रविवार, 25 सितंबर 2016

📕 *रचना संवाद:भाग दो* 📕

जीवनानुभव को रचनानुभव में बदलने की कीमियागरी 


दिन -प्रतिदिन के अनुभव- अनुभव शब्द से हम सभी वाकिफ हैं जीवन में हमें अनेक अनुभव होते हैं । हम सुबह जागते हैं तो हमे सूर्य उगता दिखाई देता है । हम रोज़मर्रा के कामों की शुरुआत करते हैं । हमें उस दिन की रोटी का प्रबन्ध करना होता है और उसके लिये घर से बाहर निकलना  होता है । अपनी नौकरी अपने रोज़गार में प्रतिदिन हमारी कितने ही लोगों से मुलाकात होती है । हम किताबें पढ़ते हैं और दूसरों के अनुभवों को भी जानते हैं । हम यात्राएं करते हैं ,लोगों से मिलते हैं , राजनीतिक घटनाक्रम पर नज़र रखते हैं , लोगों के सुख दुःख में शामिल होते हैं इस तरह रोज़ जाने कितने अनुभवों से समृद्ध होते हैं ।

बचपन से प्राप्त अनुभव : हर नया लेखक चाहे किसी भी विषय को लेकर लिखने की शुरुआत करे उसमे उसके बचपन के अनुभव शामिल होते हैं । इसका कारण यही है कि हमारे अवचेतन में सबसे अधिक बचपन के ही चित्र रहते हैं । चलना, बोलना, लिखना - पढ़ना सीखने के अलावा बचपन में और अपने अध्ययन के दौरान हम बहुत कुछ सीखते हैं । हर लेखक अपनी जैविक इच्छाओं ,भय निद्रा मैथुन , आहार के अलावा बाकी सब इस समाज से ही सीखता है । इस तरह हम अपने अनुभवों को अपने मस्तिष्क में दर्ज करते चले जाते हैं । हमारे लेखन में अवचेतन में स्थापित यह अनुभव वर्तमान अनुभवों और अध्ययन के साथ मिलकर रचना में शामिल हो जाते हैं ।

प्रेम कविता से शुरुआत  : कुछ छोटे-मोटे विषयों के अलावा बहुत से लोग अपने लेखन की शुरुआत प्रेम कविताओं से करते हैं । एक संवेदनशील युवा के मन में प्रेम का जन्म लेना स्वाभाविक है । मनुष्य की जैविक इच्छाएं और प्रेम सम्बन्धी उसकी मानसिक आवश्यकता इन तत्वों को जन्म देती हैं इसलिए उसकी प्रारम्भिक रचनायें प्रेम पर ही होती हैं । धीरे धीरे यह प्रेम विश्व के प्रति प्रेम या मानवता के प्रति प्रेम में परिवर्तित होता है । यह कहा भी जाता है कि जो  प्रेम की अच्छी कविता नहीं लिख सकता वह क्रांति की कविता भी नहीं लिख सकता ।यद्यपि बहुत सारे लोगों ने प्रेम कविता से अपने लेखन की शुरुआत नहीं की होगी विश्व के अनेक देशों के लेखकों ने जहाँ उनका बचपन अराजकता भरे माहौल में बीता बहुत गंभीर रचनाओं से शुरुआत की इसलिए कि उनके जीवन के प्रारंभिक अनुभव दुःख से भरे रहे फिर भी प्रेम उनके जीवन में कहीं न कहीं शामिल रहा जो उनकी परवर्ती रचनाओं में आया । हम पाब्लो नेरुदा जैसे कवि को इस श्रेणी में रख सकते हैं

हम अनुभव कैसे प्राप्त करते हैं इस पर भी कुछ बात कर ली जाये । अनुभव दो तरीके से प्राप्त किये जा सकते हैं स्वयं के द्वारा और अन्य माध्यमो से  । यह तय है कि अपनी इन्द्रियों के माध्यम से स्वयं के द्वारा प्राप्त अनुभव सर्वश्रेष्ठ होते हैं और उनका रचना में रूपांतरण निस्सन्देह अच्छा होता है । लेकिन आज के समय में मीडिया और अन्य माध्यमों के द्वारा हम अन्य व्यक्तियों के अनुभव को भी जस का तस ग्रहण कर सकते हैं और उनके अनुभवों पर विश्वास करते हैं । फिर भी सुनी हुई बातों के अलावा अन्य के अनुभवों की सच्चाई और उनकी तीव्रता को परखने की आवश्यकता होती है और केवल सुनी सुनाई बातों पर लिखना सन्दिग्ध हो सकता है । प्रत्यक्ष अनुभव पर भी लिखना सरल नहीं होता क्योंकि उनमें हमारी मान्यताओं में समाज की मान्यतायें भी शामिल हो जाती हैं और ज़रूरी नहीं कि वे शत प्रतिशत सही हों । इसलिये रचनाकार को अन्य माध्यम से भी उसकी पुष्टि करनी होती है अन्यथा रचना में तथ्यात्मक भूलों की सम्भावना बढ़ जाती है ।अधिकांश अनुभव हम सीधे प्राप्त करते हैं । यह अनुभव सर्वाधिक प्रामणिक होता है ।अनुभव को हम अपने अवचेतन में किस तरह दर्ज करते हैं यह अनुभव की तीव्रता पर भी निर्भर होता है । इसके लिये मुख्यत: हमारी संवेदन क्षमता ज़िम्मेदार है । यह क्षमता जितनी अधिक होगी अनुभव को हम उतनी ही तीव्रता से ग्रहण  कर सकेंगे ।

