रविवार, 19 जून 2016

रचना की स्त्रोत सामग्री

🔲 विचार श्रृंखला :   रचना संवाद🔲

1⃣ हम रचना के लिये कच्चा माल कहाँ से लेते हैं ?

❇ उत्पाद - रचना को यदि हम एक उत्पाद मान लें तो यह बात समझना बहुत आसान हो जायेगा । जिस तरह एक उत्पाद को तैयार करने के लिए हमें कच्चे माल की आवश्यकता  होती है उसी तरह एक रचना को तैयार करने के लिए हमें बहुत  सारी सामग्री की आवश्यकता होती है । हमारा समाज . समाज की भाषा , हमारे अनुभव , स्मृतियाँ और पुस्तकें मुख्यतः रचना की स्त्रोत सामग्री होते हैं । हम अपनी रचना के निर्माण के लिये जो कुछ भी इस दुनिया से लेते है उसे कुछ अलग अलग खानों में बाँटा जा सकता है ।

✳ समाज - सबसे पहले हम अपनी रचनात्मकता के लिये इस समाज की देन के बारे में बात करेंगे । यह बात तय है कि हम रचना के लिये कच्चा माल हमारे समाज से लेते हैं । इसलिये कि शब्द ,भाषा,अनुभव, और हमारे इर्द -गिर्द घटित होने वाला बहुत कुछ इसी समाज की ही उपज है । आप सोचकर देखिये यदि हमारे पास समाज के बीच बोली जाने वाली भाषा न हो , सामाजिक अनुभव न हों , सामाजिक विसंगतियों का ब्योरा न हो ,सामाजिक क्रियाकलापों की जानकारी न हो तो क्या हम कोई भी रचना लिख सकते हैं ? आप कहेंगे , निस्सन्देह हम अपने व्यक्तिगत अनुभवों को लेकर भी रचना लिख सकते हैं और इसमे ज़रूरी नहीं कि समाज का कोई योगदान हो । प्रश्न यह है कि जिसे आप व्यक्तिगत कहते हैं उसका समाज से क्या सम्बन्ध है । दरअसल हमारा व्यक्तित्व ही इस समाज की देन है ।हमारा व्यक्तिगत अनुभव के रूप में जो कुछ हमारे अवचेतन में दर्ज होता है वह वस्तुतः इस समाज के सामूहिक अवचेतन का ही परिणाम है ।

❇ भाषा - रचना के निर्माण के लिए दूसरा महत्वपूर्ण स्त्रोत है  भाषा। हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते  कि यह भाषा या यह दृष्टि जिसका उपयोग हम अपनी रचना में कर रहे है वह हमने इस समाज से ही ली है । अपनी मातृभाषा को ही ले लें । यदि हमारे माता-पिता या समाज हमें यह भाषा सीखने का अवसर नहीं देता तो क्या इसमें या किसी भी भाषा में रचना सम्भव थी ? इसके लिये हमारे पास भाषा के इतिहास के बारे में ज़रूरी सूचनायें होना आवश्यक है और वह यह कि आदिम मनुष्य के पास जब कोई भाषा नहीं थी उसने संकेतों से अपने आप को किस तरह अभिव्यक्त करना प्रारम्भ किया । संकट के अलावा ,अपनी प्राकृतिक आवश्यकताओं के लिये भी उसने संकेतों का इस्तेमाल कैसे किया । बहरहाल जब हम भाषा लेते हैं तो भाषा के साथ उसके संस्कार भी ग्रहण करते हैं , भाषा में प्रचलित लोकोक्तियाँ , कहावतें और मुहावरे भी लेते हैं ।

✳ चिंतन  - एक प्रश्न यह भी उठता है कि हम चिंतन किस भाषा में करते हैं । सामान्यतः एक रचनाकार भी अपनी मातृभाषा में ही चिंतन करता है लेकिन कुछ ऐसे रचनाकार भी होते हैं जो अन्य किसी भाषा में इतने सिद्धहस्त हो जाते हैं उनकी चिंतन की भाषा भी वही हो जाती है । अंग्रेजी के ऐसे बहुत से लेखक हैं जिनकी मातृभाषा तो हिंदी है लेकिन वे चिंतन अंग्रेजी में करते हैं इसका अर्थ यह है कि उनके रचना के स्त्रोत भी बढ़ जाते हैं जिनमे मुख्य भूमिका पुस्तकों की होती है ।

