सोमवार, 29 अगस्त 2011
आज ब्लॉग विवरण में डॉ.कमला प्रसाद का नाम जोड़ा है
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शरद कोकास
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लेबल: aalochana, ashok singhai, hindi critic, hindi literature, jabalpur . parsai, kamala prasad
बृहस्पतिवार, 23 सितम्बर 2010
प्रो. मैनेजर पाण्डेय को जन्मदिन की शुभकामनायें 23 सितम्बर
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शरद कोकास
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लेबल: आलोचक . हिन्दी साहित्य, आलोचना, नामवर सिंह, परसाई, मैनेजर पाण्डेय, सापेक्ष
शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010
"समुद्र चांद और मैं .". मैं यानि कवि अशोक सिंघई
अशोक सिंघई का पाँचवाँ काव्य संग्रह
‘समुद्र, चाँद और मैं’ लोकार्पित
केदार जी ने इस अवसर पर लिट्ररी क्लब, भिलाई इस्पात संयंत्र के अध्यक्ष व राजभाषा प्रमुख श्री अशोक सिंघई के मेधा बुक्स, नई दिल्ली से प्रकाशित पाँचवें काव्य संग्रह ‘समुद्र, चाँद और मैं’ का लोकार्पण ‘सिंघई विला’ में किया। इस सादे किन्तु गरिमामय आयोजन की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध गाँधीवादी चिन्तक व कानूनविद् श्री कनक तिवारी ने की। प्रसंगवश अशोक सिंघई के पहले प्रकाशन प्रदीर्घ कविता ‘अलविदा बीसवीं सदी’ का लोकार्पण फरवरी, 2000 में विश्व पुस्तक मेला में एवं तीसरे काव्य संग्रह ‘सम्भाल कर रखना अपनी आकाशगंगा’ का भी लोकार्पण छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में नवम्बर, 2004 में प्रख्यात साहित्यकार स्वर्गीय श्रीकान्त वर्मा एवं कीर्तिशेष सम्पादक, कवि व उपन्यासकार गुलशेर अहमद शानी की स्मृति में आयोजित ‘कविता की पंचाट‘ में श्री केदार नाथ सिंह ने ही किया था।
श्री केदार नाथ सिंह ने अशोक सिंघई को अपना प्रिय कवि बताते हुये कहा कि प्रगतिशील चेतना से युक्त अशोक उन विरले कवियों में से हैं जिनकी नई कविता में दुर्लभ लयात्मकता है। हिंदी की नई कविता में एक खास तरह की गीतात्मकता को इन्होंने बचाये रखा है। ये उम्र में मुझसे बहुत छोटे हैं, अतः इनके पास अभी साहित्य में सक्रिय बने का वक्त है और क्षमता भी। ये साहित्य में कार्यरत रहें, जीवन में यह मेरी कामना है ।
अध्यक्षीय वक्तव्य में श्री कनक तिवारी ने कहा कि ‘समुद्र, चाँद और मैं’ मुझे आकर्षित करता है और अँग्रेज़ी का मेरा सर्वाधिक प्रिय कवि कालरिज़ बरबस मुझे याद आता है जिन्होंने सागर पर सर्वश्रेष्ठ कवितायें विश्व साहित्य को दी हैं। चाँदनी रात में समुद्र के किनारे मनुष्य रूमानी हो जाता है पर अशोक अपनी ऐसी बौद्धिकता को बचाये रखते हैं जो भावुकता से पगी रहती है। अशोक का यह सौभाग्य है कि उन्हें केदारजी प्राप्त होते रहते हैं। अमूमन कवि अपने क्लाईमेक्स में मर जाता है पर केदारजी के साथ यह नहीं है, अशोक के साथ भी यही घटे, मेरी शुभकामना है।
इस अवसर पर भिलाई-दुर्ग के साहित्यकारों ने कवि केदार को 23 मार्च को प्राप्त होने वाले शलाका सम्मान की बधाई दी तथा उनके दीर्घ व कीर्तिमय जीवन की शुभकामनायें भी दीं। युवा कवि श्री शरद कोकास ने लोकार्पण कार्यक्रम का संचालन किया व इस्पातनगरी भिलाई के साहित्यकारों की ओर से श्री केदार नाथ सिंह का भिलाई पधारने पर और इस आत्मीय आयोजन में उनके तथा समस्त साहित्यकारों के प्रति समय देने के लिये आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर सापेक्ष के संपादक श्री महावीर अग्रवाल, डॉ0 सियाराम शर्मा, डॉ0 तीर्थेश्वर सिंह, प्रलेस अध्यक्ष श्री लोकबाबू, शायर मुमताज़, कवयित्री श्रीमती पुष्पा तिवारी, वरिष्ठ पत्रकार श्री अजय पाण्डेय आदि संस्कृतिकर्मी उपस्थित थे।
रपट - शरद कोकास
