भाववादियों के फलित ज्योतिष के ख़िलाफ़ होना ही है। हालांकि इसकी संभावना कम ही है, क्योंकि ये मनुस्मृति में भी स्थान पा गई हैं।
क्या यह सब सोचा और देखा समझा गया था?
मुआफ़ी की दरकार है।
परंतु गंभीर समीक्षा और सही पद्धति का अभाव लगा इसलिए इतना कुछ लिख गया।’

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स्वाइन फ़्लू संबंधी पहेली....पोस्ट पर ‘तस्लीम’ पर टिप्पणी:

‘सावधानी तो ठीक लगती है।
पर अन्य परिप्रेक्ष्यों की भी जाँच कर ही लेनी चाहिए।
कहीं ऐसा तो नहीं कि जागरुकता के भ्रम में हम ड़र फैला रहे हों।
समय भी मुनाफ़े की अभेद्य दीवारों के पीछे झाँकने में अपने आप को अक्षम पाता है।
परंतु फिर भी ऐसी सूचनाएं/अफ़वाहें भी है, जिन्हें भी जितना हो सके जाँच कर चेतावनियों के साथ रख दिया जाए, तो थोड़ा ठीक रहे।
पहली: यह वायरस अमेरिका की उन्नत लैबों में परीक्षणों की एक श्रृंखला के अंतर्गत पैदा किया गया था, या हुआ था। यह बाहर कैसे?
दूसरी: स्वाईन फ़्लू की दवाईयां और जांच किट दे सकने वाली शायद तीन ही कंपनियां थी, और वे भी इस वायरस के फैलने से पहले, मंदी के दौर की तंगी से दिवालिया होने की कगार पर थी।
अब उनके मुनाफ़े की गणना के कयास तो लगाए ही जा सकते हैं।
तीसरी: थोडे़ दिनों बाद ही संयुक्त राष्ट्र ने घोषणा कर दी थी कि जल्द ही पूरे विश्व में इसका टीका उपलब्ध करा दिया जाएगा।
मज़े हो गये, विश्व मीडिया और हमने एक सार्विक ड़र का माहौल तैयार कर ही रखा है, बस टीका आने की देर है।
हम डरे हुए, सहमे हुए लोग मनमाने दामों पर इस टीके को लगवाने के लिए लाईनों में लगे होंगे, और अमेरिका और मल्टीनेशनल्स को शुक्रिया अदा कर रहे होंगे।
दवाइयां तो सिर्फ़ बीमार खाते हैं, पर टीका तो पूरे विश्व में किस पैमाने की खपत रखेगा, आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
बिल्कुल वैसे ही जैसे कुछ ही दिनों पहले हेपीटाइटिस बी का टीका भारत के अधिकतर मध्यम और उच्च वर्ग के भारी दामों में ठोक दिया गया था, बिना ये बताए कि सामान्यतयाः इससे प्रभावित होने की सम्भावनाएं यहां कितनी हैं।
और बता भी दो तो क्या है। ड़र है ज़िंदगी का, और यदि पैसे निकाले जा सकते हों जेब से तो जोखिम क्यों उठाया जाए।
यह भी अफ़वाह है कि पूरे वैश्विक स्तर पर जो मंदी छाई हुई है, इसके जनक उन्नत देशों का यह एक घिनौना षड़यंत्र है जो उन्हें मंदी से उबारने की गारंटी देने की क्षमता रखता है।’

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समय अपनी श्रृंखला को अगली बार जारी रखेगा ही।

समय



18.दर्शन और दुनिया को देखने का नज़रिया


हे मानवश्रेष्ठों,

पिछली बार समय ने दर्शन क्या है? क्यों हैं? पर चर्चा करके दर्शन पर एक सामान्य दृष्टिकोण प्रस्तुत करने की कोशिश की थी, ताकि इस शब्द से एक सटीक मतलब लिया जा सके।

उसी पोस्ट पर जोशी जी की टिप्पणी से एक महत्वपूर्ण बात उजागर होती है, वह है इस शब्द ‘दर्शन’ पर आम सामान्य दृष्टिकोण क्या है। इससे यह बात भी समझ में आती है कि लोक में भी यह बात अच्छी तरह से स्थापित है कि दर्शन का मतलब उस व्यक्ति विशेष की तार्किक समझ और चीज़ों को देखने के उसके नज़रिए से है। इसीलिए जोशी जी यह अपना मत, एक आम मत था, जिसमें उन्होंने कहा था कि हर विषय का अपना एक दर्शन होता है, ओशो से लेकर चाय वाले तक का दर्शन भी एक दर्शन ही है। उन्होंने चार्वाक का जिक्र करके अच्छा हुआ मुझे याद दिलाया कि हमें बाद में कभी इस पर भी चर्चा करनी है, अतएव यह हम बाद में कभी देखेंगे कि चार्वाक दर्शन में कितना मज़ाक था और कितनी गंभीरता। जोशी जी को धन्यवाद कि चर्चा और संवाद को उन्होंने आगे बढा़या।

तो अब ऐसा लग रहा है कि उक्त बात का ही सूत्र पकड़ा जाए और यह देखा जाए कि आखिर फिर शास्त्रीय तरीके से कैसे व्यक्ति विशेष के चीज़ों के प्रति आम नज़रिए यानि दृष्टिकोण एवं रवैये को किस तरह से दर्शन से अलग देखा जा सकता है, और साथ ही यह भी कि इनके बीच आपसी संबंध क्या हैं।

