मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

मानक आलोचना वह है जो पाठक को फिर रचना की ओर लौटा दे ।

हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी का आज 16 फरवरी 2010 को भिलाई आगमन हो रहा है । सायं सात बजे कवि अशोक सिंघई के निवास पर दुर्ग-भिलाई के साहित्यकारों के बीच उनका काव्यपाठ आयोजित है । कल 17 फरवरी को प्रात: 11 बजे कल्याण कॉलेज के सभागार में " आज का समय " इस विषय पर उनका व्याख्यान भी होगा  । श्री अशोक वाजपेयी के भिलाई आगमन पर प्रस्तुत है  ' सापेक्ष ' के सम्पादक महावीर अग्रवाल से उनकी बातचीत का एक अंश ,' सापेक्ष " से साभार ।
 महावीर अग्रवाल: आप मानक आलोचना किसे मानते हैं मानक आलोचना का मानदंड क्या होना चाहिये ?
अशोक वाजपेयी : इसके कोई सिद्धांत हमेशा के लिये निर्धारित नहीं किये जा सकते । साहित्य की अन्य विधाओं की तरह आलोचना भी परिवर्तनशील है फिर भी कुछ गुण पहचाने जा सकते हैं ।मानक आलोचना वह है जिसमें साहित्य का अनुराग प्रकट हो ,जिसमें रचना को धीरज और जतन से समझ- बूझ कर पढ़ने का साक्ष्य हो ,जो रचना के अंतर्निहित अभिप्रायों और आशयों को स्पष्ट करने की चेष्टा करती हो जिसमे रचना की विशिष्टता को पहचानने का प्रयत्न हो ,रचना को परम्परा में अवस्थित करने का उत्साह हो , जिसमें अपने पूर्वग्रहों और रचनाकारों के पूर्वग्रहों के तादाम्य या टकराव को स्पष्ट ईमानदारी से स्वीकार किया गया हो और उनके बावज़ूद रचना के रसास्वादन का प्रमाण हो ।
          आलोचक को भी रचनाकार की तरह सामान्यीकरणों से गुरेज करना चाहिये ।आलोचक रचना को उसके व्यापक सांस्कृतिक- सामाजिक सन्दर्भ में तभी रख सकता है जब उसकी उस सन्दर्भ की समझ आश्वस्तकारी हो ,कोई बन्धा-बन्धाया फार्मूला नहीं ।मानक आलोचना वह है जो पाठक को फिर रचना की ओर लौटा दे ।
         ऐसी मानक आलोचना हिन्दी में है । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल,आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय , मुक्तिबोध , निर्मल वर्मा , नामवर सिंह जैसे मूर्धन्यों के अलावा मलयज, विजयदेव नारायण साही , विष्णु खरे , मैनेजर पाण्डेय , नन्दकिशोर नवल , वागीश शुक्ल , रमेशचन्द्र शाह , कुँवर नारायण , पुरुषोत्तम अग्रवाल , कृष्ण कुमार , मदन सोनी आदि ने ऐसी आलोचना लिखी है ।
          श्री अशोक वाजपेयी जी का स्वागत है ,,उनके यह विचार आपको कैसे लगे अवश्य बताइये । कविता पाठ व व्याख्यान की रपट अगली पोस्ट में - शरद कोकास

13 टिप्‍पणियां:

  1. सचमुच आलोचना की सार्थकता तो यही है कि जो पाठक को फिर रचना की ओर लौटा दे।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  2. विचार कुछ अधूरे लगे। लेकिन पोस्ट अच्छी है सोचने को बाध्य करती।

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  3. अशोक वाजपेयी जी के बारे में पढकर अच्छा लगा।

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  4. मानक आलोचना वह है जो पाठक को फिर रचना की ओर लौटा दे ।
    ...इस एक पंक्ति ने 'आलोचना' शब्द को न केवल परिभाषित किया है वरन आलोचना की महत्ता भी स्पष्ट की है.
    ..इस पोस्ट के लिए आभार.

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  5. मानक आलोचना वह है जो पाठक को फिर रचना की ओर लौटा दे ।

    सही बात....

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  6. मानक आलोचना वह है जो पाठक को फिर रचना की ओर लौटा दे ।

    सही बात....

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  7. अशोक जी के बारे आप से जाना, बहुत अच्छा लगा धन्यवाद

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  8. apan ne sham ko hi sanjeev tiwari jee ko phone kar k bata diya tha ki ashok jee abhi bhilai me hai kan dopahar tak rahenge.
    aur yah bhi bata diya tha ki raat ke 9 baje ke baad unse na milein to behtar rahega...

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  9. जब कोई अनुभवी व्यक्ति कुछ कहता है, तो सही ही होगा। और इन्होंने तो सही से भी आगे की बात कह डाली। उंगली उठाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।

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