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शरद कोकास
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लेबल: अशोक सिंघई, आलोचना, केदार नाथ सिंह, भिलाई इस्पात संयंत्र, शरद कोकास
बृहस्पतिवार, 25 फरवरी 2010
हम शिविर में कवि-कथाकार बनाते हैं
यह माना जाता है कि कवि – कथाकार व कलाकार जन्मजात होते हैं । लेकिन ऐसा नहीं है । एक रचनाकार बनने के लिये साधना करनी पड़ती है और विधिवत अध्ययन करना पड़ता है । यह न भी किया जाये तो कवि को कवि बनने से कोई रोक नहीं सकता लेकिन उसकी रचना में परिपक्वता आने में समय तो लग ही जाता है । इस उद्देश्य को ध्यान में रख कर हमारे देश के विभिन्न लेखक संघों और साहित्य सम्मेलनों द्वारा लेखक शिविर या रचना शिविर आयोजित किये जाते रहे हैं । स्व. मायाराम सुरजन जी के प्रयासों से मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा 27-28 वर्ष पूर्व यह परम्परा प्रारम्भ की गई थी । इस शिविर का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इस बहाने वरिष्ठ और अनुभवी लेखक नवोदित रचनाकारों के साथ मिल बैठकर बात करते हैं । इन शिविरों में रचना के हर पहलू पर बातचीत होती है ।
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शरद कोकास
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1:43 अपराह्न
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लेबल: मायाराम सुरजन, शिविर, हिन्दी साहित्य सम्मेलन
मंगलवार, 16 फरवरी 2010
मानक आलोचना वह है जो पाठक को फिर रचना की ओर लौटा दे ।
महावीर अग्रवाल: आप मानक आलोचना किसे मानते हैं मानक आलोचना का मानदंड क्या होना चाहिये ?
अशोक वाजपेयी : इसके कोई सिद्धांत हमेशा के लिये निर्धारित नहीं किये जा सकते । साहित्य की अन्य विधाओं की तरह आलोचना भी परिवर्तनशील है फिर भी कुछ गुण पहचाने जा सकते हैं ।मानक आलोचना वह है जिसमें साहित्य का अनुराग प्रकट हो ,जिसमें रचना को धीरज और जतन से समझ- बूझ कर पढ़ने का साक्ष्य हो ,जो रचना के अंतर्निहित अभिप्रायों और आशयों को स्पष्ट करने की चेष्टा करती हो जिसमे रचना की विशिष्टता को पहचानने का प्रयत्न हो ,रचना को परम्परा में अवस्थित करने का उत्साह हो , जिसमें अपने पूर्वग्रहों और रचनाकारों के पूर्वग्रहों के तादाम्य या टकराव को स्पष्ट ईमानदारी से स्वीकार किया गया हो और उनके बावज़ूद रचना के रसास्वादन का प्रमाण हो ।
आलोचक को भी रचनाकार की तरह सामान्यीकरणों से गुरेज करना चाहिये ।आलोचक रचना को उसके व्यापक सांस्कृतिक- सामाजिक सन्दर्भ में तभी रख सकता है जब उसकी उस सन्दर्भ की समझ आश्वस्तकारी हो ,कोई बन्धा-बन्धाया फार्मूला नहीं ।मानक आलोचना वह है जो पाठक को फिर रचना की ओर लौटा दे ।
ऐसी मानक आलोचना हिन्दी में है । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल,आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय , मुक्तिबोध , निर्मल वर्मा , नामवर सिंह जैसे मूर्धन्यों के अलावा मलयज, विजयदेव नारायण साही , विष्णु खरे , मैनेजर पाण्डेय , नन्दकिशोर नवल , वागीश शुक्ल , रमेशचन्द्र शाह , कुँवर नारायण , पुरुषोत्तम अग्रवाल , कृष्ण कुमार , मदन सोनी आदि ने ऐसी आलोचना लिखी है ।
श्री अशोक वाजपेयी जी का स्वागत है ,,उनके यह विचार आपको कैसे लगे अवश्य बताइये । कविता पाठ व व्याख्यान की रपट अगली पोस्ट में - शरद कोकास
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शरद कोकास
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5:31 अपराह्न
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लेबल: अशोक वाजपेयी, हिन्दी आलोचना
रविवार, 29 नवम्बर 2009
बैलगाड़ी रचना है, गाड़ीवान कवि, आलोचक कुत्ता , तो क्या पाठक बैल है ?
