मंगलवार, 19 मई 2026

30.जीवन का क्रमविकास और तंत्रिकातंत्र की उत्पत्ति










by समय

हे मानवश्रेष्ठों,

पिछली बार हमने जैव जगत में संक्रमण के दौरान परावर्तन के रूपों के जटिलीकरण की सैद्धांतिक अवधारणाओं के सार-संक्षेप पर एक नज़र ड़ाली थी। आज हम यहां जीवन के क्रमविकास और तंत्रिकातंत्र की उत्पत्ति से संबंधित अवधारणाओं से गुजरेंगे।

यहां एक बात कहने की जरूरत महसूस हो रही है।

सैद्धांतिक अवधारणाएं, इनसे अब तक अपरिचित मानवश्रेष्ठों के लिए थोड़ा दुरूह होती हैं, पर यही दुरूहता गंभीर दिलचस्पी रखने वाले मानवश्रेष्ठों के लिए इन्हें समझे जाने की जरूरत और इस हेतु सक्रिय प्रयासों का रास्ता भी प्रशस्त करती है। दुरूहताओं से सप्रयास जूझना, इनके संबंध में मानवश्रेष्ठों की समझ को अंदर से मथता है और प्राप्त संगतियां और निष्कर्ष उसकी समझ का हिस्सा बनते हैं, जिससे कि अंततः उसका व्यवहार निर्देशित होता है।

बिना इस प्रक्रिया के प्राप्त ज्ञान, - जो पहले से प्राप्त अनुकूलित प्रबोधन के साथ अंतर्क्रियाएं तथा अंतर्संबध नहीं पैदा कर पाता, इसका स्वाभाविक विकास नहीं कर पाता - आंतरिक मानसिक जगत के लिए सिर्फ़ सूचनाओं का जंजाल बनता है (जिन्हें स्मृति कई बार, अक्सर भुला भी देती है), वह समझ और व्यवहार का हिस्सा नहीं बन पाता, मनुष्य का अपना एक सार्विक वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा नहीं कर पाता।

आखिर यह अकारण नहीं होता कि न्यूटन जैसा महान वैज्ञानिक अपने जीवन के अंत समय में धार्मिकता की ओर उन्मुख हो जाता है, चोटी के वैज्ञानिक भाववादी मानसिकताओं में उलझे रहते हैं, रॉकेटों, चंद्रयानों को नारियल फोड़ कर अंतरिक्ष में भेजा जाता है, बड़े-बड़े डॉक्टर अलौकिक चमत्कारिकता में विश्वास करते पाये जाते हैं, और कई प्रबुद्ध और समझदार से लगते लोग अपने कार्यक्षेत्र में भी और इससे बाहर की चीज़ों के साथ भी अमूमन अपनी सामंती परंपराओं से प्राप्त मानसिकता औए समझ के साथ सोचते और व्यवहार करते नज़र आते हैं।

कभी अवसर उपलब्ध हुआ और समय मिला तो सामाजिक-वैयक्तिक मनोविज्ञान की इन स्वाभाविक परिणितियों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी, फिलहाल आपके मनोजगत में हलचल के लिए इतने ही इशारे पर्याप्त से लग रहे है। आखिर कहा भी तो जाता है कि समझदार को इशारा काफ़ी होता है।

चलिए अपने उसी विषय पर लौटते हैं, और चर्चा को आगे बढ़ाते हैं। यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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जीवन का क्रमविकास और तंत्रिकातंत्र की उत्पत्ति

परावर्तन का आगे का विकास जीवन के क्रमविकास से संबद्ध था। जीवन भूतद्रव्य के अस्तित्व तथा उसकी गति का एक विशेष रूप है। इसके बुनियादी भौतिक वाहक हैं प्रोटीन और न्यूक्लीय अम्ल, जो जीवित अंगियों की संतानोत्पत्ति तथा आनुवंशिकता के संचारण और नियंत्रण को सुनिश्चित बनाते हैं। जीवित अंगियों के विशिष्ट लक्षण हैं उपापचयन, वृद्धि, उत्तेज्यता ( क्षोभनशीलता ), स्वपुनरुत्पादन, स्वनियमन और पर्यावरण के प्रति अनुकूलित होने की क्षमता। सरलतम अंगी एककोशिकीय हैं। जीवन का और अधिक परिष्करण लंबी, जटिल, अंतर्विरोधी विकास की प्रक्रिया के जरिए हुआ। इस प्रक्रिया को जैविक क्रमविकास कहते हैं।

क्रमविकास के दौरान जीवित अंगी अधिक जटिल और परिष्कृत बनते गये। चूंकि पर्यावरण तथा जीवन की सारी दशाएं धीरे-धीरे बदलीं, इसलिए अंगियों की वही किस्में जीवित बची रहीं, जो इन परिवर्तनों के लिए सर्वोत्तम ढ़ंग से अनुकूलित थीं। पर्यावरण के प्रति अनुकूलन दो प्रक्रियाओं पर आधारित है: पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचारित होने वाले अनुगुण तथा विशेषताएं ( आनुवंशिकता ) और परिवर्तनशीलता ( उत्परिपर्तन )। विभिन्न कारणों से प्रभावांतर्गत अंगियों की कई विशेषताएं सहसा छलांगनुमा ढ़ंग से परिवर्तित हो जाती हैं। यह परिवर्तन सारी जाति की दृष्टि से सांयोगिक हो सकते हैं। यदि कोई अनेपक्षित परिवर्तन उपयोगी सिद्ध हुआ ( बाह्य जगत के प्रति बेहतर अनुकूलन की क्षमता और आनुवंशिकता के द्वारा संचारण ) तो उस अंगी के वंशज पौधों व जानवरों की अन्य जातियों के साथ अस्तित्व के लिए संघर्ष में अधिक आसानी से जीवित बचे रहे।

जीवित अंगी बाह्य पर्यावरण की क्रिया के ही विषय नहीं हैं, बल्कि स्वयं भी उसको प्रभावित करते हैं। अपने जीवन के क्रियाकलाप के दौरान, पर्यावरण के प्रति अनुकूलित होते समय वे एक निश्चित क्रिया या निश्चित कार्य करते हैं। यह परावर्तन के सिद्धांत के नज़रिए से विशेष महत्वपूर्ण है, क्योंकि जीवित अंगियों में परावर्तन सिर्फ़ उनकी आंतरिक संरचनाओं में प्रतिकूल परिवर्तनों से ही नहीं, बल्कि उनकी जीवन क्रिया से भी संबद्ध हैं।

जीवन संघर्ष के दौरान अंगी अधिक जटिल तथा परिष्कृत होते गये और इसी प्रक्रिया में एककोशिकीय से बहुकोशिकीय अंगियों में संक्रमण हुआ। बहुकोशिकीय अंगियों की कोशिकाओं के समूह और अंग अलग-अलग कार्य करने के लिए विशेषीकृत हो गये। समय बीतने पर तंत्रिका कोशिका नाम की कोशिकाओं के समूह पैदा होते हैं, जो परावर्तन का कार्य करने के लिए विशेषीकृत होते हैं।

जीवित अंगियों में परावर्तन उत्तेजनशीलता के अनुगुण के रूप में प्रकट होता है, यानि पर्यावरण के असर के प्रति अनुक्रिया करने की अंगी की क्षमता के रूप में। इसमें वह एक निश्चित समयांतराल में अपने को इस ढ़ंग से परिवर्तित कर लेता है कि वह उस प्रभाव के प्रति बेहतर ढ़ंग से अनुकूलित होने और अपने को जीवित तथा सुरक्षित रखने में समर्थ हो जाता है। उत्तेजनशीलता का आधार भौतिक जैव-विद्युतीय प्रक्रियाएं होती हैं।

