रविवार, 19 जून 2016

रचना की स्त्रोत सामग्री

🔲 विचार श्रृंखला :   रचना संवाद🔲

1⃣ हम रचना के लिये कच्चा माल कहाँ से लेते हैं ?

❇ उत्पाद - रचना को यदि हम एक उत्पाद मान लें तो यह बात समझना बहुत आसान हो जायेगा । जिस तरह एक उत्पाद को तैयार करने के लिए हमें कच्चे माल की आवश्यकता  होती है उसी तरह एक रचना को तैयार करने के लिए हमें बहुत  सारी सामग्री की आवश्यकता होती है । हमारा समाज . समाज की भाषा , हमारे अनुभव , स्मृतियाँ और पुस्तकें मुख्यतः रचना की स्त्रोत सामग्री होते हैं । हम अपनी रचना के निर्माण के लिये जो कुछ भी इस दुनिया से लेते है उसे कुछ अलग अलग खानों में बाँटा जा सकता है ।

✳ समाज - सबसे पहले हम अपनी रचनात्मकता के लिये इस समाज की देन के बारे में बात करेंगे । यह बात तय है कि हम रचना के लिये कच्चा माल हमारे समाज से लेते हैं । इसलिये कि शब्द ,भाषा,अनुभव, और हमारे इर्द -गिर्द घटित होने वाला बहुत कुछ इसी समाज की ही उपज है । आप सोचकर देखिये यदि हमारे पास समाज के बीच बोली जाने वाली भाषा न हो , सामाजिक अनुभव न हों , सामाजिक विसंगतियों का ब्योरा न हो ,सामाजिक क्रियाकलापों की जानकारी न हो तो क्या हम कोई भी रचना लिख सकते हैं ? आप कहेंगे , निस्सन्देह हम अपने व्यक्तिगत अनुभवों को लेकर भी रचना लिख सकते हैं और इसमे ज़रूरी नहीं कि समाज का कोई योगदान हो । प्रश्न यह है कि जिसे आप व्यक्तिगत कहते हैं उसका समाज से क्या सम्बन्ध है । दरअसल हमारा व्यक्तित्व ही इस समाज की देन है ।हमारा व्यक्तिगत अनुभव के रूप में जो कुछ हमारे अवचेतन में दर्ज होता है वह वस्तुतः इस समाज के सामूहिक अवचेतन का ही परिणाम है ।

❇ भाषा - रचना के निर्माण के लिए दूसरा महत्वपूर्ण स्त्रोत है  भाषा। हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते  कि यह भाषा या यह दृष्टि जिसका उपयोग हम अपनी रचना में कर रहे है वह हमने इस समाज से ही ली है । अपनी मातृभाषा को ही ले लें । यदि हमारे माता-पिता या समाज हमें यह भाषा सीखने का अवसर नहीं देता तो क्या इसमें या किसी भी भाषा में रचना सम्भव थी ? इसके लिये हमारे पास भाषा के इतिहास के बारे में ज़रूरी सूचनायें होना आवश्यक है और वह यह कि आदिम मनुष्य के पास जब कोई भाषा नहीं थी उसने संकेतों से अपने आप को किस तरह अभिव्यक्त करना प्रारम्भ किया । संकट के अलावा ,अपनी प्राकृतिक आवश्यकताओं के लिये भी उसने संकेतों का इस्तेमाल कैसे किया । बहरहाल जब हम भाषा लेते हैं तो भाषा के साथ उसके संस्कार भी ग्रहण करते हैं , भाषा में प्रचलित लोकोक्तियाँ , कहावतें और मुहावरे भी लेते हैं ।

✳ चिंतन  - एक प्रश्न यह भी उठता है कि हम चिंतन किस भाषा में करते हैं । सामान्यतः एक रचनाकार भी अपनी मातृभाषा में ही चिंतन करता है लेकिन कुछ ऐसे रचनाकार भी होते हैं जो अन्य किसी भाषा में इतने सिद्धहस्त हो जाते हैं उनकी चिंतन की भाषा भी वही हो जाती है । अंग्रेजी के ऐसे बहुत से लेखक हैं जिनकी मातृभाषा तो हिंदी है लेकिन वे चिंतन अंग्रेजी में करते हैं इसका अर्थ यह है कि उनके रचना के स्त्रोत भी बढ़ जाते हैं जिनमे मुख्य भूमिका पुस्तकों की होती है ।

✳ स्मृतियाँ - रचना के लिये कच्चे माल के रूप में सर्वाधिक भंडार हमें अपनी स्मृतियों से प्राप्त होता है
 । होश सम्भालने की उम्र से लेकर वर्तमान आयु तक बिताए  हुए जीवन के बहुत से सुखद व दुखद क्षणों की स्मृति हमारे साथ होती है । इसमें बचपन की स्मृति प्रमुख होती है । आपने देखा होगा कई बुज़ुर्गों को जब वे अपने बचपन की घटनाओं को बताते हैं तब वे सिलसिलेवार एक एक बात रखते हैं । यहाँ तक कि किसी विशिष्ट दिन और और किसी विशिष्ट अवसर पर उन्होंने  क्या पहना था या क्या खाया था यह भी वे विस्तार से बताते हैं । जबकि कई बार कुछ देर पहले की घटना भी उन्हें याद नहीं रहती ।
रचनाकार जब लिखना प्रारम्भ करते  हैं तो उनमें से कई लोग पहले पहल अपने बचपन की स्मृतियों के आधार पर ही रचना प्रारम्भ करते हैं । कई बार कुछ बड़े होने की स्थिति में प्राप्त अनुभव काम में आते हैं । किसी व्यक्ति से मुलाकात , बचपन का कोई दृश्य . किसी का प्रभाव यह सब हम अपने लेखन में इस्तेमाल करते हैं ।

❇ अतीत -साहित्य जगत में नॉस्टेल्जिया  शब्द को बहुत सम्मान के साथ  नहीं देखा जाता । ऐसा माना जाता है कि अतीत के लिये विलाप करना मूर्खता है । विलाप सचमुच मूर्खता हो सकती  है । अतीत जीविता अच्छी बात नहीं है लेकिन कई बार यह अतीत हमारी ताकत भी बन जाता है । अक्सर कोई गन्ध , किसी पुराने गीत की कोई पंक्ति , कोई जानी पहचानी आवाज़ , कोई तस्वीर , हमे अतीत में ले जाती है । जब हम अपने अतीत को याद करते हैं तो उससे जुड़े हुए दृश्य भी याद करते हैं । कई बार ऐसा होता है कि हमने अतीत में जो दुख भोगा है वह भविष्य में जाकर हमे सुख की तरह लगता है । हमने कई लोगों को देखते हैं जब भी वे अपने गर्दिश के दिनो की याद करते हैं तो एक अतिरिक्त उत्साह से भरे होते हैं । ऐसा सभी के साथ होता है लेकिन एक रचनाकार इनका उपयोग करता है ।

