सोमवार, 26 अक्टूबर 2009

ब्लॉगर जान गये हैं.. नामवर सिंह कौन हैं ..




इलाहाबाद संगोष्ठी के बाद हिन्दी के सुप्रसिद्ध आलोचक श्री नामवर सिंह हिन्दी ब्लॉगर्स के लिये अब नये नहीं रहे । चिठ्ठा शब्द की उत्पत्ति को लेकर उनका बयान इन दिनों चर्चा में है । साहित्य से जुड़े लोग तो खैर उन्हे जानते ही थे ।साहित्यकारों के बीच समय समय पर वे अपने विचार प्रकट करते हैं । यहाँ प्रस्तुत है सापेक्ष के सम्पादक महावीर अग्रवाल द्वारा आलोचना पर उनसे बातचीत का एक अंश । लेखकों और आलोचकों के बारे में प्रस्तुत इन विचारों को हम ब्लॉग लेखकों,पाठको और आलोचकों से जोड़कर भी देख सकते हैं ।

महावीर अग्रवाल: नए आलोचकों में आपको जिन आलोचकों में कुछ सम्भावनायें नज़र आती हैं उनके बारे में कुछ बताइये साथ ही यह भी कि आलोचक का धर्म क्या होना चाहिये ?

नामवर सिंह : कुछ आलोचक ऐसे होते हैं जो कविता के एक एक शब्द को पकड़कर बाल-की-खाल निकालते हुए उसकी बारीकियाँ समझाते चले जाते हैं । बड़ा बारीक काम करते हैं वे । सराहने को जी करता है। आचार्य शुक्ल ने भी बिहारी के सन्दर्भ में कहा था " कुछ कवि ऐसे होते हैं जो कविता में बड़ी नक्काशी का काम करते हैं पर बिहारी को वही पसन्द करेगा जो हाथी दाँत पर किये हुए काम को लेकर घंटों सराहता हो । लेकिन जो रस में थोड़ी देर डूबना चाहता हो उसको बिहारी से संतोष नही होगा । उसे रीतिकाल के कवियों में देव को ,पद्माकर को या मतिराम को देखना पड़ेगा और अगर कुछ ऊँची भूमि पर सँवरण करना चाहता है तो उसे तुलसी के पास जाना पड़ेगा " इसलिये आलोचक भी ऐसे हैं जो बाल की खाल निकालते हैं । एक एक शब्द के लक्ष्यार्थ और व्यंग्यार्थ की क्या -क्या बारीकी निकालते रहते हैं । 

यह काम भी ज़रूरी है यहाँ एक बार मैं फिर कहूंगा कि विश्लेषण की दृष्टि से मार्क्सवादी आलोचना निश्चय ही अधिक समृद्ध है । आलोचक का धर्म है कृतियों को बहुत ध्यान से पढ़ना , डूबकर पढ़ना । सटीक विष्लेषण और व्याख्या करके रचना के अंत:करण तक पहुँचना । अपने साथ पाठक के भी भीतर पहुँचाना । यह बुनियादी चीज़ हम लोग भूलते जा रहे हैं ,जिसे टृक वाले और आटोरिक्शा वाले भी जानते हैं । उनके पीछे लिखा रहता है " देखो मगर प्यार से "रचना को , पुस्तक को प्यार से देखना ज़रूरी है । यह बुनियादी चीज़ है जिससे आलोचना पैदा होती है । कोई नई रचना उभर रही है । नया लेखक सामने आ रहा है , अच्छा लिख रहा है और उसकी उपेक्षा हो रही है तो उस पर ध्यान देना चाहिये । यह आलोचना का धर्म है । प्रत्येक आलोचक अपने संघर्ष और अपनी साधना से ही अपने सच को अर्जित करता है ।

नामवर जी के इन विचारों पर आपका क्या कहना है - शरद कोकास (चित्र मे नामवर सिंह से बात करते हुए महावीर अग्रवाल , शरद कोकास के अलबम से )

बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

अपनी कविता किसे अच्छी नहीं लगती

                     ब्लॉग जगत में कविताओं के अनेक ब्लॉग हैं । यहाँ कविताओं के पाठक भी अनगिनत हैं ।सामान्यत: यह देखा गया है कि हर ब्लॉगर कहीं न कहीं कविता से जुड़ा है कहीं कवि के रूप में कहीं पाठक के रूप में । मैं भी मूल रूप से कवि हूँ और ब्लॉग जगत में प्रवेश से पूर्व ही देश की लगभग पचास साहित्यिक पत्रिकाओं में 300 से अधिक कवितायें प्रकाशित होने के अलावा एक संग्रह और एक लम्बी कविता " पुरातत्ववेत्ता " भी प्रकाशित है। कविता संग्रहों की समीक्षा भी मैं करता हूँ सो थोड़ी बहुत आलोचक के रूप में भी पहचान है। कविता के ब्लॉग्स  में कविताओं को प्रशंसा भी बहुत मिलती है। इसके अनेक कारण हो सकते हैं । लेकिन साहित्य जगत में अभी ब्लॉग की कविताओं को उस दृष्टि से नहीं देखा जाता जिस दृष्टि से साहित्यिक पत्रिकाओं में छपने वाली कविताओं को देखा जाता है । इसका एक कारण यह भी है कि यहाँ सम्पादक भी स्वयं कवि  है और उसे बिना किसी अवरोध के अपनी कविता प्रकाशित करने का अधिकार है । पाठक और कवि के बीच से सम्पादक की यह कड़ी गायब होने के कारण और कई बार अपनी कविता को परिपूर्ण समझने के मोह में हम अपनी कविता की आलोचना नहीं कर पाते हैं और कविता कहीं न कहीं कमज़ोर रह जाती है । हम इसे स्वीकार नहीं करते क्योंकि तुलसी दास जी ने कहा भी है  " निज कवित्त केहि लागि न नीका ,होय सरस वा हो अति फीका " । कई ब्लॉगर मित्रों का यह आग्रह है कि मैं इस विषय पर कुछ लिखूँ  और अपने ' कविता वर्कशॉप ' मे जो टिप्स नये लिखने वालों को देता हूँ उन्हे भी बताऊँ । सो अपने लेख " हर कविता तीन स्तरों पर आलोचना से गुजरती है" की यह पहली किश्त यहाँ जारी कर रहा हूँ । चर्चा के दौरान और जो मुद्दे आयेंगे उन पर भी लिखने की कोशिश करूंगा ।
                         