चलिए, चर्चा को आगे बढ़ाते हैं।
दर्शन और विश्व को देखने के मनुष्य के नज़रिए यानि उसके विश्वदृष्टिकोण के बीच क्या संबंध होता है, इसे समझने की कोशिश करते हैं।
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अपने दैनन्दिनी जीवन से जुड़े मामलों, मसलन, शाम कैसे गुजारी जाए, क्या खाया जाए, कहां जाया जाए, आदि-आदि, में मनुष्य उस समय की मनोदशा, अपनी आदतों और तत्कालीन संभावनाओं से निर्देशित होते हैं।

किंतु जीवन में कई ऐसी समस्याएं भी होती हैं जिनसे जूझने के लिए उसे दृढ़विश्वासों की, दुनिया को देखने के एक व्यापक नज़रिए यानि दृष्टिकोण की और मानव जीवन के लक्ष्यों तथा अर्थ की सुस्पष्ट समझ की जरूरत होती है। बुनियादी विश्वासों, विश्व और उसकी संरचना व उत्पत्ति, मानव जीवन के आशय तथा उद्देश्य, और समसामयिक वास्तविकता में मनुष्य के स्थान के बारे में उसके दृष्टिकोणों की समग्रता को उस व्यक्ति विशेष का विश्वदृष्टिकोण कहते हैं।

परिवेशीय जगत से मनुष्य के संबंध का सिद्धांत विकसित करने वाला दर्शन, विश्वदृष्टिकोण के वस्तुतः केंद्र में स्थित होता है। विश्वदृष्टिकोण की रचना में दर्शन के अलावा विज्ञान, कला, धर्म, विभिन्न राजनीतिक मत, देश विशेष का इतिहास, आदि भी भाग लेते हैं। इसके स्वभाव पर लोगों की जीवन पद्धति, उनके दैनिक क्रियाकलापों और उत्पादक क्रियाकलापों की छाप होती है।

लेकिन विश्वदृष्टिकोण की प्रणाली में दर्शन का एक विशेष स्थान होता है। यह क्या है?

दर्शन विश्वास पर कुछ भी स्वीकार नहीं करता। इसकी उत्पत्ति के समय से ही दार्शनिकों ने हमेशा अपनी प्रस्थापनाओं को प्रमाणित करने का प्रयत्न किया है। उन्होंने उनके मंडनार्थ युक्तियां प्रस्तुत कीं, सटीक और अकाट्‍य प्रमाणों के बारे में सिद्धांतों का विकास किया। साथ ही अपने प्रतिपक्षियों के विचारों का खंडन करते हुए दार्शनिकों ने आलोचनात्मक युक्तियों व तर्कणा के क़ायदों का विकास किया। उन्होंने किन्हीं विशेष विचारों को महज़ ठुकराया नहीं, बल्कि ऐसी ठोस, अकाट्‍य युक्तियां प्रस्तुत कीं, जिनसे उनका खंडन हो गया।

इसी तरह विश्व के बारे में कुछ दृष्टिकोणों को प्रमाणित करके तथा उनमें मनुष्य के स्थान को दर्शा करके एक दार्शनिक प्रणाली अपने अनुरूप विश्वदृष्टिकोण को प्रमाणित करती है। फलतः दर्शन किसी भी मनुष्य के विश्वदृष्टिकोण का सैद्धांतिक आधार होता है।
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प्रत्येक ऐतिहासिक युग का अपना ही विश्वदृष्टिकोण था। यह दृष्टिकोण तत्कालीन समाज, विज्ञान, तकनीक तथा संस्कृति, सभी के विकास के स्तर पर निर्भर करता है। जैसे-जैसे समाज में विभिन्न वर्गों का उद्‍भव होता जाता है, वैसे-वैसे ही विश्वदृष्टिकोण का स्वभाव भी वर्गीय होता जाता है। दासों और दास-स्वामियों, भूदासों और ज़मींदारों, मज़दूरों और पूंजीपतियों के भिन्न-भिन्न विश्वदृष्टिकोण होते हैं और मनुष्य की भूमिका तथा उद्देश्यों की उनकी समझ भी भिन्न-भिन्न होती है।

जाहिर है इन वर्गों के हित अलग-अलग होते हैं और आपस में टकराते हैं, अतएव प्रत्येक वर्ग अपने विश्वदृष्टिकोण का मंड़न और वैरी वर्गों के दृष्टिकोणों का खंड़न करने का प्रयास करता है। जो दार्शनिकगण किसी एक वर्ग के हितों की सफ़ाई देते हैं, वे इन्हीं के अनुरूप सिद्धांतों का, इन्हीं के पक्ष की युक्तियों का विकास करते हैं और वैरी दृष्टिकोणों के विरूद्ध संघर्ष के लिए आलोचनात्मक दलीलों को भी परिष्कृत तथा प्रखर बनाते हैं।

विश्वदृष्टिकोणों के रूप में दर्शन की महत्वपूर्ण भूमिका इसी में प्रकट होती है।
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तो हे मानवश्रेष्ठों,
अगली बार हम दर्शन के बुनियादी सवाल से गुजरते हुए, चेतना की उत्पत्ति और विकास संबंधी चर्चा की ओर आगे बढ़ेंगे।