❇ अनुभव - एक रचनाकार इस बात को स्वीकार करता है कि अधिकांश स्त्रोत सामग्री उसे अपने अनुभवों  से प्राप्त होती है यही अनुभव उसकी स्मृति में दर्ज होते हैं । लेकिन कई बार अपने अनुभवों के अलावा दूसरों के अनुभव भी रचना के निर्माण में काम आते हैं यह रचनाकार की क्षमता पर निर्भर होता है कि वह दूसरों के अनुभव को किस तरह अपनी स्त्रोत सामग्री के रूप में इस्तेमाल कर सकता है । मैंने अपने कई मित्रों से पूछा है कि आप जब प्रेम कविता लिखते हैं तो उसके लिए कच्चा माल कहाँ से लेते हैं , क्या आपने स्वयं प्रेम किया है अथवा आप दूसरों के प्रेम के आधार पर कविता लिख रहे हैं । अधिकांश ने यह स्वीकार किया है कि वे स्वयं के प्रेम के अनुभव के आधार पर ही प्रेम कविता लिखते हैं कुछ ने यह भी कहा कि इसके पीछे उनके स्वयं के कम तथा औरों के अनुभव अधिक होते हैं ।

❇ किताबें - अंतिम बात यह कि एक रचनाकार के लिए किताबें भी बहुत महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं । किताबों में ज्ञान का भण्डार है । किताबों में जो लिखा होता है वह इस मानवजाति का अनुभव ही होता है जिसे एक सार के रूप में लेखक प्रस्तुत करता है । किताबों में अथाह ज्ञान है लेकिन हमें यह तय करना होगा कि कौनसी पुस्तकें हम पढ़ें और कौनसी न पढ़ें । अनुभव प्राप्त करने के लिए कचरा पढ़ना आवश्यक नहीं है । पुस्तकों को भी हम अलग अलग श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं । बहुत सी पुस्तकें तथ्यात्मक जानकारी के लिए पढ़ी जा सकती हैं ।इस तरह हम विभिन्न स्त्रोतों से सामग्री लेकर रचना का निर्माण करते हैं ।

शरद कोकास

सोमवार, 29 अगस्त 2011

आज ब्लॉग विवरण में डॉ.कमला प्रसाद का नाम जोड़ा है

आज बहुत भारी मन से मैंने ब्लॉग विवरण में दिवंगत आलोचकों की सूची में डॉ.कमला प्रसाद का नाम जोड़ा है । और यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ उनपर लिखा एक लेख जो विगत 1 मई को अशोक सिंघई द्वारा कमला जी पर प्रकाशित एक स्मारिका के लिये मैंने लिखा था