                                       हर कविता तीन स्तरों पर आलोचना से गुजरती है


                     पहला आलोचक स्वयं कवि होता है  - कवि कर्म ईश्वरीय देन नहीं है । कविता लिखने की प्रेरणा हमे साहित्य और समाज से मिलती है लेकिन उसके लिए तैयारी स्वयं करनी होती है ।इसके लिए स्वयं का अध्ययन,अनुभवों को रचना में ढालने की शक्ति, साहित्य के इतिहास से परिचय, भाषा की समझ , कल्पनाशीलता , विचारधारा , दृष्टि , शब्दभंडार, राजनैतिक समझ और ऐसे ही अनेक तत्वों की आवश्यकता होती है । कविता लिखते समय कवि को निर्मम होकर अपनी रचना की आलोचना करनी चाहिये ।
                   दूसरा आलोचक कविता का पाठक है - कविता प्रकाशित होने के पश्चात जब पाठक के सन्मुख आती है तो वह उसका आस्वादन करता है ।मुख्यत: पाठक उस रचना में भाव ढूंढता है , कोई बिम्ब, कोई प्रतीक या कोई विचार उसे उद्वेलित करता है वह उस कविता में अपने आसपास के परिदृश्य की तलाश करता है ।पाठक के मन की कोई बात यदि उस कविता में हो तो वह उसे पढ़कर प्रसन्न होता है। यदि कविता में उसके आक्रोश को अभिव्यक्ति मिलती है या उसे अपनी समस्याओं का समाधान नज़र आता है तो वह कविता उसकी प्रिय कविताओं में शामिल हो जाती है । कुछ पाठक कविता में गेयता को पसंद करते है, वे उसकी लय एवं ताल पर मोहित होते हैं और कथ्य उनके लिए गौण हो जाता है ।
                    इस तरह पाठक के पास कविता का रसग्रहण करने का अपना पैमाना होता है ।कविता की ग्राह्यता पाठक के स्वयं के अध्ययन , उसकी विचारधारा तथा जानकारियों अथवा सूचनाओं के भंडार पर भी निर्भर करती है । कविता में पाठक की रुचि इन्ही सब बातों की वज़ह से होती है ।उसके लिए सबसे अच्छी कविता वह होती है जिसे पढ़कर अनायास उसका मन कह उठे .. ‘ अरे ! ऐसा तो मैं भी लिख सकता था ।‘
                     तीसरा आलोचक तो आलोचक है ही - इस आलोचक का काम इससे एक कदम आगे का है ।उसका काम कविता को पढ़ना या देखना मात्र नहीं है ।आलोचक का कार्य है कविता में अंतर्निहित अन्य तत्वों को पाठकों के सन्मुख रखना ताकि वे एक नई दृष्टि एवं नये उपकरणों के साथ कविता में मूल्यों की तलाश कर सकें ।आलोचक का यह कार्य उन कवियों के लिए भी ज़रुरी है जो केवल शब्दों की जोड़-तोड़ को या किसी विचार को तीव्रता के साथ कविता में प्रक्षेपित करने को ही कविता समझते हैं या जिनका कविता लिखने का उद्देश्य महज स्वांत:सुखाय, आत्माभिव्यक्ति या पाठकों का मनोरंजन है ।
                      वर्तमान समय में इस में लोकप्रियता का तत्व और जुड गया है जिसकी वज़ह से साहित्य में प्रदूषण की संभावनाएँ बढ़ गई हैं । इसके अतिरिक्त साहित्य में व्यक्तिवाद भी बढ़ता जा रहा है , व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के कारण जोड़-तोड़ की राजनीति साहित्य में भी प्रारंभ हो गई है , इस वजह से बहुत सारे अच्छे रचनाकार निराश हो चले हैं ।आलोचक का काम इस स्तर पर और भी महत्वपूर्ण हो जाता है । ( आगे जारी )

यह विचार आपको  कैसे लगे ,आप कवि हों या कविता के पाठक , या साहित्य प्रेमी ,इस पर आपकी राय जानना ज़रूरी है - शरद कोकास

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

पुरस्कारों का पैसा कहाँ से आता है ?

भारत भूषण अग्रवाल स्मृति कविता सम्मान के सन्दर्भ में संकलित पुस्तक ’ उर्वर प्रदेश ‘ की भूमिका में विष्णु खरे जी की प्रतिक्रिया या उनके लेख पर काफी चर्चा हो रही है । मै यहाँ साभार प्रस्तुत कर रहा हूँ जनवरी-जून 2009 में प्रकाशित “सापेक्ष के आलोचना विशेषांक में प्रकाशित विष्णु खरे के यह विचार जो महावीर अग्रवाल द्वारा पूछे गये एक प्रश्न के उत्तर में उन्होने दिये थे । इन विचारों को उक्त लेख की पूर्वपीठिका के रूप में देखा जा सकता है ।
महावीर अग्रवाल : पुरस्कारों का रचनाकारों और आलोचकों पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
विष्णु खरे : दिलचस्प तथ्य यह है कि पुरस्कार सिर्फ रचनाकारों को ही नहीं आलोचकों को भी दिये जा रहे हैं – ज्ञानपीठ से लेकर देवीशंकर स्मृति पुरस्कार तक । मैं साहित्य अकादमी पुरस्कार से आठ वर्ष सम्बद्ध रहा ,बल्कि उसका लगभग एकमात्र नियंत्रक या प्रबन्धक रहा ,फिर भारतभूषण स्मृति पुरस्कार ,श्रीकांत वर्मा स्मृति पुरस्कार ,देवीशंकर अवस्थी स्मृति पुरस्कार तथा अंकुर मिश्र स्मृति पुरस्कार से । अन्य कई पुरस्कारों के लिये नाम सुझाने के लिये मेरे पास परिपत्र आते रहते हैं लेकिन वे इतनी जानकारी आपसे चाहते हैं कि मैं उन्हे भरकर वापस नहीं भेज पाता । मैं जिन वर्षों में साहित्य अकादमी का कार्यक्रम उप-सचिव रहा उन वर्षों के पुरस्कारों को लेकर कुछ व्यक्ति कई दावे करते घूमते हैं , मैं सिर्फ यही कहना चाहता हूँ कि उन वर्षों में हिन्दी तथा अन्य कुछ और भाषाओं के पुरस्कारों का बिना मेरी सहमति और “ मिलीभगत” के बगैर दिया जाना असम्भव था – सारे गोपनीय कागज़ मेरे ज़रिये जाते थे और सिर्फ मेरे पास रहते थे । सही वक़्त आने पर “राइट टू इंफर्मेशन” के सहारे उन फाइलों को देख पाना शायद सम्भव हो। बहरहाल ,कोई भी पुरस्कार अपने निर्णायकों से अधिक प्रतिष्ठित नहीं हो सकता । हिन्दी में यदि किन्हीं पुरस्कारों को अपेक्षाकृत आदर से देखा और स्वीकार किया जाता है तो इसलिये कि उसके निर्णायक या निर्णायकों ने अयोग्य कृति या रचनाकार को नहीं चुना है ।