आप यहां से गुजरते रहें।

आलोचनात्मक और जिज्ञासात्मक संवादों का स्वागत है।

समय

शनिवार, 16 मई 2026

17. आखिर दर्शन का ज्ञान क्यों आवश्यक है


समय ने पिछली बार चाहा था कि मानव-मन या चेतना की उत्पत्ति और विकास की प्रक्रिया को यहां थोड़ा सार रूप में प्रस्तुत किया जाए।

परंतु अब बात चल निकली है, और जाहिर है कुछ संदर्भों, दृष्टिकोणों और शब्दावली का व्यापक प्रयोग किया जाएगा, तो यह ज़्यादा बेहतर रहेगा कि बात उन्हीं से शुरू की जाए।

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चूंकि इस हेतु समय को आपके साथ दर्शन के क्षेत्र की यात्रा करनी है, अतएव यह समुचित रहेगा की दर्शन की चर्चा ही यहां सबसे पहले की जाए। तो चलिए दर्शनशास्त्र से शुरूआत करते हैं।
समय मानवजाति के अद्यतन ज्ञान को सिर्फ़ यहां समेकित कर रहा है।

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मनुष्य के सामने सदा से ही ये प्रश्न उपस्थित रहे हैं कि विश्व में उसका स्थान क्या है, मानव जीवन का लक्ष्य, उद्देश्य और मूल्य क्या हैं? यह दुनिया आगे कैसी होगी? क्या इस संसार से उत्पीड़न और अन्याय कभी गायब हो पाएंगे? मनुष्य की नियति में क्या बदा है, युद्धों का महाविनाश या शांतिपूर्ण जीवन? मनुष्य के वर्तमान नाभिकीय युग में ये प्रश्न, मुख्यतः मानवजाति की संभावनाओं का प्रश्न और भी तीव्रता से सामने आता है। आख़िर मनुष्य अपने समय की समस्याओं और अंतर्विरोधों से कैसे निबटें? विज्ञान और तकनीकि की उपलब्धियों को मनुष्य की बेहतरी के लिए कैसे इस्तेमाल करें? और यह मनुष्य की बेहतरी ही खु़द अपने आप में क्या है?

कोई भी सचेत सक्रिय व्यक्ति ऐसे प्रश्नों का उत्तर खोजने की कोशिश किए बिना नहीं रह सकता है। किंतु विज्ञान और तकनीक स्वयं इन प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सकते हैं, और मुख्य बात इन प्रश्नों के हर समय के लिए मान्य उत्तर खोजना और उन्हें मात्र कंठस्थ कर लेना नहीं है। इस बात में पारंगत होना कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है कि तेज़ी से बदलती हुई इस दुनिया में ऐसे उत्तर कैसे खोजे जाते हैं, कौनसे दृष्टिकोण और पद्धतियां इसके लिए ज़्यादा उपयुक्त रहती हैं, इन उत्तरों की सचाई को कैसे परखा जाता है और फिर उनके अनुरूप कर्म कैसे किए जाते हैं।

इसके लिए दर्शन का ज्ञान आवश्यक है।

यह ज्ञान एक विशेष शास्त्र से प्राप्त होता है, जिसे दर्शनशास्त्र कहा जाता है।

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दर्शन का उद्‍भव प्राचीन यूनान में हुआ। 
पाईथागौरस ने सर्वप्रथम philosophy पद का उपयोग किया था। ‍
इस तरह पाश्चात्य भाषाओं में दर्शन का पर्याय ‘फ़िलॉसॉफ़ी’, दो यूनानी शब्दों- प्रेम और बुद्धिमता से मिलकर बना है, यानि इसका अर्थ है बुद्धिमता के प्रति प्रेम।

मनुष्य के आसपास की दुनिया असीम है और वह इसकी पहेलियों को हल करने का प्रयत्न धीरे-धीरे और क़दम दर क़दम चलकर ही कर सकता है। दर्शन में इस असीम का, हर विद्यमान वस्तु के स्रोतों तथा कारणों का संज्ञान प्राप्त करने के लिए अनवरत खोज में जुटने और और हर उपलब्धि पर संदेह करने के प्रयास मूर्त होते हैं। प्राचीन यूनान के महान दार्शनिक अफ़लातून ने कहा था कि दर्शन का स्रोत आश्चर्य और अचंभे में है।

प्राचीन काल में दर्शन तथा इसके उद्देश्यों के बारे में कई विविधतापूर्ण विचारों का आविर्भाव हुआ। महान यूनानी चिंतक अरस्तु का मत था कि सारे विज्ञान एक विशिष्ट लक्ष्य का अनुसरण करते हैं, केवल दर्शन ही सब विज्ञानों में स्वतंत्र है क्योंकि यह स्वयं अपने ख़ातिर अस्तित्वमान है, वहीं एक और सुप्रसिद्ध चिंतक सिसेरो ने इसकी सर्वथा उल्टी बात का दावा किया और कहा कि दर्शन जीवन का ऐसा ध्रुवतारा है जिसके बिना न तो मनुष्य का अस्तित्व हो सकता है, न स्वयं मानव जीवन का।

क्या दर्शन और धर्म अलग अलग हैं ?