साहित्य में अनुशासन के सिपाही – डॉ कमला प्रसाद
                                                         


डॉ कमला प्रसाद यह नाम सम्पादक सापेक्ष महावीर अग्रवाल के मुँह से पहली बार सुना । उन दिनों मैं दुर्ग - भिलाई में नया नया आया था । महावीर जी और मुकुन्द कौशल इस बात से वाकिफ़ थे कि मैं कवितायें लिखता हूँ । एक दिन महावीर जी ने पूछा  “ दस दिनों के लिये जबलपुर जाना चाहोगे  ? “ “ क्यों ? “ मैंने प्रतिप्रश्न किया । “  वे बोले …“ जबलपुर में कल से मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का एक कविता  रचना शिविर प्रारंभ  हो रहा है । इस शिविर में तुम दस दिनों में कविता के बारे में इतना जान लोगे जो अगले दस साल में भी नहीं जान पाओगे । “ मेरे हाँ कहने पर महावीर जी ने कहा “ ठीक है , मैं तुम्हे डॉ कमला प्रसाद के नाम से एक पत्र देता हूँ , वे तुम्हारा नाम शिविर में शामिल कर लेंगे ।“
शाम की राज्य परिवहन की बस से मैं जबलपुर के लिये रवाना हो गया । सुबह सुबह अपना बैग लिये जब मैं बलदेवबाग स्थित जानकी रमण महाविद्यालय पहुँचा तो देखा एक ऊँचे पूरे सज्जन खाना पकाने वालों को कुछ सूचनायें दे रहे हैं । मैंने उन्हीं से कहा … “ मैं दुर्ग से आया हूँ । मुझे महावीर अग्रवाल जी ने भेजा है , मुझे कमला प्रसाद जी से मिलना है ।“ वे मुस्कुराये और कहा … आओ आओ , मैं ही हूँ कमला प्रसाद । ऐसा करो अपना सामान वहाँ हाल में रख दो और नहा कर नाश्ता करने आ जाओ । “
मैंने अपना सामान रखा । बाथरूम जाकर स्नान करने के उपरांत भोजन कक्ष में  आ गया । वहाँ उपस्थित तमाम चेहरे मेरे लिए नये थे । एक लड़के ने आकर मुझसे हाथ मिलाया और कहा … मैं सुरेश स्वप्निल हूँ भोपाल से और तुम …? मैंने कहा “ मैं शरद कोकास , दुर्ग से । नाश्ता चल ही रहा था कि देखा कमला जी व्याख्यान कक्ष से बाहर आ रहे हैं , चलिये आप लोगों ने अगर नाश्ता कर लिया हो तो गोष्ठी कक्ष में आ जाइये ।
हम लोग जैसे तैसे अपनी चाय समाप्त करके सभा कक्ष में पहुँचे । कमला जी माइक पर थे …” आज हमारे शिविर का दूसरा दिन है । विलम्ब से आने वालों को मैं यह सूचना देना चाहता हूँ कि इस कविता रचना शिविर का उद्घाटन कल श्री अशोक बाजपेयी द्वारा श्री हरिशंकर परसाई की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ । इस शिविर को मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष श्री मयाराम सुरजन ने भी सम्बोधित किया । यद्यपि विधिवत इस शिविर का प्रारम्भ आज से ही हो रहा है और  गोष्ठियाँ भी  आज से ही प्रारम्भ हो रही हैं इसलिये मैं सभी शिविरार्थियों को कुछ सूचनायें देना चाहूँगा । प्रतिदिन प्रात: साढे आठ बजे से गोष्ठियाँ प्रारम्भ होंगी जिनमें कविता की रचना प्रक्रिया , शिल्प , भाषा , सम्प्रेषणीयता , बिम्ब विधान , आदि विषयों पर दो वक्ताओं के व्याख्यान होंगे जिन पर प्रतिभागियों द्वारा चर्चा की जाएगी । दोपहर एक बजे भोजन के बाद दो बजे से द्वितीय सत्र प्रारम्भ होगा जिसके अन्तर्गत समूह चर्चा की जाएगी ।  शाम पाँच बजे चाय के उपरान्त  किसी एक विशिष्ठ कवि द्वारा कविता पाठ व उसकी रचना प्रक्रिया पर बात की जाएगी । रात्रि आठ बजे भोजन तथा भोजन के पश्चात समूह के अनुसार शिविरार्थियों की कविगोष्ठी । सभी कार्यक्रम समय पर सम्पन्न होंगे और किसी प्रकार की अनुशासन हीनता अक्षम्य होगी । “
मैं समझ गया , कमला प्रसाद जी को ‘ कमाण्डर ‘ क्यों कहा जाता है । शिविर का टाइम- टेबल देखकर बहुत सारे शिविरार्थियों की शहर घूमने या भेड़ाघाट जाने की योजना खटाई में पड़ चुकी थी । शाम को जब कमला जी से शिविरार्थियों ने जब यह आशंका प्रकट की तो उन्होंने कहा  “ घबराओ मत , एक दिन हम लोग भेड़ाघाट में ही गोष्ठी रख लेंगे । “ उस दिन प्रात:कालीन सत्र में मलय जी का व्याख्यान हुआ ‘ समाज में कविता और कविता का समाज ‘ इस विषय पर । सायंकालीन सत्र में भगवत रावत जी से कवितायें सुनी और उस पर बातचीत की । उस दिन का पूरा कार्यक्रम कमला जी के निर्देशानुसार ही सम्पन्न हुआ । मुझे तो इस बात की प्रसन्नता थी  कि इस शिविर में परसाई जी , हरि नारायण व्यास ,राजेश जोशी , धनन्जय वर्मा , सोमदत्त , प्रो श्यामसुन्दर मिश्र ,राजेन्द्र शर्मा ,पूर्णचन्द्र रथ जैसे कवियों और विद्वानों से मुलाकात होगी ।
पता नहीं क्यों मुझे उस दिन इस बात की गलत फ़हमी हुई कि कमला प्रसाद जी की भूमिका शिविर मे एक व्यवस्थापक की तरह ही है । मेरा यह भ्रम तब टूटा जब अगले ही दिन मैंने प्रात:कालीन सत्र में कमला जी को बोलते हुए सुना । वे अपनी व्यवस्थापक वाली भूमिका का निर्वाह कर एक आलोचक की भूमिका में आ गए थे । उस दिन ‘ परम्परा बोध और कविता ‘ इस विषय पर कमला जी का व्याख्यान सुनने को मिला । गोष्ठी के प्रारम्भ में उन्होंने अपनी सूचनाएं प्रेषित कीं , सत्र हेतु एक अध्यक्ष का चयन किया , एक शिविरार्थी को रिपोर्टिंग का काम सौंपा और विषय पर अपना व्याख्यान देना प्रारम्भ किया ।
“ प्रत्येक कवि के लिए परम्परा बोध इसलिये आवश्यक है कि वह वर्तमान को भलिभाँति समझ सके और भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सके । यह बोध लदे हुए आदर्शों के कारण आवश्यक नहीं है आवश्यक इसलिये है कि वह आज में घुसा हुआ है । हमारे मन में , हमारी चेतना में यह परम्परा भीतर तक धसी हुई है और वह प्रत्यक्ष दिखाई देती है । जिस प्रकार धरती के ऊपर की परत को जानने के लिए , उसकी संरचना को जानने के लिए उसकी भीतरी परतों को जानना आवश्यक है उसी तरह भीतर बसी हुई परम्पराओं को देखना भी आवश्यक है । “
कमला जी बहुत सरल शब्दों में शिविरार्थियों के सम्मुख अपने विचार रख रहे थे …”  एक समय इतिहास हन्ताओं का एक वर्ग सक्रिय था , परम्परा बोध की आवश्यकता उन्हें नहीं थी , वे ऐसा चाहते भी नहीं थे , लेकिन आज इसलिये है कि वर्तमान को देखने के लिए अतीत को समझना आवश्यक है । साहित्य एवं संस्कृति की परम्परा को देखें तो ज्ञात होगा कि ऐसे कितने ही रचनाकार थे जिन्होंने सामंतों के लिए लिखा , बाद के समय में अनेकों ने पूंजीपतियों के लिए लिखा लेकिन ऐसे बहुत कम थे जिन्होंने जनता के लिए लिखा । इस तरह हम रचनाकारों को चार किस्मों में विभाजित कर सकते हैं । पहले राजा स्वयं ,दूसरे उनके दरबारों में उनके संरक्षण में  रहकर लिखने वाले , तीसरे सबसे अलग रहकर कला में अपनी बात कहने वाले और चौथे जन के बीच रहकर लिखने वाले । “
इसी सत्र में “ साहित्य और विचारधारा इस विषय पर भी कमला प्रसाद जी के विचार सुनने को मिले । उन्होंने कहा “ विचार इतिहास की सृष्टि है । मनुष्य में प्रेम ,घृणा , भूख यह मूल राग होते हैं , यही कविता में भी विकसित होते हैं । यदि मनुष्य इन मूल रागों से भटकता है तो उसकी दोषी व्यवस्था होती है । मूल रागों से भटकने पर असंतोष बढ़ता है , फ़िर वह कृत्रिम शांति की तलाश में साधु संतों बाबाओं के पास जाता है । इसीलिये उसे सही विचारधारा की आवश्यकता होती है । कवि का यह कर्तव्य है कि वह स्वयं सही विचारधारा की तलाश करे और अपनी विचारधारा का उपयोग मनुष्य के मूल रागों की वापसी की ओर करे । “
कमला प्रसाद जी के विचारों को जानने का यह मेरा पहला अवसर था । फ़िर दस दिनों तक उनसे काफ़ी बातचीत हुई । वे ही अकेले एक ऐसे व्यक्ति थे जो भोजन कक्ष में , शयन कक्ष में लगातार शिविरार्थियों के साथ रहते थे । कमला जी से परिचय की यह शुरुआत थी । उस शिविर में मुझे यह भी ज्ञात हुआ कि दुर्ग- भिलाई के रचनाकारों से कमला जी का विशेष अनुराग है और यह मैंने उनके दुर्ग-भिलाई आगमन पर महसूस भी किया । उनका यह अनुराग कम तो कभी नहीं हुआ अपितु लगातार बढ़ता ही रहा । इस शिविर के दस वर्षों पश्चात जब अपना पहला कविता संग्रह प्रकाशित करने का विचार मन में आया तो उसकी भूमिका लिखने के लिये कमला जी के अलावा और किसी का नाम मेरे मन में नहीं आया , जबकि उन दिनों कवियों से ही ब्लर्ब और भूमिका लिखवाने की परम्परा थी । मित्रों ने कहा भी कि कमला जी आलोचक हैं और आलोचक का काम कविता संग्रह प्रकाशित होने के पश्चात प्रारम्भ होता है । मैंने किसी की कोई बात नहीं सुनी , कमला जी से साधिकार अनुरोध किया और पाण्डुलिपि उन्हे भेज दी । उन्होंने सहर्ष यह भूमिका लिख भेजी साथ ही अपने सुझाव भी दिये ।
भोपाल में उनसे मुलाकात के अलावा ,प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यक्रमों में , हिन्दी साहित्य सम्मेलन के कार्यक्रमों में कमला जी जब भी दुर्ग भिलाई आये , उनसे बातचीत का अवसर मिलता रहा । संगठन के बारे में या लेखन के बारे में जब भी कोई कठिनाई मुझे महसूस होती मैं उन्हें पत्र लिख देता । उनके लिखे हुए बहुत सारे पोस्टकार्ड आज मेरी धरोहर हैं । जब भी मैं उनसे सम्वाद की आवश्यकता महसूस करता हूँ अपने संग्रह की भूमिका या उनकी चिठ्ठियाँ पढ़ लेता हूँ ।                                                                                                                     
                      n  शरद कोकास