कुछ समय पूर्व ब्लॉग “साहित्य शिल्पी” में काव्यालोचना के अंतर्गत मेरा एक लेख प्रकाशित हुआ था “ हर कविता तीन स्तरों पर आलोचना से गुजरती है” इस आलेख पर प्राप्त टिप्पणियों की ओर राजीव रंजन जी ने ध्यान आकर्षित करवाया । मेरे बहुत से मित्रों सर्वश्री अनिल कुमार,नंदन, आचार्य संजीव वर्मा , रितुरंजन,तेजेन्द्र शर्मा,दिगम्बर नासवा,अभिषेक सागर,मोहिन्दर कुमार, सुश्री अनन्या,गीता पंडित,तथा किरण सन्धु ने प्रश्नों के माध्यम से अपनी शंकायें प्रस्तुत की थीं । यह एक स्वस्थ्य परम्परा है । यह सहज मानवीय स्वभाव है कि मनुष्य को जब तक अपने मानस में उठ रहे प्रश्नों का समाधानकारक उत्तर नहीं मिल जाता वह आगे की किसी भी बात को ग्रहण कर सकने में असमर्थ होता है । वह किसी न इसी माध्यम से उन शंकाओं का ऐसा समाधान चाहता है जो उसकी धारणाओं में परिवर्तन कर सके अथवा उन्हे पुष्ट कर सके। लचीलापन उसके सहज स्वभाव में होता है और अपने विवेकानुसार सही अथवा गलत के बीच भेद कर अपने लिये जो उचित है उसे वह स्वीकार कर लेता है। मैने प्रयास किया कि इन प्रश्नों के उचित समाधान प्रस्तुत कर सकूँ ।हो सकता है कि यह प्रश्न अनेक मित्रों के मन में उठ रहे हों इसलिये "साहित्यशिल्पी" पर दिये गये उत्तर को मैं अपने ब्लॉग "आलोचक " पर भी प्रस्तुत करना चाहता हूँ । इसमें मत भिन्नता सहज स्वाभाविक है ।
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शरद कोकास
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बृहस्पतिवार, 5 नवम्बर 2009
सीधे- सादे आदमी के घर एक अनजान मेहमान ,बेनामी की शाब्दिक पिटाई द्विवेदी जी और अशोक द्वारा
कल उड़न तश्तरी पर समीर भाई के सुभाषित का आनंद ले रहा था कि उनके एक सुभाषित पर नज़र पड़ी ..”प्रशंसा और आलोचना में वही फर्क है जो सृजन और विंध्वस में “ अरे.. मैने कहा यह तो मेरे ब्लॉग के काम की चीज़ है । याद आया अभी पिछले दिनों मैने एक पोस्ट में महावीर अग्रवाल द्वारा लिये गये नामवर सिंह के साक्षात्कार का एक अंश प्रस्तुत किया था । पब्लिश होने के बाद जब मैने टिप्पणियाँ देखीं तो एक बेनामी टिप्पणी । मेरे तो हाथ पाँव फूल गये ,भई सीधे - सादे आदमी के घर एक अनजान आदमी मेहमान बन कर जबरन आ जाये तो उसकी हालत कैसी होगी बस वही मेरी हालत थी । सोचा टिप्पणी मॉडरेट कर दूँ.. अस्वीकार .. हाँलाकि यह बेनामी पढ़ा-लिखा तो दिखाई देता था और इस बहाने कई लोगो के मन मे उठ रहे प्रश्नों के जवाब भी दिये जा सकते थे । पसोपेश में था कि मुझे “ फोन ए फ्रैंड” का विकल्प याद आया सोचा मित्र से सम्वाद कर पूछ लूँ , पता नहीं यहाँ की क्या परम्पराएँ हैं ? क्या पता किसी से गलती से बेनामी वाले बॉक्स मे टिक हो गया हो और वास्तव में वह जानकारी चाहता हो .. उसके प्रश्न देखने से तो ऐसा ही लगता था ... 1 रस में डुबने के लिये तुलसी के पास जाना पड़ेगा से नामवर जी का क्या तात्पर्य है, क्या इस लोक को छोड़ना पड़ेगा ?