✳ स्मृतियाँ - रचना के लिये कच्चे माल के रूप में सर्वाधिक भंडार हमें अपनी स्मृतियों से प्राप्त होता है
 । होश सम्भालने की उम्र से लेकर वर्तमान आयु तक बिताए  हुए जीवन के बहुत से सुखद व दुखद क्षणों की स्मृति हमारे साथ होती है । इसमें बचपन की स्मृति प्रमुख होती है । आपने देखा होगा कई बुज़ुर्गों को जब वे अपने बचपन की घटनाओं को बताते हैं तब वे सिलसिलेवार एक एक बात रखते हैं । यहाँ तक कि किसी विशिष्ट दिन और और किसी विशिष्ट अवसर पर उन्होंने  क्या पहना था या क्या खाया था यह भी वे विस्तार से बताते हैं । जबकि कई बार कुछ देर पहले की घटना भी उन्हें याद नहीं रहती ।
रचनाकार जब लिखना प्रारम्भ करते  हैं तो उनमें से कई लोग पहले पहल अपने बचपन की स्मृतियों के आधार पर ही रचना प्रारम्भ करते हैं । कई बार कुछ बड़े होने की स्थिति में प्राप्त अनुभव काम में आते हैं । किसी व्यक्ति से मुलाकात , बचपन का कोई दृश्य . किसी का प्रभाव यह सब हम अपने लेखन में इस्तेमाल करते हैं ।

❇ अतीत -साहित्य जगत में नॉस्टेल्जिया  शब्द को बहुत सम्मान के साथ  नहीं देखा जाता । ऐसा माना जाता है कि अतीत के लिये विलाप करना मूर्खता है । विलाप सचमुच मूर्खता हो सकती  है । अतीत जीविता अच्छी बात नहीं है लेकिन कई बार यह अतीत हमारी ताकत भी बन जाता है । अक्सर कोई गन्ध , किसी पुराने गीत की कोई पंक्ति , कोई जानी पहचानी आवाज़ , कोई तस्वीर , हमे अतीत में ले जाती है । जब हम अपने अतीत को याद करते हैं तो उससे जुड़े हुए दृश्य भी याद करते हैं । कई बार ऐसा होता है कि हमने अतीत में जो दुख भोगा है वह भविष्य में जाकर हमे सुख की तरह लगता है । हमने कई लोगों को देखते हैं जब भी वे अपने गर्दिश के दिनो की याद करते हैं तो एक अतिरिक्त उत्साह से भरे होते हैं । ऐसा सभी के साथ होता है लेकिन एक रचनाकार इनका उपयोग करता है ।

❇ अनुभव - एक रचनाकार इस बात को स्वीकार करता है कि अधिकांश स्त्रोत सामग्री उसे अपने अनुभवों  से प्राप्त होती है यही अनुभव उसकी स्मृति में दर्ज होते हैं । लेकिन कई बार अपने अनुभवों के अलावा दूसरों के अनुभव भी रचना के निर्माण में काम आते हैं यह रचनाकार की क्षमता पर निर्भर होता है कि वह दूसरों के अनुभव को किस तरह अपनी स्त्रोत सामग्री के रूप में इस्तेमाल कर सकता है । मैंने अपने कई मित्रों से पूछा है कि आप जब प्रेम कविता लिखते हैं तो उसके लिए कच्चा माल कहाँ से लेते हैं , क्या आपने स्वयं प्रेम किया है अथवा आप दूसरों के प्रेम के आधार पर कविता लिख रहे हैं । अधिकांश ने यह स्वीकार किया है कि वे स्वयं के प्रेम के अनुभव के आधार पर ही प्रेम कविता लिखते हैं कुछ ने यह भी कहा कि इसके पीछे उनके स्वयं के कम तथा औरों के अनुभव अधिक होते हैं ।

❇ किताबें - अंतिम बात यह कि एक रचनाकार के लिए किताबें भी बहुत महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं । किताबों में ज्ञान का भण्डार है । किताबों में जो लिखा होता है वह इस मानवजाति का अनुभव ही होता है जिसे एक सार के रूप में लेखक प्रस्तुत करता है । किताबों में अथाह ज्ञान है लेकिन हमें यह तय करना होगा कि कौनसी पुस्तकें हम पढ़ें और कौनसी न पढ़ें । अनुभव प्राप्त करने के लिए कचरा पढ़ना आवश्यक नहीं है । पुस्तकों को भी हम अलग अलग श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं । बहुत सी पुस्तकें तथ्यात्मक जानकारी के लिए पढ़ी जा सकती हैं ।इस तरह हम विभिन्न स्त्रोतों से सामग्री लेकर रचना का निर्माण करते हैं ।

शरद कोकास

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