पुरस्कारों को लेकर यह प्रश्न भी उठाये जाने चाहिये कि उनका पैसा कहाँ से आता है ? वे जिनकी कथित ‘ स्मृति ‘ में दिये जा रहे हैं वे स्मृति-योग्य हैं भी या नहीं ? साहित्य से उनका क्या लेना-देना रहा है ? या उनके लिये पैसा और समारोह की व्यवस्था करने वाले स्वयं अपनी क्षुद्र स्मृति का प्रबन्धन कर रहे हैं ? निर्णायक- मंडल में साहित्यिक गुणवत्ता को लेकर जूझने वाले लोग हैं या नहीं ? क्या निर्णय प्रक्रिया पारदर्शक है और तत्सम्बन्धी नियमों का कठोर पालन किया जाता है ? यदि इनके उत्तर बेदाग हैं तो ऐसे पुरस्कार पुरस्कृत सृजेताओं की बहुत मदद कर सकते हैं । उनकी पुस्तकें प्रकाशित और चर्चित हो जाती हैं । पत्रिकायें और आलोचक उनकी ओर आकृष्ट होते हैं – यदि पहले से ही नहीं हुए तो । चूंकि अधिकांश छोटे किंतु अपेक्षाकृत प्रतिष्ठित पुरस्कार 40-45 या इस से कम उम्र के लेखक – लेखिकाओं के लिये है । इसलिये वे सही उम्र में सही स्वीकृति की मुहर जैसे बन जाते हैं । फिर यह भी स्वाभाविक है कि पुरस्कृत रचनाकार अपनी भावी रचनाओं को लेकर थोड़ी अधिक ज़िम्मेदारी महसूस करने लगें लेकिन यह भी देखा गया है कि कुछ छोटे-बड़े पुरस्कार प्राप्त करने के बाद कुछ साहित्यकारों में नाना प्रकार का पतन मिलने लगे ।

बहरहाल, मेरी मान्यता यह है कि अधिकांश पुरस्कार 50 या उससे कम आयु वाले लेखकों को ही दिये जाने चाहिये -60, 70, 80 की उम्र में लिये जाने वाले पुरस्कार यदि हास्यास्पद और निरर्थक नहीं तो करुणास्पद अवश्य लगने लगते हैं । रही बात आलोचकों को दिये जाने वाले पुरस्कारों की , तो वहाँ स्थिति कुछ चिंतनीय है । जब तक मैं देवीशंकर अवस्थी सम्मान निर्णायक-मंडल में रहा ,मैंने देखा कि पुरस्करणीय पुस्तक खोज पाना आसान नहीं था फिर यह कि अधिकांश आलोचना कविता और गल्प पर लिखी जा रही है और अन्य विधाओं पर समीक्षा का लगभग कोई अस्तित्व नहीं है । मुझे लगता है कि आलोचना के क्षेत्र में वर्ष की सर्वोत्तम समीक्षा, सर्वोत्तम निबन्ध ,सर्वोत्तम मोनोग्राफ, सर्वोत्तम शोध-प्रबन्ध और सर्वोत्तम पुस्तक पर सम्भव हो तो विधावार पुरस्कार दिये जाने चाहिये । शायद इससे हमारी व्यापकतर आलोचना का स्तर कुछ कम शोचनीय हो सके ।