मत एक - कुछ लोगों का विश्वास था कि दर्शन को धर्म से पृथक नहीं किया जा सकता, कि यह धार्मिक मताग्रहों की बेहतर समझ में सहायक है। 

मत दो - जबकि कुछ अन्य की राय थी कि यह संदेहों और तर्कबुद्धि पर आधारित है, अतः धर्म से मेल नहीं खाता क्योंकि धर्म आस्था पर आधारित होता है। दर्शन के सार तथा उद्देश्य के बारे में इस तरह से ही, आधुनिक चिंतकों तक के भी कई मत-मतांतर प्रचलित हैं, जिन पर यदि मौका मिला तो समय फिर कभी दर्शन के इतिहास की चर्चा के अंतर्गत बात करना चाहेगा।

फिलहाल दर्शन की अद्यतन समझ को जिस तरह से सामान्यीकृत कर दिया गया है उसे देखिए।

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यह विश्व प्रकृति और समाज से बना है। ज्ञान की अन्य प्रणालियां, मसलन, दैनिक अनुभव पर आधारित साधारण ज्ञान, राजनैतिक, वैज्ञानिक, तकनीकि ज्ञान, आदि वास्तविकता के अलग-अलग पहलुओ को परावर्तित करती हैं और दैनिक जीवन, उद्योग तथा राजनैतिक संघर्ष में, प्रकृति के संज्ञान के दौरान और अन्य मामलों में उनकी जरूरत पड़ती हैं। साथ ही मनुष्यजाति के इतिहास के प्रत्येक युग, प्रत्येक अवधि ने ऐसे कार्य और सवाल पेश किये हैं जो जीवन की सर्वाधिक बुनियादी समस्याओं को छूते हैं और जिनके समाधान पर संपूर्ण मानवजाति की और प्रत्येक व्यक्ति की नियति निर्भर है।

जनसाधारण के बुनियादी हितों को परावर्तित करने बाली इन समस्याओं को समझना, उनसे अवगत होना और उन्हें सटीकतः निरूपित करना अत्यंत कठिन है, और इससे भी अधिक कठिन है उनको हल करने के तरीक़ों और साधनों का पता लगाना। ऐसा करने के लिए विभिन्न विज्ञानों की उपलब्धियों के अत्यंत गहन ज्ञान, मनुष्यों के बुनियादी हितों को समझने और युगों के विभेदक लक्षणों तथा विशेषताओं को सही ढंग से निरूपित करने की योग्यता की जरूरत होती है।

जाहिर है कि इसके वास्ते ज्ञान की एक विशेष प्रणाली की, एक ऐसी प्रणाली की आवश्यकता है, जो वास्तविकता को उसके अलग-अलग पहलुओं और समस्याओं के बजाय एक साकल्य के रूप में देखने में सक्षम हो और जिसके केन्द्र में अपनी सारी आकांक्षाओं, प्रयासों, आशाओं, संदेहों तथा सवालों, अपने सारे अंतर्विरोधों, खोजों और भ्रमों सहित मनुष्य खडा़ हो।

फलतः दर्शन "अपने काल के बौद्धिक सारतत्व" के और "समसामयिक विश्व के दर्शन" की हैसियत से विश्व में मनुष्य के स्थान तथा अपने परिवेशीय जगत के प्रति उसके रुख़ के ज्ञान की एक विशेष प्रणाली है। वह मनुष्य के क्रियाकलाप के आधारों तथा उनकी नियमसंगतियों को जानने के प्रयत्न करता है।

जर्मनी के महान आधुनिक वैज्ञानिक दार्शनिक और चिंतक कार्ल मार्क्स ने दर्शन की व्याख्या करते हुए कहा था:
" चूंकि प्रत्येक सच्चा दर्शन अपने काल का बौद्धिक सारतत्व होता है, इसलिए वह समय अवश्यंभावि रूप से आता है जब दर्शन ना केवल आंतरिक दृष्टि से, ना केवल अपनी अंतर्वस्तु द्वारा, बल्कि अपने रूप के जरिए, बाह्य दृष्टी से भी अपने काल के वास्तविक जगत के संपर्क में आता है तथा उससे अंतर्क्रिया करता है। और तब दर्शन अन्य विशेष प्रणालियों के संदर्भ में सिर्फ़ एक विशेष प्रणाली भर नहीं रह जाता, बल्कि वह विश्व के संदर्भ में सामान्य दर्शन बन जाता है, समसामयिक विश्व का दर्शन बन जाता है। "

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आज इतना ही।
अगली बार चेतना के संदर्भ मे जारी इस चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।
इस श्रृंखला के बाद समय भारतीय दर्शन पर भी चर्चा करने की योजना रखता है।
आप यहां से गुजरते रहें।

आलोचनात्मक और जिज्ञासात्मक संवादों का स्वागत है।

समय

प्रस्तुतकर्ता : शरद कोकास 

मित्रों, पोस्ट के अंत मे टिप्पणियों के नीचे जाएं । यहाँ “ मुख्यपृष्ठ “ पर क्लिक करने से आप मेरे ब्लॉग्स के मीनू या लेटेस्ट सूची तक पहुँच सकते हैं उसके नीचे जहां " वेब वर्शन देखें " लिखा है उसे क्लिक करने पर जो पेज खुलेगा उसमें साइड बार में मेरी पुस्तकों के चित्र हैं जो वस्तुतः उन्हें पढने के लिए लिंक हैं । उन पर क्लिक करें और “कविता कोश” में मेरी कविताएँ पढ़ें । उसी तरह वहाँ दिए गए ब्लॉग्स के चित्र पर टच कर आप मेरे अन्य ब्लॉग्स तक पहुँच सकते हैं – शरद कोकास

बुधवार, 13 मई 2026

16.मनुष्य की चेतना वास्तव मे है क्या



इस बार समय, चेतना की संकल्पना पर मानवजाति द्वारा की गयी अद्यानूतन विवेचना को जस की तस रख रहा है।
थोड़ी सी गंभीरता और ध्यान की दरकार है।

मनुष्य के मस्तिष्क में यथार्थ के प्रतिबिंब के तौर पर मन के कई स्तर होते हैं।

मन का उच्चतम स्तर चेतना है, यह मनुष्य की सक्रियता की सामाजिक-ऐतिहासिक परिस्थितियों और अन्य लोगों के साथ निरंतर भाषाई संपर्क की प्रक्रिया में पैदा होती है। इस दृष्टि से चेतना वास्तव में सत्त्व का ज्ञान ही है।

चेतना की संरचना और उसकी महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक विशेषताएं क्या हैं?