क्रम-विकास की अगली अवस्था में अधिक विकसित प्राणियों ( मत्स्य, कीट, जलस्थलचारी, स्तनपायी ) में एक जटिल बहुशाखीय तंत्रिकातंत्र बन गया। नये विशेषीकरण के फलस्वरूप कुछ तंत्रिका कोशिकाएं पर्यावरण के केवल प्रकाश के प्रभावों, कुछ केवल ध्वनि प्रभावों और कुछ यांत्रिक प्तभावों का ही प्रत्यक्षण करने लगीं। कोशिकाओं का एक विशेष समूह अन्य के बीच संबंध स्थापित करनेवाला मध्यस्थ बन गया यानि तंत्रिका आवेगों को अन्य अंगों तक संचारित करने, पूर्ववर्ती प्रभावों के बारे में सूचना संग्रह ( स्मरण ) करने तथा पर्यावरण से प्राप्त संकेतों का विश्लेषण तथा उनमें फेरबदल करने के विशेष कार्य करने लगा। उच्चतर जानवरों में इन विशेष तंत्रिका कोशिकाओं से एक विशेष अंग की रचना हुई, जो पर्यावरण के सारे परावर्तनों तथा उसके साथ अंतर्क्रिया के नियंत्रण का कार्य करने लगा। यह अंग मस्तिष्क है।

तंत्रिकातंत्र और ख़ासकर मस्तिष्क की उत्पत्ति के साथ परावर्तन एक नये और अधिक ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। बाह्य जगत के वस्तुगत प्रभावों के प्रति अनुक्रिया के रूप में प्रतिकूल संरचनात्मक परिवर्तन ऐसे कार्य संबंधी परिवर्तनों से संपूरित हो गये, जो अंगी को बनाए या सुरक्षित रखने के लिए ही नहीं, बल्कि अपने प्राकृतिक वास-स्थल के प्रति तथा उसके साथ अंतर्क्रिया करने के लिए भी बेहतर अनुकूलित थे।
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इस बार इतना ही।
अगली प्रस्तुतियों में, यथार्थता के निष्क्रिय और सक्रिय परावर्तन पर नज़र ड़ालेंगे, और चेतना की उत्पत्ति की ओर आगे बढ़ेंगे।
आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय



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29.जैव जगत में संक्रमण के दौरान परावर्तन










by समय

हे मानवश्रेष्ठों,

पिछली बार हमने अजैव जगत में परावर्तन के कुछ रूपों की चर्चा की थी।

इस बार जैव जगत में संक्रमण के दौरान परावर्तन के रूपों के जटिलीकरण पर एक नज़र ड़ालेंगे। यह एक महत्ववपूर्ण और दिलचस्प पड़ाव है जो परावर्तन के जटिलीकरण और उससे चेतना की उत्पत्ति तथा जैविक परावर्तन के क्रमिक विकास की पड़ताल से जुड़ा है।

समय की योजना है कि इस पर मानवजाति के अद्यानूतन ज्ञान के बारे में यहां विस्तार से प्रचुर सामग्री समेकित और प्रस्तुत की जा सके, ताकि जिज्ञासू प्रवृत्ति के मानवश्रेष्ठों को इच्छित संदर्भ-संकेत मिल सकें।
समय निमित्त मात्र है।
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पृथ्वी में जीवन अरबों वर्ष पहले उत्पन्न हुआ, और इसकी उत्पत्ति में कोई चमत्कारिकता नहीं है। गर्म महासागर में तथा जलीय वाष्प से भरपूर वायुमंडल में हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, आक्सीजन और अन्य तत्वों की प्रचुरता थी। जटिल भौतिक-रासायनिक प्रक्रियाओं के फलस्वरूप उनसे कार्बनिक यौगिकों की रचना हुई। अनेक वैज्ञानिकों के कार्यों की बदौलत आधुनिक विज्ञान में इन यौगिकों को प्रयोगशाला में हासिल करने की विधियों का विकास हुआ।

अजैव से जैव पदार्थ में परिवर्तन की व्याख्या के लिए अनेक सिद्धांत प्रतिपादित किये गए। ओपारिन ने सुझाया कि ज्यों ही कार्बन-आधारित जैव द्रव्य बन गये, जिनमें कार्बन के परमाणु विविध प्रकार से नाइट्रोजन, आक्सीजन, हाइड्रोजन, फ़ास्फ़ोरस और गंधक के परमाणुओं से जुड़े होते हैं, जैव पदार्थ की उत्पत्ति के लिए आधार तैयार हो गया। आधुनिक विज्ञान इस मत के समर्थन में काफ़ी प्रमाण प्रस्तुत करता है।

ओपारिन के सिद्धांत के अनुसार जैव द्रव्यों का निर्माण लगभग दो अरब वर्ष पहले पृथ्वी के वायुमंडल में मुक्त आक्सीजन की उत्पत्ति और तत्जनित प्रकाश-रासायनिक अभिक्रियाओं एवं प्रकाश-संश्लेषण की बदौलत शुरू हुआ था। आद्य महासागर बहुत कुछ जैव द्रव्यों के काढ़े जैसा था, जो समय के साथ विराट अणुओं वाले अत्यंत जटिल कार्बन-आधारित द्रव्यों में संश्लेषित हो गया। ( इसके विपरीत भी एक सिद्धांत है, जिसका प्रतिपादन आल्फ़ेद कास्तलेर ने किया और इसके अनुसार आणविक यौगिकों का व्यवस्थित स्वरूप सामान्य अवस्थाओं में बढ़ने की बजाए घटते ही जाता है। इस कारण इसकी अत्यंत कम संभावना है कि जैव योगिकों की उत्पत्ति पृथ्वी पर हुई होगी। दूसरे शब्दों में, इस सिद्धांत का प्रतिपादक जीवन के पृथ्वी से इतर मूल की प्राक्कल्पना का समर्थन करता है)

अस्थिर और सहजता से अपने घटकों में विखंड़ित होनेवाले अणु, अपने स्थिर अस्तित्व के लिए (स्थायित्व के लिए) अपने से बाहर के प्राकृतिक परिवेश के साथ सतत चयापचयी विनिमय पर ( यानि परिवेश के द्रव्यों के चयनात्मक आत्मसातीकरण और अपघटन के उत्पादों के उत्सर्जन पर ) निर्भर थे। इस तरह विराट अणु वास्तव में स्वयं अपना उत्पादन करने वाले तंत्रों में परिवर्तित हो गए, जो स्वोत्प्रेरक ढ़ंग से द्रव्यों की उनके प्राकृतिक परिवेश के साथ विनिमय की प्रक्रिया का नियमन करते थे।

इन अणुओं में और, सर्वोपरी, समस्त जीवित अंगियों के अंगों की रचना करने वाले प्रोटीन के अणुओं में, ऐसे अनुगुण थे, जो हमारे लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। बाहरी वस्तुओं के प्रभावांतर्गत वे विखंड़ित नहीं हुए, गुणात्मक भिन्न प्रणालियों में रूपांतरित नहीं हुए, बल्कि संरक्षित रहे और उनका अस्तित्व बना रहा। इसका यह अर्थ है कि इन अणुओं से विरचित पदार्थ के अंशों या तत्वों के पारस्परिक आंतरिक विन्यास में एक परिवर्तन हो गया। बाह्य प्रभावों की प्रतिक्रिया स्वरूप कणों तथा तत्वों के बीच उर्जा संपर्क परिवर्तित हुए, किंतु स्वयं पदार्थ की प्रणाली का अपने घटक अंगों और तत्वों में विखंड़न नहीं हुआ। जब ऐसे परिवर्तन लाने वाले कारकों की संक्रिया बंद हो जाती है, तो विषयी अपनी पहले वाली स्थिति में वापस आ जाता है।

इस तरह यह कहा जा सकता है कि अजैवजगत और निर्जीव प्रकृति से जैवजगत तथा सजीव प्रकृति में संक्रमण की अवधि, परावर्तन के रूपों के विकास की एक नयी अवस्था थी। जटिल जैविक प्रणालियों के स्तर पर भी परावर्तन इस बात में देखा जाता है कि विषय ( बाह्य प्रभावों ) की क्रिया के प्रति विषयी अपनी कुछ आंतरिक संरचनाओं में बदलाव के जरिए अनुक्रिया करता है। जब क्रिया बंद हो जाती है, तो ये संरचनाएं अपनी मूल अवस्था पर लौट आती हैं और इस तरह परावर्तन के विषयी के लिए अस्तित्वमान रहना और विकसित होना संभव हो जाता है।

अतएव, यह सोचने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं कि परावर्तन के भ्रूण रूपों से युक्त ऐसी जैव संरचनाएं ही अनेक भूवैज्ञानिक युगों के दौरान विकसित होकर आज के जैव तंत्रों के पुरखे बनीं।