यहाँ हम वर्तमान में चल रहे स्त्री विमर्श और दलित विमर्श के सन्दर्भ में देखें । ऐसा  माना जाता है कि जो अनुभव स्वयं के द्वारा प्राप्त नहीं हैं उन्हें रचना में बेहतर तरीके से प्रस्तुत नहीं किया जा सकता और वह रचना प्रामाणिक नहीं मानी जा सकती । गैर दलितों द्वारा दलितों पर लिखे साहित्य को इसीलिये नकार दिया गया क्योंकि उसमे वह भोगा हुआ यथार्थ नहीं था । साहित्य में यह बहस अब तक चल रही है । उसी तरह हम स्त्री के सन्दर्भ में भी कह सकते हैं । स्त्री की सामजिक स्थिति एक सार्वजनिक अनुभव हो सकती है लेकिन स्त्री के शरीर में होने वाले हार्मोनल परिवर्तन और फलस्वरूप उपजी मन:स्थिति को कोई पुरुष समझ ही नहीं सकता । स्त्री के द्वारा किये जा रहे ऑब्ज़रवेशंस और उसकी दृष्टि तक ठीक ठीक पहुँच पाना भी पुरुष के लिये असंभव है इसलिये स्त्री द्वारा स्त्री पर रचा साहित्य उसके अनुभव के अधिक करीब होता है । स्त्री या पुरुष लेखक भले ही कह ले कि रचना को जन्म  देने की पीड़ा प्रसव वेदना जैसी होती है लेकिन वास्तविकता सभी जानते हैं कि प्रसव वेदना को बगैर उसके अनुभव के  नहीं जाना जा  सकता  ।

स्वार्जित अनुभव और लेखन यह एक लम्बी बहस का विषय है  प्रश्न यह है कि यदि हम उस वर्ग से नहीं आये हैं तो क्या हम उस वर्ग पर रचना न करें ? यहाँ मैं वरिष्ठ कवि भगवत रावत के कथन को उद्ध्रत करना चाहूँगा  । वे कहते हैं “  मैं ब्राह्मण हूँ । पूरी तरह से आयडेंटीफिकेशन करने के बाद भी समाज ने मुझे ब्राह्मण के नाते स्वीकृति व संस्कार दे रखे हैं । क्या मैं उस वर्ग का आयडेंटिफिकेशन कर सकता हूँ ? डायरेक्ट अनुभव अधिक प्रामाणिक हैं । इसमें बहस की गुंजाइश नहीं है। रचनाकर्म के नाते हम मेहदूद हैं । हमारे अनुभव फंडामेंटल राइट हैं । आधार पर टिककर अन्य घटनाओं के बारे में पढ़कर सुनकर देखकर रियेक्ट करते हैं । नीग्रो के बारे मे हम किताब लिखते हैं , यहाँ हमारा अनुभव सोर्स का नहीं है, अत: हम रचना न करें यह ठीक नहीं है । व्रहत्तर समाज के प्रति सम्वेदना की विश्वदृष्टि से  हम आन्दोलित होते हैं । ये अनुभवों के दो रूप हमारे सामने हैं । जब तक हमारे पास डायरेक्ट अनुभव है , हम किसी दूसरे के अनुभव तक नहीं पहुंच सकते। बहुत से अनुभव अनकांशसली ग्रहण करते हैं । दूसरे रचनाकारों को पढ़ने तथा विश्वदृष्टि विकसित करने से हम नीग्रो के अनुभवों  तक भी पहुंच सकते हैं - करीब करीब । 

इसलिये कहा जा सकता है कि अन्य व्यक्तियों के जीवनानुभव  को भी बेहतर तरीके से रचना में अभिव्यक्त किया जा सकता है इसलिये कि वर्तमान में वैश्विक परिवेश के अंतर्गत कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिन पर सार्वजनिन दृष्टि निर्मित हो चुकी है जैसे कि आतंकवाद । इस पर रचना लिखने के लिये आवश्यक नहीं कि हम उसके शिकार हों । उसी तरह दंगे पर कविता लिखने के लिये भी अपना घर जलाना ज़रूरी नहीं है ।

