बुधवार, 21 अक्तूबर 2009

अपनी कविता किसे अच्छी नहीं लगती

                     ब्लॉग जगत में कविताओं के अनेक ब्लॉग हैं । यहाँ कविताओं के पाठक भी अनगिनत हैं ।सामान्यत: यह देखा गया है कि हर ब्लॉगर कहीं न कहीं कविता से जुड़ा है कहीं कवि के रूप में कहीं पाठक के रूप में । मैं भी मूल रूप से कवि हूँ और ब्लॉग जगत में प्रवेश से पूर्व ही देश की लगभग पचास साहित्यिक पत्रिकाओं में 300 से अधिक कवितायें प्रकाशित होने के अलावा एक संग्रह और एक लम्बी कविता " पुरातत्ववेत्ता " भी प्रकाशित है। कविता संग्रहों की समीक्षा भी मैं करता हूँ सो थोड़ी बहुत आलोचक के रूप में भी पहचान है। कविता के ब्लॉग्स  में कविताओं को प्रशंसा भी बहुत मिलती है। इसके अनेक कारण हो सकते हैं । लेकिन साहित्य जगत में अभी ब्लॉग की कविताओं को उस दृष्टि से नहीं देखा जाता जिस दृष्टि से साहित्यिक पत्रिकाओं में छपने वाली कविताओं को देखा जाता है । इसका एक कारण यह भी है कि यहाँ सम्पादक भी स्वयं कवि  है और उसे बिना किसी अवरोध के अपनी कविता प्रकाशित करने का अधिकार है । पाठक और कवि के बीच से सम्पादक की यह कड़ी गायब होने के कारण और कई बार अपनी कविता को परिपूर्ण समझने के मोह में हम अपनी कविता की आलोचना नहीं कर पाते हैं और कविता कहीं न कहीं कमज़ोर रह जाती है । हम इसे स्वीकार नहीं करते क्योंकि तुलसी दास जी ने कहा भी है  " निज कवित्त केहि लागि न नीका ,होय सरस वा हो अति फीका " । कई ब्लॉगर मित्रों का यह आग्रह है कि मैं इस विषय पर कुछ लिखूँ  और अपने ' कविता वर्कशॉप ' मे जो टिप्स नये लिखने वालों को देता हूँ उन्हे भी बताऊँ । सो अपने लेख " हर कविता तीन स्तरों पर आलोचना से गुजरती है" की यह पहली किश्त यहाँ जारी कर रहा हूँ । चर्चा के दौरान और जो मुद्दे आयेंगे उन पर भी लिखने की कोशिश करूंगा ।
                         