संद्रवावक्षेपों ( कोएसर्वेट ) के नाम से ज्ञात प्रोटीन के अणुओं की भांति, जो संभवतः आधुनिक जीवधारियों के आद्य प्ररूप थे, सभी प्रकार के जैव द्रव्य, बाह्य प्रभावों के परावर्तन के ढ़ंग के मामले में ही जड़ प्रकृति से भिन्न होते हैं। यह परावर्तन स्वयं पर्यावरणीय प्रभावों, उनकी तीव्रता तथा स्वरूप पर ही नहीं, अपितु जीवधारी की आंतरिक दशा पर भी निर्भर होता है। हर जीवधारी सभी बाह्य क्षोभकों ( उद्दीपकों, exciter ) के प्रति चयनात्मक, अर्थात सक्रिय रवैया अपनाता है और इस तरह जैव प्रकृति की एक गुणात्मक नयी विशेषता, स्वतःनियमन का प्रदर्शन करता है।

उदविकास की लंबी प्रक्रिया के फलस्वरूप वर्तमान अवयवियों ने क्षोभनशीलता (उद्दीपनशीलता) से लेकर संवेदन, प्रत्यक्ष,स्मृति और चिंतन यानि मानसिक जीवन की विभिन्न अभिव्यक्तियां तक, परावर्तन के अनेकानेक रूप विकसित कर लिये हैं।
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इस बार इतना ही।
अगली प्रस्तुतियों में, जैव जगत में परावर्तन के रूपों के जटिलीकरण पर प्रमुखता से नज़र ड़ालेंगे, और थोड़ा विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे।

28.अजैव जगत में परावर्तन










by समय

हे मानवश्रेष्ठों,
पिछली बार हमने पदार्थ के मूलभूत गुण के रूप में, परावर्तन ( Reflection, a reflex action, an action in return ) की चर्चा शुरू की थी।
इसी को आगे बढ़ाने और समझने के लिए आज हम अजैव जगत में परावर्तन के कुछ रूपों की चर्चा करेंगे।
समय यहां अद्यतन ज्ञान को सिर्फ़ समेकित कर रहा है।
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हमने जाना था कि, परावर्तन हर भौतिक वस्तु ( परावर्तन के विषयी ) का अपने साथ अंतर्क्रियाशील अन्य भौतिक वस्तुओं ( विषयों ) के प्रभाव के प्रति अनुक्रिया करने का एक विशेष गुण है।

परावर्तन का सरलतम रूप अजैव जगत में पाया जाता है, जो भूतद्रव्य ( Matter ) की गति के यांत्रिक, रासायनिक, भौतिक तथा कुछ अन्य रूपों में अपने आपको अभिव्यक्त करता है।

अजैव जगत में परावर्तन के इन रूपों की विशेषता को समझने के लिए हम चंद उदाहरणों पर ग़ौर करते हैं:

१. हम बिलियर्ड के बल्ले से गेंद पर चोट करते हैं। गेंद एक निश्चित दिशा में और एक निश्चित दूरी तक ऐसी रफ़्तार से लुढ़कती है, जो गेंद पर किये गए आघात बल पर निर्भर होती है।

२. दो प्राथमिक भौतिक कण, ऋण आवेश युक्त इलैक्ट्रॉन तथा धन आवेश युक्त पोज़ीट्रॉन निश्चित दशाओं में एक दूसरे से टकराते हैं और नष्ट हो जाते हैं, यानि दो फ़ोटोनों में अर्थात प्रकाश के क्वांटमों में तबदील हो जाते हैं।

३. जब क्षरण से अरक्षित लोहे की किसी वस्तु पर पानी गिर जाता है, तो ऑक्सीकरण की क्रिया से उस वस्तु में जंग लग जाता है।

४. कठोरतम चट्टानों से निर्मित पहाड़ भी धूप, पानी और रेत के कणों, वायु तथा कंकरों के प्रभाव से शनैः शनैः टूटता है, उसमें दरारें पड़ जाती हैं और वह घिस-पिटकर छोटे-छोटे टुकड़ों में और अंततः बालू में परिणत हो जाता है।

इन उदाहरणों में हम भूतद्रव्य की गति के विविध रूपों ( यांत्रिक, भौतिक, रासायनिक और तथाकथित भूवैज्ञानिक जो कि वास्तव में इन्हीं तीनों का सम्मेल है ) को देखते हैं।

पहले उदाहरण में में गेंद का सरल विस्थापन होता है। इस परावर्तन का विषयी ( गेंद ) स्वयं परिवर्तित नहीं होता। अन्य तीन उदाहरणों में बाह्य क्रिया का विषयी ( एक प्राथमिक कण, लोहे की वस्तु, पहाड़ ) वस्तुगत कारकों के प्रभाव के प्रति एक निश्चित ढ़ंग से अनुक्रिया हे नहीं करता, बल्कि उनके असर से विखंड़ित होकर किसी अन्य वस्तु में परिवर्तित हो जाता है ( एक फ़ोटोन, जंग, बालू में )।

इन सारे मामलों में परावर्तन का विषयी, बाह्य प्रभाव के प्रति एक निश्चित ढ़ंग से अनुक्रिया करता है। उनके साथ होने वाले परिवर्तन, बाह्य प्रभाव के स्वभाव के अनुरूप होते हैं।

यदि लोहे की वस्तु को बिलियर्ड़ के बल्ले से ठोकर मारी गई होती, तो उस पर जंग नहीं लगती और हाथी दांत की गेंद को पानी में भिगोया गया होता, तो वह अपने स्थान से विस्थापित न होती। परावर्तन का विषयी बाहरी प्रभाव के प्रति कैसी अनुक्रिया करता है, यह केवल विषय के स्वभाव पर ही नहीं, बल्कि विषयी के अपने अनुगुणों पर, उसकी भौतिक, यांत्रिक और रासायनिक विशेषताओं पर भी निर्भर करता है।

अजैव जगत में परावर्तन के उपरोक्त सभी उदाहरण, विविध विज्ञानों के दृष्टिकोण से, पदार्थ की गति के भिन्न रूपों से की अभिव्यक्ति से संबंधित हैं। दर्शन के दृष्टिकोण से ये उदाहरण एक विशेषता से एकीकृत हैं, अर्थात यह कि विषयी, विषय के प्रभाव के प्रति एक खास ढ़ंग से अनुक्रिया करता है, यानि परावर्तन की प्रक्रिया में भाग लेता है।

इस तरह, यह या तो स्थान परिवर्तित करता है ( उदाहरण-१ ), या किसी अन्य वस्तु में परिवर्तित होते हुए गहन गुणात्मक परिवर्तन से होकर गुजरता है ( मूल कण प्रकाश के क्वांटमों में, लोहा जंग में, पहाड़ बालू-मिट्टी में )। परावर्तन के दौरान विषयी का विनाश या गुणात्मक रूपांतरण अजैव जगत में परावर्तन की लाक्षणिक विशेषता है।
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आज इतना ही।
अगली बार जैव जगत में संक्रमण के दौरान परावर्तन के रूपों के जटिलीकरण पर एक नज़र ड़ालेंगे, और थोड़ा विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे।
आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय



27.पदार्थ का मूलभूत गुण - परावर्तन








by समय

हे मानवश्रेष्ठों,
समय फिर हाज़िर है।
चेतना की उत्पत्ति पर चल रही श्रृंखला पर फिर लौटते हैं, और इस बार पदार्थ के मूलभूत गुण और उसके सिद्धांत को समझने की कोशिश करते हैं।

आज की चर्चा का यही विषय है। समय यहां अद्यतन ज्ञान को सिर्फ़ समेकित कर रहा है।
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मानव-मन या चेतना (Consciousness) की उत्पत्ति उन प्रश्नों में से है, जिन्होंने प्रकृति के नियमों का अध्ययन करने वालों को सबसे अधिक उलझन में ड़ाला है। १८ वीं शताब्दी में दार्शनिकों ने इस प्रश्न पर पुरजोर बहस की थी कि क्या भूतद्रव्य (Matter) के बिना चेतना का अस्तित्व संभव है और अगर नहीं है, तो वह आयी कहां से?