इन विचारों पर आपके विचार सादर आमंत्रित हैं । कवि बोधिसत्व के विचार भी उनके ब्लॉग विनय पत्रिका में अवश्य पढ़ें साथ ही विमल कुमार का लेख ब्लॉग बना रहे बनारस पर पढ़ें ।- शरद कोकास

रविवार, 6 सितंबर 2009

तो कामायनी की ऐसी तैसी हो जाती

आलोचक बच्चन सिंह ( 2 जुलाई 1919- 5 अप्रेल 2008 ) आलोचना,क्रांतिकारी कवि निराला,हिन्दी नाटक, समकालीन साहित्य, आलोचना की चुनौती।आलोचक और आलोचना,साहित्य का समाजशास्त्र,हिन्दी आलोचना के बीज शब्द जैसी पुस्तकों के रचयिता है । "सापेक्ष" के आलोचना अंक से महावीर अग्रवाल और बच्चन सिंह की बातचीत से यह अंश मैने लिया है और चित्र साभार ,कवि चित्रकार इरफान के ब्लॉग "टूटी हुई बिखरी हुई से"

बच्चन सिंह ने कहा था


रचनाकारों का कहना है कि आलोचक रचनाओं को बिना पढ़े ही आलोचना लिखते हैं और आलोचक का कहना है कि रचनाकार समीक्षाओं को बिना पढ़े ही रचनात्मक साहित्य लिखते हैं । ये आरोप प्रत्यारोप बेमाने ही नहीं उपहासास्पद भी हैं आलोचक रचनाकार का निर्देशक नहीं हो सकता । रचना और आलोचना अलग-अलग साहित्यिक अनुशासन हैं । रचनाकार अपनी आलोचनायें पढ़ता अवश्य है लेकिन पढ़कर सरका देता है । यदि जयशंकर प्रसाद जी या मुक्तिबोध जी की आलोचनायें पढ़कर कामायनी लिखते तो कामायनी की ऐसी तैसी हो जाती । बहुत से आलोचक ऐसे भी हैं जो अत्यंत कटु भाषा का प्रयोग करते हैं । रवि बाबू को इनसे पाला पड़ा था । वे इन्हे साहित्यिक गुंडे कहते हैं। कीट्स और वर्ड्सवर्थ को भी इन्होने तंग किया था । हिन्दी में ऐसे ही आलोचकों ने आधुनिक काल के सर्वश्रेष्ठ कवि निराला को विक्षिप्त कर दिया था ।

आजकल अनेक आलोचकों का रुझान सांस्कृतिक आलोचना की ओर बढ़ा है । भारत अनेक संस्कृतियों का देश है । भाषा,देश-काल ,स्थानिकता ,खानपान, त्योहार, उत्सव , रीति-नीति ,वेष-भूषा के आधार पर उनमे सूक्ष्म भेद किया जा सकता है । बंगाल ,हिन्दी भाषी क्षेत्र ,तमिलनाडु , केरल , महाराष्ट्र ,कर्नाटक ,पूर्वोत्तर प्रदेश गुजरात आदि मे थोड़ी- बहुत भिन्नता पाई जाती है पर इनमें नैकट्य ,एकत्व ,बन्धुत्व की कमी नही है इन्हे एक भारतीय छतरी की छाँह मे रखा जा सकता है । पर धर्म के आधार बनी संस्कृतियाँ जैसे मुस्लिम ईसाई उस छतरी में नहीं समा पाते हैं लेकिन इन सभी संस्कृतियों मे एक तरह का सहअस्तित्व रहता है । इनमे आपस में आवा जाही बन्द नही होती । अत: इनके आधार पर एक भारतीय संस्कृति की भावात्मक परिकल्पना या संरचना की जा सकती है ।