                                       हर कविता तीन स्तरों पर आलोचना से गुजरती है


                     पहला आलोचक स्वयं कवि होता है  - कवि कर्म ईश्वरीय देन नहीं है । कविता लिखने की प्रेरणा हमे साहित्य और समाज से मिलती है लेकिन उसके लिए तैयारी स्वयं करनी होती है ।इसके लिए स्वयं का अध्ययन,अनुभवों को रचना में ढालने की शक्ति, साहित्य के इतिहास से परिचय, भाषा की समझ , कल्पनाशीलता , विचारधारा , दृष्टि , शब्दभंडार, राजनैतिक समझ और ऐसे ही अनेक तत्वों की आवश्यकता होती है । कविता लिखते समय कवि को निर्मम होकर अपनी रचना की आलोचना करनी चाहिये ।
                   दूसरा आलोचक कविता का पाठक है - कविता प्रकाशित होने के पश्चात जब पाठक के सन्मुख आती है तो वह उसका आस्वादन करता है ।मुख्यत: पाठक उस रचना में भाव ढूंढता है , कोई बिम्ब, कोई प्रतीक या कोई विचार उसे उद्वेलित करता है वह उस कविता में अपने आसपास के परिदृश्य की तलाश करता है ।पाठक के मन की कोई बात यदि उस कविता में हो तो वह उसे पढ़कर प्रसन्न होता है। यदि कविता में उसके आक्रोश को अभिव्यक्ति मिलती है या उसे अपनी समस्याओं का समाधान नज़र आता है तो वह कविता उसकी प्रिय कविताओं में शामिल हो जाती है । कुछ पाठक कविता में गेयता को पसंद करते है, वे उसकी लय एवं ताल पर मोहित होते हैं और कथ्य उनके लिए गौण हो जाता है ।
                    इस तरह पाठक के पास कविता का रसग्रहण करने का अपना पैमाना होता है ।कविता की ग्राह्यता पाठक के स्वयं के अध्ययन , उसकी विचारधारा तथा जानकारियों अथवा सूचनाओं के भंडार पर भी निर्भर करती है । कविता में पाठक की रुचि इन्ही सब बातों की वज़ह से होती है ।उसके लिए सबसे अच्छी कविता वह होती है जिसे पढ़कर अनायास उसका मन कह उठे .. ‘ अरे ! ऐसा तो मैं भी लिख सकता था ।‘
                     तीसरा आलोचक तो आलोचक है ही - इस आलोचक का काम इससे एक कदम आगे का है ।उसका काम कविता को पढ़ना या देखना मात्र नहीं है ।आलोचक का कार्य है कविता में अंतर्निहित अन्य तत्वों को पाठकों के सन्मुख रखना ताकि वे एक नई दृष्टि एवं नये उपकरणों के साथ कविता में मूल्यों की तलाश कर सकें ।आलोचक का यह कार्य उन कवियों के लिए भी ज़रुरी है जो केवल शब्दों की जोड़-तोड़ को या किसी विचार को तीव्रता के साथ कविता में प्रक्षेपित करने को ही कविता समझते हैं या जिनका कविता लिखने का उद्देश्य महज स्वांत:सुखाय, आत्माभिव्यक्ति या पाठकों का मनोरंजन है ।
                      वर्तमान समय में इस में लोकप्रियता का तत्व और जुड गया है जिसकी वज़ह से साहित्य में प्रदूषण की संभावनाएँ बढ़ गई हैं । इसके अतिरिक्त साहित्य में व्यक्तिवाद भी बढ़ता जा रहा है , व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के कारण जोड़-तोड़ की राजनीति साहित्य में भी प्रारंभ हो गई है , इस वजह से बहुत सारे अच्छे रचनाकार निराश हो चले हैं ।आलोचक का काम इस स्तर पर और भी महत्वपूर्ण हो जाता है । ( आगे जारी )

यह विचार आपको  कैसे लगे ,आप कवि हों या कविता के पाठक , या साहित्य प्रेमी ,इस पर आपकी राय जानना ज़रूरी है - शरद कोकास

24 टिप्‍पणियां:

  1. ओह, ये थी सारी गुत्थी...मुझ जैसे नौसिखुए रचनाकारों के लिए अनिवार्य पोस्ट...

    उत्तर देंहटाएं
  2. शरद जी तब तो आपसे एक प्रार्थन है कि आप मेरी कविताओं की आलोचना भी जरूर करें उस दिन अपनी गलती गज़ल मे पता चल गयी थी आज उसे भी सही करती हूँ धन्यवाद्

    उत्तर देंहटाएं
  3. ब्लागिंग में समालोचना या समीक्षा की बहुत आवश्यकता है। कैसे और कब यह आरंभ हो सकेगी? कहा नहीं जा सकता, लेकिन प्रयास किए जा सकते हैं। समालोचना हिन्दी ब्लाग जगत को नए आयाम देगी।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सही आलेख है शरद जी, गुजरिया कभी अपना दही खट्टा बताती है ? पीने/खाने वाला ही बता सकता है कि कितना खट्टा है , मगर अफ़सोस यह भी है कि आज गुजरिया यह सुनना भी तो नहीं पसंद करती कि उसका दही खट्टा है ! मैंने भी जितनी बार ऐसे गुज्जर/गुजरियाओ से उनका दही खट्टा बताया और कहाँ पर सुधार की गुंजाइश है, उदाहरणार्थ मैंने कहा कि आपकी इस पोस्ट में 'खता' की जगह खटा टाईप हो गया उसे ठीक कर ले , पर अफ़सोस कि उन्होंने उस शब्द को भी ठीक नहीं किया, आज तक ! इसलिए जय-जैकार में ही भलाई है !