भौतिकवादी वैज्ञानिकों का मत है कि मन या चेतना की उत्पत्ति पदार्थ के विकास की दीर्घ प्रक्रिया के फलस्वरूप संपन्न हुई। पदार्थ की प्रकृति की जांच करते हुए उन्होंने उसकी गति के विभिन्न रूपों पर ध्यान केन्द्रित किया, क्योंकि गति ही पदार्थ के अस्तित्व का रूप है। पूर्णतः गतिशून्य और परिवर्तन रहित पदार्थ नाम की कोई चीज़ नहीं है। ब्रह्मांड़ में सारा पदार्थ, सारी जीव और जड़ प्रकृति सतत गति, परिवर्तन और विकास की अवस्था में है।

प्रत्ययवादियों (Idealistic) के उपरोक्त प्रश्न का उत्तर देते हुए फ़्रांसीसी भौतिकवादी देनी दिदेरो ने अनुमान लगाया कि भूतद्रव्य के अपने आधार में ही एक विशेष अनुगुण है, जो मूलतः संवेदनों से मिलता जुलता है। इसी से संवेदन की क्षमता तथा बाद में चिंतन का जन्म हुआ। इस अनुमान के समर्थन में उन्होंने अंड़े और चूज़े का उदाहरण दिया कि अंड़े में संवेदन और विश्व के प्रत्यक्षण की क्षमता नहीं होती, जबकि उससे उत्पन्न होनेवाले चूज़े में होती है। फलतः उन्होंने तर्कणा की कि संवेदन की क्षमता अजैव भूतद्रव्य से उत्पन्न हुई।

चूंकि १८ वीं शताब्दी के विज्ञान को हमारे युग के विज्ञान के सापेक्ष जीवन और चेतना की उत्पत्ति के बारे में बहुत कम जानकारी थी इसलिए दिदेरो चेतना और भूतद्रव्य के संबंध के बारे में एक पूर्ण, प्रमाणित दार्शनिक सिद्धांत की रचना नहीं कर पाए।

बहुत बाद में जब मानवजाति का यह वस्तुगत ज्ञान और विकसित होता गया तो एक ऐसे ही सिद्धांत का विकास हुआ जिसेपरावर्तन का सिद्धांत कहते हैं।

इस सिद्धांत के अनुसार, अपने जड़, अजैव रूपों से लेकर, पदार्थ के उद्‍विकास के सर्वोच्च तथा जटिलतम उत्पाद - मानव मस्तिष्क तक, सारे पदार्थ का एक सामान्य गुण है परावर्तन। परावर्तन (Reflection, a reflex action, an action in return) भूतद्रव्य (Matter) का एक सार्विक, मूलभूत, अविभाज्य (Integral) तथा वस्तुगत अनुगुण है। यह हर भौतिक वस्तु का अपने साथ अंतर्क्रियाशील अन्य भौतिक वस्तुओं के प्रभाव के प्रति अनुक्रिया करने का एक विशेष गुण है। यानि कि यह भौतिक वस्तुओं द्वारा बाह्य प्रभावों की प्रतिक्रिया है।

परावर्तन के रूप, भूतद्रव्य के रूपों पर निर्भर होते हैं, यह अपने को बाह्य प्रभावों के उत्तर में, इन प्रभावों की प्रकृति के अनुसार क्रिया करने में व्यक्त करता है। जड़ प्रकृति में गति, पिंड़ों अथवा द्रव्यों की यांत्रिक, भौतिक अथवा रासायनिक अन्योन्यक्रिया के रूप ले सकती है। भौतिक विश्व के दीर्घकालिक क्रमविकास तथा पदार्थ की गति के रूपों की बढ़ती जटिलता के दौरान जैव पदार्थ का आविर्भाव गति के रूपों में गुणात्मक परिवर्तन ले आता है। जीवधारियों में परावर्तन के जैव रूप पाये जाते हैं। जैव पदार्थ के उदविकास के दौरान, परावर्तन का यह अनुगुण अंततः मानव चेतना तथा चिंतन में विकसित हो गया। अतः यह कहा जा सकता है कि चेतना परावर्तन का उच्चतम रूप है।

विश्व के भौतिक स्वभाव तथा उसके वस्तुगत द्वंदात्मक विकास के दृष्टिकोण और मत, परावर्तन के इस सिद्धांत के साथ घनिष्टता और अविभाज्य रूप से जुड़ा है। प्रत्ययवादी और अधिभूतवादी इस संयोजन को समझने में अक्षम हैं और इसी कारण से वे चेतना की उत्पत्ति के प्रश्न का ऐसा सही उत्तर नहीं दे सकते, जो विज्ञान से मेल खाता हो और प्रकृति और समाज की वस्तुगत समझ विकसित करने में सक्षम हो।

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आज इतना ही।
अगली बार अजैव और जैव जगत में परावर्तन के रूपों पर एक नज़र ड़ालेंगे, और उन्हें थोड़ा विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे।
आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

26.टिप्पणियों के अंशों से दिमाग़ को कुछ खुराक - ३










by समय

हे मानवश्रेष्ठों,
समय यहां श्रृंखला के बीच में कुछ टिप्पणियों को देने की गुस्ताख़ी कर रहा है।
समय का उद्देश्य इन्हें यहां दस्तावेज़ीकृत करना है, और साथ ही उन मानवश्रेष्ठों तक इन्हें पंहुचाना है जो इनसे महरूम रहे हैं। उम्मीद है आपके दिमाग़ को कुछ खुराक मिलने की संभावनाएं तो हैं ही।
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विजयादशमी पर विशेष - रामसेतु... प्रविष्टि पर ‘बुराभला’ पर टिप्पणी:

...आपकी या श्रृद्धालुओं की आस्था पर जाहिरा तौर पर सवाल खडे़ नहीं किये जा सकते, आखिर यह व्यक्तिगत मामला है और सभी स्वतंत्र हैं कि वे ज्ञान और समझ के किस स्तर पर रहना पसंद करते हैं, उन्हें कहां सुभीता लगता है।

परंतु यहां आप इसे तार्किक औए वैज्ञानिक रूप के साथ रख रहे हैं और आस्था के लिए तार्किक ज़मीन तैयार कर रहे हैं, इसलिए यह नाचीज़ यह टिप्पणी करने की हिमाकत कर रहा है, आशा है मुआफ़ करेंगे और अन्यथा नहीं लेंगे।

अगर आप वाकई वैज्ञानिक तरीकों से इतिहास और मानवजाति के क्रमविकास को समझना चाहते हैं तो आपकों वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ लिखे इतिहास और ऐतिहासिक समझ से गुजरना पड़ेगा। ना कि तथ्यों और निष्कर्षों का मनचाहा मानसिक जाल बुनकर अपने को तुष्ट करने का रास्ता अख्तियार करना पड़ेगा। और निश्चिंत रहें, उसके बाद भी हमारे पास गर्व करने के लिए काफ़ी सामग्री होगी साथ ही ढ़ेर सारे सबक भी होंगे जिनसे भविष्य को संवारने का उचित रास्ता निकाल सकने की असीम संभावनाएं भी मौजूद रह सकें।

और वैज्ञानिक तरीके से संपुष्ट इतिहास की समझ कहती है, कि हमारे महान ग्रंथ वेदों का समय ही ईसा पूर्व १५००, यानि कि आज से ३५०० वर्ष प्राचीन हैं, और इनका संकलन और लिपिबद्धिकरण तो और बहुत बाद की चीज़ हैं।

हड़प्पा सभ्यता के नगरों के निर्माण का समय २७०० ईसा पूर्व, यानि आज से लगभग ४७०० वर्ष पूर्व का निश्चित हुआ है। जाहिर है सिंधु घाटी की यह सभ्यता वेदों की आर्य सभ्यता से भी प्राचीन है। इसकी खोज ने, जो कि आज से लगभग ८०-९० वर्ष पूर्व ही हुई है, आर्यों के यहीं के होने या बाहर से आने वाले विवाद को भी खत्म कर दिया, और यह निश्चित हो गया कि आर्य ईरान की तरफ़ से आए थे और उनसे पहले यहां सापेक्षतः उनसे बहुत विकसित सभ्यता मौजूद थी।