गुरुवार, 23 सितंबर 2010

प्रो. मैनेजर पाण्डेय को जन्मदिन की शुभकामनायें 23 सितम्बर


" मैं ‘ शब्द और कर्म ‘ के साथ ‘ साहित्य और इतिहास दृष्टि ‘ लेकर हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में आया "

प्रो मैनेजर पाण्डेय बता रहे हैं कि वे आलोचना के क्षेत्र में कैसे आए । प्रो मैनेजर पाण्डेय से महावीर अग्रवाल द्वारा लिए गए साक्षात्कार का एक अंश साहित्यिक पत्रिका ‘ सापेक्ष ‘ से साभार ।
महावीर अग्रवाल : अपनी रचना प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए बताइये की आपकी आलोचना के क्षेत्र में रुचि कैसे जागृत हुई ? आप कब से यह कार्य कर रहे हैं ? इस क्षेत्र को आपने क्यों चुना ?
प्रो मैनेजर पाण्डेय : आलोचना में रुचि आलोचना पढ़ते पढ़ते ही जगी । मैंने अपने छात्र जीवन में जिन आलोचकों को विशेष रूप से पढ़ा था उनमें आचार्य रामचंद्र शुक्ल , हजारी प्रसाद द्विवेदी , रामविलास शर्मा ,नन्ददुलारे वाजपेयी प्रमुख थे । एक तरह से इन आलोचकों की आलोचनाओं में निहित और व्यक्त अन्तर्विरोधों के बारे में सोचते हुए ही मुझे आलोचना के क्षेत्र में काम करने की प्रेरणा मिली । मैं उस समय अपनी पी एच डी के लिए ‘ भक्ति आंदोलन और सूरदास ‘ पर काम कर रहा था । मैंने अपना पहला आलोचनात्मक लेख ‘ भक्ति काव्य की लोकधर्मिता ‘ लिखा था जो डॉ त्रिभुवन सिंह द्वारा सम्पादित ‘ साहित्यिक निबंध ‘ नामक पुस्तक में 1968 में छपा था ।
            उस समय प्रगतिशील लेखक संघ कम सक्रिय था लेकिन बनारस में प्रगतिशील लेखक बहुत सक्रिय थे । मैं बनारस के प्रगतिशील लेखकों की गोष्ठियों में भाग लेते हुए अपने विचारों को व्यवस्थित और विकसित कर रहा था । यह मेरी आलोचनात्मक चेतना के निर्माण का आरंभिक दौर था ।बाद में मैं 1971 में जोधपुर विश्वविद्यालय पहुँचा जहाँ डॉ नामवर सिंह पहले से मौजूद थे । वहाँ उनके साथ विभिन्न साहित्यिक प्रश्नों पर बातचीत करते हुए मैं आलोचना के क्षेत्र में बहुत अधिक सजग रूप से सक्रिय होने की कोशिश करने लगा । उस समय नामवर सिंह के सम्पादन में निकलने वाली पत्रिका ‘ आलोचना ‘ में मेरे लेख छपने लगे । 1975 में मैं सतना के प्रगतिशील लेखक सम्मेलन में शामिल हुआ था जिसमें परसाई जी भी मौजूद थे । उसमें मैंने एक लेख ‘ साहित्य के नये सौन्दर्यशास्त्र की ज़रूरत ‘ पढ़ा था जो बाद में पहल में प्रकाशित हुआ था ।
            उस समय मैं मुक्तिबोध के आलोचनात्मक लेख से परिचित हुआ था । बाद में मैंने साहित्य के इतिहास दर्शन के क्षेत्र में काम करना शुरू किया और ‘ आलोचना ‘ पत्रिका में साहित्य व इतिहास दर्शन से संबन्धित चार लेख छपे , जिन्हे पाठकों ने बहुत पसन्द किया । वे लेख मेरी पुस्तक “ साहित्य व इतिहास दृष्टि में हैं । उसी बीच मेरे लेख विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में छपे थे वे ‘ शब्द और कर्म ‘ नामक मेरी पुस्तक मे संकलित हैं । इस तरह मैं ‘ शब्द और कर्म ‘ के साथ ‘ साहित्य और इतिहास दृष्टि ‘ लेकर हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में आया ।

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

"समुद्र चांद और मैं .". मैं यानि कवि अशोक सिंघई

                                                  अशोक सिंघई का पाँचवाँ काव्य संग्रह
                                                     ‘समुद्र, चाँद और मैं’ लोकार्पित