2 आलोचक क्या होता है ? 3. ये मार्क्सवादी आलोचना क्या है? अन्य किस किस तरही की वादी आलोचनायें होती हैं ।
1] अब आपकी रस ग्रन्थि के बारे में आप ही फ़ैसला कीजिए। आपने ख़ुद लिखा है कि बिहारी में आपको रस दिखाई देता है। तो यह नामवर जी से अलग क्या है? वह भी शुक्ल जी के हवाले से यही कह रहे हैं कि जिन्हें रस का आस्वादन नक्काशी की तरह (आशय ऊपरी सजावट से है) करना है उसके लिये निश्चित तौर पर बिहारी काफ़ी हैं। लेकिन रस का आस्वादन करना है, उसमें डूबना है उसे कविता के भीतर प्रवेश करना होगा। ऐसे में कविता की आत्मा उसके लिये एक आवश्यक संघटक तत्व है। एक ऐसा आंतरिक सौन्दर्य जो कविता को बहुअर्थी तो बनाता ही है, साथ ही अपने अंतस में एक ऐसा स्पेस बनाता है जहां तक पहुंच कर पाठक कविता के साथ एकाकार होता है। इसके लिये कविता की अपने समय और जन के साथ एक अनन्य सहानूभूति ज़रूरी है। यही विभेद कबीर या तुलसी से बिहारी को अलग करता है।
2) अब आलोचक क्या होता है यह सवाल मुझे तो अजीब लगता है। फिर भी आलोचक अपने समय तथा समाज को समझने वाला ऐसा विशेषज्ञ होता है जो कविता को पुनर्प्रस्तुत करता है। वह अपने समय की कसौटी पर कविता को कसता है। लोग आलोचक को लेकर अक्सर कुछ ज़्यादा ही असहिष्णु होते हैं। अब अगर यह पूछा जाये कि बिहारी हों या कबीर या फिर तुलसी हों अगर उनके अध्येताओं ने आधुनिक समय में उनको फिर से पढकर पुनर्प्रस्तुत और पुनर्व्याख्यायित नहीं किया होता तो क्या केवल स्मृतियों और चन्द पाण्डुलिपियों के भरोसे उनको इस तरह समग्र में पढ पाना संभव होता?
3]मार्क्सवादी आलोचना एक वैज्ञानिक पद्धति के सहारे कविता को समझने तथा व्याख्यायित करने का उन्नत औज़ार है। यह उस भौतिकवादी अवधारणा के आधार पर कविता की व्याख्या करती है जो जीवन की भाववादी अवधारणा को ख़ारिज़ करती है। यानि वह विचार जो मानता है कि कोई इश्वरीय प्रेरणा रचना नहीं करवाती और न ही कोई कवि बन कर पैदा होता है। एक आदमी अपने चतुर्दिक संसार के अनुभवों से सीखता है और इस सामाजिक संपत्ति , ज्ञान और परिवेश जनित संवेदना के सहारे अलग-अलग तरीके से प्रतिक्रिया करता है…कविता उनमें से एक है। आप इस दर्शन की जडें भारतीय दर्शन की परम्परा में तलाश सकते हैं। यह पद्धति भी कविता को कलाकर्म ही मानती है लेकिन साथ ही वह कला के सामाजिक सरोकारों को भी मान्यता देती है।
उदाहरण दूं तो इस मानवविरोधी दौर में अगर एक गीत ऐसा लिखा जाये जो किसानों की आत्महत्या की बात का मज़ाक उडाये और खेती बारी के दुश्मनो की प्रशंसा के गीत गाये ( जैसे गुलामी के दौर में अंग्रेज़ों के समर्थन में लिखे गीत) तो मार्क्सवादी पद्धति का सही आलोचक उसको रेशा-रेशा खोलकर साबित करेगा कि यह गीत ख़ारिज़ करने योग्य है। इसके उलट आत्महत्याओ के संताप से आतुर जो गीत इस हालात को बदलने की बात करेगा उसे यह पद्धति आगे ले आयेगी।
अब मार्क्सवादी आलोचकों ने किया कि नहीं यह एक अलग बात है। इसे लेकर भी तमाम असहमतियां हैं मेरी।
रहा सवाल दूसरी पद्धतियों का तो भाई भाववादी आलोचना की भी एक पद्धति है…आप चाहें तो एक आह-वाह वादी आलोचना भी है…जनविरोधी और दक्षिणपंथी आलोचना पद्धति है…पर ये आपकी तरह बेनामी होके ही आना पसंद करते हैं। देखिये ना प्रतिबद्धता का मतलब मार्क्सवाद से प्रतिबद्धताओं को ही मान लिया जाता है। संघ के और दूसरी विचारधाराओं के हिमायती शायद केवल अवसरवाद से ही संबद्ध होते हैं प्रतिबद्धता से नहीं ।
वैसे कहना नहीं किसी से, अपनी आलोचकों से पटती नहीं है
अरे भाई प्रशंसक जो प्यारे लगते हैं..........हा हा हा
प्रस्तुतकर्ता
शरद कोकास
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7:14 पूर्वाह्न
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लेबल: अलबेला, अशोक कुमार पाण्डेय, उड़न तश्तरी, दिनेश राय द्विवेदी, नामवर सिंह