हमारे इतिहास को जब वैदिक नज़रिए से देखा जाता है, तो काल के उस हिस्से का अध्ययन पूर्ववैदिक और उत्तरवैदिक काल के रूप में किया जाता है। वेदों के समय की सभ्यता का स्तर वेदों से ही मिल सकता है, जिससे साफ़ संकेत मिलते हैं आर्य उस वक्त खानाबदोश अवस्थाओं के पशुपालक अवस्थाओं से गुजर रहे थे। उनके वेद कालीन देवता भी अलग थे, जिनमें इन्द्र सबसे प्रमुख थे, और आपकी जानकारी के लिए यह भी काफ़ी महत्वपूर्ण होगा कि वेदकालीन देवताओं में उत्तरवैदिक देवतागणों जैसे कि ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि के लिए कोई जिक्र नहीं है। हमारे इन महान देवी-देवताओं का बखान हम बाद के महान ग्रंथों उपनिषदों और पुराणों में पाते हैं जो कि निश्चित ही वेदों के बाद के हैं।

अब चूंकि रामायण में इन भी देवी-देवताओं का चरित्र-चित्रण काफ़ी विस्तार से हुआ है, तो जाहिरा तौर पर यह निष्कर्ष निकलना लाजिमी है कि वाल्मिकी रामायण का समय वेदों और पुराणों के बाद का ही है। यह दोहराना अब महत्व नहीं रखता कि वेदों का समय आज से ३५०० वर्ष पूर्व का है, अतः रामायण का काल भी इनके बाद ही ठहराया जा सकता है।

जाहिर है कि इसके समय को ७००० वर्ष पूर्व ले जाना आस्था का विषय तो हो सकता है, परंतु तर्क और वैज्ञानिकता का नहीं।

अतएव आस्था है तो उसे आस्था ही रहने दिया जाए। आस्था को तर्कों और वैज्ञानिकता के दृष्टिकोणों से तौलेंगे तो हो सकता है कि आस्था पर चोट पहुंचने की परिस्थितियां पैदा हों। जो कि जाहिर है हमारा और आपका उद्देश्य या इच्छित कतई नहीं है।

राम हमारे और हमारे जनमानस की आस्था के नायक हैं, उन्हें आस्था की, श्रृद्धा की विषयवस्तु ही रहने दें, उन्हें तर्क और वैज्ञानिकता से तौलना इस आस्था औए श्रृद्धा के खिलाफ़ ही जाएगा।.....

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क्या पुनर्जन्म संभंव है? एक बेबाक....प्रविष्टि पर ‘तस्लीम’ पर टिप्पणी:

...लोकप्रिय मामलों में ऐसा होता ही है। आखिर अधिकतर लोग अपने सामान्य सूचनापरक ज्ञान के ही आधार पर ही, उपलब्ध हो पाए ज्ञान के आधार पर ही जीवन के भवसागर में उतरे हुए हैं।

बाकी सब तो है जैसा ही है।
आपकी लिखी एक बात ने चौंकाया। ‘आत्मा की खोज अभी जारी है।’
क्या खूब!

समस्या यहीं से तो शुरू होती है, और वहीं आप संशय छोड़ देते हैं।

अगर आत्मा की खोज अभी जारी है, यानि कि आत्मा के बारे में अभी कुछ खास नहीं कहा जा सकता। आत्मा की उपस्थिति के विचार का ही विस्तार हैं ये सभी मामले, जो आपस में गुंथे हुए हैं।

आत्मा का विचार सबसे प्राचीन है, आदिमकालीन। इसी से हर भौतिक वस्तुओं में आत्मा, देवत्वरोपण, ईश्वर, परमआत्मा आदि-आदि की संकल्पनाएं पैदा हुईं। पुनर्जन्म की अवधारणा का अविष्कार तो इनके सापेक्ष काफ़ी आधुनिक है। हमारे यहां वेदों के समय तक यह पैदा नहीं हुई थी।

अगर आप ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ इसे देखेंगे तब पता पड़ेगा कि इस अवधारणा की उत्पत्ति, लगभग राज्यों और उनके शोषण की उत्पत्ति के साथ-साथ हुई।

यदि आत्मा है, तो ईश्वर है, चेतना से पदार्थ की उत्पत्ति है, भूत-प्रेत हैं, जादू-चमत्कार हैं, पुनर्जन्म है, सारी भूल-भुलैयाएं हैं।

इसलिए आत्मा के प्रश्न से जूझना सबसे प्राथमिक है। आप आत्मा के अस्तित्व के सवाल को स्थगित रखकर या अभी संदेह में रखकर, बाकी की बातों के लिए तर्कों के जरिए पुरजोर लड़ाई नहीं लड़ सकते।

विज्ञान की उत्पत्ति के समय ही सर्वप्रथम उसकी उर्जा इन्हीं सब के अस्तित्व को टटोलने में ज्यादा खर्च हुई थी, इसे ऐसे भी कह सकते है पदार्थ और चेतना के संबंधों को समझने के इन प्रयासों से ही विज्ञान की उत्पत्ति हुई थी।

असल विज्ञान जितनी उर्जा खर्च कर सकता था, कर ली गई, और अब उसके पास इन फ़ालतू की चीज़ों के लिए समय नहीं है। अब केवल सूडोसाईंस की कुछ धाराएं ही इस सब पर अभी भी साधनों और उर्जा का अपव्यय करने में लगी हुई हैं, और यह यथास्थिति बनाए रखने की, आम जनमानस को उलझाए रखने की कवायदें वर्तमान व्यवस्था के हितों के अनुकूल हैं, अतः वह इन्हें प्रश्रय और प्रचार उपलब्ध कराता रहता है।

सारी स्थिति विज्ञान और अद्यतन दर्शन के सामने बिल्कुल साफ़ है, यह बात अलग है कि वह आपकी कितनी पहुंच में हैं।.....
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स्त्रियों में मनोरोग पराशक्तियां और कुछ विचार...प्रविष्टि पर ‘संचिका’ पर टिप्पणी:

...ग्रामीण इलाकों और शहरों में भी ग्रामीण परिवेशगत मानसिकताओं में इन परिघटनाओं का व्यापक असर है।

आपने इसे यहां उठाकर सही दृष्टि और सरोकारों के साथ विश्लेषित करने का समुचित प्रयास किया है। आप इसमें दो चीज़े औए जोड़ सकती हैं।

एक तो इन परिघटनाओं के पीछे के कुछ काम संबंधी आधार जो कि अक्सर अनछुए रह जाते हैं, या इस तरीके से इन्हें देखना और विश्लेषित करना काम संबंधी वर्जनाओं और अनैतिकताओं के घटाघोपों के चलते जानबूझकर छोड़ दिया जाता है।

दूसरा, जिसका कि आपने सिर्फ़ इशारा किया है पर उसे पुरजोर तरीके से उठाया जाना चाहिए ही, अक्सर ऐसे मामलों का पूरी चेतना और होशोहवास के साथ सृजित किया जाना। यह पूरी तरह से जानबूझकर किया जाता है और इसके पीछे के कारणों को आपने यहां रखा ही है।

कई मामलों में साहित्यिक सी भाषा में यह कहा जा सकता है कि इस तरह की परिघटनाएं पुरूष सत्ता के प्रति उन्हीं के बनाए हथियारों के साथ, हाशिए की स्त्रियों का यह एक विद्रोह है जो इस तरह उन्हें एक छद्म ही सही पर अपनी इच्छित परिस्थितियों के निर्माण का एक अल्पकालिक और कभी-कभी तो दीर्घकालिक भी, अवसर देता है।

पराशक्तियों के मामले में भी सही इशारे किए हैं आपने। जो दावा करता है, संदिग्ध तो वह ऐसे ही हो जाता है, क्योंकि उसे दावा करने की जरूरत पड़ी। यानि कि वह यह दावा करके इसके जरिए कुछ पाना चाहता है।

बहुत कम बार ही ये रोगी-सोगी होते हैं। बाकि जिन्हें दिलचस्पी है वे ऐसे अधिकतर मामलों के पीछे की झूंठ-सिद्धी की कई कहानियां ढूंढ़ सकते हैं।.....
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इसी प्रविष्टि पर आदरणीय वत्स जी की टिप्पणी पर एक प्रतिटिप्पणी:

...आधुनिक ज्ञान पुरातन का ही विस्तार होता है, क्रमिक विकास की प्रक्रिया में होता है। नये अनुभव और प्रमाण, पुरानी कई चीज़ों को गलत साबित करते हैं और कई पुरानी चीज़ों की कमियों को रेखांकित कर उसे और सटीक बनाते हैं।