विगत दिनों शीर्ष कवि व समर्थ समालोचक डॉ0 केदार नाथ सिंह भिलाई आये थे । 75 वर्षीय केदार जी अपनी 90 वर्षीय माता जी से मिलने  कोलकाता जा रहे थे , बीच में थोड़ा सा समय मिला तो छत्तीसगढ़ के मित्रों से मिलने के लिये ठहर गये ।  इस अवसर पर उनका काव्यपाठ हुआ और दुर्ग- भिलाई के मित्रों ने समकालीन कविता पर उनसे बातचीत की । इसी दिन केदार जी को शलाका सम्मान दिये जाने की भी घोषणा हुई थी ।जब उन्हे इस बात की बधाई  हम लोगों ने दी तो उन्होने कहा कि इस घोषणा से ज़्यादा प्रसन्नता मुझे आप लोगों से मिलने की है । केदार जी लगभग दो दिन यहाँ रहे , हम लोगों के साथ घूमते-फिरते रहे ,गपियाते रहे ।  
                       केदार जी ने  इस अवसर पर लिट्ररी क्लब, भिलाई इस्पात संयंत्र के अध्यक्ष व राजभाषा प्रमुख श्री अशोक सिंघई के मेधा बुक्स, नई दिल्ली से प्रकाशित पाँचवें काव्य संग्रह ‘समुद्र, चाँद और मैं’ का लोकार्पण ‘सिंघई विला’ में किया। इस सादे किन्तु गरिमामय आयोजन की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध गाँधीवादी चिन्तक व कानूनविद् श्री कनक तिवारी ने की। प्रसंगवश अशोक सिंघई के पहले प्रकाशन प्रदीर्घ कविता ‘अलविदा बीसवीं सदी’ का लोकार्पण फरवरी, 2000 में विश्व पुस्तक मेला में एवं तीसरे काव्य संग्रह ‘सम्भाल कर रखना अपनी आकाशगंगा’ का भी लोकार्पण छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में नवम्बर, 2004 में प्रख्यात साहित्यकार स्वर्गीय श्रीकान्त वर्मा एवं कीर्तिशेष सम्पादक, कवि व उपन्यासकार गुलशेर अहमद शानी की स्मृति में आयोजित ‘कविता की पंचाट‘ में श्री केदार नाथ सिंह ने ही किया था।
श्री केदार नाथ सिंह ने अशोक सिंघई को अपना प्रिय कवि बताते हुये कहा कि प्रगतिशील चेतना से युक्त अशोक उन विरले कवियों में से हैं जिनकी नई कविता में दुर्लभ लयात्मकता है। हिंदी की नई कविता में एक खास तरह की गीतात्मकता को इन्होंने बचाये रखा है। ये उम्र में मुझसे बहुत छोटे हैं, अतः इनके पास अभी साहित्य में सक्रिय बने का वक्त है और क्षमता भी। ये साहित्य में कार्यरत रहें, जीवन में यह मेरी कामना है ।
                      अध्यक्षीय वक्तव्य में श्री कनक तिवारी ने कहा कि ‘समुद्र, चाँद और मैं’ मुझे आकर्षित करता है और अँग्रेज़ी का मेरा सर्वाधिक प्रिय कवि कालरिज़ बरबस मुझे याद आता है जिन्होंने सागर पर सर्वश्रेष्ठ कवितायें विश्व साहित्य को दी हैं। चाँदनी रात में समुद्र के किनारे मनुष्य रूमानी हो जाता है पर अशोक अपनी ऐसी बौद्धिकता को बचाये रखते हैं जो भावुकता से पगी रहती है। अशोक का यह सौभाग्य है कि उन्हें केदारजी प्राप्त होते रहते हैं। अमूमन कवि अपने क्लाईमेक्स में मर जाता है पर केदारजी के साथ यह नहीं है, अशोक के साथ भी यही घटे, मेरी शुभकामना है।
                              इस अवसर पर भिलाई-दुर्ग के साहित्यकारों ने कवि केदार को 23 मार्च को प्राप्त होने वाले शलाका सम्मान की बधाई दी तथा उनके दीर्घ व कीर्तिमय जीवन की शुभकामनायें भी दीं। युवा कवि श्री शरद कोकास ने लोकार्पण कार्यक्रम का संचालन किया व इस्पातनगरी भिलाई के साहित्यकारों की ओर से श्री केदार नाथ सिंह का भिलाई पधारने पर और इस आत्मीय आयोजन में उनके तथा समस्त साहित्यकारों के प्रति समय देने के लिये आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर सापेक्ष के संपादक श्री महावीर अग्रवाल, डॉ0 सियाराम शर्मा, डॉ0 तीर्थेश्वर सिंह, प्रलेस अध्यक्ष श्री लोकबाबू, शायर मुमताज़, कवयित्री श्रीमती पुष्पा तिवारी, वरिष्ठ पत्रकार श्री अजय पाण्डेय आदि संस्कृतिकर्मी उपस्थित थे।
रपट - शरद कोकास    