चेतना की पहली विशेषता तो इसके नाम से ही मालूम हो जाती है, जो परिवेशी विश्व के ज्ञान अथवा बोध का पर्याय है। चेतना की संरचना में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संज्ञानात्मक प्रक्रियाएं शामिल हैं, जिनसे मनुष्य अपने ज्ञान की निरंतर वृद्धि करता रहता है। इन प्रक्रियाओं में संवेदनों, प्रत्यक्षों, स्मृति, कल्पना और चिंतन को सम्मिलित किया जा सकता है। संवेदन और प्रत्यक्ष, जो मस्तिष्क पर उत्तेजित करने वाले कारकों के प्रभाव को सीधे परावर्तित करते हैं, चेतना में वैसा ही इन्द्रियजनित चित्र बनाते हैं, जैसा कि वह मनुष्य को दत्त क्षण में प्रतीत हो रहा होता है। 
स्मृति की बदौलत मनुष्य अतीत के बिंबों को चेतना में सुरक्षित रखता है।कल्पना उसे प्रदत्त क्षण में अनुपलब्ध वस्तुओं के बिंबात्मक प्रतिरूप बनाने की संभावना देती है और चिंतन मनुष्य को संचित ज्ञान का तार्किक इस्तेमाल करके समस्याओं को हल करने में समर्थ बनाता है। उपरोक्त मानसिक संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं में किसी एक के भी क्षतिग्रस्त अथवा विकृत होने से चेतना में भी अनिवार्यतः विकृति पैदा हो जाती है।

चेतना की दूसरी विशेषता उसमें कर्ता और वस्तु (विषय) के बीच, अर्थात जो मनुष्य के आत्म का अंग है उसके और जो मनुष्य के अनात्म का अंग है, उसके बीच स्पष्ट भेद किया जाना है। जैव जगत के इतिहास में मनुष्य पहला जीवधारी था, जिसने इस जगत से अलग होकर अपने को परिवेशी वस्तुओं के मुकाबले में रखा। वह अकेला जीवधारी है, जो अपना संज्ञान कर सकता है, अर्थात अपने अहं को अन्वेषण व अध्ययन का विषय बना सकता है। मनुष्य सचेतन ढंग से अपने कार्यों और अपने आप का मूल्यांकन करता है। आत्म का अनात्म से पृथक्करण, जो एक ऐसा अनुभव है जिससे बचपन में हर कोई गुजरता है, मनुष्य की आत्मचेतना के निर्माण में एक महत्त्वपूर्ण चरण है।

चेतना की तीसरी विशेषता मनुष्य के सोद्देश्य क्रियाकलाप का सुनिश्चितीकरण है। चेतना का एक कार्य मनुष्य की सक्रियता के उद्देश्यों का निर्माण है, जिसमें उत्प्रेरकों का बनना तथा उन्हें तौला जाना, संकल्पमूलक निर्णय लेना, विशिष्ट उद्देश्यों की ओर लक्षित कार्यों पर नियंत्रण रखना, आवश्यक सुधार करना, आदि भी सम्मिलित हैं। रोगवश या अन्य किसी कारण से सोद्देश्य क्रियाकलाप में बाधा डालनेवाली सभी मानसिक विचलनों को चेतना का विकार माना जाता है।

चेतना की चौथी विशेषता परिवेश के प्रति एक निश्चित रवैया है। मनुष्य की चेतना का एक अनिवार्य अंग भावों की दुनिया है, जो जटिल वस्तुपरक और मुख्यतः सामाजिक संबंधों को प्रतिबिंबित करती है। मनुष्य जिन अंतर्वैयक्तिक संबंधों में भाग लेता है, उनके भावात्मक मूल्यांकन उसकी चेतना का मूल्यपरक पहलू होते हैं। कई अन्य मामलों की तरह यहां भी विकृतिविज्ञान सामान्य चेतना के सारतत्व को स्पष्ट करने में मदद देता है। 

कतिपय मानसिक रोगों में चेतना के विकार का लक्षण भावनाओं और संबंधों के क्षेत्र की गड़बड़ियां होती हैं: रोगी अपनी माँ तक से घृणा करता है, हालांकि पहले वह उसे बेहद प्यार करता था, या फिर वह अपने मित्रों और संबंधियों की बुराई करता है, इत्यादि।