    उत्तर देंहटाएं
  5. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  6. जिसे पढ़कर अनायास उसका मन कह उठे .. ‘ अरे ! ऐसा तो मैं भी लिख सकता था ।‘ बहुत ही अच्‍छा एवं सही लिखा है आपने, आप जैसे अनुभवी ही इस पर गहन प्रकाश डाल सकते हैं आभार सहित लेखनी के लिये शुभकामनायें ।

    उत्तर देंहटाएं
  7. आप ही के शब्दों में...

    हास्य कविता पढ़ने का भी अपना ही आनंद है...


    जय हिंद...

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपकी मान्यता पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। मुद्दा बहुत सही उठाया है। रोचक और गंभीर भी। विषय की मूलभूत अंतर्वस्तु को उसकी समूची विलक्षणता के साथ बोधगम्य बना दिया है। इस विषय पर संवाद की ज़रूरत है। मैं अपनी कुछ बातें रखना चाहूंगा। कविता और कवि के बीच संपादक और उसका संपादन क्यों ? कई कवियों ने अपना संग्रह सीधे-सीधे छपवाया और उन्हें लोगों की वाह-वाही भी मिली। हम कविता तो पाठक के लिए ही लिखते हैं। हां उन तक पहुंचने-पहुंचाने का एक, (आख़िरी नहीं), माध्यम हैं वे (संपादक और उनकी पत्रिका)। चुनने दीजिए ना सीधे पाठकों को। ये संपादक की कतर-ब्यौंत क्यों, पसंद ना-पसंद क्यों? अगर टी-वी-टुट्ट लेकर एक अस्थापित पंत किसी संपादक के पास जाता तो क्या वे छापते। और अभी हाल ही में एक प्रसिद्ध कवि की एक कविता एक फूल के ऊपर एक प्रसिद्ध पत्रिका में देखा, कवि ने कल्पना भी नहीं की होगी जो इस उद्देश्य के लिए उस रचना को संकेत बनाया जाएगा। यह मैं इस लिए कहना चाह रहा हूं कि आजकल संपादक तो अपनी-अपना खास विचारधारा के साथ पत्रिकाएं चला रहें हैं। यदि आपकी रचना उस खांचे में फिट बैठती है तो रचना विश्व साहित्य की अनुपम कृति, वरना कूड़े के ढ़ेर में भी उसकी जगह नहीं। इसलिए जय हो ब्लॉगजगत।

    उत्तर देंहटाएं
  9. पूरी भीड की आंखों के सामने कोई घटना घटती है .. हर व्‍यक्ति के सामने उस घटना का अलग अलग प्रभाव पडता है .. उसके अनुसार संबंधित घटना के बारे में हर व्‍यक्ति की अभिव्‍यक्ति होती है .. अब उसकी अभिव्‍यक्ति को पढनेवाले सारे लोगों पर उसका एक जैसा प्रभाव नहीं दिखाई दे सकता .. अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार लोग उसका कुछ भी अर्थ लगा सकते हैं .. उसके भाव को समझने की कोशिश कर सकते हैं .. उसमें किसी बिम्‍ब की तलाश कर सकते हैं .. यही कारण है कि आलोचना को इतना महत्‍व दिया जाता है .. वैसे आलोचना सकारात्‍मक तो होनी ही चाहिए .. और भाव को अच्‍छी तरह समझे बिना आलोचना नहीं की जा सकती .. आपका लेख अच्‍छा लगा .. अगली कडी का इंतजार रहेगा !!