अनुभव को रचना में बदलने की शक्ति क्या दैवीय शक्ति है -  अब हम अपने व्यक्तिगत अनुभवों को रचनानुभव में बदलने के बारे में कुछ बातें विस्तार से देखेंगे ।वरिष्ठ कथाकार  रमाकांत श्रीवास्तव ने एक रचना शिविर मे अपने व्याख्यान में गोर्की के एक लेख का उल्लेख किया था  । इस लेख में मक्सिम गोर्की ने एक लड़की  के बारे में बताया है  जिसने उन्हे पत्र में लिखा था कि मै पन्द्रह वर्ष की हूँ ,परंतु इस अल्पायु में ही मुझ में लेखन की प्रतिभा जागृत हो उठी है ,जिसका कारण मेरा दारुण नीरस जीवन है । रमाकांत जी कहते हैं “  नीरस जीवन को कल्पना से सुन्दर बनाने के प्रयास को भी लिखने का आधार स्वीकार करते हुए गोर्की ने प्रश्न उठाया है , कैसे जीवन की इन स्थितियों में आदमी किसी चीज़ के बारे में लिख सकता है ? लेखन के सम्बन्ध में अनुभव एक बुनियादी प्रश्न है । क्योंकि यही रचना के भावी स्वरूप को तय करने वाला तत्व है । कोई यह भी कह सकता है कि अनुभूतियों का दबाव मुझे बाध्य कर रहा है कि मैं लिखूँ । यह बात भी बुरी नहीं है बल्कि तर्कसम्मत है । कम से कम ये दोनो ही स्थितियाँ समझ मे आनेवाली हैं । किसी  हीनता की ग्रंथि से रचना जन्म लेती है या अचानक किसी भाव के विस्फोट से पैदा होती है । इन फिकरों से ये मानसिक दशायें फिर भी बेहतर हैं । रचनानुभूति कोई दैवी वरदान है यह भ्रम केवल मध्ययुग तक कायम नहीं रहा । निकट अतीत तक रूमानी कलाकारों को यह लगता था  कि उनका स्वर किसी दैवी शक्ति का माध्यम भर है । कोई अपनी पीड़ा को कोई अपने प्यार को अपनी रचना की प्रेरणा मानने पर आमादा रहा ।  भले ही हम इसे दैवी शक्ति माने या लेखन की प्रतिभा को जन्मजात माने लिखने की प्रेरणा हमें अपने अनुभवों की वज़ह से ही मिलती है । जीवनानुभव को रचनानुभव में बदलने की शक्ति हमें हमारे प्रयास से ही मिलती है वर्ना दुनिया में करोड़ों लोग हैं जिनके पास एक लेखक से ज़्यादा अनुभव होते हैं लेकिन वे रचनाकार नहीं हो सकते ।

केवल अनुभव पर्याप्त नहीं - इस तरह हम देखते हैं कि मनुष्य की निजी अनुभूति उसकी रचना में सहायक बन सकती है । वह अपने अनुभवों को रचना में रूपांतरित कर सकता है । लेकिन ख़तरा यह है कि केवल इस तरह से लिखी रचना में रूमानी भावुकता हो सकती है और कालांतर में महत्वहीन साबित हो सकती है  अतः रचना की सार्थकता ज़रूरी है । मैं पुन: रमाकांत जी को उद्ध्रत करना चाहूंगा । “ 
जीवनानुभव को रचना में रूपांतरित करने के लिये सबसे महत्वपूर्ण है रचनाकार की दृष्टि । रचनाकार के पास एक सांस्कृतिक व ऐतिहासिक चेतना होती है ,वह अपनी इसी चेतना का उपयोग रचना में करता है । यह दृष्टि भी उसे जन्म से नहीं प्राप्त होती ,वह यह दृष्टि अर्जित करता है । जब यह दृष्टि उसकी प्रवृत्ति बन जाती है तब वह उसे अपनी रचना को एक विशेष आकार देती है । इसे हम कई बार विचारधारा का नाम भी देते हैं । लेकिन यह जस का तस कविता में नहीं आता हम अपने विचार की रोशनी में चीज़ों को देखते हैं और तदनुसार उसे अपनी रचना में उतारते हैं । जैसे कि हर कारीगर समाज से संसाधन जुटाता है लेकिन उसे उसी रूप में वापस नहीं करता । जैसे कुम्हार समाज से मिट्टी लेता है लेकिन उसका मटका बना कर वापस करता है । टोकरी बुनने वाला प्रकृति से बाँस लेता है और उसकी विभिन्न वस्तुएँ बनाता है । हम आज की आधुनिक वस्तुओं को भी देखे तो उनका मूल कहीं न कहीं प्रकृति में ही है । ठीक इसी तरह रचना के साथ भी होता है ,हम समाज से अनुभव के रूप में जो कुछ भी लेते हैं उसे रचना के रूप में लौटाते हैं । ऐसा हर दौर में हुआ है कि उस काल का जीवन उस काल की रचनाओं में आया है ।  


शरद कोकास  

1 टिप्पणी:

  1. सारगर्भित आलेख
    आपसे बहुत सीखने को मिलता है
    सादर

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