चेतना और भाषा का संबंध 

चेतना के उपर्युक्त सभी विशिष्ट लक्षण भाषा के माध्यम से बनते और व्यक्त होते हैं और भाषा मन के विकास से अभिन्नतः जुड़ी हुई है। वास्तव में मनुष्य वाक् के जरिए, भाषा द्वारा होने वाले संप्रेषण के जरिए ही ज्ञान का संचय कर सकता है और मानवजाति द्वारा संचित तथा भाषा में अभिव्यक्त विचारों की संपदा से अपने को समृद्ध बना सकता है। भाषा एक विशेष वस्तुपरक प्रणाली है, जो मनुष्य के सामाजिक-ऐतिहासिक अनुभव अथवा सामाजिक चेतना का प्रतिनिधित्व करती है। व्यक्ति द्वारा आत्मसात् किये जाने पर भाषा एक तरह से उसकी वास्तविक चेतना बन जाती है।

एक सामाजिक उत्पाद होने के कारण चेतना केवल मनुष्य में पाई जाती है। पशुओं में चेतना नहीं होती।

मन का सबसे निचला स्तर अचेतन ( subconsious) है, जिसे यों परिभाषित किया जा सकता है: अचेतन उन मानसिक प्रक्रियाओं, कार्यों और अवस्थाओं की समष्टि है, जो ऐसे प्रभावों पर निर्भर है जिनका कि मनुष्य को बोध नहीं है। चेतन मन के विपरीत अचेतन मन व्यक्ति के कार्यों का सोद्देश्य नियंत्रण अथवा उनके परिणामों का मूल्यांकन करने में असमर्थ होता है।

अचेतन के क्षेत्र में निद्रावस्था के दौरान घटित मानसिक व्यापार ( स्वप्न ) ; असंवेदित, किंतु असल में क्षोभकों द्वारा उत्पन्न अनुक्रियाएं ; जो क्रियाएं पहले चेतनाधारित थी किंतु स्वतः होने या बारंबार आवृति के कारण चेतन मन से विस्थापित हो गयीं ; सक्रियता के कतिपय उत्प्रेरक, जिनमें लक्ष्य की चेतना का अभाव है, और बहुत सी चीज़ें आती हैं। अचेतन परिघटनाओं में बीमार मनुष्य के मन में पैदा होनेवाली प्रलाप, विभ्रम, आदि कतिपय विकृतिमूलक प्रक्रियाओं को भी शामिल किया जाता है। अचेतन मन को चेतन मन का विलोम मानकर, अचेतन को पशु मानस का प्रतिरूप समझ बैठना ठीक न होगा। अचेतन भी मानव मन की चेतना जैसी ही चारित्रिक विशेषता है और वह भी मनुष्य के अस्तित्व की सामाजिक परिस्थितियों द्वारा निर्धारित होता है, हालांकि वास्तव में वह मनुष्य के मन में विश्व का केवल आंशिक तथा अपर्याप्त प्रतिबिंब है।

मन और मस्तिष्क, मन और परिवेश के सहसंबंधों की आगे की जांच के लिए और मानव सक्रियता के मानसिक नियमन तथा नियंत्रण के आगे विश्लेषण के लिए मन की, चेतना की उत्पत्ति के प्रश्न की अधिक विस्तार से विवेचना की आवश्यकता है। वास्तव में मन की मुख्य नियमसंगतियों और मानव चेतना के निर्माण के प्रश्नों का उदविकासीय दृष्टिकोण से विश्लेषण करके ही प्रकाश में लाया और ह्र्दयंगम किया जा सकता है।

समय 

प्रस्तुति :शरद कोकास 

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मंगलवार, 12 मई 2026

15. समलैंगिकता पर यह नहीं पढ़ा होगा कभी

समलेंगिकता पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, पढा़ जा चुका है।

अभी समय ब्लॉग पर है अतः यह भी कहेगा कि बहुत ब्लॉग काले किए जा चुके हैं।

समय अधिकतर से गुजरा है और यह कहने में कोई संकोच नहीं रखता कि इक्का-दुक्का जगहों को छोडकर अधिकतर जगह इस पर परंपरा में मिले बने-बनाए ढांचे के अंतर्गत ही अपने दिमाग़ का घोडा़ खूब दौडाया गया है।

तो चलिए आज दृष्टि डालते हैं और पडताल करते हैं, समलेंगिकता पर की गयी महान चर्चाओं में पेश की गई कुछ प्रवृतियों की। समय की दिलचस्पी इन्हीं में है, उसका इरादा यहां समलेंगिकता पर कोई नया पुराण लिखना नहीं है।

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एक बात तो यह कही गई कि यह प्रकृति की व्यवस्था के खिलाफ़ है।

चलिए पहले प्रकृति की व्यवस्था की ही बात कर लेते हैं। समय को सिर्फ़ इस तर्क में दिलचस्पी है।

अब यह बात बार-बार दोहराने की जरूरत नहीं रह गई है कि प्रकृति का हमसाया होकर नहीं वरन मनुष्य नाम का प्राणी सिर्फ़ इसी वज़ह से अस्तित्व में आया कि वह प्रकृति के खिलाफ़ खडा हो गया। उसने प्रकृति की हर व्यवस्था को चुनौती दी और प्रकृति को अपने हिसाब से ढ़ालना सीखा।आज मनुष्य के पास प्रकृति की व्यवस्था का कुछ नहीं बचा है, वरन उसने प्रकृति को अपनी व्यवस्था में ढा़ल लिया है। प्राकृतिक वर्षा का मामला कुछ जरूर निर्भरता रखता है, पर इससे भी कई जगह वह अपनी निर्भरता समाप्त कर चुका है। यह बात दीगर है कि प्रकृति के इस अनियोजित दोहन और निरूपण के प्रभावों के पश्चात अब वह इसके भी समुचित नियोजन की ओर उन्मुख हो रहा है।