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत सही. ब्लॉग पर रचनाकार सर्वशक्तिसम्पन्न होता है.सम्पादन के साथ-साथ कम्पोज़िंग, पेस्टिंग और पब्लिशिंग सब वो खुद करता है. सम्पादक की कैंची या आलोचक की नज़र से बेफ़िक्र. चूंकि ब्लॉग-कवि स्वयं प्रकाशक है, इसलिये उसकी प्रतिभा कहीं न कहीं प्रभावित ज़रूर होती है. अपनी तमाम त्रुटियों पर ध्यान रचनाकार खुद नहीं दे सकता. ये काम सम्पादक और आलोचक का है. ये दोनों मिल के रचनाकार को मांज डालते हैं, जिससे उसकी प्रतिभा निखर आती है. लेकिन अब क्या हो? सार्थक चर्चा.

    उत्तर देंहटाएं
  11. कवि कर्म ईश्वरीय देन नहीं है-क्या सचमुच कोकास जी ?

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत सही लिखा आप ने हम भी कभी आलोचक बन जाते है, लेकिन शिष्टा चार मै रह कर, आलोचक भी बनो तो मित्र के रुप मे, ओर आलोचना ही संवारती है आप की कविता को.
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  13. मुख्यत: पाठक उस रचना में भाव ढूंढता है , कोई बिम्ब, कोई प्रतीक या कोई विचार उसे उद्वेलित करता है वह उस कविता में अपने आसपास के परिदृश्य की तलाश करता है ।पाठक के मन की कोई बात यदि उस कविता में हो तो वह उसे पढ़कर प्रसन्न होता है।

    बिलकुल सही लिखा है आपने ..समीक्षा ही सही बता सकती है की क्या लिखा गया है ..बहुत ही बढ़िया लेख लिखा है आपने शरद जी ..

    उत्तर देंहटाएं
  14. रविन्द्र स्वप्निल प्रजापति ने कहा
    ravindra swapnil prajapati to me

    kavita eswariye or pryas dona hia hai ....

    उत्तर देंहटाएं
  15. aapne meri aankhen khol deen... ab pahla alochak khud hi banna padega

    उत्तर देंहटाएं
  16. हिन्‍दी ब्‍लागजगत के लिए बहुत आवश्‍यक है इस लेख की कडि़या क्‍योंकि अधिकतम हिन्‍दी ब्‍लागों में कविताये हैं. इससे लेखन का स्‍तर सुधरेगा, व्‍यर्थ की कविताई वाह वाही व चापलूसी से परे कवि बेहतर लिख सकेगा एवं हिन्‍दी ब्‍लागिंग का मान बढेगा.

    उत्तर देंहटाएं
  17. शरदजी, कविता तो कवि की कल्पना होती है जो कि शब्दों में उसका मन उकेरता है, मेरे ख्याल से आलोचना करने का हक तो सबको है परंतु कविता में सुधार करने का या न करने का अधिकार केवल कवि का ही है क्योंकि हो सकता है कि पाठक कवि की मूल भावना तक पहुंच ही नहीं पाता हो। कवि के मनोभाव जो कि उसके कविता लिखते समय थे वो तो कोई भी नहीं जान सकता इसलिये कविता का आनंद लिया जाना चाहिये हाँ बीच में संपादन की बात रही तो मेरे हिसाब से तो आलोचना ज्यादा सही है न कि संपादन।

    अगर कवि की भावना को ठेस नहीं पहुंचेगी तो शायद कवि भी कविता को ठीक कर लेगा परंतु कवि को दबाब में कभी भी कविता को बदलना नहीं चाहिये। हिन्दी साहित्य में कितने ही उदाहरण मौजूद हैं।