इधर विश्वग्राम का झुनझुना थमा कर तीसरी दुनिया को अपने साँस्कृतिक साम्राज्यवाद का शिकार बना कर विकसित पूंजीवादी देश महान हैं । वे अपनी पूंजीवादी संस्कृति को चमकदार बनाकर तीसरी दुनिया को बेच रहे हैं । संस्कृति को उन्होने पदार्थ ( कमोडिटी) बना रखा है। विश्वग्राम एक प्रकार का सांस्कृतिक उद्योग हैं। इसके माध्यम से वे तीसरी दुनिया को सांस्कृतिक उपनिवेश में बदलने का उपक्रम कर रहे हैं । अब तीसरी दुनिया जाग उठी है । उसे अपनी संस्कृति को बचाना जरूरी होगा । इसलिये वह अपनी देशी भाषा , साहित्य के रूप में और कथ्य को अपनी परम्परा के अनुरूप ढाल रही है । उसका अपना नारा है अपनी जड़ों की ओर लौटो । इन्ही जड़ों से स्वस्थ्य परिवर्तन भी होगा । इसी सन्दर्भ में उसे अपने साहित्य का नया मूल्यांकन करना पड़ा है । जब जब परिवेश बदलेगा तब तब पुनर्मूल्यांकन अपेक्षित होगा ।

( बच्चन सिंह जी के यह विचार इन अर्थों में महत्वपूर्ण है कि वे इस बदलते हुए परिवेश में साहित्य के पुनर्मूल्यांकन की मांग करते हैं , क्या यह पुनर्मूल्यांकन उचित है ? क्या यह पुन: नये विवाद को जन्म नहीं देगा ? बच्चन सिंह जी ने भारतीय छतरी की जो परिभाषा दी है वह पर्याप्त है ? 

आपके महत्वपूर्ण विचार सादर अपेक्षित हैं ।-

शरद कोकास

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सोमवार, 31 अगस्त 2009

जिसके पास सपना नहीं है उसे कलम रख देनी चाहिये

कमलेश्वर
ने कहा था

साहित्य में तरह तरह के अंतर्विरोधों ने बड़ी दिक्कतें पैदा कीं । इस अंतरविरोध के कारण यह दिखाई पडता था कि साहित्य में आदमी यह सोचता है ,घर के मामले में ,परिवार के मामले में यह सोचता है ,समाज के मामले में यह सोचता है और राजनीति के मामले में यह सोचता है । तो यह जो अंतर्विरोध है ,इसके कारण रचना में जो दीप्ति और शक्ति आनी चाहिये वह नहीं पाती । 

इस तरह का बहुत लेखन होता है । मैं खुद आपसे कहता हूँ और क्षमा चाहता हूँ अपने तमाम साथियों को याद करते हुए कि जब नई कहानी का दौर आया तो उस दौर में हम कम से कम पूरे भारत में फैले हुए थे । कल्पना हैदराबाद से निकलती थी ,ज्ञानोदय कलकत्ते से निकलता था ,माध्यम निकलता था , पटना से चार-चार पत्रिकायें निकलती थीं । लगभग सौ लेखक थे , बड़ा लम्बा काँरवा था , लेकिन फिर सब कहाँ छूटते चले गये । 

आप सोचिये ! हम कहीं न कहीं रचना का अकेलापन झेल रहे हैं । जब लोग छूट गये तो रचना हमारी पूरक थी , क्योंकि जो हम नहीं लिख पाते थे , वह लिखता था , वह नहीं लिखता तो कोई तीसरा लिखता था । तो रचना का एक अनुपूरक दौर था । और वह पूरक रचना मिलकर एक बड़े साहित्य या बड़े सवाल का निर्माण करती थी । अभी यह बात आई कि हमारे पास सपना नहीं है ,

