(विष्णुचंद्र शर्मा द्वारा संपादित "मुक्तिबोध की आत्मकथा " से साभार)
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बुधवार, 3 जून 2009
मुक्तिबोध ने कहा था
मिलने पर बहुत से आलोचक बहुत बातें करते हैं -बहुत आवेग से ,उत्साह से,वे बातेंजो उनके ह्रदय से निकलती होती हैं,उनके आलोचनागत मंतव्यों से बहुत दूर जा पडती हैं ,कभी- कभी वे उन बातों के विरुद्ध भी पाई जाती है ,बहुत बार वे उनके मंतव्यों से अधिक मार्मिक, अधिक दृष्टिमय और अधिक यथार्थ भी होती हैं । इसलिए की
बात करते समय वह आलोचक "नाट्य" नही कर रहा है, वरन अपने व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं का सहज उदघाटन करता जा रहा है। लेकिन जब वह लेखनी चलाने लगता है ,या मंच पर जाता है तब वह आलोचक का मुकुट पहनकर , सत्य का राजदंड स्वीकार कर ,भाषण देने लगता है -पिटी-पिटाई ,घिसी -घिसाई शब्दावली में और ऐसे नाटकीय स्वर में जो उसने याद करके (दिमाग के तरकस में ) रख छोडे है ।
(विष्णुचंद्र शर्मा द्वारा संपादित "मुक्तिबोध की आत्मकथा " से साभार)
(विष्णुचंद्र शर्मा द्वारा संपादित "मुक्तिबोध की आत्मकथा " से साभार)
‘पहल’ पत्रिका में प्रकाशित लंबी कविता “पुरातत्त्ववेत्ता” और “देह” के लिए चर्चित कवि शरद कोकास की और दो लंबी कविताएँ “पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा” तथा परमाणु बम के अविष्कारक “ओपेनहाइमर” पर लिखी लम्बी कविता ‘समालोचन’ वेब पत्रिका में प्रकाशित हैं । उनके छह कविता संकलन प्रकाशित हैं 1."गुनगुनी धूप में बैठकर " 2. 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' 3. 'अनकही' 4 'सुख एकम दुःख' 5 'बिजूका' 6. चयनित कविताएं । उनकी गद्य पुस्तकों में "मन मशीन" "एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी" "बैतूल से भंडारा" और "कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ" अमेज़न पर बेस्ट सेलर हैं । कवि,लेखक,ब्लॉगर,पॉडकास्टर,हिप्नो व साइको थेरेपिस्ट शरद कोकास बतौर मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग भी करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा अंधश्रद्धा निर्मूलन पर व्याख्यान देते हैं साथ ही फेसबुक,व्हाट्सएप,इन्स्टाग्राम,ट्विटर आदि पर भी सक्रिय हैं ।
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हिन्दी साहित्य के सभी दिवंगत महान आलोचकों के प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए उनके विचारों को आप तक पहुंचाने हेतु कृतसंकल्प
जवाब देंहटाएंआपके इस ब्लौग के लिये कबसे समय निकालने को उत्सुक हो रखा था मैं। आज समय मिला है तो शुरु से ही शुरु कर रहा हूँ। वैसे भी इस "आलोचक" के प्रथम पृष्ठ के लिये इससे ज्यादा सार्थक पोस्ट और कोई नहीं हो सकती थी।
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