रविवार, 6 सितंबर 2009

तो कामायनी की ऐसी तैसी हो जाती

आलोचक बच्चन सिंह ( 2 जुलाई 1919- 5 अप्रेल 2008 ) आलोचना,क्रांतिकारी कवि निराला,हिन्दी नाटक, समकालीन साहित्य, आलोचना की चुनौती।आलोचक और आलोचना,साहित्य का समाजशास्त्र,हिन्दी आलोचना के बीज शब्द जैसी पुस्तकों के रचयिता है । "सापेक्ष" के आलोचना अंक से महावीर अग्रवाल और बच्चन सिंह की बातचीत से यह अंश मैने लिया है और चित्र साभार ,कवि चित्रकार इरफान के ब्लॉग "टूटी हुई बिखरी हुई से"


बच्चन सिंह ने कहा था


रचनाकारों का कहना है कि आलोचक रचनाओं को बिना पढ़े ही आलोचना लिखते हैं और आलोचक का कहना है कि रचनाकार समीक्षाओं को बिना पढ़े ही रचनात्मक साहित्य लिखते हैं । ये आरोप प्रत्यारोप बेमाने ही नहीं उपहासास्पद भी हैं आलोचक रचनाकार का निर्देशक नहीं हो सकता । रचना और आलोचना अलग-अलग साहित्यिक अनुशासन हैं । रचनाकार अपनी आलोचनायें पढ़ता अवश्य है लेकिन पढ़कर सरका देता है । यदि जयशंकर प्रसाद जी या मुक्तिबोध जी की आलोचनायें पढ़कर कामायनी लिखते तो कामायनी की ऐसी तैसी हो जाती । बहुत से आलोचक ऐसे भी हैं जो अत्यंत कटु भाषा का प्रयोग करते हैं । रवि बाबू को इनसे पाला पड़ा था । वे इन्हे साहित्यिक गुंडे कहते हैं। कीट्स और वर्ड्सवर्थ को भी इन्होने तंग किया था । हिन्दी में ऐसे ही आलोचकों ने आधुनिक काल के सर्वश्रेष्ठ कवि निराला को विक्षिप्त कर दिया था


आजकल अनेक आलोचकों का रुझान सांस्कृतिक आलोचना की ओर बढ़ा है भारत अनेक संस्कृतियों का देश है । भाषा,देश-काल ,स्थानिकता ,खानपान, त्योहार, उत्सव , रीति-नीति ,वेष-भूषा के आधार पर उनमे सूक्ष्म भेद किया जा सकता है । बंगाल ,हिन्दी भाषी क्षेत्र ,तमिलनाडु , केरल , महाराष्ट्र ,कर्नाटक ,पूर्वोत्तर प्रदेश गुजरात आदि मे थोड़ी- बहुत भिन्नता पाई जाती है पर इनमें नैकट्य ,एकत्व ,बन्धुत्व की कमी नही है इन्हे एक भारतीय छतरी की छाँह मे रखा जा सकता है । पर धर्म के आधार बनी संस्कृतियाँ जैसे मुस्लिम ईसाई उस छतरी में नहीं समा पाते हैं लेकिन इन सभी संस्कृतियों मे एक तरह का सहअस्तित्व रहता है । इनमे आपस में आवा जाही बन्द नही होती । अत: इनके आधार पर एक भारतीय संस्कृति की भावात्मक परिकल्पना या संरचना की जा सकती है ।

इधर विश्वग्राम का झुनझुना थमा कर तीसरी दुनिया को अपने साँस्कृतिक साम्राज्यवाद का शिकार बना कर विकसित पूंजीवादी देश महान हैं । वे अपनी पूंजीवादी संस्कृति को चमकदार बनाकर तीसरी दुनिया को बेच रहे हैं । संस्कृति को उन्होने पदार्थ ( कमोडिटी) बना रखा है विश्वग्राम एक प्रकार का सांस्कृतिक उद्योग हैं। इसके माध्यम से वे तीसरी दुनिया को सांस्कृतिक उपनिवेश में बदलने का उपक्रम कर रहे हैं । अब तीसरी दुनिया जाग उठी है । उसे अपनी संस्कृति को बचाना जरूरी होगा । इसलिये वह अपनी देशी भाषा , साहित्य के रूप में और कथ्य को अपनी परम्परा के अनुरूप ढाल रही है । उसका अपना नारा है अपनी जड़ों की ओर लौटो इन्ही जड़ों से स्वस्थ्य परिवर्तन भी होगा । इसी सन्दर्भ में उसे अपने साहित्य का नया मूल्यांकन करना पड़ा है । जब जब परिवेश बदलेगा तब तब पुनर्मूल्यांकन अपेक्षित होगा

( बच्चन सिंह जी के यह विचार इन अर्थों में महत्वपूर्ण है कि वे इस बदलते हुए परिवेश में साहित्य के पुनर्मूल्यांकन की मांग करते हैं , क्या यह पुनर्मूल्यांकन उचित है ? क्या यह पुन: नये विवाद को जन्म नहीं देगा ? बच्चन सिंह जी ने भारतीय छतरी की जो परिभाषा दी है वह पर्याप्त है ? आपके महत्वपूर्ण विचार सादर अपेक्षित हैं ।--शरद कोकास)

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8 टिप्‍पणियां:

  1. सहमत हैं हम आपकी बातों से , पर युग धर्म से कोई बच पाया है क्या ।

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  2. कामायनी की मुक्तिबोध द्वारा की गई आलोचना का सिर पैर मुझे समझ में नहीं आया था। कुछ अधिक ही खींच कर कही गई बात !
    एक बार उस पर लेख दीजिए।
    जगह जगह 'संस्क्रति' प्रयोग हुआ है, ठीक करें 'संस्कृति'।
    तामिलनाडु नहीं तमिलनाडु।
    छत्री नहीं छतरी।

    इतनी तेज बदलती और बन्ध तोड़ती दुनिया में अपनी जड़ों की ओर कैसे लौटें? सबसे पहले पता तो चले कि जड़ें हैं क्या? कहाँ?

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  3. साहित्य का पुनर्मूल्याकंन सत्यतः विभिन्न बदलती हुई परिस्थितियों में जरूरी होगा - सहमत हूँ ।

    प्रविष्टि का आभार ।

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  4. मुझे तो विचार आत्मसात करने लायक हैं...विवाद कैसा...हाँ, विमर्श की संभावनाओं को नहीं नकारता!

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  5. आजकल हम भी कामायनी ही पढ़ रहे हैं, ये मुक्तिबोधजी की आलोचना पर पढने की हमें भी तीव्र इच्छा है।

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  6. उसका अपना नारा है अपनी जड़ों की ओर लौटो । इन्ही जड़ों से स्वस्थ्य परिवर्तन भी होगा । इसी सन्दर्भ में उसे अपने साहित्य का नया मूल्यांकन करना पड़ा है । जब जब परिवेश बदलेगा तब तब पुनर्मूल्यांकन अपेक्षित होगा ।
    मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ।मुकतिबोध की आलोचना भी दे सकें तो कृपा होगी

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