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

हम शिविर में कवि-कथाकार बनाते हैं




                  छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का युवा रचना शिविर

यह माना जाता है कि कवि – कथाकार व कलाकार जन्मजात होते हैं । लेकिन ऐसा नहीं है । एक रचनाकार बनने के लिये साधना  करनी पड़ती है और विधिवत अध्ययन करना पड़ता है । यह न भी किया जाये तो कवि को कवि बनने से  कोई रोक नहीं सकता लेकिन उसकी रचना में परिपक्वता आने में समय तो लग ही जाता है  । इस उद्देश्य को ध्यान में रख कर हमारे देश के विभिन्न लेखक संघों और साहित्य सम्मेलनों द्वारा लेखक शिविर या रचना शिविर आयोजित किये जाते रहे हैं । स्व. मायाराम सुरजन जी के प्रयासों से मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा 27-28 वर्ष पूर्व यह परम्परा प्रारम्भ की गई थी  । इस शिविर का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इस बहाने वरिष्ठ और अनुभवी लेखक नवोदित रचनाकारों के साथ मिल बैठकर बात करते हैं । इन शिविरों में रचना के हर पहलू पर बातचीत होती है ।
हिन्दी के कई ब्लॉगर एवं लेखक इन्ही शिविरों में भाग ले चुके हैं जिनमें फिलहाल तो मुझे कुमार अम्बुज , शरद कोकास  गिरीश पंकज और वन्दना अवस्थी दुबे का नाम याद आ रहा है । शमशेर बहादुर सिंह , हरिशंकर परसाई , हबीब तनवीर , डॉ. मलय , डॉ.कमला प्रसाद , भगवत रावत, राजेश जोशी , उदय प्रकाश ,राजेन्द्र शर्मा  ,धनंजय वर्मा जैसे वरिष्ठ रचनाकारों ने विषय विशेषज्ञों के रूप में इन शिविरों में अपनी भागीदारी दर्ज की है ।
म.प्र .हिन्दी साहित्य सम्मेलन के बाद  अब छत्तीसगढ़ प्रदेश साहित्य सम्मेलन ने भी इस परम्परा को पुन: प्रारम्भ किया है और आगामी 4 मार्च से 7 मार्च 2010 तक दुर्ग ज़िले के बालोद जनपद में ऐसा ही एक रचना शिविर आयोजित किया जा रहा है । सम्मेलन के महामंत्री रवि श्रीवास्तव ,तथा प्रबन्ध मंत्री राजेन्द्र चांडक ने यह जानकारी दी है कि इस शिविर में 40 युवाओं को आमंत्रित किया जायेगा । इन प्रतिभागियों के नाम विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से आमंत्रित किये जा रहे हैं ।
इस शिविर में जो युवा भाग लेना चाहते हैं उनकी आयु  30 वर्ष से अधिक नहीं होना चाहिये । यह ज़रूरी है कि वे कम से कम एक-दो साल से लिख रहे हों और उनमें आगे बढ़ने की सम्भावना और इच्छा हो । दुर्ग से 50 किलोमीटर दूरी पर स्थित बालोद तक उन्हे स्वयं के व्यय से आना होगा । शिविर में चार दिनों तक भोजन एवं आवास की व्यवस्था सम्मेलन द्वारा की जायेगी । उन्हे शिविर में एक अनुशासित प्रशिक्षार्थी की तरह रहना होगा और शिविर के नियमों का पालन करना होगा ।
श्री चांडक ने बताया कि इस शिविर में वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना , कथाकार डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव , वरिष्ठ कवि एवं “देशबन्धु” के प्रधान सम्पादक ललित सुरजन , कवि रवि श्रीवास्तव , सहित देश के अन्य साहित्यकार भी नवोदित रचनाकारों के साथ रहकर उन्हे मार्गदर्शन देंगे । इस शिविर में रचना प्रक्रिया पर लेख और चर्चा के सत्र होंगे , समूह चर्चा होगी , समकालीन मुद्दों पर बातचीत होगी , जाने –माने लेखकों की रचनाओं का विश्लेषणपरक अध्ययन होगा , रचना के तत्व, रचनाकार की आंतरिक स्वतंत्रता , रचना की भाषा , कल्पना व  बिम्बों का प्रयोग जैसे विषयों पर चर्चा होगी साथ ही वरिष्ठ रचनाकारों का काव्य व कहानीपाठ होगा तथा शिविरार्थी युवाओं की रचनाओं पर आत्मीय बातचीत होगी ।
यदि आप इस रचना शिविर में भाग लेना चाहते है तो देर न करें वरिष्ठ रचनाकारों व ब्लॉगर्स से भी निवेदन है कि वे युवाओं को इस कार्य हेतु निर्देशित करें । श्री राजेन्द्र चांडक से मोबाइल नम्बर 9425207425  या रायपुर स्थित छत्तीसगढ़ प्रदेश साहित्य सम्मेलन कार्यालय के दूरभाष क्रमांक 0771-2292011  पर सम्पर्क करें । ई मेल पता है – info@msfraipur.com
मैं अपनी ओर से केवल इतना ही कहना चाहूंगा कि मैने 1984 में ,जबलपुर में सम्मेलन के दस दिवसीय “ कविता रचना शिविर “ में भाग लिया था और उन दस दिनों में जो कुछ मैने पाया उसे दस वर्षों मे भी नहीं पा सकता था । शीघ्र  ही इस ब्लॉग पर उस शिविर के अनुभव साथ ही रचना के विभिन्न तत्वों पर अपनी बातें ,और नवोदित रचनाकारों के लिये आवश्यक टिप्स एक लेखमाला के रूप में  प्रस्तुत करूंगा ।
आपका – शरद कोकास

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

मानक आलोचना वह है जो पाठक को फिर रचना की ओर लौटा दे ।

हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी का आज 16 फरवरी 2010 को भिलाई आगमन हो रहा है । सायं सात बजे कवि अशोक सिंघई के निवास पर दुर्ग-भिलाई के साहित्यकारों के बीच उनका काव्यपाठ आयोजित है । कल 17 फरवरी को प्रात: 11 बजे कल्याण कॉलेज के सभागार में " आज का समय " इस विषय पर उनका व्याख्यान भी होगा  । श्री अशोक वाजपेयी के भिलाई आगमन पर प्रस्तुत है  ' सापेक्ष ' के सम्पादक महावीर अग्रवाल से उनकी बातचीत का एक अंश ,' सापेक्ष " से साभार ।
 महावीर अग्रवाल: आप मानक आलोचना किसे मानते हैं मानक आलोचना का मानदंड क्या होना चाहिये ?
अशोक वाजपेयी : इसके कोई सिद्धांत हमेशा के लिये निर्धारित नहीं किये जा सकते । साहित्य की अन्य विधाओं की तरह आलोचना भी परिवर्तनशील है फिर भी कुछ गुण पहचाने जा सकते हैं ।मानक आलोचना वह है जिसमें साहित्य का अनुराग प्रकट हो ,जिसमें रचना को धीरज और जतन से समझ- बूझ कर पढ़ने का साक्ष्य हो ,जो रचना के अंतर्निहित अभिप्रायों और आशयों को स्पष्ट करने की चेष्टा करती हो जिसमे रचना की विशिष्टता को पहचानने का प्रयत्न हो ,रचना को परम्परा में अवस्थित करने का उत्साह हो , जिसमें अपने पूर्वग्रहों और रचनाकारों के पूर्वग्रहों के तादाम्य या टकराव को स्पष्ट ईमानदारी से स्वीकार किया गया हो और उनके बावज़ूद रचना के रसास्वादन का प्रमाण हो ।
          आलोचक को भी रचनाकार की तरह सामान्यीकरणों से गुरेज करना चाहिये ।आलोचक रचना को उसके व्यापक सांस्कृतिक- सामाजिक सन्दर्भ में तभी रख सकता है जब उसकी उस सन्दर्भ की समझ आश्वस्तकारी हो ,कोई बन्धा-बन्धाया फार्मूला नहीं ।मानक आलोचना वह है जो पाठक को फिर रचना की ओर लौटा दे ।
         ऐसी मानक आलोचना हिन्दी में है । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल,आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय , मुक्तिबोध , निर्मल वर्मा , नामवर सिंह जैसे मूर्धन्यों के अलावा मलयज, विजयदेव नारायण साही , विष्णु खरे , मैनेजर पाण्डेय , नन्दकिशोर नवल , वागीश शुक्ल , रमेशचन्द्र शाह , कुँवर नारायण , पुरुषोत्तम अग्रवाल , कृष्ण कुमार , मदन सोनी आदि ने ऐसी आलोचना लिखी है ।
          श्री अशोक वाजपेयी जी का स्वागत है ,,उनके यह विचार आपको कैसे लगे अवश्य बताइये । कविता पाठ व व्याख्यान की रपट अगली पोस्ट में - शरद कोकास

रविवार, 29 नवंबर 2009

बैलगाड़ी रचना है, गाड़ीवान कवि, आलोचक कुत्ता , तो क्या पाठक बैल है ?