तो मित्रवर ! एक सबसे बड़ी चीज़ यह है कि जिसके पास सपना नहीं है उसे तो कलम रख ही देनी चाहिये । खामखाँ लिख रहा है । अगर सपना नहीं है तो कलम की ज़रूरत ही नहीं है ( वाराणसी में मई1999 में पत्रिका काशी प्रतिमान द्वारा आयोजित समकालीन हिन्दी लेखन विषयक गोष्ठी में कमलेश्वर जी द्वारा अध्यक्ष पद से व्यक्त विचार के अंश : “काशी प्रतिमान” से साभार )

" यह कमलेश्वर जी ने सिर्फ 10 वर्ष पहले कहा था ,मुझे लगता है सपना तो हर मनुष्य देखता है लेकिन हर मनुष्य लेखक नहीं होता । इसलिये लेखक होने के लिये सिर्फ सपना काफी नहीं है । "

आपका -शरद कोकास

शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

वे सुबह मछली को दाना चुगाते हैं और रात को फिशकरी खाते हैं ।

हरिशंकर
परसाई ने कहा था

आज 22 अगस्त परसाई जी के जन्म दिन पर बहुत पुरानी यह घटना याद आ रही है । यह 1983 की बात है बैंक की नई नई नौकरी थी और मैं ट्रेनिंग के लिये जबलपुर गया था । दुर्ग से निकलते समय सापेक्ष के सम्पादक महावीर अग्रवाल जी ने सापेक्ष की कुछ प्रतियाँ दीं और कहा “नेपिय टाउन में यह परसा जी के यहाँ दे देना ।“ जबलपुर में मैने रिक्शा किया और कहापरसाई जी के यहाँ चलो  

मोहल्ले में पहुंचकर रिक्शेवाले ने पूछा “भैया घर पता है ? “ 

मैने कहा “ पता तो नही है  लेकिन वे देश के बहु बड़े लेखक है उनका घर सब जानते होंगे । चलो किसीसे पूछ लेते हैं ।“ एक दो लोगों से पूछा तो उन्होने अनभिज्ञता जताई । 

एक ने कहा “ कौन परसाई...? अच्छा वो वकील हैं क्या ?” वहीं 3-4 छात्र खड़े थे जब उन्होने भी कहा कि वे नहीं जानते तो मुझे गुस्सा आ गया और मैने कहा “ शर्म नहीं आती आप लोगों को देश का इतना बड़ा लेखक आपके मोहल्ले में रहता है और आप उनका घर नहीं जानते ।“ खैर पूछते–पाछते घर तो कुछ देर में मिल गया लेकिन जैसे ही मैने परसाई जी से इसका ज़िक्र किया तो वे ज़ोर से हँस पड़े और कहा “ गनीमत है उसने वकील तो कहा , लेकिन आपको इतना परेशान होने की क्या ज़रूरत ..
अपने देश में लेखक ही तो सबसे कम जाना जाता है


फिर तो खैर हर साल उनके यहाँ जाना होता रहा । कभी जयप्रकाश पाण्डेय ,कभी हिमांशु भाई के साथ ।एक दो बार तो भाई हिमांशु राय अपनी साइकल पर बिठाकर भी ले गये । उन मुलाकातों के अपने अनुभव फिर कभी लिखूंगा । फिलहाल तो व्यंग्य पर परसाई जी के विचार जो उन्होने महावीर अग्रवाल के एक प्रश्न के उत्तर में प्रकट किये थे ।

व्यंग्य यथार्थ से उपजता है व्यंग्य का कार्य एक लहर उठाना है और समाज को झकझोर कर खड़ा कर देना है सभी विधाओं में व्यंग्य की भाषा शक्कर की तरह घुल जाती है सवाल यह है कि कोई लेखक अपने युग की विसंगतियों को कितने गहरे खोजता है उस विसंगति की व्यापकता क्या है और वह जीवन में कितनी अहमियत रखती है मात्र व्यक्ति की ऊपरी विसंगतिशरीर रचना की ,व्यवहार की ,बात के लहज़े की,एक चीज़ है और व्यक्ति तथा समाज के जीवन की भीतरी तहों में जाकर विसंगति खोजना उन्हे अर्थ देना और उसे विरोधाभास से पृथक कर जीवन से साक्षात्कार कराना दूसरी बात है  