अतएव इस तर्क के जरिए समलेंगिकता को खारिज़ करना उचित नहीं जान पडता।

अब जरा यह भी देख लें कि वास्तव में प्राकृतिक व्यवस्था के निमित्त मनुष्य का सामान्यतया क्या दृष्टिकोण है। यदि दो विपरीत लिंगियों का यौन आकर्षण और तदअनुरूप क्रियाएं प्राकृतिक व्यवस्था के अंतर्गत आती हैं, तो इनके लिए मनुष्य-समाज में कितनी सहजता है, यह कितनी सुलभ और सर्वमान्य हैं, यह किसी से भी छुपा नहीं है। मनुष्य का सारा धार्मिक इतिहास इन्हीं की वर्जनाओं और प्रतिबंधों से भरा पडा़ है। मनुष्य के इतिहास की अधिकतर उर्जा इन्हीं के दमन में नष्ट हुई है।

क्या ब्रह्मचर्य का पालन, उपवास, शरीर को कष्ट पहुंचाना, प्रेम की खिलाफ़त, अन्याय, शोषण आदि-आदि प्राकृतिक व्यवस्था के खिलाफ़ नहीं है?

एक और नज़रिया देखें।

यदि समलेंगिकता से कुछ देर के लिए यौन क्रियाओं को अलग कर देते हैं, तो हे मानव श्रेष्ठों क्या बचता है? दो समान लिंगियों के बीच के भावनात्मक और दोस्ताना संबंध ही ना।अब बताइये, दो विपरीत लिंगियों के बीच तो मनुष्यों ने इतनी बड़ी खाई खडी कर रखी है कि समाज में सहज रूप से उपलब्ध ये भावनात्मक और दोस्ताना संबंध सिर्फ़ और सिर्फ़ समान लिंगियों के बीच ही पनपते देखें जा सकते हैं।

पुरूषों के सिर्फ़ पुरूष मित्र होते है, स्त्रियों के सिर्फ़ स्त्री मित्र। 

दो विपरीत लिंगियों के बीच मित्रता, भावनात्मक और दोस्ताना संबंध की बात तो अभी भी अधिकतर रूप से सूली पर चढाने के योग्य मानी जाती है, असामाजिक और अनैतिक।

फिर जरा सोचिए, आज के इस असुरक्षा, अविश्वास और अनिश्चितता के माहौल में भावनात्मक, दोस्ताना, और सुरक्षित संबंधों को ढूंढ़ते ये समलेंगिक मित्र यदि साथ रहना निश्चित कर लेते हैं ( अभी यौन क्रियाएं की बात ही नहीं उठाई जा रही है), जीवन के इस संघर्ष में हमराही होने में ज्यादा निश्चिंतता पाते हैं तो क्या वाकई यह इतना असहज कार्य कर रहे हैं?

और यदि यह साथ रहना, यह भावनात्मक लगाव, शारीरिक जरूरतों की यह प्राकृतिक आवश्यकता यदि उनके बीच थोडी बहुत तात्कालिक यौन क्रियाओं की संभावनाओं के हालात भी पैदा कर देती है, तो बताइये क्या यह उनकी सामाजिक व्यवस्थागत नियती नहीं है?

यहां प्राकृतिक असंतुलन या कमियों के चलते समलिंगियों के प्रति किसी मनुष्य के सहज आकर्षण को अलग से देखे जाने की जरूरत है। जाहिर है यह भी प्राकृतिक शक्तियों के कारण ही उनकी नियति है जो कि अंततः उन्हें प्राकृतिक विपरीत लिंगी व्यवस्था के खिलाफ़ जाने की प्राकृतिक आवश्यकता बन रही है। ऐसे लोगों को समाज में किस तरह उपहास और विलगता का विषयी बनाया जाता है यह जगजाहिर सी ही बात है। ऐसे सामाजिक व्यवहार के बीच उन्हें कोई अपने जैसा मिलजाना क्या एक नैमत की तरह नहीं है, जिसके लिए वे भगवान? का शुक्रिया अदा करें, और इस सृष्टि में अपना होना भी महसूस करें।

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दूसरी ओर समलेंगिकता को जायज ठहराने के लिए इतिहास से उदाहरण खोज कर लाने और इनके जरिए इसके अस्तित्व की शाश्वतता को स्थापित और प्रमाणित करने की प्रवृति भी दिखाई दी।

बात यहां तक तो ठीक है इतिहास की, अतीत की समालोचना के जरिए मनुष्य किसी भी समस्या के उत्स को खोजने, उसके विकास की प्रक्रिया को समझने और प्राप्त समझ को भावी निदान के लिए उपयोग करने की प्रक्रिया से गुजरे परंतु वर्तमान विसंगतियों को शाश्वत बताने और परिवर्तन के धार को कुंद करने के लिए इतिहास से गडे़ मुर्दे उखाड़ लाने की प्रवृति सामाजिक रूप से खतरनाक है।

अतीत से भविष्य संवारने के सबक सीखे जाने चाहिएं, ना कि यथास्थिति बनाए रखने के लिए चालाकी भरे नुस्ख़े।अतीत की किसी संवृति का उदाहरण देकर वर्तमान की किसी भी विसंगति को जायज नहीं ठहराया जा सकता। इस तरह तो वर्तमान समाज की कई नकारात्मक्ताओं के उदारहण इतिहास में खोजे जा सकते हैं और उनको कायम रखने के लिए पुरजोर बहसें की जा सकती हैं। यह प्रवृति ठीक नहीं है, हालांकि समाज में कई मनुष्यों और समूहों को ऐसे ही प्रयास करते देखा जा सकता है।