                                                 तीसरे आलोचक का वक्तव्य -    शरद कोकास-                                                                               
                                                                                                

           कुछ समय पूर्व  ब्लॉग “साहित्य शिल्पी” में  काव्यालोचना के अंतर्गत मेरा  एक लेख प्रकाशित हुआ था  “ हर कविता तीन स्तरों पर आलोचना से गुजरती है” इस आलेख पर  प्राप्त टिप्पणियों की ओर राजीव रंजन जी ने ध्यान आकर्षित करवाया । मेरे बहुत से मित्रों सर्वश्री अनिल कुमार,नंदन, आचार्य संजीव वर्मा , रितुरंजन,तेजेन्द्र शर्मा,दिगम्बर नासवा,अभिषेक सागर,मोहिन्दर कुमार, सुश्री अनन्या,गीता पंडित,तथा किरण सन्धु ने प्रश्नों के माध्यम से अपनी शंकायें प्रस्तुत की थीं । यह एक स्वस्थ्य परम्परा है । यह सहज मानवीय स्वभाव है कि मनुष्य को जब तक अपने मानस में उठ रहे प्रश्नों का समाधानकारक उत्तर नहीं मिल जाता वह आगे की किसी भी बात को ग्रहण कर सकने में असमर्थ होता है । वह किसी न इसी माध्यम से उन शंकाओं का ऐसा समाधान चाहता है जो उसकी धारणाओं में परिवर्तन कर सके अथवा उन्हे पुष्ट कर सके। लचीलापन उसके सहज स्वभाव में होता है और अपने विवेकानुसार सही अथवा गलत के बीच भेद कर अपने लिये जो उचित है उसे वह स्वीकार कर लेता है। मैने प्रयास किया  कि इन प्रश्नों के उचित समाधान प्रस्तुत कर सकूँ ।हो सकता है कि यह प्रश्न अनेक मित्रों के मन में उठ रहे हों इसलिये "साहित्यशिल्पी" पर दिये गये उत्तर को मैं अपने  ब्लॉग "आलोचक " पर भी प्रस्तुत करना चाहता हूँ ।  इसमें मत भिन्नता सहज स्वाभाविक है ।
            अनिल कुमार जी ने कविता के सम्बन्ध में यह आदिम प्रश्न किया है कि कविता को किसी वाद की आवश्यकता क्यों है ? आदरणीय संजीव वर्मा सलिल जी ने भी पूछा है क्या किसी रचना के साथ वाद विशेष या विचारधारा विशेष के प्रतिबद्ध रह कर न्याय किया जा सकता है ? वस्तुत: ‘कविता’ को किसी वाद की आवश्यकता नहीं है । वाद कवि के भीतर होता है और वह यदि इसे अपने जीवन दर्शन में शामिल कर लेता है तो वह उसकी रचना में सहज रूप से आ जाता है । किसी वाद को जानबूझकर कविता में प्रक्षेपित करने का अर्थ कवि द्वारा अपनी मूलभूत पहचान के साथ खिलवाड़ भी हो सकता है । मूलत: यह प्रश्न मार्क्सवाद और कलावाद की बरसों से चली आ रही बहस को लेकर है । कुछ के अनुसार यह बहस अब समाप्त हो चुकी है और कुछ के अनुसार यह और तेज हुई है । दर असल कविता में मूल्यों की उपस्थिति से उसका स्थान तय किया जाता है स्वतंत्रता,समता,न्याय जैसे मूल्य उसके लिये अनिवार्य हैं । कवि से यह अपेक्षा की जाती है कि उसकी कविता में मूल्यों के प्रति चिंता और चिंतन दोनों ही हो । वैज्ञानिक दृष्टि की आवश्यकता वर्तमान में सहज अपेक्षित है ।धर्म ,पूंजीवाद और बाज़ारवाद के दुष्परिणामों से कोई अछूता नहीं है अत: कविता में अघोषित रूप से यह सब शामिल हो ही जाता है । कवि की राजनैतिक प्रतिबद्धता भी प्रभाव डालती है । कविता में सौन्दर्य,उदात्तता और कवि के सामाजिक सरोकारों की भी अपेक्षा की जाती है अत: अब केवल वाद को प्रक्षेपित कर रचना करना सम्भव नहीं है।
            अनिल जी ने पूछा है कि कविता को कौनसी संस्था मानकीकृत करती है तथा किन पत्रिकाओं में छपनेवाले कवि कहलाते हैं? कविता के मानकीकरण के लिये अभी तक किसी संस्था का गठन नहीं हुआ है जो आई.एस.आई. मार्का कविताओं पर लगा सके । कुछ संस्थायें स्वयम्भू रूप से कविता पर फतवे जारी कर सकती हैं लेकिन यह समाज ही है जो कविता के मानक तय करता है और कालानुसार उनमें परिवर्तन कर सकता है। समाज का प्रशिक्षण समय करता है जो आदिकाल से अब तक जारी है । वैसे ही सिर्फ पत्रिकाओं मे छपने वाले कवि नहीं कहलाते । कवि हर मनुष्य के भीतर होता है उसकी अभिव्यक्ति के माध्यम भिन्न हो सकते हैं। “पाथेर पांचाली” में हवा से हिलते हुए काँस का दृश्य देखिये आपको कैमरे से की गई कविता का आभास होगा ।कबीर और तुलसी के समय पत्रिकाएं नहीं थीं । तुलसी यदि विनय पत्रिका न भी लिखते तो बड़े कवि कहलाते {यहाँ पत्रिका का अर्थ पत्रिका के वर्तमान में प्रचलित अर्थ मेगजीन या रिसाले से नहीं है } वैसे वर्तमान में पत्रिकाओं की भी अलग राजनीति चल रही है ,लघु पत्रिका,व्यावसायिक पत्रिका,सामाजिक पत्रिका, जैसे अनेक विभाजन हैं एक समय में अखबार में लिखना कवि की गरिमा के अनुकूल नहीं माना जाता था । खैर इस विषय पर विस्तार से फिर कभी लिखूंगा । आपने पूछा है ऐसे कौनसे कवि हैं जिनकी कवितायें आम आदमी तक पहुंचती हैं।