उपवास और यज्ञादि की भी ऐसी ही चीरफ़ाड़ की गई और परंपराओं से जुड़े इन क्रियाकलापों में कुछ तार्किकता ढ़ूंढ़ने की कोशिश की गई कि आखिर इनमें क्या कुछ ऐसा है जिससे मानवजाति फ़ायदा उठा सकती है। यह वत्स जी का इछ्छित है।

समझदारी का तकाज़ा वत्स जी के इच्छित को तो शामिल करता ही है, साथ ही इसे और आगे लेजाकर जो व्यर्थ शाबित हुआ है उससे मुक्ति पाने की मांग भी रखता है।

समस्या यही पैदा होती है।

स्त्रियां किसी विशेष दिन व्रत-उपवास रखती हैं, अगर वे अपने आपको थोड़ा पढे-लिखों में शुमार भी करवाना चाहती हैं तो पूछने पर वे ऐसे ही वत्स जी की तरह जवाब देंगी कि देखो इस बहाने थोड़ा ड़ाईटिंग बगैरा हो जाती है जी।

अगर उनसे कहा जाए कि यह तो ठीक है, चलिए ऐसा कीजिए आप उस विशेष दिन को छोड़ दीजिए, और किसी दिन यह विज्ञान-सिद्ध फ़ायदे उठा लीजिए।

तब असलियत सामने आती है कि इनका यह विज्ञान-सिद्ध रूप नहीं वरन पारंपरिक धार्मिक विश्वास असल मूल में हैं। और इसीलिए यह होता है कि विज्ञान-सिद्धि जाती है भाड़ में और ढ़ोंग बन कर रह जाती है।

अक्सर लोग व्रत-उपवास में सामान्य दिनों से अधिक कैलौरी का सेवन करते हुए देखे जाते हैं, उन्होंने अपने मतलब के हिसाब से कई तोड़ निकाल लिए हैं। असल मंतव्य धार्मिक छद्म के जरिए मिलने वाली उसी मनोवैज्ञानिक, मानसिक तसल्ली का ही है जिसका जिक्र लवली कुमारी कर रही हैं।

किसी अंश की वैज्ञानिकता से, किसी भी पूरे पाखंड़ को जायज नहीं ठहराया जा सकता। वत्स जी तो शायद ही सहमत हों, पर और मानवश्रेष्ठ इस पर विचार कर सकते हैं।

वत्स जी की विधि का ही प्रयोग करके यह भी तो कहा जा सकता है कि कब तक वे सदियों पूर्व की मानसिकता और परिस्थितियों के अनुसार कही और लिखी बातों की भूलभुलैया मे भटके रहकर उसे ही परम ज्ञान की घुट्टी के रूप में परोसते रहेंगे और मानवजाति के अद्यानूतन ज्ञान से नज़रें चुराते रहेंगे।.....
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तो चलें समय के उस फ़लक पर...प्रविष्टि पर ‘ज्योतिष दर्शन’ पर टिप्पणी:

...जब बात प्राकॄतिक परिधटनाओं के संदर्भ में कही जा रही हो जैसा कि आईंस्टीन और बकौल निशांत मिश्र, स्टीफन हॉकिंग के निहितार्थ हैं, बात एकदम वाज़िब है।

विज्ञान के अनुसार प्राकृतिक परिघटनाओं की नियमसंगतता को सिद्धांत के रूप में तभी निरूपित माना जा सकता है, जब यह नियमसंगीतियों के जरिए वस्तुगतता के संदर्भ में निश्चित भविष्यवाणी करने में समर्थ सिद्ध होता है।

समस्या यह है कि व्यवस्थागत असुरक्षाओं के चलते, अपने व्यक्तिगत भविष्य को जानने की उत्कंठा में मनुष्य इन वैज्ञानिक प्रास्थापनाओं में प्रयुक्त हुए मिलते-जुलते अभीष्ट शब्दों को देखकर, उनका सही निहितार्थ समझे बगैर इनका मनमाफ़िक, अपने मंतव्यों के निहितार्थ उपयोग करने लगता है और समाज में विद्यमान भ्रमों की संपुष्टि के जरिए अपने अस्तित्व की प्रतिष्ठा और दोहन की जुंबिशों में जुट जाता है।

वैज्ञानिक ज्ञान के जरिए अब तक समझ आई प्राकृतिक परिघटनाओं और दर्शन की ऐतिहासिक भौतिकवादी अवधारणाओं के जरिए सामाजिक परिघटनाओं की भाविष्यवाणियां की जा सकती हैं, और की भी जाती हैं।

प्राकृतिक परिघटनाओं के सापेक्ष सामाजिक परिघटनाओं के मामले में सटीक भविष्यवाणियां थोड़ी मुश्किल होती हैं, क्योंकि यहां वस्तुगत यथार्थता के साथ, एक और तत्व जुड़ जाता है वह है चेतनागत यथार्थता। इनकी अन्योन्यक्रियाएं निरंतर नये-नये प्रभाव और निर्भरता पैदा करती रहती हैं, और वस्तुगत यथार्थ को निरंतर परिवर्तित करती रहती हैं।

तो प्राकृतिक परिघटनाओं के मामले में नियमसंगतता को समझने के बाद उनकी नियमों के अंतर्गत तयशुदा नियति से ऐसे भ्रामिक वक्तव्य निकाले जा सकते हैं जिनसे सत्य का आभास भी होता है और जो भ्रमों को और बढा़कर काल्पनिक कपोल कल्पनाओं के नये नये द्वार खोल सकता हो, जैसे यह कथन या निष्कर्ष जो कि यहां निकाला गया है कि सब कुछ पूर्व नियत है और हर चीज़ का एक निश्चित भविष्य है।

फिर यह संभावना पैदा हो सकती है कि इसे साधारणतयः मनुष्य अपने जीवन और समाज से जोड़कर देखने लगता है, और ऐसी ही चिंतन और निष्कर्षों की और उद्यत होता है जिसे कि आपने बाद में विवेचित किया है।

और आपकी समझ भी इस घलमपेल को समझ पा रही है, इसीलिए आपके सामने यह अनुत्तरित प्रश्नों और कल्पनाओं को छोड जाती है।.....
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वियोजित अनुभव, उनका मानसिक असंतुलन और...प्रविष्टि पर ‘संचिका’ पर टिप्पणी:

...आपने सही कहा है कि व्यक्ति अपनी सामाजिक अन्योन्यक्रियाओं के जरिए अपने एक मानसिक जगत का निर्माण करता है। अपेक्षाओं की पूर्ति की भौतिक संभावनाएं, व्यवहारिक रूप में, इन मानसिक इच्छाओं की अभिव्यक्ति को संचालित और नियंत्रित करती रहती हैं।

असुरक्षा और अनिश्चितता का माहौल, अपेक्षित आदर्श परिस्थितियों और क्रूर वास्तविकताओं के मध्य एक द्वंद बनाए रखता है। इनसे विचलन और अपरिपक्वता, मानसिक अस्थिरता पैदा करती है और ऊल-जलूल व्यवहार में अपनी अभिव्यक्ति पाती है।

समस्या यह भी है कि आजकल मानसिक चिकित्सा के नाम पर भी व्यापारिक और सतही मानसिकता हावी है। इस ओर गंभीर प्रयासों का अभाव है। मनोवैज्ञान और शारीरिक चिकित्सा को आपस में गड्ड-मड्ड कर दिया गया है और मानसिक रोगी के मनोवैज्ञानिक अध्ययन और कौंसिलिंग का अभाव नज़र आता है। रोगी और मनोचिकित्सक दोनों के पास समय और मनोव्यवहार की गहराई टटोलने की समझ का अभाव है, और परिणति तात्कालिक ईलाज़ यानि मष्तिष्क को सुन्न कर मानसिक क्रिया व्यवहार को स्थगित करने की प्रवृति के रूप में सामने आ रही है।

ये दवाइयां उन्हें इसकी लत ड़ालती है और रोगी, संबंधियों और मनोचिकित्सक, सभी को अपने मुफ़ीद लगती हैं। असली मनोवैज्ञानिक सवाल पृष्ठ्भूमि में ही रह जाते हैं।.....
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नारीयां क्यो बनाती हैं यौन संबंध? एक....प्रविष्टि पर ‘साईब्लॉग’ पर टिप्पणी:

...आपने एक रोचक विषय उठाया है, कम से कम पुरूषों के लिए तो है ही।

पुरूषप्रधान समाज की मानसिकता इसे ऐसे ही रूप में लेने को अभिशप्त है, जैसा कि विवेक और जाकिर भाई की टिप्पणियों से जाहिर होता है। भले ही यह आपका मंतव्य रहा हो या नहीं।

इसलिए समझदारी का तकाज़ा कहता है कि प्रस्तुति और विश्लेषण का तरीका ऐसा होना चाहिए कि यह सिर्फ़ प्रचलित मानसिकताओं की सनसनीखेज़ तुष्टि का जरिया भर बन कर ना रह जाएं बल्कि एक सहिष्णु यथार्थ समझ की सही दिशा की राह प्रशस्त करता हो।

शरद कोकास एक गंभीर इशारा जरूर कर रहे हैं पर वहां भी यौन संबंधों का हथियारगत इस्तेमाल अवश्य ही मिलेगा।पुरूष प्रधान समाज में स्त्री के अधिकार सीमित हैं। स्त्री पुरूष के लिए संपत्ति है और इसके अनुरूप ही भोग्या सामग्री। उसके लिए यौन संबंध यौन तुष्टि के साथ-साथ अपनी सत्ता के प्रस्फुटिकरण और प्रदर्शन का साधन भी हैं। इसीलिए वह यौन संबंधों के लिए अवसरवादी है और अपनी सत्ता और स्त्री की निर्भरता के चलते अवसरों की संभावनाएं भी खूब रखता है।

इस सारे जंजाल में स्त्री व्यक्तित्व की आधिकारिक उपस्थिति कहीं भी अभिव्यक्त नहीं होती। इसीलिए वह वह बराबरी के, प्रेम के, भावनात्मक संबंधों के अवसरों के लिए हमेशा प्रतीक्षारत रहती है।

स्त्री के व्यक्तित्व का यही खालीपन, लंपट पुरूषों के लिए और अधिक अवसर उपलब्ध कराता है। और फिर धोखा, छल, मोहभंग जैसी अवस्थाओं की परिणति अस्तित्व में आती हैं।

स्त्री केवल यौन तुष्टि के उपकरण के रूप में अपनी पुरजोर उपस्थिति दर्ज़ कर पाती है। पुरूष जब कभी भावुकता में भी होता है तो इसकी परिणति यौन संबंध तक खींच ले ही जाता है।

कुलमिलाकर लाबलुब्बेआब यह कि सामान्यतया स्त्री के लिए पुरूष की यह यौन जरूरत और उसकी पूर्ति के लिए स्त्री की भौतिक उपस्थिति की आवश्यकता उसके लिए एक हथियार की तरह उभरने की संभावना पैदा करती है जिसका कि इस्तेमाल तात्कालिक रूप से अपना मनोइच्छित प्राप्त करने में किया जा सकता है।

इसी की अभिव्यक्ति, जैसा कि इस आलेख में जिक्र है, भौतिक वस्तुओ, उसके क्रियाकलापों में सहायता और भावनात्मक संतुष्टि को यौन संबंधों के जरिए प्राप्त करने के रूप में होती है।

जहां बराबरी के से संबंधों की उपस्थिति होती है, वहां फिर भी इनके पृष्ठभूमि में होने की संभावनाएं हो सकती हैं।

मनुष्य की यौन संबंधों की सहज और प्राकृतिक जरूरत इसी व्यवस्थागत रूप के चलते विकृतियों के लिए अभिशप्त है।.....
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आशा है कि कई विषयों पर चिंतन हेतु आपके दिमाग़ को निश्चित ही कुछ ख़ुराक तो मिली ही होगी।
आप चाहे तो किसी पर भी संवाद को आगे बढ़ाया जा सकता है।

शुक्रिया।

25.भूतद्रव्य संबंधी दृष्टिकोणों का विकास कैसे हुआ?



पिछली बार भूतद्रव्य (Matter) की परिभाषा और मंतव्य पर चर्चा की गई थी।

आज यहां यह देना काफ़ी दिलचस्प हो सकता है कि भूतद्रव्य संबंधी दृष्टिकोणों का विकास कैसे हुआ?

आज की चर्चा का यही विषय है। समय यहां अद्यतन ज्ञान को सिर्फ़ समेकित कर रहा है।
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भूतद्रव्य संबंधी दृष्टिकोणों का विकास कैसे हुआ?

अतीतकाल से ही लोग यह सोचने-विचारने लगे थे कि उनके गिर्द विद्यमान वस्तुएं किससे निर्मित हैं और कि उनका कोई सार्विक (Universal) नियम या आधार है या नहीं।

प्राचीन यूनान के पुरानतम दार्शनिकों ने अपनी अटकलों को दैनिक जीवन के अनुभवों तथा प्रेक्षणों पर आधारित किया। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि पानी ही हर चीज़ का मूल तत्व है। बाद के कुछ दार्शनिक वायु को सबका मूल तत्व समझते थे। फिर सूर्य की दिव्य अग्नि के विचार के चलते आग में सबका मूलतत्व देखा गया। और आगे इन मूलतत्वों में मिट्टी को भी जोड़ दिया गया और यह समझा गया कि सब कूछ इन चार तत्वों से निर्मित है और वही भूतद्रव्य है। किंतु अरस्तु के दृष्टिकोण से यह भूत्द्रव्य निष्क्रिय और अनाकार है और उसे रूप प्रदान करने के लिए एक विशेष बल की आवश्यकता होती है।

प्राचीन भारत में भी लगभग इसी तरह का दृष्टिकोण उभर कर आया, जिसके कि अनुसार सब कुछ पंच तत्वों से निर्मित है। यहां आकाश को भी एक स्वतंत्र तत्व के रूप में सम्मिलित किया गया।

यूनान के दार्शनिक ल्युकिपस और डेमोक्रिटस ( लगभग ५०० ईसा पूर्व ) अदृश्य परमाणु को विश्व का आधार मानते थे। भारत में कणाद का परमाणुवाद भी यही निष्कर्ष स्थापित कर रहा था। लेकिन परमाणु के अस्तित्व की यह कल्पना कहा से पैदा हुई? साधारणतयः हवा में धूलिकणों को नहीं देखा जाता, परंतु अंधेरे में किसी दरार या छिद्र से आती रौशनी में अनगिनत कण किसी भी बाह्य आवेग के बिना चलते-फिरते नज़र आते हैं। अतः परमाणुवादियों ने दलील दी कि परमाणुओं को भी नहीं देखा जा सकता, किंतु ‘मानसिक दृष्टि’ या तर्कबुद्धि से उनकी कल्पना की जा सकती है, वे हमेशा विद्यमान रहते हैं और एक अनवरत गति उनमें अंतर्निहित होती है| यह दलीलें काफ़ी लंबे समय तक मात्र अटकलें ही बनी रही।

मध्ययुगीन दर्शन भौतिक जगत को दैवी रचना का फल मानता था। हर भौतिक वस्तु नीच, जघन्य और पापमय, अतः ध्यान के अयोग्य मानी जाती थी। यहां तक कि कई दार्शनिक धाराओं में तो संपूर्ण वस्तुगत जगत को ही माया, भ्रम घोषित कर दिया गया।

१७ वीं और १८ वीं शताब्दियों में विज्ञान के विकास के बाद ही विश्व की भौतिक प्रकृति एक बार फिर से दर्शन के ध्यान का केन्द्रबिंदु बनी। फ़्रांसीसी दार्शनिक देकार्त, अंग्रेज भौतिकविद न्यूटन और रूसी वैज्ञानिक लोमोनोसोव सूक्ष्म और कठोर कणिकाभ गोलियों जैसे गतिमान कणों को भूतद्रव्य का आधार मानते थे। चूंकि उस वक्त यांत्रिकी प्रमुख वैज्ञानिक शास्त्र था, और वह पदार्थों के विस्थापन और अंतर्क्रिया का अध्ययन करती थी इसलिए ‘भूतद्रव्य’ (Matter) की संकल्पना को ‘पदार्थ’ (Substance) के तदअनुरूप ही समझा जाता था। पदार्थ के सारे अनुगुण भूतद्रव्य पर आरोपित कर दिये गए।