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समलेंगिकता को चार प्रकारों या अवस्थाओं में देखा जा सकता है:

१. व्यक्तिवादी, अहंवादी मानसिकता के चलते अक्सर साधन संपन्नों द्वारा यौन क्रीडा़ओं, यौन कुंठाओं की तृप्ति के लिए किए जाने वाले समलेंगिक यौन-व्यापार।

२. उपरोक्त विवेचना के आधार पर पैदा हुए समलेंगिक भावनात्मक संबंध जिनमें यौन क्रियाएं महत्त्वपूर्ण नहीं हैं।

३. ऐसे समलेंगिक भावनात्मक संबंध जिनमें यौन क्रियाएं भी अस्तित्व में आ जाती है और महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं।

४. शारीरिक हार्मोन असंतुलन और कमियों के चलते बनें समलेंगिक संबंध। ऐसे में कुछ पुरूषों में स्त्रेण प्रवृतियां और कुछ स्त्रियों में पौरुषेय प्रवृतियां देखी जा सकती हैं। यहां दो तरह के जोडे अस्तित्व में आ सकते हैं, एक तो ऐसा जोडा जहां एक सदस्य विपरीत प्रवृतियों में है जबकि दूसरा सामान्य, और दूसरा ऐसा जोडा जहां दोनों ही सदस्य विपरीत प्रवृतियों में हैं परंतु एक जैसे होने के कारण लगाव पैदा होने से एक दूसरे के साथ सामाजिक सुरक्षा और शांति पाते हैं।

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पहली अवस्था निस्संदेह एक व्यक्तिवादी विकृति है जो कि वर्तमान ढ़ांचे के अवशिष्ट की तरह है, इसका प्रतिकार किया जाना चाहिए परंतु इसका व्यवहारिक उन्मूलन इस राजनैतिक-सामाजिक ढ़ांचे में आमूलचूल परिवर्तन से ही संभव है।

दूसरी व तीसरी अवस्था भी इसी सामाजिक ढ़ांचे की अनिच्छित अभिव्यक्तियां हैं। जैसा कि ऊपर विवेचित किया गया है यह प्राकृतिक सहज संबंधों के बीच एक आप्राकृतिक असहजता के बंधनों की वज़ह से हैं और इस प्राकृतिक सहजता के निरूपण में ही इनके लोप होने की संभावनाएं हैं। जब मनुष्यों के बीच हर तरह के भेद समाप्त होने की सामाजिक परिस्थितियां विकसित कर ली जाएंगी तो लिंगभेद के हिसाब से भी कुछ तय होने की संभावनाएं नहीं रहेंगी।

तब तक यह वाजिब ही है उनकी उनकी इच्छाओं का सम्मान किया जाए, उन्हें अधिकार दिया जाए कि वे इस मामले में अपने निर्णयों के लिए स्वतंत्र हैं। स्वतंत्रता का यह अहसास ही उनके मूल धारा में लौटने का अवसर प्रदान करेगा। वरना यहां भी कई मामलों में, प्रेम के मामलों की तरह ही मनुष्य इन अपेक्षाकृत कम महत्त्व की चीज़ों को, प्रतिबंधों की प्रतिक्रियास्वरूप ज्यादा ही तूल देता है और एक मानसिक घटाघोप में फंसकर जबरन अपनी इच्छापूर्ति करने की कोशिश करता है और फलतः कई और तरह के अंतर्विरोधों में उलझकर रह जाता है। यह एक सनक और उसकी असहजपूर्ति बनकर रह जाता है।

चौथी अवस्था महत्त्वपूर्ण है और जाहिर है मनुष्य समाज में और भी कई शारीरिक अयोग्यताओं पर सामान्यतया अपनाई जाने वाली सामाजिक व्यवस्थाओं और मान्यताओं के सापेक्ष ही इन्हें तौले जाने की जरूरत है। यह भी एक तरह की शारीरिक अयोग्यता ( physical disability ) है क्योंकि यह भी शारीरिक कमियों के चलते ही पैदा होती है। इसीलिए इस मामले को भी उसी नज़रिए से देखे जाने की जरूरत है जैसे कि अपंगता, मानसिक अयोग्यताओं, लाईलाज या गंभीर बीमारियों से ग्रस्त मनुष्यों या समाजिक अन्याय झेल रहे मनुष्यों के मामलों में विचार करते वक्त अपनाया जाता है।

उपरोक्त सभी तरह की समलेंगिकताओं को एक साथ नहीं समेटा जा सकता। तात्कालिक प्रतिक्रियाओं में यह भूल हो रही है कि बिना इनकी बारीकी में गये सभी को एक ही लाठी से हांका जा रहा है। इन्हें अलग-अलग ही देखा जाना चाहिए और तदअनुरूप ही इन पर समुचित नज़रिया अपनाया जाना चाहिए।

समझदारी का तो यही तकाज़ा है।

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लंबा हो ही जाता है, बक-बक में ध्यान ही नहीं रहता।

खैर जी, जरूरी लगता है तो मनु्ष्य लंबे रास्तों पर चलता ही है।

एक जगह एक नारा देखा था:

`shortcuts may cut short your life'

यह दिमाग़ में रखा जा सकता है।

समय

प्रस्तुति :शरद कोकास