यह समाज हमे भाषा सिखाता है अपने अध्ययन संस्कार और परिवेश से भी भाषा धीरे धीरे विकसित होती है पाखण्ड के बारे में कहानी कविता और कई तरह के लेख लिखे जाते हैं मै लेख लिखकर कुल यह कह दूंगा—‘ कुछ लोग इतने दयालु और धार्मिक होते हैं कि रोज़ सुबह मछली को दाना चुगाते हैं और रात को फिश करी खाते हैं

तो अब आप भी ढूंढ कर श्री हरिशंकर परसाई का समग्र साहित्य पढ़ ही डालिये वरना अगले साल आप भी पूछेंगे कौन परसाई ?

-आपका शरद कोकास

मंगलवार, 11 अगस्त 2009

क्या मुकुटधर पाण्डेय ने पागलपन में अच्छी कवितायें और लेख लिख डाले ?



ऐसा कहा जाता है कि कवि तो पागल होता है । यह पागलपन या दीवानापन उसका साहित्य के प्रति तो होता है लेकिन सम्भवत: अपने लेखन पर ध्यान केन्द्रित करने के फलस्वरूप अन्य दुनियावी बातों पर उसका ध्यान नहीं जाता। 

उसकी बेखयाली को उसका पागलपन समझ लिया जाता है । 

इसके अलावा वह भी एक साधारण मनुष्य होता है । अनेक किस्म के भय उसे भी हो सकते है । सन 1918 से 1923 के बीच श्री मुक़ुटधर पाण्डेय भी ऐसी ही मानसिक व्याधि या यात्रा के फोबिया से ग्रस्त थे । हाँलाकि इसी दौर में उन्होने हिन्दी में छायावाद शीर्षक से चार निबन्ध लिखे । उस दौर की कविता को छाया वाद नाम देने का श्रेय भी उन्ही को जाता है । अपनी मानसिक अवस्था के बारे में श्री क्षेमचन्द्र सुमन को एक पत्र उन्होने लिखा था प्रस्तुत है उस पत्र से यह अंश । इसे पढ़कर आप ही बतायें उन्हे क्या हुआ था ।

मुक़ुटधर पाण्डेय ने कहा था

"सन 1918 में मैं किसी काम से बिलासपुर जा रहा था । स्टेशन पर एक मित्र ने भांग की गोली खिला दी । बिलासपुर पहुंचते -पहुंचते मुझे घबराहट होने लगी । ऐसी घबराहट कि किसी प्रकार शांत नहीं हुई । मैं बिलासपुर में ठहर नहीं सका रायगढ़ लौट आया । तब तबियत ठीक हो गई । कुछ दिन बाद किसी काम से कलकत्ता जाने का विचार ठहरा । ठीक जाने के समय वही घबराहट फिर शुरू हो गई । हज़ारों बार समझने पर भी , शांत करने पर भी मन शांत नहीं हुआ । लाचार यात्रा रोक देनी पड़ी । तब घबराहट बन्द हो गई । जब कभी बाहर जाने का विचार होता बिलासपुर की याद आते ही घबराहट शुरू हो जाती मैने यह लक्षण प्रयाग के एक आयुर्वेद पंचानन, पंडित जगन्नाथ प्रसाद शुक्ल सम्पादक ' सुधानिधि ' को लिख भेजा । उन्होने मेरे एक मित्र से कहा -" यह पागलपन का लक्षण है "। मित्र ने मुझे लिखा । मैने बात हंसी में उड़ा दी । मैं उसे एक हवाई बीमारी समझता था । पागलपन का खयाल तक नहीं था । सन 1918 से 1923 तक मुझे यह शिकायत तो रही ,पर इन्ही वर्षों में मैने अच्छी कवितायें लिखीं और लेख लिखे । "

(प्रस्तुत अंश वर्तमान साहित्य के आलोचना अंक मे सम्मिलित सूरज पालिवाल के लेख से साभार । मुकुटधर पाण्डेय जी पर विस्तृत जानकारी संजीव तिवारी के ब्लॉग आरम्भ में )

आपका शरद कोकास