    कविता तत्व पर आपका लेख संग्रहणीय है आगे की कड़ियों का इंतजार रहेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  18. @द्विवेदी जी -धन्यवाद ,प्रयास तो मैने प्रारम्भ कर दिया है और उम्मीद है ,इसे स्वस्थ्य भावना से लिया जायेगा । अभी प्रिंट जगत के मित्रो को भी जोड़ना है । साहित्य की समालोचना निश्चित ही ब्लॉग जगत को नये आयाम देगी ।
    @ मनोज जी - आपकी बात से मै सहमत हूँ , पत्रिकाओं से हमारा विरोध नहीं है । पत्रिकाओं के सम्पादकों का अपना विवेक ( और विचारधारा भी कभी ) होता है । कविता संग्रह का उद्देश्य यह भी होता है कि कवितायें एक स्थान पर मिल जायें ।लेकिन आलोचना का उद्देश्य अलग है यह रचना की बेहतरी के लिये है कौन नही चाहेगा कि उसकी रचना और बेहतर हो । प्रकाशन के कई माध्यम हो सकते हैं यह अलग विषय है । @विवेक रस्तोगी -धन्यवाद विवेक , -पकी बात सही है ,कवि जो सोचकर लिखता है ज़रूरी नहीं पाठक या आलोचक उसके सम्पूर्ण अर्थ तक पहुँचे लेकिन कभी कभी ऐसा भी होता है कि वह उसके नये अर्थ भी उद्घाटित करता है । निराला, मुक्तिबोध और सारे बड़े कवियों ने इस बात को स्वीकार किया है । आलोचक का यह श्रम कवि को नई सोच भी प्रदान करता है और पाठक एक और नये अर्थ के साथ रचना का आनन्द लेता है । प्रकाशित कविता में सुधार नहीं किया जा सकता (हाँलाकि ब्लॉग जगत में यह सम्भव है ) लेकिन अगली रचना के लिये या सृजन प्रक्रिया के अंतर्गत रचना के लिये कवि को एक दिशा निर्देश तो मिलता ही है । इस बात से मै पूरी तरह सहमत हूँ कि रचना मे सुधार करने का अधिकार और विवेक केवल कवि के पास ही होना चाहिये ,आलोचक या पाठक केवल सुझाव दे सकता है दबाव नहीं डाल सकता । आगे की चर्चाओं में भी भाग लेते रहें ।
    भवदीय -शरद कोकास
    @ गोदियाल जी - आपकी एक ही टिप्पणी तकनीकी गड़बडी से दो बार प्रकाशित हो गई अत: पुनरावृत्ति न हो इसलिये एक हटा दी है ,अन्यथा न लें ।
    @अरविन्द जी - सचमुच ऐसा ही है , आप तो जानते ही है ।
    @ रवीन्द्र - आप भी जानते हैं .. जानते है ना ? ,

    उत्तर देंहटाएं
  19. bahut sahi likha hai aapne.
    main bhi kabhi-kabhi shaukiya kavita or gazal likhta hoon, kripya mere blog- http://prabalpratapsingh81kavitagazal.blogspot.compar aakar mera margdarshan karne ki kripa karyen.
    dhanyavaad.

    उत्तर देंहटाएं
  20. भाई साहब
    मोटे तौर पर सहमत हूं।
    वैसे प्रिन्ट हो या ब्लाग अच्छी-बुरी कवितायें हर जगह हैं और उनके पाठक भी।

    कितना अच्छा हो कि महीने में एकाध बार ब्लाग से कुछ कवितायें उठाकर आप उनकी स्वस्थ आलोचना कर डालें

    उत्तर देंहटाएं
  21. aap jo bhi pesh karoge accha hi karoge..yakinan
    chahe vo aalocna ho ya aalekh

    उत्तर देंहटाएं
  22. अरे, ये तो बडे काम का लेख है । कविता ईश्वरी देन तो है पर प्रयत्न और स्व-आलोचना से आप उसे निखार जरूर सकते हैं । शुध्द हिंदी लिखना तो मेरी समझ से आवश्यक है हालांकि टायपिंग की गलतियाँ हो ही जाती हैं पर दुबारा तिबारा देख लेना चाहिये । हालांकि मै स्वयं टिप्पणी करने के बाद उसे दुबारा नही पढती और बाद में पछताती हूँ ।
    आपकी टिप्पणियों को अब अलग नज़र से देखना पडेगा ।

    उत्तर देंहटाएं