ऐसे बहुत से कवि हैं जो अपने समय में जन जन के बीच लोकप्रिय रहे हैं, बाबा नागार्जुन ,त्रिलोचन,बच्चन, शील कई नाम हैं । हमारे यहाँ दुर्ग मे एक कवि बिसम्भर यादव ‘मरहा’ हैं जो तीन हजार से अधिक कार्यक्रमो में कविता पाठ कर चुके हैं जिनका प्रमाण आयोजक के हस्ताक्षर सहित उनकी डायरियों में दर्ज़ है ।विशेष बात यह कि छत्तीसगढ़ी में कविता पढ़ने वाले यह कवि निरक्षर है और उन्हे अपनी सारी कविताएँ कंठस्थ हैं वे मस्तिष्क में कविता रचते हैं और उन्हें अपने स्मृति भंडार में दर्ज़ कर लेते हैं। ऐसे कवि कम हैं जिनकी जटिल कविताएँ भी आम आदमी तक पहुंचती हैं । जटिल कविता को आम आदमी तक पहुंचाने हेतु कवि के भीतर सशक्त पाठ या प्रस्तुतिकरण  द्वारा उन्हे सम्प्रेषित करने का गुण होना चाहिये । अनिल जी ने पूछा है मुख्यधारा क्या है व इसे कौन निर्धारित करता है ? मेरा मानना है कि मुख्यधारा समय निर्धारित करता है । किसी कवि ,आलोचक ,पत्रिका या संस्था को यह अधिकार नहीं है । यह मुख्य धारा काल सापेक्ष होती है । आज जो लोकप्रिय या चर्चित कवि है आवश्यक नहीं भविष्य में समय के क्षितिज पर सितारे की तरह दैदिप्यमान रहे । आपने सुना भी होगा ‘हुए नामवर बेनिशाँ कैसे कैसे ,ज़मीं खा गई आसमाँ कैसे कैसे’ । अत: मुख्य धारा की परवाह ना करते हुए कवि को अपना कवि कर्म जारी रखना चाहिये ।
            संजीव जी ने पूछा है कोई रचना मानकों पर खरी होने के बाद सिर्फ इसलिये हीन कही जाये कि समीक्षक उस में प्रतिपादित विचारधारा से असहमत है । संजीव जी मानकों पर खरी उतरने के बाद रचना हीन कैसे हो सकती है । वैसे दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं का प्रतिपादन करने वाली रचनाओं  के मानक समान हो सकते हैं । मेरा मत है कि रचना को यदि पूर्वाग्रह के साथ पढ़ा जायेगा तो यह न केवल रचना और रचनाकार की अवमानना होगी बल्कि आलोचक की बुद्धि पर भी सन्देह किया जायेगा । रचनाकार का जीवन दर्शन,दृष्टि ,अनुभूतियों को कथ्य में परिवर्तित करने की क्षमता, एवं उसकी शिल्पगत विशेषता रचना के भीतर जब प्रस्फुटित होती है तो देश काल के अनुसार मानक स्वयं बनते जाते हैं । इस दृष्टि से किसी भी रचना को श्रेष्ठ या हीन साबित करना उचित नहीं है। दिगम्बर जी से भी मैं यही कहना चाहूंगा कि आलोचना के लिये मापदंडों का लचीलापन आवश्यक है । आलोचक रचना के लिये पैरामीटर्स या तो स्वयं तय करता है या रचना उसके लिये पैरामीटर्स का निर्माण करती है । यह रचना की ताकत पर भी निर्भर करता है । पूर्वाग्रह से ग्रस्त रहना ना आलोचना के लिये सुखद है ना रचना के लिये ।
            संजीव जी ने आलोचना,समालोचना,समीक्षा व व्याख्या मे भेद जानना चाहा है । आलोचना व समालोचना दोनो में मूलभूत कोई अंतर नहीं है । दोनों सैद्धांतिक,व्यावहारिक व विस्तृत होती हैं । सामान्यत: आलोचना का अर्थ केवल निन्दा से तथा समालोचना का अर्थ निन्दा व प्रशंसा दोनों से लिया जाता है लेकिन साहित्य में ऐसा नहीं है । आलोचना व समालोचना दोनो में निन्दा व प्रशंसा शामिल होती है । साहित्य में आलोचना शब्द ही प्रचलन में है । समीक्षा सामान्यत: एक कृति की, एक अवसर (event) की, हो सकती है इसमें निहितार्थ को इंगित (point out) किया जा सकता है । व्याख्या से तात्पर्य विस्तारपूर्वक विश्लेषण से है यह एक ग्रंथ से लेकर एक पंक्ति तक की हो सकती है ।
            अंत मे नन्दन जी की शंका जो खेमों में बँट चुकी रचना व आलोचना को लेकर है । रचनाकर्म व आलोचना दोनो के प्रभावित होने का मुख्य कारण यही है कि दोनों ने अपने आपको प्रथम आलोचक मानना छोड़ दिया है , जो मान रहे हैं वे बेहतर रच रहे हैं । तेजेन्द्र जी के विनोद से अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा । तेजेन्द्र जी आलोचक को बैलगाड़ी के नीचे चलने वाले कुत्ते की उपमा  दिये जाने का युग शेक्स्पीयर के साथ ही समाप्त हो चुका हैआलोचना अपने आप में एक महत्वपूर्ण रचना कर्म है । ब्रिटेन की छोड़िये हमारे यहाँ भी कहा जाता था कि असफल कवि आलोचक बन जाता है  लेकिन आज देखिये बहुत से महत्वपूर्ण कवि आलोचना के क्षेत्र में हैं । वैसे कुत्ते वाली उपमा में यदि हम बैलगाड़ी को रचना मान लें,गाड़ीवान को कवि,उसके नीचे चलते हुए भौंकने वाले कुत्ते को आलोचक मान लें तो पाठक बैल ही हुए ना । लेकिन सबसे महत्वपूर्ण भी वे ही हैं यदि वे गाड़ी को खींचना बन्द कर देंगे तो बैलगाड़ी,गाड़ीवान और कुत्ता क्या कर लेंगे ? अत: अच्छी रचना का स्वागत करें तथा कवि और आलोचक को अपना काम करने दें ।( चित्र :महावीर प्रसाद द्विवेदी )
                                                               --- आपका -शरद कोकास