१९ वीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरूआत में भौतिक क्षेत्रों (विद्युत-चुंबकीय क्षेत्र, गुरुत्व क्षेत्र) जैसी नयी घटनाओं की खोज ने भूतद्रव्य की समझ को आमूलतः बदल दिया। भूतद्रव्य की, निष्चित द्रव्यमान व ज्यामितिक आकार वाले ‘पदार्थ’ की समरूपी व्याख्या इस समझ के लिए रुकावट थी कि भौतिक क्षेत्र भी भूतद्रव्य का ही विशिष्ट रूप है। भौतिक क्षेत्रों की सारी आश्चर्यजनक विशेषताओं के बावजूद वे परमाणुओं और मूल कणों की भांति ही मनुष्य की चेतना से परे और स्वतंत्र रूप से विद्यमान हैं।

यही वह एकमात्र तथा निर्णायक लक्षण है जो इस बात का उत्तर देना संभव बनाता है कि क्या भौतिक है और क्या अभौतिक, यानि प्रत्ययिक है। एक खंभे में द्रव्यमान होता है, वह प्रकाश के लिए अपारगम्य होता है, परंतु उसकी छाया के लिए ये दोनों बाते लागू नहीं होती। फिर भी खंभा और उसकी छाया भौतिक हैं, क्योंकि वे वस्तुगत रूप से मनुष्य की चेतना से परे विद्यमान हैं।

भूतद्रव्य की अधिभूतवादी (Metaphysical) तथा यांत्रिक (Mechanical) संकल्पनाएं इसलिए भी सीमित व असत्य थीं कि उन्हें यांत्रिकी तथा भौतिकी के बाहर लागू करना असंभंव था। मानवसमाज तथा सामाजिक संबंधों का चित्रण पदार्थ के अनुगुणों के अनुरूप नहीं किया जा सकता। इसलिए भूतद्रव्य की पहले की संकल्पनाओं और समझ को सामाजिक प्रक्रियाओं और इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना की रचना के लिए भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था।

किंतु मनुष्य की पहली दिलचस्पी की चीज़ समाज तथा उसका जीवन है, खास तौर पर महती सामाजिक रूपांतरणों के इस युग में, जब प्रश्न यह पैदा होता है कि आरंभ करने के लिए क्या आवश्यक है- भौतिक सामाजिक संबंध या आत्मिक जीवन की घटनाएं। यही कारण है कि भूतद्रव्य की इस ( पिछली पोस्ट में वर्णित ) समसामयिक परिभाषा ने वैज्ञानिक तथा दार्शनिक अर्थ भी ग्रहण कर लिया है।
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आज इतना ही।
आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

24.दार्शनिक संकल्पना - भूतद्रव्य ( Matter ) के मंतव्य



श्रृंखला पर लौटते हैं।

जैसा कि पिछली चर्चाओं में हमने देखा था कि दर्शन का बुनियादी सवाल भूतद्रव्य (Matter) और चेतना (Consciousness) के सवाल, इनके अंतर्संबंधों और प्राथमिकता के सवाल से जुड़ा था।

अतएव यह समीचीन होगा कि इन संकल्पनाओं, भूतद्रव्य और चेतना पर, पहले चर्चा कर ली जाए, इन्हें पहले सुपरिभाषित कर लिया जाए।

आज की चर्चा का यही विषय है। समय यहां अद्यतन ज्ञान को सिर्फ़ समेकित कर रहा है।
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मनुष्य अत्यंत भिन्न वस्तुओं तथा प्रक्रियाओं की अनगिनत विविधताओं से घिरा हुआ है: जानवर और पौधे, विभिन्न यंत्र और औजार, रासायनिक यौगिक, कला वस्तुएं, प्रकृति की घटनाएं, आदि। हम जानते हैं कि सारी वस्तुएं अणुओं तथा परमाणुओं से बनी हैं और दृश्य ब्रह्मांड़ में अरबों-खरबों तारे, तारकीय निहारिकाएं तथा आकाशगंगीय प्रणालियां हैं।

पहली नज़र में वे सब असंबंधित वस्तुओं तथा घटनाओं का विषम संग्रह जैसा जान पड़ती हैं। इसीलिए दुनिया अक्सर लोगों को एक रेलपेल जैसी, सांयोगिक वस्तुओं तथा प्रक्रियाओं की उलझी हुई गुत्थी जैसी नज़र आती है, जिनके मध्य मनुष्य रेगिस्तान में खोया-खोया सा लगता है।

किंतु सारी वस्तुओं और घटनाओं के बीच उनकी सारी विभिन्नताओं के बावजूद एक सर्वनिष्ठ विभेदक लक्षण है, अर्थात वे सब मनुष्य की चेतना के बाहर तथा उससे स्वतंत्र रूप से विद्यमान हैं। दूसरे शब्दों में, मनुष्य के गिर्द वस्तुओं और प्रक्रियाओं की दुनिया एक वस्तुगत यथार्थता (Objective Reality) है।

इसी वस्तुगत यथार्थता को अभिव्यक्त करने वाली संकल्पना ‘भूतद्रव्य’ को वैज्ञानिक रूप में इस तरह परिभाषित किया जाता है:भूतद्रव्य, मनुष्य की चेतना से स्वतंत्र रूप से अस्तित्वमान, और मनुष्य द्वारा उसके संवेदनों (Sensation) द्वारा अनुभूत, वस्तुगत यथार्थता को अभिव्यक्त करने वाला एक दार्शनिक प्रवर्ग है।

यहां, मनुष्य की चेतना से परे तथा स्वतंत्र रूप से विद्यमान वस्तुगत यथार्थता, और इसके लिए प्रयुक्त दार्शनिक संकल्पना (Concept) या प्रवर्ग (Categories) के बीच अंतर करना आवश्यक है। उन्हें परस्पर उलझाना नहीं चाहिए, ठीक उसी तरह से जैसे कि एक वास्तविक, वस्तुगत मोटरकार तथा उसकी संकल्पना ‘मोटरकार’ को। एक वास्तविक मोटरकार को चलाकर ले जाया सकता है, लेकिन उस ‘मोटरकार’ को नहीं चलाया जा सकता है, जो संकल्पना की शक्ल में मनुष्य के दिमाग़ में होती है।

इस परिभाषा से निष्कर्ष निकलता है कि:

० ‘भूतद्रव्य’ का आशय है मनुष्य के गिर्द विद्यमान संपूर्ण विश्व, वह हर चीज़ जो चेतना नहीं है, वह हर चीज़ जो चेतना से परे है, उससे बाहर अस्तित्वमान है।

० इस संकल्पना का गुणार्थ यह है कि किसी भी भौतिक वस्तु, अनुगुण, संबंध या प्रक्रिया का एकमात्र और सबसे महत्वपूर्ण लक्षण उसकी वस्तुगतता तथा चेतना से उसकी स्वाधीनता है।

० प्रवर्ग ‘भूतद्रव्य’ प्रकृति तथा समाज दोनों की घटनाओं पर, मनुष्य चेतना के बाहर अस्तित्वमान और होने वाली, तथा चेतना से स्वतंत्र सामाजिक प्रक्रियाओ पर लागू होता है।

० मनुष्य द्वारा सारी भौतिक प्रक्रियाओ तथा घटनाओं का संज्ञान अथवा उसकी चेतना द्वारा उनका परावर्तन, संवेदनों तथा संवेदन-प्रत्यक्षणों के जरिए होता है।
इनमें केवल वे ही वस्तुएं तथा घटनाएं शामिल नहीं है, जिनका प्रत्यक्षण मनुष्य अपने श्रवण, दृश्य, स्पर्श या गंध संवेदनों से कर सकता है, बल्कि वे भी शामिल हैं, जिनके लिए उन अत्यंत जटिल आधुनिक उपकरणों ( दूरदर्शी, सूक्ष्मदर्शी, राड़ार आदि ) की जरूरत होती है जो मनुष्य के संवेदन अंगों की क्षमताओं को कई गुना बढ़ा देते हैं।

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आज इतना ही।
अगली बार देखेंगे कि भूतद्रव्य संबंधी दृष्टिकोणों का विकास कैसे हुआ?
आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय

समय के साये में - आपके दिमाग़ से रूबरू आपकी ज़िंदगी का आईना



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